दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने अचानक मार्शल लॉ क्यों लगाया और फिर क्यों हटे पीछे?

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- Author, फ्रांसिस माओ और जेक क्वोन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने मंगलवार की रात एक चौंकाने वाला फ़ैसला करते हुए पहली बार दक्षिण कोरिया में मार्शल लॉ की घोषणा की.
लेकिन भारी दबाव के बाद इसे वापस ले लिया.
यून सुक-योल की ये अप्रत्याशित घोषणा देर रात टीवी पर प्रसारित की गई. बताया गया कि देश को उत्तर कोरिया और देश-विरोधी ताक़तों से ख़तरा है.
लेकिन जल्द ही ये स्पष्ट हो गया कि निर्णय बाहरी ख़तरों से नहीं बल्कि राष्ट्रपति यून सुक-योल की अपनी हताशाजनक राजनीतिक परेशानियों से प्रेरित था.
जैसे ही घोषणा हुई, इसके विरोध में हज़ारों लोग संसद के सामने जुट गए. तुरंत विपक्ष के सांसद संसद पहुँचे और मार्शल लॉ को निरस्त करने के लिए आपातकालीन वोट की मांग करने लगे.
सांसदों और आम लोगों को दबाव के बाद यून ने हार मान ली और कुछ घंटों बाद संसद में हुए मतदान को स्वीकार करते हुए मार्शल लॉ का आदेश वापस ले लिया.
कैसे हुआ ये घटनाक्रम

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पर्यवेक्षकों का कहना है कि यून ने एक ऐसे राष्ट्रपति की तरह काम किया है, जो चारों तरफ़ से घिरे हुए हैं.
मंगलवार रात को उन्होंने अपने संबोधन में सरकार को कमज़ोर करने के विपक्ष के प्रयासों का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा कि वह "तबाही मचाने वाली देश विरोधी ताक़तों को कुचलने के लिए" मार्शल लॉ की घोषणा करते हैं.
उनके आदेश का अर्थ था कि देश अस्थायी तौर पर सेना के नियंत्रण में चला गया.
हैलमेट पहने सैनिकों और पुलिस को नेशनल असेंबली की इमारत में तैनात किया गया. इस भवन की छत पर हेलिकॉप्टर उतरते देखे गए.
स्थानीय मीडिया ने भी नकाबपोश, बंदूकधारी सैनिकों के इमारत में घुसने की तस्वीरें दिखाईं.
ऐसे वीडियो दिखाए गए, जिनमें नेशनल असेंबली के कर्मचारी सैनिकों को रोकने का प्रयास कर रहे थे.
मंगलवार को दक्षिण कोरियाई समयानुसार लगभग रात 11 बजे, सेना ने एक आदेश जारी किया.
इस आदेश में कहा गया कि तुरंत प्रभाव से संसद और राजनीतिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों और गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है और मीडिया को सरकारी नियंत्रण में लिया जाता है.

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लेकिन दक्षिण कोरियाई राजनेताओं ने तुरंत यून की घोषणा को अवैध और असंवैधानिक क़रार दिया.
उनकी अपनी पार्टी, रूढ़िवादी पीपल्स पावर पार्टी के नेता ने भी यून के इस फ़ैसले को "ग़लत क़दम" बताया.
इस बीच, देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, उदारवादी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ली जे-म्यांग ने अपने सांसदों से संसद पहुँचकर, मार्शल लॉ की घोषणा के ख़िलाफ़ मतदान करने का आह्वान किया.
उन्होंने आम दक्षिण कोरियाई लोगों से संसद में आकर विरोध प्रदर्शन करने का भी आह्वान किया.
ली जे-म्यांग ने कहा, "टैंक, बख़्तरबंद गाड़ियों, बंदूकों और चाकुओं से लैस सैनिक देश पर राज न करें इसलिए मेरे साथियो नेशनल असेंबली पहुँचिए."
उनके इस संदेश पर हज़ारों लोग संसद के बाहर जमा होने लगे.
प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे, 'मार्शल लॉ नहीं लगेगा' और 'तानाशाही को ख़त्म करो'
स्थानीय मीडिया ने संसद के बाहर से प्रसारण करते हुए गेट पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच कुछ झड़पें भी दिखाईं. लेकिन सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद तनाव हिंसा में नहीं बदला.
इसी बीच सांसद बैरिकेड्स को पार करते हुए संसद में दाखिल हो गए. वे तमाम रुकावटों को पार करते हुए मतदान कक्ष तक पहुँचने में सफल रहे.
कोरियाई समयानुसार, बुधवार तड़के एक बजे के आस-पास दक्षिण कोरिया की संसद में 300 में से 190 सदस्य उपस्थित थे.
इन सांसदों ने विधेयक को ख़ारिज करते हुए राष्ट्रपति यून की मार्शल लॉ की घोषणा को अमान्य घोषित कर दिया.
मार्शल लॉ लगाने के क्या थे मायने?

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दक्षिण कोरिया में मार्शल लॉ आपातकाल के समय लगाया गया, अस्थायी शासन होता है, जिस दौरान देश की कमान सेना के हाथ में आ जाती है.
इसकी वजह ये बताई जाती है कि चुनी हुई सरकार अपना कामकाज करने में असमर्थ है.
दक्षिण कोरिया में इसकी घोषणा आख़िरी बार साल 1979 में की गई थी. तब दक्षिण कोरिया के तत्कालीन सैन्य तानाशाह पार्क चुंग-ही की तख्तापलट के दौरान हत्या कर दी गई थी.
साल 1987 में दक्षिण कोरिया के संसदीय लोकतंत्र बनने के बाद से इसे कभी लागू नहीं किया गया.
लेकिन मंगलवार को यून ने मार्शल लॉ लगा दिया था. उन्होंने देश के नाम संबोधन में कहा था कि वह दक्षिण कोरिया को 'देश-विरोधी ताक़तों' से बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

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राष्ट्रपति यून पहले की सरकारों की तुलना में उत्तर कोरिया के प्रति अधिक कठोर रुख़ अपनाते रहे हैं.
अपने संबोधन में उन्होंने विपक्ष को उत्तर कोरिया का समर्थक बताया लेकिन अपने इस बयान के पक्ष में कोई सबूत नहीं दिया.
मार्शल लॉ के तहत, सेना को अतिरिक्त शक्तियाँ दे दी जाती हैं और अक्सर नागरिकों के अधिकारों को निलंबित कर दिया जाता है.
सेना ने राजनीतिक गतिविधियों और मीडिया पर प्रतिबंध की घोषणा तो की लेकिन प्रदर्शनकारियों और राजनेताओं ने उन आदेशों की खुलकर अवहेलना की.
सेना ने अपने आदेश में कहा था कि सारा मीडिया सरकार के नियंत्रण में लिया जाता है लेकिन ज़मीन पर इसके कोई सबूत नहीं मिले.
यहाँ तक योनहाप नाम के राष्ट्रीय प्रसारक समेत अन्य आउटलेट सामान्य रूप से रिपोर्टिंग करते रहे.
यून ने क्यों किया ये फ़ैसला?

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यून मई 2022 में सत्ता में आए थे. उनकी छवि एक कट्टर रूढ़िवादी की है.
लेकिन इस साल अप्रैल में विपक्ष ने देश के आम चुनाव में भारी जीत हासिल की. उसके बाद देश पर उनकी पकड़ ढीली होने लगी.
संसद पर विपक्ष का नियंत्रण होने के कारण उनकी सरकार बिल पास नहीं करवा पा रही थी.
देश में उनकी लोकप्रियता लगातार कम हो रही थी. हाल में आए सर्वे में उनकी लोकप्रियता 17% के न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई है.
इस साल वे कई घोटालों में फँसे हैं. इन्हीं में एक स्कैंडल उनकी पत्नी से जुड़ा है.
उनकी पत्नी पर आरोप लगा कि उन्होंने एक डिज़ाइनर बैग उपहार में स्वीकार किया. इसके अलावा स्टॉक मार्केट में हेराफेरी से जुड़ा मामला भी सामने आया.
पिछले महीने राष्ट्रपति यून ने राष्ट्रीय टीवी पर माफ़ी मांगी थी. उन्होंने कहा था कि वे फर्स्ट लेडी के कामकाज़ की देखरेख के लिए एक ऑफ़िस स्थापित कर रहे हैं.
लेकिन उन्होंने विपक्ष की किसी व्यापक जाँच की मांग को अस्वीकार कर दिया था.
फिर इस सप्ताह विपक्ष ने एक बजट विधेयक में कटौती का प्रस्ताव रखा. देश के क़ानून के मुताबिक़ इस विषय पर राष्ट्रपति वीटो का इस्तेमाल नहीं कर सकते.
इसी समय विपक्ष ने फ़र्स्ट लेडी की जांच करने में विफल रहने के लिए कैबिनेट सदस्यों और कई वरिष्ठ सरकारी वकीलों के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने का प्रस्ताव भी रखा.
अब क्या होगा?

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यून की घोषणा ने कई लोगों को अचंभे में डाल दिया और छह घंटे तक दक्षिण कोरियाई लोग असमंजस की स्थिति में रहे. लोग ये जानना चाह रहे थे कि मार्शल लॉ आदेश का क्या मतलब है.
लेकिन विपक्ष ने तुरंत संसद में जमा होकर राष्ट्रपति के आदेश के ख़िलाफ़ मतदान कर इसे अस्वीकार कर दिया.
राजधानी सोल में सैनिकों और पुलिस की भारी उपस्थिति के बावजूद जल्द ही ऐसा लगने लगा कि सेना के लिए देश पर नियंत्रण हासिल करना मुमकिन नहीं होगा.
दक्षिण कोरियाई क़ानून के अनुसार, अगर संसद बहुमत से मार्शल लॉ का विरोध करे, तो उसे लागू नहीं किया जा सकता.
इसी क़ानून के तहत मार्शल लॉ के कमांडरों को सांसदों को गिरफ़्तार करने से भी रोकता है.
ये स्पष्ट नहीं है कि अब क्या होगा और यून को इस क़दम का क्या ख़ामियाजा भुगतना पड़ेगा.
मंगलवार रात संसद के बाहर जमा हुए कुछ प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे कि 'यून सुक-योल को गिरफ़्तार करो'
आगे जो भी हो लेकिन उनके इस क़दम ने निश्चित रूप से दक्षिण कोरिया को स्तब्ध कर दिया है.
यहाँ के लोग अपने देश को एक संपन्न, आधुनिक लोकतंत्र मानते हैं, जो अतीत की तानाशाही के दौर को काफ़ी पीछे छोड़ चुका है.
मंगलवार को जो कुछ हुआ, उसे यहाँ बीते दशकों में लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.
जानकारों का मानना है कि ये घटना दक्षिण कोरिया के लोकतंत्र की साख के लिए अमेरिका में छह जनवरी को हुए दंगों से भी अधिक नुक़सानदेह हो सकता है.
सोल स्थित इवा विश्वविद्यालय के एक विशेषज्ञ लीफ-एरिक इस्ले ने कहा, "यून की मार्शल लॉ की घोषणा क़ानूनी अतिक्रमण और राजनीतिक ग़लतफ़हमी का प्रतीक है. इससे दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है."
"वो एक ऐसे राजनेता लग रहे थे जो पूरी तरह से घिर चुके हैं. जो बढ़ते घोटालों और महाभियोग की मांगों के ख़िलाफ़ हताशा में ऐसा क़दम उठा रहे हैं. लेकिन अब इन सब चीज़ों की मांग और तेज़ होती जाएगी."
बुधवार सुबह मार्शल लॉ वाले विधेयक को रद्द करते हुए संसद के स्पीकर ने स्पष्ट रूप से कह दिया - हम लोगों के साथ मिलकर लोकतंत्र की हिफ़ाज़त करेंगे."
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