बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत पड़ोसी देशों के साथ साल 2024 में कैसे रहे मोदी सरकार के रिश्ते

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2024 में भारत के ज्यादातर पड़ोसी देशों में राजनीतिक उथल-पुथल मची रही. कई ऐसी घटनाएं हुईं जिससे भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कहीं-कहीं कड़वाहट महसूस की गई.
बांग्लादेश से लेकर मालदीव तक ने भारत को कई मौकों पर मुश्किल में डालने का काम किया. वहीं चीन के साथ सीमा विवाद पर प्रगति भी देखने को मिली.
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, तब तमाम पड़ोसी देशों के प्रमुख भारत पहुंचे थे.
शपथ समारोह और उसके बाद के शुरुआती सालों में पीएम मोदी ने सिर्फ पड़ोसी देशों की यात्रा की. इससे साफ हो गया कि भारत की विदेश नीति में पड़ोसी देशों को सबसे अधिक महत्व दिया जाएगा.
इस नीति को औपचारिक तौर पर 'नेबरहुड फर्स्ट' या 'पड़ोसी सबसे पहले' के तौर पर जाना गया. हालांकि इस नीति की अवधारणा 2008 में सामने आई थी.
इसे अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया था.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

बांग्लादेश के साथ बढ़ता तनाव

इमेज स्रोत, Getty Images
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने दो बार बांग्लादेश की यात्रा की है. एक बार वे 6 जुलाई, 2015 को और दूसरी बार 26 मार्च, 2021 को वहां पहुंचे थे.
अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख़ हसीना की सत्ता खत्म होने के बाद दोनों देशों के संबंध बदल गए. वे पांच अगस्त से भारत में हैं.
इससे पहले तक दोनों देशों के नेताओं के बीच सार्वजनिक तौर पर तालमेल नजर आता था, लेकिन अब बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ है.
भारत लगातार बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से शिकायत कर रहा है कि वह हिंदुओं समेत बाक़ी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही है.
दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर व्यापार पर भी पड़ रहा है. भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक अगस्त 2023 की तुलना में अगस्त 2024 में भारत का निर्यात 28 फीसदी गिरा है.

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज का मानना है कि बांग्लादेश की राजनीतिक उठापटक उनका आंतरिक मसला है और उसके चलते भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं आया है.
वो कहते हैं, "भारत की हमेशा से नीति रही है कि अपने विकास के साथ पड़ोसी देश को आर्थिक रूप से मजबूत करे और वहां राजनीतिक स्थिरता बनी रहे."
भारद्वाज का मानना है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां जमात और एंटी अवामी लीग शक्तियां मजबूत हुई हैं, जिसके कारण वह पाकिस्तान के क़रीब जा रहा है.
वो कहते हैं, "ये वो लोग हैं जो चाहते थे कि बांग्लादेश कभी पाकिस्तान से अलग ना हो, ऐसे में उनका पाकिस्तान की तरफ झुकाव बहुत सामान्य है, वहीं चीन के संदर्भ में देखें तो शेख हसीना की सरकार और अब की सरकार में कोई खास फ़र्क नहीं है. मोहम्मद यूनुस भी चीन के साथ संतुलन साध रहे हैं."
वहीं, विदेशी मामलों के जानकार और 'द इमेज इंडिया इंस्टीट्यूट' के अध्यक्ष रॉबिंद्र सचदेव का मानना है कि साल 2024 में भारत को सबसे बड़ा झटका अपने पड़ोसी बांग्लादेश से लगा है, जो 'नेबरहुड फ़र्स्ट' की नीति को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा.
वो कहते हैं, "शेख हसीना के बांग्लादेश में ना रहने से पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद भी बढ़ सकता है, क्योंकि उनके समय में उग्रवादियों को वहां शरण नहीं मिलती थी, लेकिन अब उन्हें एक बार फिर से खुद को मजूबत करने का मौका मिल सकता है."
नेपाल के साथ भारत के रिश्ते

इमेज स्रोत, Getty Images
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी अब तक पांच बार नेपाल की यात्रा कर चुके हैं. 2019 के बाद वे सिर्फ़ एक बार मई, 2022 में नेपाल गए थे.
दोनों देश क़रीब 1750 किलोमीटर की सीमा साझा करते हैं.
फिलहाल नेपाल की सत्ता कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष खड्ग प्रसाद (केपी) शर्मा के हाथों में है. उन्हें भारत विरोधी माना जाता है.
ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल की आधिकारिक वेबसाइट पर ओली का परिचय दिया है.
वेबसाइट ने गर्व से बताया है कि कम्युनिस्ट शासन स्थापित करने की कोशिशों में उन्हें क्या-क्या झेलना पड़ा है, अपनी ज़िंदगी के 14 साल उन्हें क़ैद में बिताने पड़े.
उन्हें एक क्रांतिकारी और समाजवादी नेता के तौर बताया गया है.
चौथी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने पहला विदेशी दौरा चीन का किया. पारंपरिक रूप से नेपाल के प्रधानमंत्री कमान संभालने के बाद भारत का दौरा करते हैं,
दिसंबर, 2024 में केपी ओली की सरकार ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड एनिशिएटिव यानी बीआरआई के नए फ्रेमवर्क पर समझौता किया है.
मोरक्को के बाद नेपाल दूसरा देश है, जिसने बीआरआई के नए फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए हैं.
यह एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जिसके सहारे चीन पश्चिम के दबदबे वाले वर्ल्ड ऑर्डर को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है.
प्रोफेसर संजय भारद्वाज का मानना है कि नेपाल, भारत और चीन के बीच संबंधों में संतुलन बनाकर रखना चाहता है.
वो कहते हैं, "केपी ओली चीन के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं, लेकिन वे भारत को भी नहीं छोड़ना चाहते. वे चीन से मिलने वाले फायदों को दरकिनार नहीं करना चाहते."
साल 2015 में नेपाल ने भारत पर अघोषित नाकाबंदी करने का आरोप लगाया, अक्टूबर 2019 में कालापानी और लिपुलेख इलाकों को भारत के नक्शे में दिखाने पर विवाद हुआ, 2023 में संसद भवन में भारतीय उपमहाद्वीप की लगाई तस्वीर पर नेपाल नाराज हुआ.
प्रोफेसर संजय भारद्वाज कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में जरूर कई विवाद नेपाल के साथ सामने आए, लेकिन साल 2024 में दोनों देशों के बीच संबंधों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है और ना ही कोई बड़ा विवाद सामने आया है.
पाकिस्तान के साथ रिश्ते

इमेज स्रोत, Getty Images
दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ एक बार यात्रा की है. इसमें एक नाम पाकिस्तान का भी है.
अपने पहले शपथग्रहण समारोह में नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को बुलाया था.
वो शरीफ के जन्मदिन पर अचानक लाहौर भी पहुंचे थे, लेकिन पठानकोट, उरी, पुलवामा और फिर बालाकोट के चलते दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ा, जो लगातार जारी है.
हालांकि, साल 2024 में पाकिस्तान राजनीतिक अनिश्चितता और आर्थिक अस्थिरता में उलझा रहा.
राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान ने शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन की मेजबानी की और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर इस्लामाबाद पहुंचे.
इससे पहले साल 2015 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस्लामाबाद गई थीं.
सम्मेलन में बोलते हुए जयशंकर ने आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद को लेकर एक बार फिर से पाकिस्तान को नसीहत दी.
विदेशी मामलों के जानकार और 'द इमेज इंडिया इंस्टीट्यूट' के अध्यक्ष रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं, "भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सालों से ठंडे बस्ते में पड़े हैं और साल 2024 में इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया."
वो कहते हैं, "जब तक पाकिस्तान ,भारत विरोधी प्रोपेगेंडा और सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को नहीं रोकता, तब तक रिश्ते पटरी पर नहीं लौटेंगे."
वहीं, दूसरी तरफ साल 2024 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2025 के आयोजन को लेकर दोनों देशों के बीच घमासान रहा.
चैंपियन ट्रॉफी की मेजबानी पाकिस्तान के पास है, लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान जाने से साफ़ इनकार कर दिया.
अब हाइब्रिड मॉडल में चैंपियन ट्रॉफी का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें भारत अपने सभी मुकाबले दुबई में खेलेगा.
मालदीव से क्या पटरी पर लौटे संबंध

इमेज स्रोत, Getty Images
नवंबर 2023 में मोहम्मद मुइज्ज़ू मालदीव के राष्ट्रपति बने. उन्होंने अपने चुनाव अभियान में 'इंडिया आउट' यानी भारत को देश से बाहर करने का नारा दिया था.
उनके सत्ता में आने के बाद भारत और मालदीव के संबंधों में तनाव चरम पर आ गया था और ये साल 2024 में भी जारी रहा.
साल के शुरुआत में नरेंद्र मोदी लक्षद्वीप गए थे और उन्होंने कुछ तस्वीरें शेयर करते हुए लोगों से यहां आने की अपील की थी.
इस अपील के बाद मालदीव के कुछ मंत्रियों ने मोदी और भारत विरोधी टिप्पणी की, जिससे दोनों देशों के बीच एक नया विवाद फिर से खड़ा हो गया.
रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं, "मालदीव के साथ भारत के अच्छे रिश्ते थे लेकिन मुइज्ज़ु के आने के बाद संबंध पटरी से उतरे, क्योंकि उन्होंने ऐसे भारत विरोधी बयान दिए जो आज तक नहीं दिए गए हैं."
वो कहते हैं, "मालदीव की सरकार चीन की तरफ झुकती रही है, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि भारत बिल्कुल ही बैकफुट पर आ गया, जो भारत के लिए चिंता की बात है. मुइज्जु के आने से वहां चीन की मौजदूगी बढ़ी है, जो खतरे की घंटी की तरह है."
सचदेव कहते हैं कि सोशल मीडिया पर एक अलग ही माहौल दिखाई दे रहा था, लेकिन इसके बावजूद भारत ने बहुत ही संतुलित बयान दिए.
वो कहते हैं, "अगस्त 2024 में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तीन दिन की मालदीव यात्रा की और कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए. अब लग रहा है कि मालदीव, भारत को लेकर सहज हो रहा है."
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से बातचीत

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं. 1947 तक भारत की सीमा भी अफ़ग़ानिस्तान से सटी हुई थी.
90 के दशक में तालिबान जब सत्ता में आए थे तो भारत ने उनको मान्यता नहीं दी थी. लेकिन, 2001 में 9/11 हमलों के बाद अमेरिकी सेना अफ़ग़ानिस्तान में आ गई और तालिबान की सत्ता चली गई.
भारत ने इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में एक बार फिर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और पिछले 20 सालों में तीन अरब डॉलर से भी ज़्यादा का निवेश किया.
जून, 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान का दौरा भी किया, लेकिन भारत के प्रयासों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब अगस्त, 2021 में तालिबान ने दूसरी बार अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया.
उस वक्त जानकारों का मानना था कि तालिबान के राज में भारत को वो स्पेस नहीं मिलेगी जो अशरफ गनी के समय में मिलता थी, क्योंकि भारत ने तालिबान को ना तो पहले मान्यता दी थी और ना ही अब दी है.
रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं, "साल 2024 में क़तर के जरिए भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बातचीत बढ़ी है. दोनों देशों ने पर्दे के पीछे रहकर काफी होमवर्क किया है, जिसके नतीजे साल 2025 में देखने को मिलेंगे."
वो कहते हैं, "इस बीच अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत ख़राब स्तर पर पहुंच गए हैं, जो भारत के लिए फायदेमंद है. अगर तालिबान सरकार पाकिस्तान के करीब जाती तो न सिर्फ भारत की मुश्किलें बढ़ती बल्कि पाकिस्तान को रणनीतिक बढ़त भी मिलती."
'श्रीलंका का सच से सामना'

इमेज स्रोत, Getty Images
श्रीलंका की विदेश नीति में भारत की जितनी अहमियत है, उतनी ही अहमियत भारत के लिए श्रीलंका की रही है.
भारत और चीन दोनों श्रीलंका को अपने कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों में तरजीह देते रहे हैं.
इसकी एक बड़ी वजह हिंद महासागर में श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति है, जो रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है.
साल 2022 में श्रीलंका में सरकार के खिलाफ़ बगावत हो गई. जनता ने राष्ट्रपति आवाज समेत कई सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति गोटाबाया को देश छोड़कर भागना पड़ा.
भारत ने आर्थिक संकट में डूबे श्रीलंका की आगे बढ़कर मदद की और आखिरकार साल 2024 में वहां एक नई सरकार का गठन हुआ.
22 सितंबर को आए नतीजों में वामपंथी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके ने राष्ट्रपति चुनावों में जीत दर्ज की.
प्रोफेसर संजय भारद्वाज का कहना है, "दिसानायके ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर यह संदेश दिया है कि श्रीलंका भारत के साथ मजबूत साझेदारी चाहता है."
वहीं एक्सपर्ट रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं कि आर्थिक संकट और लोन रिस्ट्रक्चरिंग में जिस तरह से भारत ने श्रीलंका की मदद की थी, उसने श्रीलंका का यह बताया कि असल में उसका सच्चा दोस्त कौन है.
वो कहते हैं, "लोन रिस्ट्रक्चरिंग में चीन ने श्रीलंका की मदद करने से मना कर दिया था, जबकि भारत उसके साथ खड़ा था."
इस मुश्किल घड़ी में भारत ने जो मदद की थी, उसकी सराहना दिसानायके ने भी की. उन्होंने ये भी कहा कि श्रीलंका की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ़ किसी भी तरह से नहीं होने देंगे
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित












