बांग्लादेश की पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियां, भारत पर क्या असर पड़ेगा?

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भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में हाल के दिनों में और भी तनाव देखने को मिला है. जब से इस साल अगस्त में व्यापक विरोध प्रदर्शन के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने बांग्लादेश छोड़ा, तब से दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों में तल्ख़ी आ गई है.
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाओं और दोनों देशों की तरफ से हुई बयानबाज़ी ने इन संबंधों में और तनाव पैदा किया है.
बीते हफ़्ते बांग्लादेश में इस्कॉन से जुड़े चिन्मय कृष्ण दास को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था, जिसके बाद तनाव और भी बढ़ गया.
त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में बांग्लादेश के उप-उच्चायोग की इमारत में तोड़फोड़ हुई थी. इस पर बांग्लादेश ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी और भारत ने इस पर खेद जताया था.

अब सवाल यह है कि भारत-बांग्लादेश संबंध किस दिशा में जा रहे हैं? आखिर क्यों यह स्थिति पैदा हुई, और दोनों देशों की अंदरूनी राजनीति इन संबंधों को कैसे प्रभावित कर रही है?
बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा का सवाल क्यों इतना अहम बन गया है? क्या बांग्लादेश पाकिस्तान के ज़्यादा नजदीक जा रहा है?
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बांग्लादेश और भारत से जुड़े इन मुद्दों पर चर्चा की.
इस चर्चा में शामिल हुए- बांग्लादेश में भारत के पूर्व राजनयिक और जिंदल स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स से जुड़े बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के फेलो जितेंद्र नाथ मिश्रा, बीबीसी के पूर्वी भारत के संवाददाता सलमान रावी और 'द हिंदू' के सीनियर असिस्टेंट एडिटर कल्लोट भट्टाचार्जी.
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते

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हाल के दिनों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की ख़बरों और सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद भारत में हिंदू संगठनों ने आक्रामक प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी.
बांग्लादेश में भी इस्कॉन और भारत विरोधी अभियान शुरू हो गया.
बांग्लादेश में भारत के पूर्व राजनयिक जितेंद्र नाथ मिश्रा का कहना है कि बांग्लादेश और भारत के बीच हाल की चुनौतियां नई नहीं हैं.
उन्होंने 1975 का उदाहरण देते हुए कहा, "तब हालात और जटिल थे. जब किसी भी देश में राजनीतिक परिवर्तन होता है, तो चुनौतियां बढ़ जाती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रिश्ते टूट गए हैं."
जितेंद्र कहते हैं, "बांग्लादेश न तो पाकिस्तान का पक्षधर है और न ही चीन का, वह सिर्फ़ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है."
जितेंद्र मिश्रा ने कहा, "भारत सरकार ने हमेशा बांग्लादेश के विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ काम किया है."
उन्होंने कहा, "हमने बांग्लादेश अवामी लीग के साथ इसलिए सहयोग किया क्योंकि ये हमारे हित में था, हमें उनसे कोई विशेष लगाव नहीं था."
जितेंद्र मिश्रा ने कहा, "बांग्लादेश हमारे लिए एक महत्वपूर्ण देश है, क्योंकि यहां से हमें व्यापार, पर्यटन और अन्य कई क्षेत्रों से राजस्व प्राप्त होता है. अवामी लीग ने इन सभी क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग किया है."
बांग्लादेश-भारत बॉर्डर पर तनाव

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भारत और बांग्लादेश के बीच हाल के दिनों में विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण दोनों देशों की सीमा से सटे इलाकों में इसका असर साफ देखा जा सकता है.
भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर सुरक्षा बढ़ने से आना-जाना मुश्किल हो गया है.
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के अनुसार, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर पहले लोग आसानी से आना-जाना कर सकते थे.
सलमान बताते हैं, "कई लोग नदी पार करके स्कूल जाते थे और अगर कोई बीमार पड़ता, तो उन्हें इलाज के लिए बॉर्डर के इस पार लाया जाता था. लेकिन, अब हालात बदल चुके हैं. बॉर्डर पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है, जिससे लोग पहले की तरह आसानी से एक देश से दूसरे देश नहीं जा सकते."
सलमान रावी कहते हैं, "बांग्लादेश का सबसे बड़ा बॉर्डर क्षेत्र भारत से सटा हुआ है और वर्तमान में बॉर्डर पर माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है."
"अब लोग डर रहे हैं कि यदि कोई भी व्यक्ति बॉर्डर के इस पार कुछ बोलता है, तो बॉर्डर के उस पार उनके रिश्तेदारों को निशाना बनाया जा सकता है."
उन्होंने कहा, "बांग्लादेश की कार्यवाहक मोहम्मद यूनुस सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि क्या कदम उठाए जाएं. वहां हिंदू समुदाय को निशाना बनाने की ख़बरें बढ़ने से भारत में उत्तेजना पैदा हो रही है."
"इसके परिणामस्वरूप, पहले से ज्यादा नफ़रत देखने को मिल रही है, जिससे भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में नई समस्या पैदा हो रही है."
बांग्लादेश में 'हिंदुओं पर अत्याचार'

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बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के बाद इस साल पांच अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना देश छोड़कर चली गईं और उनकी सरकार का पतन हो गया.
इसके बाद आठ अगस्त को अंतरिम सरकार का गठन किया गया था.
अंतरिम सरकार के गठन से पहले, इन तीन दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में अल्पसंख्यक समुदायों और उनके विभिन्न प्रतिष्ठानों पर हमले के आरोप लगे.
भारत के पूर्व राजनयिक जितेंद्र नाथ मिश्रा ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के आरोपों पर कहा, "यह कोई नई बात नहीं है, बांग्लादेश में हमेशा हिंदुओं पर अत्याचार होते रहे हैं."
"लेकिन, इस बार भारत की प्रतिक्रिया अलग है, और यह एक नई बात है."
उन्होंने बांग्लादेश में हिंदू जनसंख्या में आई गिरावट का ज़िक्र करते हुए कहा, "1947 में इस पूर्व पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 25 फीसदी हिंदू थे, लेकिन आज यह संख्या घटकर केवल 8-9 फीसदी रह गई है. वे कहां गए? क्या उनका धर्म परिवर्तन हुआ? क्या वे भारत चले गए? या फिर उनकी हत्या की गई?"
जितेंद्र मिश्रा ने कहा, "बांग्लादेश में यह सब पहले भी होता रहा है, लेकिन इस बार हम जिस तरह का माहौल देख रहे हैं, वह पहले कभी नहीं था."
"हिंदुओं पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए इसे भड़काना अब एक नया पहलू बन गया है."
द हिंदू के सीनियर असिस्टेंट एडिटर कल्लोट भट्टाचार्जी ने कहा, "अगर हम आज के भारत के नजरिए से बांग्लादेश के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमारा ध्यान वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति पर जाता है."
"हालांकि, यह माहौल सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के लिए नहीं है, बल्कि बांग्लादेश के नागरिकों के लिए भी यह चुनौतीपूर्ण है."
भट्टाचार्जी ने बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, "यूनुस सरकार के डर से वहां का प्रशासन अपने कार्यों को सही तरीके से अंजाम नहीं दे पा रहा है."
पाकिस्तान के साथ बढ़ती बांग्लादेश की नज़दीकियां

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बांग्लादेश ने चार महीने पहले हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से ऐसे कई क़दम उठाए हैं, जिनसे उसके पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर होने के संकेत मिलते हैं.
बांग्लादेश ने पाकिस्तानी नागरिकों को वीज़ा देने के लिए ज़रूरी सुरक्षा जांच के नियम को भी हटा दिया, जिससे ज़ाहिर होता है कि बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है.
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नज़दीकियों पर कहा, "जो चीजें पाकिस्तान को लेकर लोगों के दिमाग में बैठी हुई हैं, वही चीजें अब बांग्लादेश को लेकर भी लोगों के दिमाग में आ रही हैं. इसके कारण कई जगहों पर माहौल खराब हो रहा है और लोग डरे हुए हैं."
उन्होंने कहा, "बांग्लादेश से शादी और त्योहारों के लिए कई लोग कोलकाता के न्यू मार्केट में ख़रीदारी करने आते थे, लेकिन अब वो मार्केट खाली पड़ा हुआ है."
उन्होंने कहा, "अब लोग उसी भाषा में एक-दूसरे से बात कर रहे हैं, जो पाकिस्तान के साथ करते वक्त इस्तेमाल होती थी."
कल्लोट भट्टाचार्जी ने इस मुद्दे पर कहा, "अगर किसी को शेख हसीना का विरोधी बनना है, तो वह उन्हीं चीजों को अपना सकता है, जो शेख हसीना और उनकी पार्टी के खिलाफ थीं."
"अगर शेख हसीना और उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ विरोध तैयार करना है, तो यूनुस सरकार को पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाना पड़ेगा. उन्हें यह दिखाना होगा कि वे शेख हसीना के ख़िलाफ़ हैं."
भारत के पूर्व राजनयिक जितेंद्र नाथ मिश्रा कहते हैं, "अगर बांग्लादेश चाहे भी, तो वह पाकिस्तान के साथ ज्यादा नजदीक नहीं जा पाएगा."
"यह देखने वाली बात होगी कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में किसे एक-दूसरे की ज्यादा ज़रूरत है."
"बांग्लादेश शेख हसीना के समय में बहुत अच्छा रहा है, और अब की यूनुस सरकार यह चाहती है कि बांग्लादेश के रिश्ते पड़ोसी देशों के साथ फिर से रीबैलेंस हों."
क्यों बढ़ रहे हैं प्रदर्शन?

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भारत और बांग्लादेश में कई जगह एक-दूसरे के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए हैं.
कुछ दिन पहले ढाका यूनिवर्सिटी के कैंपस में सैकड़ों छात्रों ने भारत विरोधी नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया था.
कल्लोट भट्टाचार्जी ने बांग्लादेश में बिगड़ते हालात पर चर्चा करते हुए कहा, "हालात बिगड़ने में मीडिया की भूमिका तो है ही, लेकिन साथ ही ग्राउंड लेवल पर भी कुछ अहम घटनाएं हो रही हैं."
उन्होंने शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के छात्र विंग, छात्र लीग के बारे में कहा, "यूनुस सरकार ने अक्टूबर में छात्र लीग को अवैध घोषित कर दिया, जिसके बाद वे अंडरग्राउंड हो गए. जिसके बाद छात्र लीग के कई एक्टिविस्ट हिंदुओं के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए."
भट्टाचार्जी कहते हैं, "यहां हिंदू-मुस्लिम का कोई मुद्दा नहीं है. छात्र लीग के लोग केवल यूनुस सरकार को चुनौती देना चाहते हैं, और यही कारण है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों में बढ़ते प्रदर्शन देख रहे हैं."

कल्लोट भट्टाचार्जी ने बांग्लादेश में हो रहे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा, "इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. बांग्लादेश के लोग भारतीय मीडिया को बहुत ध्यान से देखते हैं, और इसका असर वहां के समाज पर भी पड़ता है."
उन्होंने खासकर पूर्वोत्तर भारत के राज्यों का उल्लेख किया, "असम, त्रिपुरा, मेघालय जैसे क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में कई नए चैनल्स आए हैं, जो तीखी बहस वाली ख़बरों को प्रमुखता से दिखाते हैं."
"ऐसे चैनल्स का असर बांग्लादेश के लोगों पर भी पड़ता है, जिससे स्थिति और बिगड़ती है."
भारत के पूर्व राजनयिक जितेंद्र नाथ मिश्रा ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर कहा, "भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और एक शक्तिशाली देश के रूप में उभर चुका है, जो पहले नहीं था."
"यही कारण है कि भारत के पड़ोसी देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों को अब इससे हौसला मिलता है."
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने बांग्लादेश में बढ़ते तनाव और भारत-बांग्लादेश कूटनीतिक संबंधों पर कहा, "विरोध करने वाले लोग कह रहे हैं कि यूनुस साहब इस बदलाव के लिए आए थे, ताकि चुनाव हो और एक चुनी हुई सरकार बने, लेकिन इससे पहले ही करेंसी नोटों से मुजीबुर रहमान की तस्वीरों को हटा देने का फ़ैसला लिया गया. इसके अलावा, जो घटनाएं सामने आई हैं, उनसे उत्तेजना और बढ़ी है."
उन्होंने आगे कहा, "कूटनीतिक तरीके से इस मुद्दे को सुलझाने के बजाय बयानबाजी करना एक समस्या है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के चेयरमैन ने भी इस तरह का पोस्ट डाला था, जिससे आक्रोश और बढ़ा."
उन्होंने कहा, "इसलिए, भारत को कूटनीतिक तरीके से बात करने की जरूरत है, क्योंकि अगर यह प्रदर्शन और बढ़ते हैं, तो स्थिति और भी बिगड़ सकती है."
शेख़ हसीना का भारत में होना भी तनाव की एक वजह?

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कुछ महीने पहले बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना हिंसक आंदोलनों की वजह से अपने पद से इस्तीफ़ा देकर देश छोड़ भारत आ गई थीं.
ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि क्या शेख़ हसीना को शरण देना भारत के लिए चुनौती साबित हो सकता है.
जितेंद्र नाथ मिश्रा इस पर कहते हैं, "शेख हसीना भारत इसलिए आईं क्योंकि उनकी ज़िंदगी ख़तरे में थी. लेकिन, यह भारत के लिए एक चुनौती भी है कि शेख़ हसीना भारत में हैं."
उन्होंने कहा, "इसी कारण भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ढाका जा रहे हैं. कूटनीतिक संवाद की बहुत ज़रूरत है, क्योंकि हमारे बीच विश्वास कुछ हद तक टूट चुका है."
शेख़ हसीना की भारत में शरण और बांग्लादेश की राजनीति पर 'द हिंदू' के सीनियर असिस्टेंट एडिटर कल्लोट भट्टाचार्जी कहते हैं, "यह कोई नई बात नहीं है कि पड़ोसी देश का कोई नेता या नेत्री भारत में शरण ले. शेख़ हसीना का भारत में रहना भी कोई बड़ी बात नहीं है."
भट्टाचार्जी ने बांग्लादेश की राजनीति में हो रहे बदलावों पर कहा, "इतने महीनों से शेख़ हसीना और उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ यूनुस सरकार के सलाहकार और छात्र संगठन लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं."
"ऐसा लगता है कि वे जनता को यह प्रेरित कर रहे हैं कि बांग्लादेश में एक नई राजनीतिक पार्टी का जन्म हो सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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