बांग्लादेश में बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी भारत के नाम पर आपस में ही क्यों भिड़े

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बांग्लादेश में शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ वहाँ की सारी राजनीतिक पार्टियां एकजुट दिख रही थीं लेकिन अब इनके आपसी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं.
ऐसा लग रहा है कि बांग्लादेश में कौन भारत को लेकर ज़्यादा आक्रामक है, इसकी होड़ चल रही है. बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी इसी को लेकर आपस में भिड़ गए हैं.
दूसरी तरफ़ चुनाव को लेकर भी अंतरिम सरकार से मतभेद बढ़ रहा है.
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और अंतरिम सरकार के बीच मतभेद बढ़ता जा रहा है.
देश में वोट देने की न्यूनतम उम्र 17 साल करने की अंतरिम सरकार के सुझाव के बाद बीएनपी का कहना है कि इससे चुनाव में और देरी ही होगी.
बांग्लादेश में कई लोग ये आरोप लगा रहे हैं कि अंतरिम सरकार जानबूझकर चुनाव में देरी कर रही है.
बांग्लादेश के एक पत्रकार सलाहुद्दीन शोएब चौधरी ने एक्स पर लिखा है कि पहले मोहम्मद यूनुस और उनके छात्र समर्थकों ने शेख़ हसीना को सत्ता से बाहर किया और अब चुनाव नहीं करा के ये बीएनपी को भी रास्ते से हटाना चाहते हैं.
हालांकि, मोहम्मद युनूस ने हाल ही में कहा था कि 2025 के अंत में चुनाव होंगे.
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने हिसंक विरोध प्रदर्शन के बाद पाँच अगस्त को अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था और वह देश छोड़कर भारत आ गईं थीं.
उनके देश छोड़ने के बाद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मोहम्मद युनूस ने देश में अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर शपथ ली थी. अंतरिम सरकार के गठन के बाद प्रशासन के शीर्ष पदों पर बड़े पैमाने पर बदलाव हुए थे.

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एक तरफ़ जहाँ शेख़ हसीना के साथ ही उनकी पार्टी अवामी लीग के सांसदों और मंत्रियों के ख़िलाफ़ हत्या समेत अलग-अलग आरोपों में मामले दर्ज होने का सिलसिला शुरू हुआ, वहीं बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी बीएनपी की अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया के ख़िलाई कई मामलों में सज़ा रद्द कर दी गई.
जमात-ए-इस्लामी के भी कई नेता और कार्यकर्ता जेल से रिहा हुए.
शेख़ हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद ऐसा लग रहा था कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, विपक्षी दल बीएनपी, जमात और आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले छात्र नेता आपस में एकजुट हैं लेकिन अब क़रीब छह महीने के बाद इनके बीच मतभेद उभरने लगे हैं.

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जमात पर बीएनपी का हमला
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के महासचिव रुहुल कबीर रिज़वी ने जमात-ए-इस्लामी पर आरोप लगाया है कि वो भारत के साथ अपने रिश्ते अच्छे करने के लिए शेख़ हसीना को माफ़ कर देना चाहता है.
उन्होंने 29 दिसंबर को कहा था, "देश की एक इस्लामिक राजनीतिक पार्टी तानाशाह शेख़ हसीना को पड़ोसी देश भारत के साथ रिश्ते अच्छे करने के लिए माफ़ कर देना चाहती है. वो पार्टी जिसने 1971 में देश के मुक्ति युद्ध का विरोध किया था, वो अब इस कठिन समय में अपने लिए अवसर तलाश रही है."
रिज़वी ने कहा, "जुलाई-अगस्त की क्रांति 16 साल के लगातार आंदोलन का नतीजा थी."
रिज़वी ने कहा है कि बीएनपी ने कभी भी लोकतांत्रिक मूल्यों को पीछे नहीं छोड़ा, वो उसके साथ है.
उन्होंने कहा, "बीएनपी जनता से किए अपने वादों से कभी पीछे नहीं हटी है. 1971 से लेकर पांच अगस्त तक बीएनपी लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ रही है."
बीएनपी के नेता ने ये भी आरोप लगाया है कि शेख़ हसीना की अवामी लीग ने जहाँ पाँच अगस्त से पहले बैंकों को लूटा, वहीं, इसके बाद एक इस्लामिक समूह ने भी ऐसा ही किया.
जमात-ए-इस्लामी पार्टी ने रिज़वी के आरोपों पर सिलसिलेवार तरीक़े से जवाब दिया है.

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रिज़वी के बयान पर बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का जवाब
बीएनपी के संयुक्त महासचिव रिज़वी के आरोपों को बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने ख़ारिज किया है.
पार्टी ने इन बयानों को प्रॉपेगैंडा क़रार देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी किया है.
बांग्लादेश जमात ए-इस्लामी को संक्षेप में जमात भी कहते हैं. भारत विभाजन से पहले 1941 में बनी इस पार्टी के संस्थापक सैयद अबुल अला मौदूदी थे. विभाजन के बाद ये पाकिस्तान चले गए और फिर पार्टी के पूर्वी धड़े से बांग्लादेश जमात ए-इस्लामी का जन्म हुआ.
1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पार्टी के कई नेताओं पर अत्याचार के संगीन आरोप लगे थे.
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव मौलाना रफीकु़ल इस्लाम ख़ान ने बीएनपी को जवाब दिया है.
जवाब में कहा है, "बीएनपी नेता रुहुल कबीर रिज़वी का 'जमात भारत से अच्छे रिश्ते के लिए शेख़ हसीना को माफ़ करना चाहता है' वाला बयान न केवल ग़लत और आधारहीन है बल्कि राजनीति से प्रेरित भी है."
रिज़वी के बीएनपी पर देश के कठिन समय में अपना फ़ायदा खोजने के दावे और 1971 में मुक्ति युद्ध में शामिल नहीं होने के बयान पर जमात ने कहा है, "पिछले कुछ दशकों से इस तरह का प्रॉपेगैंडा चल रहा है और जनता ने बहुत पहले ही इस तरह की बातों को ख़ारिज कर दिया है. जमात-ए-इस्लामी के बारे में इस तरह की भ्रामक बातें करके वो क्या हासिल करना चाहते हैं?''
जमात ने बीएनपी को जवाब देते हुए कहा है, "उन्होंने (बीएनपी नेता रिज़वी) आरोप लगाया है कि जमात इस्लाम के नाम पर राजनीति करती है. दरअसल, जमात इस्लाम के नाम पर राजनीति नहीं करती है बल्कि इस्लामिक सिद्धांतों के आधार पर राजनीति करती है. जमात ने कभी भी इस देश के लोगों के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया है."
जमात ने रिज़वी को जवाब देते हुए कहा, "देश में लोग उनके इस बयान से हैरत में हैं कि जमात भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए शेख़ हसीना को माफ़ करना चाहता है. इस तरह के आरोप लगाने से पहले उन्हें आत्ममंथन करने की ज़रूरत है. लोगों को अच्छी तरह पता है कि कौन बार-बार भारत की यात्रा कर रिश्ते सुधारना चाहता है."
जमात-ए-इस्लामी ने कहा है, ''हमारी राजनीति भारत के आधिपत्य और फासीवाद के ख़िलाफ़ है और यही वजह है कि रिज़वी नाराज़ हो गए हैं.''

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जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी के बीच अतीत में गठबंधन
जमात-ए-इस्लामी (जेआई) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच अतीत में गठबंधन हो चुका है. क्या शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद बीएनपी और जेआई के बीच गठबंधन होगा?
जेआई की राजनीतिक विचारधारा इस्लामी धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है. जेआई के प्रकाशन 'ऐन इंट्रोडक्शन टू बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी' के अनुसार, बांग्लादेश को इस्लामी लोक कल्याणकारी राज्य बनाना है.
मौदूदी इस्लामी सरकार और शरिया क़ानून की वकालत करते थे. जेआई की राजनीतिक विचारधारा बीएनपी से मेल नहीं खाती है. बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक़ रहमान कहते रहे हैं कि राजनीति धर्म से प्रभावित हो सकती है लेकिन राजनीति धर्म आधारित नहीं होनी चाहिए. बीएनपी और जेआई की विचारधारा में ये बुनियादी फ़र्क़ माना जाता है.
बांग्लादेश की सत्ता से शेख़ हसीना के बेदख़ल होने के बाद वहाँ अंतरिम सरकार बनी और मोहम्मद युनूस के पास सत्ता की कमान आई.
बीएनपी तभी से चाह रही है कि बांग्लादेश में जल्द से जल्द चुनाव हो लेकिन जमात-ए-इस्लामी इसके पक्ष में नहीं है. दोनों के बीच मतभेद शेख़ हसीना के जाते ही सतह पर आने लगे थे.
बीएनपी ने चुनाव की मांग की थी तो जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के प्रमुख शफ़िक़ुर रहमान ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा था, ''बांग्लादेश के लोग अभी अवामी लीग की सरकार के अन्याय से उबर भी नहीं पाए हैं और कुछ लोग चुनाव की मांग कर रहे हैं.'''
शफ़िक़ुर रहमान को जवाब देते हुए बीएनपी के महासचिव मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर ने कहा था, ''जिनके पास कोई जनसमर्थन नहीं है और जो चुनाव नहीं जीत सकते हैं, वे चुनाव का विरोध ही करेंगे. बीएनपी और जमात के बीच कोई गठबंधन नहीं है. यह गठबंधन बहुत पहले ही टूट गया था.''
मौदूदी पश्चिमी देशों के लोकतांत्रिक व्यवस्था को ख़ारिज करते थे. लेकिन मौदूदी के बाद जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव में भाग लेना शुरू किया था.
2008 तक जमात-ए-इस्लामी चुनाव में हिस्सा लेता रहा. जनवरी 1999 में शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग के ख़िलाफ़ जेआई और बीएनपी के बीच गठबंधन हुआ था. 2018 में इस गठबंधन का विस्तार हुआ और इसमें 20 पार्टियां शामिल हुईं.
2018 के इस गठबंधन विस्तार का ज़िक्र जमात-ए-इस्लामी की ओर से जारी बयान में भी किया है. उन्होंने कहा है कि गठबंधन के लिए बुनियादी बातों को भी दरकिनार करके गठबंधन करना पाखंड का सबसे बड़ा उदाहरण है और लोग इस बात को भूले नहीं हैं.
जेआई 2002 से 2006 के बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल भी रहा. यहाँ तक कि इस सरकार में जेआई के मंत्री भी थे. 2014 और 2024 के चुनाव का बीएनपी और जेआई ने बहिष्कार किया था.

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बीएनपी और अंतरिम सरकार में टकराव
देश में चुनाव कराने के मुद्दे पर बीएनपी और अंतरिम सरकार के बीच मतभेद लगातार उभरकर सामने आ रहे हैं. बीएनपी की मांग है कि देश में जल्द से जल्द चुनाव कराए जाएं क्योंकि ऐसा नहीं करने से गतिरोध बढ़ेगा.
ढाका ट्रिब्यून की ख़बर के अनुसार, मोहम्मद यूनुस ने ये सुझाव दिया है कि वोटिंग की उम्र घटाकर 17 साल की जानी चाहिए. इस पर बीएनपी का कहना है कि इससे चुनाव आयोग पर दबाव पड़ेगा और चुनाव प्रक्रिया में देरी होगी.
युनूस ने अपने बयान में कहा था, "युवाओं को उनका भविष्य तय करने देने ने के लिए मेरा मानना है कि वोटिंग की उम्र 17 साल होनी चाहिए."
इस पर बीएनपी के सचिव मिर्ज़ा फखरूल इस्लाम आलमगीर ने कहा कि वोटिंग की उम्र 17 साल करने का मतलब है कि नई वोटिंग सूची तैयार की जाएगी.
उन्होंने कहा कि लोग ऐसा महसूस कर रहे हैं कि अंतरिम सरकार जानबूझकर चुनाव प्रक्रिया में देरी कर रही है.
बीएनपी नेता ने कहा है कि मुख्य सलाहकार को ये विषय उठाने से पहले अन्य पक्षों से बात करनी चाहिए थी. मौजूदा समय में न्यूनतम उम्र 18 साल सभी पक्षों को मान्य है.
16 दिसंबर को युनूस ने विक्ट्री डे के दिन दिए भाषण में ये संकेत दिया था कि चुनाव 2026 में हो सकते हैं,
उन्होंने कहा था, "मैं अगर कहूं तो चुनाव 2025 के अंत से 2026 की छमाही तक हो सकते हैं."
उन्होंने कहा था कि चुनाव मतदाता सूची में अपडेट करने के बाद होंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















