भारत बांग्लादेश संबंध: 'भरोसेमंद दोस्ती' में कैसे पड़ती जा रही है दरार

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आज से दस साल पहले नरेंद्र मोदी पहली बार बतौर प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दे रहे थे.
अपने भाषण में पीएम मोदी ने कहा था, "हमारा भविष्य हमारे पड़ोस से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि मेरी सरकार ने पहले ही दिन से पड़ोसी देशों से मित्रता और सहयोग बढ़ाने को प्राथमिकता दी है."
पीएम मोदी ने इस अमेरिकी दौरे के बीच न्यूयॉर्क में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना से अपनी पहली मुलाक़ात भी की थी.
फिर अगले दस सालों तक मोदी और शेख़ हसीना के बीच द्विपक्षीय मुलाक़ातों की संख्या बढ़ती गई और भारत-बांग्लादेश के संबंधों का ग्राफ़ भी ऊपर चढ़ता गया.

2023-24 के बीच एक साल में दोनों एक-दूसरे से दस बार मिले थे और इसकी जानकारी ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी थी.
इसी साल जून में नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और जनवरी में शेख़ हसीना पांचवीं बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं थी.
मोदी के शपथ ग्रहण के कुछ दिन बाद शेख़ हसीना भारत आईं. नरेंद्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में किसी विदेशी नेता की यह पहली राजकीय यात्रा थी.
साथ ही जनवरी में फिर से प्रधानमंत्री बनने के बाद शेख़ हसीना की भी किसी देश की ये पहली द्विपक्षीय यात्रा थी.
तब पीएम हसीना ने कहा था, "भारत हमारा प्रमुख पड़ोसी, भरोसेमंद दोस्त और क्षेत्रीय साझेदार है. बांग्लादेश-भारत संबंध तेजी से बढ़ रहे हैं. मैं पीएम मोदी को बांग्लादेश आने के लिए आमंत्रित करती हूं."
इस घटनाक्रम से दोनों देशों की नज़दीकी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
लगभग डेढ़ महीने बाद शेख़ हसीना एक बार फिर भारत आईं लेकिन बतौर प्रधानमंत्री नहीं. इस बार जब वह भारत पहुंचीं तो बांग्लादेश में लाखों छात्र और लोग सड़कों पर थे.
शेख़ हसीना ने इस्तीफ़ा दिया और बांग्लादेश में 84 वर्षीय नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर शपथ ली.
अंतरिम सरकार के बनने के बाद भारत-बांग्लादेश के संबंधों में कड़वाहट शुरू हुई और अब चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद दोनों देशों के बीच काफ़ी तल्ख़ कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल हो रहा है.
बीते दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कानूनी सलाहकार आसिफ नज़रुल ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, ''भारत को ये समझना होगा कि ये शेख़ हसीना का बांग्लादेश नहीं है.''
बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को भारत समर्थक के तौर पर देखा जाता रहा है.

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शेख़ हसीना के दौर में भारत-बांग्लादेश संबंध
भारत और बांग्लादेश चार हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा साझा करते हैं और दोनों के बीच गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते हैं.
बांग्लादेश की सीमा भारत और म्यांमार से लगती है लेकिन उसकी 94 फ़ीसदी सीमा भारत से लगती है. इसलिए बांग्लादेश को 'इंडिया लॉक्ड' देश कहा जाता है.
बीते कुछ सालों में बांग्लादेश, भारत के लिए एक बड़ा बाज़ार बनकर उभरा है. दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और भारत एशिया में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है.
साल 2022-23 में बांग्लादेश भारत का पांचवां सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार बन गया. वित्त वर्ष 2022-23 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 15.9 अरब डॉलर का था.

पिनाक रंजन चक्रवर्ती एक रिटायर्ड भारतीय राजनियक और बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रहे हैं.
पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "शेख़ हसीना के समय भारत कंधे से कंधा मिलाकर बांग्लादेश के साथ आगे बढ़ रहा था. दोनों देशों के बीच रेल कनेक्टविटी से लेकर बिजली की सप्लाई बढ़ी."
"इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार और लोगों का आना-जाना भी बढ़ा था. दोनों देश के संबंध भी ऐतिहासिक गति से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन अब ये सारी चीज़ें प्रभावित हो रही हैं."
पिछले साल दोनों देशों के बीच पहली सीमा पार भारत-बांग्लादेश ऊर्जा पाइपलाइन शुरू हुई थी.
इस पाइपलाइन को भारत सरकार ने 377 करोड़ रुपए की लागत में बनाया है, जिसमें बांग्लादेश में पड़ने वाला हिस्सा 285 करोड़ रुपए में बना है.
साल 2023 में ही अखौरा-अगरतला रेल लिंक का उद्घाटन किया, जो बांग्लादेश तथा पूर्वोत्तर को त्रिपुरा के माध्यम से जोड़ता है.
इसके अलावा भारत और बांग्लादेश ने साल 2015 में भूमि सीमा समझौते तथा क्षेत्रीय जल पर समुद्री विवाद जैसे अरसे से लंबित मुद्दों को सफलतापूर्वक सुलझाया था.
लेकिन, इस दौर में भी सीमा पार नदी के जल का बंटवारा, अवैध प्रवास, नशीले पदार्थों की तस्करी और बांग्लादेश पर चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता की बात थी.
भारत और बांग्लादेश 50 से ज़्यादा नदियां साझा करते हैं, लेकिन अब तक केवल दो संधियों (गंगा जल संधि और कुशियारा नदी संधि) पर सहमति बनी है.
तीस्ता और फेनी नदी के मुद्दे पर अभी तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई है.

शेख़ हसीना के बाद बांग्लादेश से रिश्ते
शेख़ हसीना के जाने के बाद अंतरिम सरकार का गठन हुआ. येल यूनिवर्सिटी के लेक्चरर सुशांत सिंह इसे भारत की कूटनीतिक विफलता मानते हैं.
फॉरेन पॉलिसी के लिए एक लेख में सुशांत सिंह ने लिखा, "हसीना ने आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया और सेना सहित सभी सरकारी संस्थाओं को नियंत्रित किया. परिणामस्वरूप, भारत ने मान लिया कि विरोध के बावजूद वह सत्ता में रहेंगी."
"लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भारतीय ख़ुफ़िया और कूटनीतिक विफलता के कारण भारत तब हैरान रह गया, जब सेना ने इस महीने (अगस्त) हसीना को देश छोड़ने के लिए कहा. किसी भी पश्चिमी सरकार ने उन्हें शरण देने की पेशकश नहीं की, जिससे वह नई दिल्ली में ही रह गईं."
सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने शेख़ हसीना के फ़ैसलों को पलटना शुरू किया और महीने भर के भीतर जमात-ए-इस्लामी पर लगी पाबंदी हटा दी.
तब जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफ़ीक़-उर रहमान ने कहा था, “हमारा मानना है कि भारत अंततः बांग्लादेश के साथ संबंध में अपनी विदेश नीति का पुनर्मूल्यांकन करेगा. हमें लगता है कि एक-दूसरे के आंतरिक मुद्दों में हस्तक्षेप से बचना चाहिए."
जमात-ए-इस्लामी देश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी है और इसकी छवि भारत विरोधी रही है. शेख़ हसीना इसे आतंकवादी संगठन बताती थीं.
प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत, नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.
जमात के सवाल पर प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "शेख़ हसीना से पहले भी बीएनपी और जमात खुलकर भारत विरोधी स्टैंड लेते थे."
"इससे वो यह कोशिश करते थे कि इस्लामिक कट्टरपंथियों में अपनी पकड़ मज़बूत कर पाएं और भारत विरोधी भावना को भुनाकर अपनी राष्ट्रवादी भावना को मज़बूती दे सकें."
"दोनों आज भी यही कर रहे हैं और भारत को इसके लिए तैयार रहना चाहिए."
बांग्लादेश से पहले मालदीव में भी भारत विरोधी भावना खुलकर सामने आ रही थी. मोहम्मद मुइज्जू के इंडिया आउट के नारे पर वहां के राष्ट्रपति बने थे. फिलहाल मामला शांत दिखाई दे रहा है.
बांग्लादेश में इसके उलट जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं भारत के ख़िलाफ़ आक्रामकता बढ़ती जा रही है.
अब चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद हालात और ख़राब होते दिख रहे हैं.
भारत की तरफ़ से लगातार कहा गया कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ''इस्कॉन की वैश्विक प्रतिष्ठा है और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में इसका दमदार रिकॉर्ड है. चिन्मय दास की गिरफ़्तारी चिंताजनक है.''
बांग्लादेश की 17 करोड़ की आबादी में हिन्दू आठ प्रतिशत हैं. इसी साल अगस्त महीने में शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद से वहाँ के हिन्दुओं पर हमले के कुछ मामले सामने आए हैं.
मंगलवार को बीएनपी के महासचिव रुहुल कबीर रिज़वी ने भारत की जमकर आलोचना की.
रुहुल कबीर रिज़वी ने कहा, ''हम भारत के ग़ुलाम बनने के लिए आज़ाद नहीं हुए हैं. हम भारत के उग्र हिन्दुओं से कहना चाहते हैं कि आपकी दोस्ती शेख़ हसीना से है."
"इस दोस्ती को बचाने के लिए बांग्लादेश के लोगों से खुलेआम दुश्मनी अच्छे पड़ोसी का व्यवहार नहीं हो सकता है. हज़ारों लोगों की जान लेने के बाद हसीना आपके यहाँ की शरणार्थी हैं.''
ऐसे माहौल में सवाल उठता है कि भारत और बांग्लादेश के संबंध पटरी पर कब लौटेंगे?
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, "यूनुस सरकार की कोई संवैधानिक वैद्यता नहीं है. जब तक वहां चुनाव नहीं होते तब तक बड़ा मुश्किल है कि भारत-बांग्लादेश संबंध पटरी पर लौटें."
"चुनाव से पहले भारत को टारगेट किया जाता रहेगा, क्योंकि उससे हर राजनीतिक दल को फ़ायदा हो रहा है. कोई ऐसा राजनीतिक धड़ा ऐसा नहीं है, जो भारत का सकारात्मक पक्ष लेकर आगे बढ़े."
"आवामी लीग जैसा दल पहले था, अब उसकी हालत किसी से छिपी नहीं है."

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'बातचीत ही एक मात्र विकल्प'
बांग्लादेश सरकार में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी में सलाहकार के रूप में काम कर रहे नाहिद इस्लाम ने भारत सरकार की आलोचना करते हुए भारतीय जनता पार्टी का ज़िक्र किया है.
नाहिद इस्लाम ने लिखा, "भारत का सत्तारूढ़ अभिजात्य वर्ग, विभाजनकारी राजनीति और बांग्लादेश विरोधी बयानबाजी में लगा हुआ है."
"बीजेपी बांग्लादेश को भारत के लिए एक आंतरिक राजनीतिक मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है. अगर ऐसा होता है, तो यह भारत की घरेलू राजनीति के लिए हानिकारक होगा."
बांग्लादेश के इस रुख़ पर पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "वहां जो 'असंवैधानिक' सरकार है उसमें शेख़ हसीना के प्रति ग़ुस्सा है. अतीत में हमारे शेख़ हसीना के साथ अच्छे संबंध थे और वो अभी भारत में हैं."
"अभी सत्ता में आए लोगों का मानना है कि हसीना तानाशाह थीं. लेकिन, बांग्लादेश को भी वर्तमान हालात के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि भारत उनका पड़ोसी है."
बांग्लादेश अभी अल्पसंख्यकों के मामले को आंतरिक मामला बता रहा है, लेकिन भारत भी कुछ मौक़ों पर ऐसा कर चुका है.
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने 16 सितंबर को ग़ज़ा और म्यांमार के साथ ही भारत को भी उस फ़ेहरिस्त में शामिल किया था 'जहाँ मुसलमान ख़राब परिस्थितियों से जूझ रहे हैं.'
इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि अल्पसंख्यकों पर बयानबाज़ी करने वाले देशों को दूसरे के बारे में राय ज़ाहिर करने से पहले अपना रिकॉर्ड देखना चाहिए.
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार बार-बार इस बात पर ज़ोर दे रही है कि भारत सरकार को बांग्लादेश को अवामी लीग के चश्मे से देखना बंद करना चाहिए. ऐसे में भारत के पास क्या विकल्प मौजूद हैं?
बांग्लादेश में मेजर जनरल (रिटायर्ड) एएनएम मुनीरुज़्ज़मां द हिंदू से बातचीत में कहते हैं कि भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों की वर्तमान स्थिति भारत के लिए पारंपरिक कूटनीति के लिए जगह नहीं छोड़ती है.
वो कहते हैं, "भारत को बांग्लादेश के राजनीतिक क्षेत्र में सभी पक्षों के साथ बातचीत करना चाहिए. पांच अगस्त के घटनाक्रम के बाद, बांग्लादेश की राजनीति बहुत अलग हो गई है."
"इस स्थिति में सालों से चली आ रही कूटनीति काम नहीं आ सकती और भारत को इसे जल्दी से समझने और रीसेट बटन दबाने की ज़रूरत है."
मेजर जनरल (रिटायर्ड) एएनएम मुनीरुज़्ज़मां का कहना है कि हसीना सरकार के अंत को द्विपक्षीय संबंधों के अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए और बांग्लादेश के असली लोगों से बातचीत करना चाहिए.
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