अजमेर: 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' की कहानी, जिस पर गर्माया है विवाद

अढ़ाई दिन का झोपड़ा की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, अजमेर स्थित अढ़ाई दिन का झोपड़ा
    • Author, अंशुल सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अजमेर की एक स्थानीय अदालत ने अजमेर शरीफ़ दरगाह के नीचे 'मंदिर' का दावा करने वाली याचिका को हाल ही में स्वीकार कर लिया था.

दरगाह से कुछ ही दूरी पर स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' को लेकर अब अजमेर के डिप्टी मेयर ने दावा किया है कि इसकी जगह पहले 'मंदिर और कॉलेज' था .

कुछ रोज़ पहले उत्तर प्रदेश के संभल में मौजूद शाही जामा मस्जिद को लेकर इसी तरह का दावा किया गया था और ज़िला अदालत ने मामले में सर्वे का आदेश दिया था.

भारतीय जनता पार्टी के नेता और अजमेर के डिप्टी मेयर नीरज जैन का दावा है कि 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' की जगह पहले मंदिर और संस्कृत कॉलेज मौजूद था.

'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक है और अजमेर की दरगाह से 500 मीटर से भी कम की दूरी पर मौजूद है.

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किस आधार पर दावा?

अजमेर के डिप्टी मेयर नीरज जैन का दावा है कि नालंदा और तक्षशिला विश्विद्यालय की तर्ज़ पर पुरानी धरोहर को नष्ट करके 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' बनाया गया है.

नीरज जैन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "जिसको आज तथाकथित अढ़ाई दिन का झोपड़ा बताया जाता है वो संस्कृत पाठशाला और मंदिर था. उस समय जो आक्रामणकारी भारत आए थे उन्होंने इस धरोहर को तहस-नहस करने के बाद वर्तमान संरचना को बनाया है. इस बात के सबूत वहां पर मौजूद हैं. आज अढ़ाई दिन का झोपड़ा में लगे खंभों में जगह-जगह पर देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं. वहां पर स्वास्तिक और कमल के चिन्ह हैं और संस्कृत की लिखावट में कई श्लोक वगैरह भी लिखे हुए हैं."

नीरज कहते हैं कि हमने अतीत में भी यह मांग की है कि यहां धार्मिक गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए.

नीरज अपने दावे के पीछे हरबिलास सारदा की किताब को आधार मानते हैं और अजमेर शरीफ़ दरगाह मामले में याचिकाकर्ता विष्णु गुप्ता ने भी इसी किताब को आधार बनाया है.

अढ़ाई दिन का झोपड़ा की तस्वीर
इमेज कैप्शन, एएसआई के मुताबिक़, यह दिल्ली के पहले सुल्तान क़ुतबुद्दीन ऐबक द्वारा 1199 ई. में बनवाई गई एक मस्जिद है

साल 1911 में हरबिलास सारदा ने 'अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव' नाम से एक किताब लिखी थी. 206 पन्नों की इस किताब में कई टॉपिक शामिल हैं.

किताब के सातवें चैप्टर में 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' नाम का चैप्टर है.

इस चैप्टर में हरबिलास सारदा लिखते हैं, "जैन परंपरा के मुताबिक़, इस संरचना का निर्माण सेठ वीरमदेवा काला ने 660 ईस्वी में जैन त्योहार पंच कल्याणक मनाने के लिए एक जैन मंदिर के रूप में किया था. इसकी आधारशिला जैन भट्टारक श्री विश्वानंदजी ने रखी थी."

हरबिलास सारदा दावा करते हैं कि इसके नाम से यह आम धारणा है कि इसे ढाई दिन में बनाया गया है जबकि इस संरचना को मस्जिद में बदलने में कई साल लगे थे.

हरबिलास सारदा आगे लिखते हैं, "यह मूल रूप से एक इमारत थी जिसका इस्तेमाल एक कॉलेज के रूप में किया जाता था. इसे एक वर्ग के रूप में बनाया गया था और हर तरफ की लंबाई 259 फ़ीट थी. इसके पश्चिमी भाग में एक 'सरस्वती मंदिर' (कॉलेज) था. इस कॉलेज का निर्माण लगभग साल 1153 में भारत के पहले चौहान सम्राट वीसलदेव द्वारा किया गया था."

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सारदा लिखते हैं, "1192 ई. में ग़ौर (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान का एक प्रांत) से आए अफ़ग़ानों ने मोहम्मद ग़ौरी के आदेश पर अजमेर पर हमला किया था और इस दौरान इस इमारत को भी क्षति पहुंचाई गई थी."

"इसके बाद इस संरचना को मस्जिद में बदलने की शुरुआत हुई थी. सफेद संगमरमर से बना इमामगाह या मेहराब 1199 ईस्वी और पारदर्शी दीवारें 1213 ईस्वी में सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के समय बनाई गई थीं. इस तरह से पुनर्निर्माण या रूपांतरण का कार्य 1199 ई. से पहले से 1213 तक चला, यानी पंद्रह वर्षों से अधिक."

हालांकि बीबीसी नीरज जैन और हरबिलास सारदा की किताब में लिखे दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है.

यह पूछे जाने पर कि हरबिलास सारदा की किताब तो बरसों-बरसों से है, फिर अब क्यों इसे मुद्दा बनाया जा रहा है? नीरज कहते हैं, "मैं पिछले कुछ सालों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहा हूं और एएसआई से इसका सर्वे और सरंक्षण की मांग करता आया हूं. इस बार भी यही कर रहा हूं."

लेकिन कई इतिहासकार इसे प्रमाणों के साथ क़ुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गई मस्जिद बताते हैं. इस पर आप क्या कहेंगे?

नीरज जैन कहते हैं, "जो इतिहासकार ऐसा कह रहे हैं कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे बनवाया है, मेरा उनको कहना है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे बनवाया नहीं था, बल्कि मंदिर और कॉलेज को तुड़वाया था. ये सब तोड़कर अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद बनाई गई है."

अजमेर में दरगाह शरीफ़

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इमेज कैप्शन, अजमेर शरीफ़ दरगाह सभी धर्मों के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है

इतिहासकार इस दावे पर क्या कहते हैं?

अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और भारतीय इतिहास कांग्रेस के सचिव प्रोफ़ेसर सैय्यद अली नदीम रिज़वी इस बहस को तर्कहीन और आधारहीन मानते हैं.

उनका कहना है कि जब प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 है तो इस तरह की बहस की क्या ज़रूरत है.

प्रोफ़ेसर सैय्यद अली नदीम रिज़वी कहते हैं, "बौद्धों के कई धार्मिक स्थल हिन्दू धर्म के मंदिर में बदल गए. जाने कितने जैन मंदिर हैं जो हिन्दू धर्म के मंदिरों में बदल गए. क्या आप हर एक को खोद-खोदकर उनके मूल तक पहुंचाएंगे. यह सब तब हो रहा था जब न तो संविधान था और न ही लोकतंत्र था. आज की तारीख़ में संविधान है, नियम-क़ानून है. कुल मिलाकर यह इतिहास का मसला नहीं है."

एएसआई का क्या कहना है?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की वेबसाइट पर 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' को लेकर जानकारी दी गई है.

एएसआई के मुताबिक़, "यह वास्तव में दिल्ली के पहले सुल्तान क़ुतबुद्दीन ऐबक द्वारा 1199 में बनवाई गई एक मस्जिद है, जो दिल्ली के कुतुब-मीनार परिसर में बनी क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के समकालीन है. इसके बाद 1213 में सुल्तान इल्तुतमिश ने इसमें घुमावदार मेहराब और छेद वाली दीवार लगाई. भारत में ऐसा यह अपने तरीके का पहला उदाहरण है."

"हालांकि, परिसर के बरामदे के अंदर बड़ी संख्या में वास्तुशिल्प कलाकृतियां और मंदिरों की मूर्तियां हैं, जो लगभग 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान इसके आसपास एक हिंदू मंदिर के अस्तित्व को दर्शाती हैं. मंदिरों के खंडित अवशेषों से बनी इस मस्जिद को 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' के नाम से जाना जाता है, संभवतः इसका कारण है कि यहां ढाई दिनों तक मेला लगता था."

एएसआई की वेबसाइट पर संदर्भ के तौर पर हरबिलास सारदा की किताब का इस्तेमाल किया गया है.

जैन मुनि सुनील सागर

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इमेज कैप्शन, 2024 के मई महीने में जैन मुनि सुनील सागर 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' पहुंचे थे

पहले भी उठ चुकी है ऐसी मांग

साल 2024 के मई महीने में जैन मुनि सुनील सागर के नेतृत्व में जैन समुदाय के लोगों ने नंगे पैर 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' तक मार्च किया था.

तब मीडिया से बातचीत में सुनील सागर ने कहा था, "आज, मैंने अढ़ाई दिन का झोपड़ा देखा और पाया कि यह झोपड़ी नहीं, बल्कि एक महल है. इस दौरान मुझे हिन्दू आस्था की टूटी हुई मूर्तियां मिलीं फिर भी विडंबना है कि इसे मस्जिद कहा जाता है."

इस दौरान जैन मुनि ने एक पत्थर के मंच पर बैठकर लगभग दस मिनट का प्रवचन भी दिया था.

तब अजमेर शरीफ़ दरगाह के खादिमों की प्रतिनिधि संस्था अंजुमन कमेटी के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि जैन मुनि बिना कपड़ों के मस्जिद में प्रवेश नहीं कर सकते हैं.

इस पर जैन मुनि की तरफ़ से कहा गया था कि जैन धर्म के अनुयायी होने के नाते किसी भी सरकारी इमारत में प्रवेश करना उनका अधिकार है.

सरवर चिश्ती के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा था कि सरवर चिश्ती ने जैन मुनियों पर टिप्पणी कर सनातन संस्कृति का अपमान किया है और उन्हें पूरे सनातन समाज से माफी मांगनी चाहिए.

इसी साल जनवरी के महीने में जयपुर से तत्कालीन बीजेपी सांसद रामचरण बोहरा ने पर्यटन एंव पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री जी किशन रेड्डी को पत्र लिखकर कहा था कि 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' संस्कृत शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इसे मूल स्वरूप में परिवर्तित किया जाए.

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