मोहम्मद यूनुस ने कैसे किया भारत-बांग्लादेश रिश्तों को प्रभावित?

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बिगड़ेंगे या बेहतर होंगे?
ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि बांग्लादेश में अगस्त में हुए सत्ता परिवर्तन और उससे जुड़े बदलावों ने कई चर्चाओं को जन्म दिया है.
अगस्त से पहले, दोनों देशों के नेताओं के बीच सार्वजनिक तौर पर तालमेल नज़र आता था. विद्यार्थियों के आंदोलन के बाद बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने देश छोड़कर भारत में शरण लिया. इसके बाद वहाँ मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ. इसमें विद्यार्थी नेता भी शामिल हुए.
बतौर प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का 15 साल का कार्यकाल रहा है. उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगे. साथ ही उनकी सरकार के अंतिम दिनों में ज़बरदस्त हिंसा हुई. इन सबसे बांग्लादेश की जनता में स्पष्ट नाराज़गी दिखाई दी.
शेख़ हसीना और उनकी पार्टी 'अवामी लीग' का विरोध कर रहे विद्यार्थियों और अन्य दलों ने भारत से उनको वापस भेजने की माँग लगातार उठाई है.

इस नाराज़गी का असर तब और बढ़ा जब बांग्लादेश सरकार ने भारत से शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण का अनुरोध किया.
दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण समझौता होने के बावजूद भारत ने बांग्लादेश के इस अनुरोध पर अब तक कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है.
जानकारों की राय में ऐसे कौन से कदम हैं जो दोनों देश उठा सकते हैं? यही नहीं, इन सबके बीच बांग्लादेश में तक़रीबन छह महीने पहले सत्ता संभालने वाले प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस की भूमिका को कैसे देखा जाना चाहिए?
इस लेख में इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से बात की गई है.
शेख़ हसीना और मोहम्मद युनूस के रिश्ते

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साल 1940 में चट्टोग्राम में जन्मे मोहम्मद यूनुस को साल 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. यह पुरस्कार उनके साथ, उनकी बनाई संस्था 'ग्रामीण बैंक' को भी दिया गया था.
नोबेल संस्था के मुताबिक़, सबसे गरीब वर्ग के लोगों को आसान किश्तों पर लोन देकर यूनुस और ग्रामीण बैंक ने गरीबी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत पहल का उदाहरण पेश किया है.
बांग्लादेश में शेख़ हसीना के दौर में उन पर कई आरोप लगे.
हालाँकि, मोहम्मद यूनुस के वकीलों ने उन आरोपों को सरकार की तरफ़ से चलाई गई मुहिम का हिस्सा बताया था.
साल 2007 में यूनुस ने राजनीति में उतरने का भी प्रयास किया था. उस वक़्त शेख़ हसीना जेल में थीं.
ऐसा माना जाता है कि यूनुस के इस कदम के बाद शेख़ हसीना उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगीं. हालाँकि, अपने प्रयास पर यूनुस ने जल्द ही विराम लगा दिया था और कहा था कि राजनीति उनके बस की नहीं.
इस साल अगस्त में विद्यार्थियों की माँग पर यूनुस ने देश का नेतृत्व संभाला.
क्या रिश्ते बेहतर होंगे?

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नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. मुबाशर हसन बांग्लादेश के मामलों के विशेषज्ञ हैं.
उनकी राय में प्रोफ़ेसर यूनुस ने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने की लगातार कोशिशें की हैं.
वह कहते हैं, "यूनुस को और क्या करना चाहिए? मुझे लगता है कि वह दिखा सकते हैं कि वह भारत की चिंताओं, विशेषकर सुरक्षा मामलों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं."
"लेकिन, ये भी समझना चाहिए कि प्रोफ़ेसर यूनुस उन विद्यार्थियों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिन्होंने हसीना के साथ भारत के संबंधों को देखा है. इसका अर्थ है कि जब भारत के साथ संबंधों में सुधार की बात आती है तो उनके पास बहुत कुछ करने की गुंजाइश नहीं है."
"इसके अलावा, हसीना के दौर में मीडिया की आवाज़ को दबाया गया. अब मीडिया पर वैसा दबाव नहीं है. यूनुस के सारे कदमों पर सवाल भी उठेंगे. इसलिए भी वह सावधानी से चल रहे हैं."
डॉ. हसन मानते हैं कि रिश्तों में सुधार के लिए दोनों देशों के नेतृत्व को पहल करने की ज़रूरत है.
'' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और यूनुस के बीच शिखर वार्ता से चीज़ें बेहतर होंगी. बांग्लादेश ने मोदी के साथ बैठक करने की पहले कोशिश की थी लेकिन बात नहीं बन पाई.''
लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि प्रोफेसर यूनुस के भारत के प्रति रुख़ पर बांग्लादेश में सहमति है.
उनके नेतृत्व में भारत के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट पर बांग्लादेश में सवाल भी उठ रहे हैं.
चाहे बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा झेली गई हिंसा की बात हो या फिर क़ानून व्यवस्था की बात- ये वे मुद्दे हैं जिन पर भारत ने सार्वजनिक तौर पर बांग्लादेश की नीतियों में सुधार की माँग की है.
सुरक्षा की कमी का हवाला देकर भारत ने अगस्त के बाद से बांग्लादेश में अपने वीज़ा ऑपरेशन को सीमित रखा है. हालाँकि, इमरजेंसी वीज़ा अब भी दिए जा रहे हैं. हाल ही में इसे बढ़ाने का आश्वासन भी दिया गया है.
शेख़ हसीना का दौर

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प्रोफेसर ज़ुबैदा नसरीन ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.
उन्होंने बताया, "अक्सर प्रोफ़ेसर यूनुस सही बातें कहते हैं. हालाँकि, ज़मीनी स्तर पर क्या हो रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है. मैं इन दोनों के बीच अंतर देख रही हूँ."
"उदाहरण के लिए, अभी सरकार ने देश में शासन के कई क्षेत्रों में सुधार के लिए आयोग बनाए हैं. इसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को न के बराबर शामिल किया गया है."
"यूनुस भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं, लेकिन उनके एक करीबी सलाहकार महफ़ूज़ आलम ने हाल ही में सोशल मीडिया पर भारत के कुछ इलाकों को बांग्लादेश में शामिल करने की बात की थी. क्या ये दोनों देशों के संबंधों के लिए अच्छा हो सकता है?"
तीन दशकों तक बांग्लादेश के राजनयिक रहे हुमायूँ कबीर, विदेश मंत्रालय में सचिव भी रहे हैं.
हुमायूँ कबीर मानते हैं, "दोनों देशों के बीच के रिश्ते गहरे हैं. हालाँकि, राजनीतिक स्तर पर अभी दोनों साथ चलते नज़र नहीं आते. आर्थिक स्तर पर शायद ही कोई दिक़्क़त नज़र आती है."
उन्होंने कहा, "पीएम मोदी और प्रोफ़ेसर यूनुस ने बात की है. दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने भी मुलाक़ात की. अब विदेश सचिवों की भी मुलाकात हुई है. फिर भी लग रहा है कि रिश्ता आगे नहीं बढ़ पा रहा है."
"मुझे लगता है कि अगर भारत इस उम्मीद से आगे बढ़ता है कि प्रोफ़ेसर यूनुस भी शेख़ हसीना की तरह हैं और भारत के साथ वैसे ही काम करेंगे तो शायद बात बनेगी नहीं. शेख़ हसीना का दौर अलग था. ये दौर अलग है."
"हमें यह भी देखना होगा कि बांग्लादेश की सरकार फ़िलहाल अलग-अलग मोर्चों पर सुधार करने की कोशिश में लगी है. वे भारत के साथ किसी भी तरह का समझौता तोड़ने के मूड में नहीं हैं."
उन्होंने कहा, "दूसरी चीज़ जो हुई है, वह है बांग्लादेश के लोगों की नाराज़गी. इसका कारण भारत के वीज़ा पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय है. रिश्तों में कड़वाहट अब आम लोगों के स्तर तक भी पहुँच रही है."
"बांग्लादेश में लोग इस बात से भी आहत हैं कि एक दमनकारी शासक के ख़िलाफ़ उनके संघर्ष को सीमा पार नहीं समझा जा रहा है."
"इस दौर के पूरे घटनाक्रम को भारत में राजनेताओं और मीडिया के एक वर्ग द्वारा जानबूझकर नकारात्मक रूप से पेश किया गया है."
चुनी हुई सरकार आई तो बनेगी बात?

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कुछ दिनों पहले बांग्लादेश में प्रोफ़ेसर यूनुस ने चुनाव से जुड़ी एक अहम घोषणा की थी.
उन्होंने कहा कि चुनाव या तो 2025 के अंत में या फिर 2026 के पहले छह महीनों में कराए जा सकते हैं.
रीवा गांगुली दास साल 2019 और 2020 के बीच बांग्लादेश में भारत की राजदूत और विदेश मंत्रालय में सचिव रही हैं. वह मानती हैं कि एक चुनी हुई सरकार शायद रिश्तों में सुधार ला सकती है.
उन्होंने कहा, "चुनी हुई सरकार जनादेश के साथ काम करती है. अभी बांग्लादेश की सरकार एक निर्वाचित सरकार नहीं है."
"इस सरकार के घटक अलग-अलग विचारधारा से जुड़े हैं. इसका असर शायद उसके काम पर भी पड़ता है. कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि शायद भारत का विरोध करना ही एकमात्र ऐसी चीज़ है, जो उन्हें आपस में बांधे रखती है."
वह प्रोफ़ेसर यूनुस को कैसे देखती हैं? इस सवाल पर वह कहती हैं, "मैं उनकी राजनीतिक पकड़ के बारे में बहुत निश्चित नहीं हूँ. वह लंबे समय तक बांग्लादेश के बाहर भी रहे हैं."
"इसके अलावा, कई बार ऐसा भी लगा है कि वह दबाव में हैं. इसलिए भारतीय दृष्टिकोण से मुझे लगता है कि हमें एक निर्वाचित सरकार के कार्यभार संभालने तक इंतज़ार करना होगा."
हालाँकि, हुमायूँ कबीर इस नज़रिए से सहमत नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि बांग्लादेश में चुनाव होने तक रिश्तों में गिरावट आने देना, समझदारी होगी."
आगे का रास्ता कैसा होगा?

हाल ही में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ढाका गए थे. वहाँ उन्होंने प्रोफ़ेसर यूनुस से भी मुलाक़ात की. क्या इस मुलाक़ात से और उच्च स्तरीय बैठकों के लिए रास्ता खुलेगा?
रीवा गांगुली दास ऐसा नहीं मानतीं.
वह कहती हैं, "विदेश सचिव की यात्रा अच्छी रही लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के रिश्ते वापस पटरी पर आ गए हैं? जवाब जानने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना होगा. मुझे शीर्ष राजनीतिक स्तर पर किसी बैठक की तत्काल कोई संभावना नहीं दिखती."
तो फिलहाल ऐसा क्या है जो दोनों देश कर सकते हैं?
प्रोफ़ेसर डॉ. ज़ुबैदा कहती हैं, "शायद शेख़ हसीना के साथ भारत के करीबी संबंधों की वजह से बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना जन्मी थी. इसे हिंदू विरोधी भावना में बदलने दिया गया है. इस मुद्दे को, ख़ासतौर से भारत की संवेदनशीलता के मद्देनज़र, बेहतर तरीके से संभालने की जरूरत थी."
"दूसरी बात यह है कि बांग्लादेश में 1971 के मुक्ति संग्राम के प्रतीकों पर लगातार हो रहे हमले दर्शाते हैं कि यह प्रशासन मौलिक रूप से बांग्लादेश को अलग तरीके से देखता है. ऐसा लगता है कि एक नए बांग्लादेश को बनाने का प्रयास किया जा रहा है. इसमें अल्पसंख्यकों और आज़ादी के इतिहास के लिए शायद ही कोई जगह हो."
जहाँ तक भारत की बात है, डॉ. हसन मानते हैं कि भारत को बांग्लादेश के समाज के सभी हिस्सों के साथ रिश्ते बनाने होंगे.
उनका मानना है, "भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जो बांग्लादेश की नई सरकार के साथ आगे बढ़ने में असमर्थ है. चीन, पाकिस्तान और अमेरिका, इन सभी ने संबंध बनाए हैं. मुझे लगता है कि चूँकि भारत ने अवामी लीग के अलावा दोस्त नहीं बनाए, इसलिए अब वह अकेला नज़र आ रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















