बांग्लादेश में चिन्मय दास को सुनवाई के दौरान क्यों नहीं मिला कोई वकील?

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तीन दिसंबर को बांग्लादेश के चटगांव की अदालत में सम्मिलित सनातनी जागरण जोत के प्रवक्ता चिन्मय दास की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान के उनकी तरफ़ से कोई वकील पेश नहीं हुआ.
चिन्मय दास को 26 नवंबर को चटगांव के कोतवाली थाने में दर्ज देशद्रोह के मामले में कोर्ट में पेशी के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था.
अब ऐसे आरोप लग रहे हैं कि धमकियों के कारण चिन्मय दास की तरफ़ से कोई वकील सामने नहीं आ रहा है. लेकिन चटगांव बार एसोसिएशन ने किसी वकील को धमकी दिए जाने की बात से इनकार किया है.
मौजूदा पृष्ठभूमि में चटगांव की अदालत ने उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई एक महीने के लिए टाल दी है. अब इस पर दो जनवरी को सुनवाई होगी.

70 हिंदू वकीलों को अभियुक्त बनाया गया
बीते 26 नवंबर को चिन्मय कृष्ण दास की पेशी के दौरान हुई हिंसा, तोड़फोड़ और एडवोकेट सैफ़ुल इस्लाम आलिफ़ की मौत के बाद दायर मामले में 70 हिंदू वकीलों को अभियुक्त बनाया गया है.
इनमें दास की ज़मानत याचिका दायर करने वाले वकील भी शामिल हैं. उनके अलावा ऐसे वरिष्ठ हिंदू वकीलों के नाम इसमें शामिल हैं, जो दास के पक्ष में अदालत में बहस कर सकते हैं.
लेकिन चटगांव बार एसोसिएशन ने अपने सदस्यों से एडवोकेट सैफ़ुल इस्लाम की हत्या और इससे संबंधित किसी भी मामले में शामिल नहीं होने का अनुरोध किया है.
पता चला है कि इसकी वजह से इन मामलों में अभियुक्तों की ज़मानत के लिए वकालतनामा पेश करने वाले वकीलों को दबाव और धमकी का सामना करना पड़ रहा है.
हालांकि बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निजामुद्दीन का दावा है कि किसी भी वकील को न तो धमकी दी गई है और न ही उसकी सुरक्षा को कोई ख़तरा है.
फ़ौजदारी क़ानून के विशेषज्ञों का कहना है कि किसी वकील को अभियुक्त के पक्ष में लड़ने की अनुमति नहीं देना, उसके क़ानूनी अधिकारों का उल्लंघन है.
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा है कि किसी भी अपराध के मामले में अभियुक्त को अपना पक्ष रखने का समुचित मौक़ा दिया जाना चाहिए.
चिन्मय दास की ओर से कोई वकील क्यों नहीं पेश हुआ?

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बीते 26 नवंबर को देशद्रोह के आरोप में चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद चटगांव की अदालत ने उनकी ज़मानत नामंज़ूर करते हुए उन्हें जेल भेज दिया था.
उस दिन दास के समर्थकों के विरोध प्रदर्शन की वजह से उनको अदालत से जेल ले जाने में क़रीब साढ़े तीन घंटे का समय लगा था.
इसी दौरान हिंसा में वकील सैफ़ुल इस्लाम आलिफ़ की मौत हो गई और कम से कम 30 अन्य लोग घायल हो गए.
इस फ़ैसले के विरोध में चिन्मय दास के वकीलों ने उसी दिन सत्र न्यायालय में ज़मानत की अर्ज़ी दायर की थी. लेकिन उस दिन उस पर सुनवाई नहीं हो सकी.
अदालत ने इसके लिए तीन दिसंबर की तारीख़ तय की थी.
उस दिन शाम को वकील आलिफ़ की मौत की ख़बर फैलने के बाद चटगांव बार एसोसिएशन ने अगले दो दिनों तक काम बंद रखने का एलान कर दिया.
इस दौरान होने वाले विरोध प्रदर्शन में चिन्मय दास को तमाम मामलों में अभियुक्त बनाने की मांग उठी थी.
उधर, बार एसोसिएशन ने वकीलों से अभियुक्तों की पैरवी नहीं करने की अपील कर दी.
एक दिसंबर को अदालत में न्यायिक कामकाज शुरू होने के बाद पता चला कि दास की ज़मानत याचिका पर सुनवाई तीन दिसंबर को होगी.
लेकिन उसी दिन यानी रविवार को पुलिस के काम में बाधा पहुंचाने के एक मामले में एक अभियुक्त मुफ़्ती अहमद हुसैन के वकील काज़ी मोफ़िज़ुर रहमान को वकालतनामा जमा करने के बावजूद वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा.
पता चला कि बार एसोसिएशन ने इस घटना से संबंधित किसी भी मामले में वकीलों के नहीं लड़ने का फ़ैसला किया है.
काज़ी मोफ़िज़ुर रहमान ने इस मुद्दे पर अपनी एक फ़ैसबुक पोस्ट में लिखा है, "चूंकि एसोसिएशन ने इन तीन मामलों में वकालतनामा पेश नहीं करने का फ़ैसला किया है. इसलिए मैं अपने वकालतनामे पर खेद जताते हुए इसे वापस लेता हूँ."
रहमान बीबीसी बांग्ला से बातचीत में कहते हैं, "वकालतनामा पेश करना हमारा संवैधानिक अधिकार है. बांग्लादेश बार काउंसिल के नियम हैं. मुझे किसी ने बाधा नहीं पहुंचाई. इस मुद्दे पर फ़ेसबुक पर दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मैंने आलिफ़ की हत्या मामले में वकालतनामा दिया है. जिस मामले में अभियुक्त की ओर से पैरवी करने गए मैंने वकालतनामा दायर किया था वो अलग था. आलिफ़ की हत्या का मामला अलग है."
रहमान बताते हैं कि वकील की हत्या मामले में तमाम अभियुक्त हिंदू हैं. पुलिस की ओर से दायर तोड़फोड़ के मामले में दास को अभियुक्त नहीं बनाया गया है.
26 नवंबर की घटना से संबंधित मामलों में अभियुक्तों के पक्ष में पैरवी नहीं करने के लिए किसी तरह का दबाव है या नहीं?
इस सवाल पर रहमान ने कहा, "दबाव ज़रूर है. ऐसा नहीं होता तो बार काउंसिल के रूल्स एंड ऑर्डर के मुताबिक़ एक वकील का अभियुक्त के पक्ष में वकालतनामा पेश करना स्वाभाविक है. यह इंसान का संवैधानिक अधिकार है. "

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मंगलवार को चिन्मय दास की ज़मानत याचिका पर सुनवाई से पहले भी वकीलों ने अदालत परिसर में प्रदर्शन किया.
उन लोगों ने हमला, तोड़फोड़ और हत्या के मामलों में दास को अभियुक्त नहीं बनाने पर विरोध जताया. उस दिन सरकार की ओर से अदालत में क़रीब 100 वकील मौजूद थे.
सुनवाई के दौरान पता चला कि चिन्मय दास की ओर से कोई भी वकील मौजूद नहीं है. सरकार की ओर से अदालत में मौजूद सरकारी वकील मफ़ीज़ुल हक़ भुइयां ने अदालत से अगली तारीख़ देने की अपील की.
इस अपील और चिन्मय दास की ओर से किसी वकील के मौजूद नहीं रहने के कारण अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई दो जनवरी को करने का फ़ैसला किया.
क्या वकीलों पर अभियुक्तों की ओर से मामला नहीं लड़ने का कोई दबाव है?
इस सवाल पर चटगांव बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निजामुद्दीन ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "हमने एसोसिएशन की ओर से अपील की है कि एडवोकेट सैफ़ुल इस्लाम आलिफ़ हत्याकांड और इससे संबंधित तमाम मामलों में कोई वकील अभियुक्तों की पैरवी न करे. हमने हत्या के मामले में पैरवी नहीं करने पर ख़ास ज़ोर दिया है."
वकील नहीं होने पर सनातनी जोत की टिप्पणी

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आख़िर चिन्मय दास के मामले की पैरवी के लिए उनकी ओर से अदालत में कोई वकील मौजूद क्यों नहीं था?
इस सवाल पर सम्मिलित सनातनी जोत के केंद्रीय प्रतिनिधि एडवोकेट सुमन कुमार राय बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि कोई वकील नहीं था. किसी वकील को उनकी ओर से पेश ही नहीं होने दिया गया. वहाँ विरोध का एलान किया गया था."
राय ने दावा किया कि बीते दो दिनों के दौरान विभिन्न मामलों में अदालत में सुनवाई से पहले वकीलों को कई बाधाओं का सामना करना पड़ा. वहाँ एक सभा में घोषणा की गई थी कि अभियुक्तों की पैरवी करने वाले वकीलों की सामूहिक पिटाई की जाएगी.
राय कहते हैं, "यहाँ जान से मारने की धमकी मिली है. ऐसे में कोई वकील अदालत में कैसे पेश होगा. इससे पहले कुछ हिंदू वकीलों के चेंबर में भी तोड़फोड़ की गई है."
उनका दावा है कि यहाँ एक ऐसा डरावना माहौल बना दिया गया है कि कोई वकील अभियुक्तों की पैरवी करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता. वह बताते हैं कि बार एसोसिएशन के साथ बातचीत के बाद अदालत से परिस्थिति शांत होने पर जमानत की सुनवाई पहले करने का अनुरोध किया जाएगा.
उन्होंने कहा, "अगर यह अनुरोध नामंज़ूर होता है, तो मामला वापस लेने की याचिका दायर की जाएगी. मामला वापस लेने के बाद निचली अदालत में सुनवाई की कोशिश की जाएगी. अगर वहाँ भी याचिका नामंज़ूर हो जाती है तो हाई कोर्ट में अपील की जाएगी."
सनातनी जोत ने मंगलवार को जारी एक बयान में कहा, "बांग्लादेश के नागरिक के तौर पर हर व्यक्ति को क़ानूनी सहायता पाने का अधिकार है."
संगठन ने वकीलों के ख़िलाफ़ मामला दायर करने पर भी विरोध जताया है.
अमेरिका की प्रतिक्रिया
अमेरिका के विदेश मंत्रालय की नियमित ब्रीफिंग के दौरान मंगलवार को सहायक प्रवक्ता वेदांत पटेल ने बांग्लादेश का ज़िक्र होने पर कहा था कि धार्मिक आज़ादी और मौलिक मानवाधिकार की रक्षा करना ज़रूरी है.
पटेल से सवाल किया गया था कि चिन्मय दास को कोई वकील नहीं मिल रहा है, ऐसे में अमेरिका क्या इस मुद्दे पर कोई क़दम उठाएगा?
इस पर पटेल का कहना था, "हमारे पास इस मामले का ब्योरा उपलब्ध नहीं है. लेकिन हम बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि गिरफ़्तार लोगों को समुचित पैरवी का मौक़ा दिया जाना चाहिए."
(ये आर्टिकल बीबीसी बांग्ला से ली गई है)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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