एवरेस्ट के शेरपाओं को क्यों अपना घर बहने का डर सता रहा है?

खुंभू वैली के छोर पर बसे एक गांव का दृश्य जहां भूस्खलन हुआ है.

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इमेज कैप्शन, खुंभू वैली के छोर पर बसे एक गांव का दृश्य जहां 16 अगस्त को भूस्खलन हुआ है
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

नेपाल के एवरेस्ट इलाक़े में समुद्र तल से 3,800 मीटर ऊपर एक छोटा शेरपा थेम गांव बसा हुआ है.

यहां रिकॉर्ड बनाने वाले कई शेरपा पर्वतारोहियों का घर है, जिनमें शेरपा तेंजिंग नॉरगे का भी नाम शामिल है. वह पर्वतारोही एडमंड हिलेरी के साथ माउंट एवरेस्ट पर जाने वाले पहले व्यक्ति थे.

लेकिन 16 अगस्त को इस गांव में बाढ़ का बर्फ़ीला पानी भर गया, क्योंकि एक झील फट गई थी.

इस आपदा में एक दर्जन से अधिक घर, होटल, स्कूल और क्लीनिक तबाह हो गए और 60 लोग बेघर हो गए.

इस गांव में रहने वाले 300 लोग अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या यह जगह आगे भी सुरक्षित रहने वाली है.

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'हम अभी भी सदमे में हैं'

हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन शेरपा समुदाय के लोगों का कहना है कि वे ख़ुशकिस्मत थे कि बाढ़ दिन में आई, जब हर कोई जग रहा था और सबको जल्द अलर्ट मिल गया था.

नेपाल माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आंग शेरिंग शेरपा ने कहा, "अगर यह रात में होता तो 200 से 300 लोगों की जान चली जाती."

थेम गांव के ही रहने वाले और इसी गांव में पैदा हुए यांगजी डोमा शेरपा ने कहा, "हम अभी भी सदमे में हैं और आपस में बात करते हुए हम अभी भी रो रहे हैं."

"सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या यह जगह अब और सुरक्षित नहीं रही. इस बाढ़ ने दिखा दिया है कि हमें इससे भी ख़तरनाक हालात से सामना करना पड़ सकता है और इसीलिए लोग सुरक्षित नहीं महसूस करते."

पहाड़ के नीचे वाले हिस्से में बसे गांव भी इसी तरह प्रभावित हुए हैं.

थेम से नीचे दो दिन के पैदल यात्रा की दूरी पर स्थित टोक टोक गांव के पसांग शेरपा ने कहा, "बाढ़ की वजह से हमारे गांव का कुछ हिस्सा बह गया...सौभाग्य से हम ऊपर पहाड़ की ओर चढ़ कर जान बचाने में सफल रहे."

उन्होंने कहा, "दृश्य और आवाज़ें इतनी डरावनी थीं कि मैं अभी भी अंदर से हिला हुआ हूं. मैंने पड़ोस के गांव में शरण ली है और सोच रहा हूं कि क्या टोक टोक जाना चाहिए."

दूध सी दिखने वाली सफेद नदी, पत्थरों और मलबे के बह कर आने से गाढ़ी भूरी हो गई.

निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं

बर्फ़ीली झीलों की निगरानी का कोई तंत्र नहीं है.

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इमेज कैप्शन, जहां दो झीलें फटीं वहां तीन और झीलें हैं. इनमें से किसी की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इन गांवों से ऊपर की ओर स्थित हिम झीलों की व्यवस्थित निगरानी का तंत्र होता तो ख़तरा बहुत कुछ कम हो सकता था.

उनका कहना है कि कुछ झीलों पर वैज्ञानिकों और प्रशासन का ध्यान गया लेकिन बाकी को यूं ही छोड़ दिया गया है.

जबकि, कई गांवों में आपदा से पहले की तैयारियां पूरी तरह नदारद हैं.

डोमा शेरपा ने कहा, "इमजा हिम झील के नीचे के कुछ गांवों में इस बात की ट्रेनिंग दी गई है कि बाढ़ की स्थिति में कैसे बचाव किया जाए. लेकिन हमारे गांव में ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई."

पिछले 50 साल में एक दर्जन से अधिक हिम झीलों के टूटने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें चार घटनाएं एवरेस्ट के दुधकोसी नदी बेसिन में हुईं.

1985 में थेम के ऊपर एक झील फटी थी, जब एक बड़ा बर्फीला तूफ़ान दिग त्शो हिम झील में आ गिरा और इसकी वजह से जो लहर पैदा हुई उससे बांध भर कर टूट गया.

इसकी वजह से नीचे की ओर बनी जलविद्युत परियोजना नष्ट हो गई और 30 लाख डॉलर से अधिक का नुक़सान हुआ.

छोटी झीलें, बड़े ख़तरे

पहाड़ी के एक हिस्से के बह जाने से नष्ट हुई इमारतों और मलबों से होकर जाती सड़क ही सम्पर्क मार्ग है.

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निगरानी का न होना केवल थेम की ही समस्या नहीं है.

हिमालयी क्षेत्र में हज़ारों ग्लेशियर और हिम झीलें हैं, लेकिन एवरेस्ट इलाक़े में बहुत कम हैं जिनकी निगरानी होती हो और वहां बाढ़ का वार्निंग सिस्टम लगा हो.

जबकि ग्लोबल वार्मिंग ने ग्लेशियरों के पिघलने की दर को बढ़ा दिया है जिससे झीलों के टूटने तक का डर है.

साल 2021 में लीड्स यूनिवर्सिटी की अगुवाई में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि 400 से 700 साल पहले हिमालयी ग्लेशियरों के विस्तार के बाद से बर्फ़ पिघलने की दर के मुकाबले, पिछले कुछ दशकों में इन ग्लेशियरों से दस गुना बर्फ़ कम हुई है.

साल 2022 में 'नेचर जर्नल' में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 1990 के दशक के बाद से माउंट एवरेस्ट का साउथ कोल ग्लेशियर आधा हो गया है.

माउंट एवरेस्ट के नीचे इमजा लेक को 2016 में खाली कर दिया गया था क्योंकि ये पता चला था कि इसके भरने से इससे नीचे के गांवों, ट्रेकिंग के रास्ते और बांधों को ख़तरा है.

लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि हाल के सालों में कई नई झीलें बनीं हैं, जबकि अन्य का विस्तार हुआ है और एक दूसरे में जुड़कर और बड़ी हो गई हैं.

इसके अलावा तेज़ी से घटते ग्लेशियरों की वजह से स्थानीय भौगोलिक परिस्थिति में अस्थिरता का ख़तरा बढ़ गया है.

इसकी वजह से भूस्खलन और बर्फ़ीले तूफ़ानों का ख़तरा बढ़ गया है, जो झीलों को भर सकते हैं और उनके फटने का कारण बन सकते हैं.

'तीन और झीलें, फट जातीं तो...'

मिंगमा शेरपा

प्रशासन का कहना है कि नेपाली हिमालयी क्षेत्र में उन्होंने दो दर्जन हिम झीलों की पहचान की है जहां ख़तरा हो सकता है, लेकिन 16 अगस्त को फटी दो झीलों का न तो इस सूची में नाम था न अधिकारियों ने जांच पड़ताल की थी.

शेरिंग शेरपा ने कहा, "ये बहुत छोटी थीं जिन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और फिर भी नुक़सान बहुत अधिक हुआ."

"कल्पना करिए कि अगर बड़ी झील फटती तो क्या हो सकता था. ऐसी बहुत सी झीलें एवरेस्ट इलाक़े में हैं."

नेपाल के डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीआरआरएमए) के अधिकारियों ने इस इलाक़े का हवाई सर्वे किया और पाया कि बाढ़ के स्रोत के आसपास पांच छोटी-छोटी हिम झीलें हैं. इनमें से एक आंशिक रूप से फट गई, जबकि दूसरी पूरी तरह फट गई.

डोमा शेरपा ने कहा, "इसका मतलब है कि उस जगह मौजूद अन्य झीलें भी किसी दिन उसी तरह फट सकती हैं."

"अब जनता जानती है कि अब वो और सुरक्षित नहीं है. हम ख़ासकर बुज़ुर्ग लोगों को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उनके साथ चलने फिरने की समस्या है."

'बाहरी दुनिया से अलग थलग'

डोमा शेरपा

हिमालयी ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग के चलते झीलें और ख़तरनाक हो गई हैं और स्थानीय लोगों का कहना है कि बाढ़ से हुए कुछ नुक़सान की तो भरपाई असंभव है.

थेम नदी खुंबू वैली के बाएं हिस्से से होकर बहती थी, लेकिन बीते शुक्रवार को आई बाढ़ ने इसका रास्ता बदल दिया है. अब यह गांव के दाहिने से होकर बह रही है और आधी ज़मीन इसमें समा गई है.

डोमा शेरपा ने कहा, "बची हुई आधी ज़मीन मलबे और बड़े बड़े पत्थरों से भरी हुई है."

"भूकंप से नष्ट हुए घरों को फिर से बनाने जैसा यह नहीं है. जब आपके पास कोई ज़मीन नहीं बची है तो आप घर बनाएंगे कहां?"

इस इलाक़े में बिजली देने वाले एकमात्र जलविद्युत स्टेशन के बांध को भी इस बाढ़ से नुक़सान पहुंचा है.

बांध में कीचड़ और मलबा भरने की वजह से स्टेशन ने काम करना बंद कर दिया है.

थेम के पास स्थित एक बड़े पर्यटन स्थल नामचे में यूथ क्लब के अध्यक्ष मिंगमा शेरपा ने कहा, "परिणामस्वरूप, बिजली नहीं है और इसकी वजह से दूरसंचार भी ठप पड़ गया है."

उन्होंने कहा, "जबसे आपदा आई है, बाहरी दुनिया से गांव पूरी तरह कट गया है. यह बहुत डरावना है."

उनके मुताबिक़, "जलवायु परिवर्तन की वजह से धीरे धीरे पड़ने वाले असर को लेकर हम चिंतित थे, जैसे कि जल स्रोतों का ख़त्म होना, लेकिन आपदा ने दिखाया है कि हम कितने असुरक्षित और ख़तरे की ज़द में हैं."

प्रशासन का क्या कहना है

हिमालयी घाटी में बाढ़ से प्रभावित गांवों में अब लोग पहले जैसा सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे.

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इमेज कैप्शन, हिमालयी घाटी में बाढ़ से प्रभावित गांवों में अब लोग पहले जैसा सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे

सरकारी अधिकारी स्थानीय चिंताओं के बारे में जानते हैं.

एमडीआरआरएमए के प्रमुख अनिल पोखरेल ने कहा, "प्रशासन विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर रहा है जो थेम गांव के ऊपर स्थित बाकी तीन झीलों के ख़तरों के बारे में अध्ययन करेगी और पता लगाएगी कि नीचे के गांव लोगों के रहने के लिए सुरक्षित हैं या नहीं."

उन्होंने कहा, "हम इस इलाक़े में आपदाओं को कम करने के लिए काम कर रहे हैं."

हालांकि स्थानीय शेरपा समुदाय के लोगों का कहना है कि जब हिम झीलों के फटने के ख़तरे से निपटने को लेकर बात आती है तो उन्होंने "बातें बहुत देखी हैं मगर काम कम देखा."

डोमा शेरपा ने कहा, "हम बड़ी बड़ी योजनाओं के बारे में सुनते हैं, ख़ासकर सम्मेलनों में, और फिर इन्हें भुला दिया जाता है."

वो कहते हैं, "लेकिन इस बाढ़ ने जो नुक़सान किया, उसे भूल नहीं सकते और ऊपर कई अन्य झीलें हैं जो किसी भी समय हम पर कहर बन कर टूट सकती हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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