भ्रष्टाचार और परिवारवाद के लगते आरोप, कैसे पारदर्शी होगी भारत की न्यायपालिका?

जस्टिस यशवंत वर्मा की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले के बाद न्यायपालिका सवालों के घेरे में है

बीते हफ़्ते एक तस्वीर जगह-जगह दिखी और लोगों की उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं भी आईं. तस्वीर थी एक घर में लगी आग को बुझाए जाने के बाद स्टोर रूम से मिली, अधजली नोटों की गड्डियों की.

ये घर दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा का था.

हालांकि जस्टिस वर्मा ने कहा कि उन्होंने या उनके परिजनों ने वहां कभी कैश नहीं रखा और ये उनके ख़िलाफ़ साज़िश है जबकि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमेटी बना दी है.

इस मामले के बाद एक बार फिर न्यायपालिका को लेकर बहस तेज़ हुई है. मामला सिर्फ़ भ्रष्टाचार का ही नहीं है.

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सवाल कई हैं, न्यायपालिका की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो रही है, न्यायपालिका की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित रहेगी, जजों की नियुक्ति में क्या कोलेजियम ही सबसे प्रभावशाली तरीक़ा है, राजनीतिक दख़लंदाज़ी के आरोप क्या महज़ खोखले आरोप हैं या उनमें कुछ दम भी है.

बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सवालों पर चर्चा की.

इन तमाम पहलुओं पर चर्चा के लिए वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट इंदिरा जयसिंह, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के लॉ स्कूल में पब्लिक स्कूल के चेयर प्रोफ़ेसर तरुण खेतान और बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार शामिल हुए.

वीडियो कैप्शन, न्यायपालिका की जवाबदेही और स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित हो?- द लेंस

जजों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर क्यों नहीं होती?

वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट इंदिरा जयसिंह

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इमेज कैप्शन, वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि अगर किसी भी जज के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तुरंत दर्ज करने की व्यवस्था बन गई तो न्यायपालिका की पूरी स्वतंत्रता ख़त्म हो जाएगी
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यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका भ्रष्टाचार का आरोप लगा हो. गाहे बगाहे यह मसला उठता ही रहता है. कभी ज़िला स्तर पर तो कभी इतने बड़े स्तर पर.

यही वजह है कि कभी न्यायपालिका के जज के चयन की परंपराओं पर सवाल उठता है तो कई बार उनके अंदर के तंत्र में जवाबदेही को निर्धारित करने की बात आती है.

यह भी सवाल आता है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जो भी तंत्र मौजूद हैं क्या वह सही तरीके़ से काम कर रहे हैं और तंत्र अपने आप में संपूर्ण है.

वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट इंदिरा जयसिंह ने कहा, "जवाबदेही से मतलब यह है कि हमें हमारे सवालों के जवाब मिले. इस तरह के केस में सुप्रीम कोर्ट ही जवाब दे सकता है क्योंकि जिस जज के ख़िलाफ़ यह आरोप है वह हाईकोर्ट का जज है और हाईकोर्ट के जज का अप्वाइंट करने के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के जज हैं. हमारे सवाल का जवाब दो और यही जवाबदेही है."

न्यायपालिका के अंदर आम आदमी पर लागू नियमों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं होती है?

उन्होंने बताया, "सेम प्रोसेस नहीं हो सकते हैं. वह इसलिए कि हम चाहते हैं कि हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र रहे. आप किसी भी हवलदार को अगर यह अधिकार दें कि किसी भी जज के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तुरंत दर्ज कर लो तो न्यायपालिका की पूरी स्वतंत्रता ख़त्म हो जाएगी. उच्चतम न्यायालय का इसीलिए यह फै़सला है और मैं इससे सहमत भी हूं कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अनुमति के बाद ही एफ़आईआर दर्ज हो सकती है. अगर यह सेफ़गार्ड नहीं होगा तो आप मान लिजिए कि एक पुलिस स्टेट में हम रहेंगे."

ज्यूडिशियल काउंसिल तय कर सकती है जवाबदेही

एक अदालत का कैरीकेचर

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इमेज कैप्शन, एक जज को काफ़ी पावरफुल लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला देना पड़ता है.

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में लॉ स्कूल में पब्लिक स्कूल के चेयर प्रोफ़ेसर तरुण खेतान ने कहा, "भारत की न्यायपालिका में समस्याएं हैं लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए गेटकीपर्स बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि हमारे यहां एक जज को काफ़ी पावरफ़ुल लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला देना पड़ता है. कभी कभी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भी फ़ैसला देना पड़ता है और अगर किसी जज को फ़ैसला देने से पहले ये डर मन में बैठ जाए कि इस पर फ़ैसला देने से मेरा क्या होगा तो फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता बिल्कुल ख़त्म हो जाएगी."

उन्होंने बताया, "भारत के कानून में महाभियोग का नियम है. राजनेता इसका प्रयोग करके किसी जज को हटा सकते हैं लेकिन यह आसान नहीं है. आसान इसलिए नहीं कि सत्ता पक्ष को जज पसंद नहीं आया तो वो जज को मनमर्ज़ी से हटा दें. ये नहीं हो सकता लेकिन सत्ता और विपक्ष मिलकर किसी जज के ख़िलाफ़ पुख्ते सबूत के साथ बहुमत लाकर जज को हटा सकते हैं. बाकी देशों में भी ऐसे ही महाभियोग क़ानून होते हैं."

उन्होंने बताया कि एक और संस्थान काफी जगहों पर है जो भारत में नहीं है. इसे ज्यूडिशियल काउंसिल कहा जाता है. यह जजों के छोटे गलत कार्यों की जवाबदेही तय कर सकती हैं लेकिन उनका स्वतंत्रता होना बहुत ज़रूरी है.

भारत के वर्तमान परिदृश्य में हम यह कर पाएंगे या नहीं यह देखना होगा.

जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका कितनी ज़रूरी?

एक कैरीकेचर

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इमेज कैप्शन, 1993 में उच्चतम न्यायालय ने फ़ैसला दिया कि उनकी सलाह नहीं बल्कि मंज़ूरी से होगी न्यायाधीशों की नियुक्ति

जजों की नियुक्ति को लेकर सवाल काफ़ी समय से उठ रहे हैं.

बीबीसी संवाददाता उमंग पोद्दार ने कहा, "जजों की नियुक्ति को लेकर बहुत लोगों का मानना है कि एक ऐसी प्रकिया होनी चाहिए जिसमें न्यायपालिका स्वतंत्र रहे. भारतीय संविधान के अनुसार उच्चतम और उच्च न्यायालय के जजों को मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति नियुक्त कर सकता है."

उन्होंने बताया, "1993 में नौ जजों की पीठ ने एक फ़ैसला दिया और कहा कि उनकी मंज़ूरी ज़रूरी है. पक्ष सभी का होगा लेकिन आखिरी फैसला उच्चतम न्यायालय का होगा. 2014 में इसे बदलने के लिए कार्यपालिका एक संशोधन लेकर आया. इस पर पांच जजों की एक पीठ बैठी और उसने फैसला सुनाया कि यह असंवैधानिक है. इस फैसले में जजों ने कहा कि नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता ज़रूरी है."

उन्होंने बताया कि इसी पीठ के एक जज ने कहा कि इसमें कार्यपालिका की भी मंज़ूरी चाहिए. उनका पक्ष रखना ज़रूरी है उनकी नज़र में यह असंवैधानिक नहीं था.

उमंग पोद्दार कहते हैं कि नियुक्ति को लेकर बाकी देशों का उदाहरण देते हुए भी लोग बात करते हैं. ऐसे दो पक्ष हैं जो मुख्यत: नियुक्ति पर बात कर रहे हैं कि किस तरह से जजों की नियुक्ति होनी चाहिए.

कॉलेजियम सिस्टम कितना सही है?

कैरीकेचर

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इमेज कैप्शन, विश्लेषक कहते हैं कि कॉलेजियम को हटाना ज़रूरी नहीं है लेकिन उसमें पारदर्शिता होना बहुत ज़रूरी है.

जजों की नियुक्तियों में परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में कॉलेजियम सिस्टम कितना सही है?

इंदिरा जयसिंह ने कहा, "मैं मानती हूं कि कॉलेजियम सिस्टम सही है लेकिन परिवारवाद बहुत बड़ा सवाल है. ये क्यों हो रहा है क्योंकि कॉलेजियम के सिस्टम में पारदर्शिता नहीं है. मैं एक वकील हूं अचानक कोई आकर बैठता है और हमें कहना पड़ता है माई लार्ड, माई लार्ड. कौन है ये? कहां से आया? कैसे आया? इसके बारे में क्या हो रहा है कुछ पता नहीं?"

उन्होंने कहा, "एक बहुत बड़ा सवाल मेरे मन में सालों से ये है कि जज बनने के लिए अवसर की समानता क्यों नहीं है? आखिर जो 60 प्रतिशत जज बनते हैं वो हम जैसे वकील होते हैं तो मैं यह जानना चाहूंगी कि मुझे क्यों नहीं बनाया, उसे क्यों बनाया? इसका नतीजा जो देख रहे हैं वह है परिवारवाद."

उन्होंने कहा कि 'दूसरा जातिगत संयोजन देख लीजिए. ब्राह्मणों का वर्चस्व है. अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाएं कहां हैं? ये क्यों हो रहा है? इसके लिए कॉलेजियम को हटाना ज़रूरी नहीं है लेकिन उसमें पारदर्शिता होना बहुत ज़रूरी है.'

जज क्यों नहीं बताते अपनी संपत्ति?

पैसा और डंडा

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों की राय है कि जज बनाने के लिए वकीलों का आवेदन मांगा जाना चाहिए.

इंदिरा जयसिंह ने कहा, "मैं तो ये मानती हूं कि अगर किसी वकील को जज बनना है उसे आवेदन का अधिकार दो. फिर देख लो कितने लोग आवेदन करते हैं. आपके पास एक अच्छी स्क्रीनिंग कमेटी होनी चाहिए. आप उनका ट्रैक रिकार्ड ​देखो."

उन्होंने कहा, "जज नियुक्ति करते हैं तो उनके फ़ैसलों का ट्रैक रिकार्ड क्यों नहीं देख रहे हो. फिर जो भी है आप उनके ट्रैक रिकार्ड को पब्लिक कर दो. आपके नियुक्ति के मानदंड हैं, वह गायब हैं तो ये होने ही वाला है."

न्यायपालिका में पारदर्शिता को लेकर इतना प्रतिरोध क्यों है? इंदिरा जयसिंह ने कहा, "आप देख लिजिए कि आरटीआई एक्ट का क्या हाल हो रहा है? उच्चतम न्यायालय में कई लोगों ने आवेदन कर रखा है और यही जवाब आता है कि इस सवाल का जवाब हम आपको नहीं दे सकते हैं."

उन्होंने कहा कि एक दूसरा सवाल है कि जजों को अपनी संपत्तियों की घोषणा सार्वजनिक करनी चाहिए. आज के ज़माने में ये भी नहीं है तो जज आप क्यों बनाते हो वो तो बहुत दूर की बात है? इस बात का हमें दुख है और इसके कारण ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं.

कोशिश हुई लेकिन अर्थपूर्ण बदलाव बाकी

सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपना पदभार संभालने के बाद कॉलेजियम में पारदर्शिता लाने की कोशिशें की थीं

उमंग पोद्दार ने कहा, "न्यायपालिका के लोगों का मानना है कि कॉलेजियम नियुक्ति का सबसे अच्छा तरीका है. हालांकि कुछ जज कॉलेजियम में पारदर्शिता लाने की बात कहते हैं. ऐसी कुछ कोशिश भी हुई थी जब जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपना पदभार संभाला था. उन्होंने तीन चार सिफारिश की थी."

उन्होंने कहा, "यह लगातार देखा जा रहा है कि सिफारिशें पूरी तरह से लागू नहीं की जाती हैं. कॉलेजियम की सिफारिश का पारदर्शी बनाने की बात होती है लेकिन सिफारिशों को जब पढ़ें तो ज़्यादातर यह लिखा जाता है कि यह जो वकील हैं उन्हें बहुत अनुभव है."

पोद्दार कहते हैं कि इसके बाद इसे बहुत गहराई से नहीं देखा जाता है कि वकील का क्या अनुभव है? किस आधार पर उन्हें एक जज के तौर पर देखा जा रहा है?

उन्होंने कहा कि इन चीज़ों की बातें होती हैं. थोड़ी बहुत कोशिशें भी हुई हैं लेकिन कोई ऐसी कोशिश नहीं हो पाई कि जिससे यह कहा जा सके कि कोई अर्थपूर्ण बदलाव आया है.

यहां जजों को देना होता है पब्लिक इंटरव्यू

प्रोफ़ेसर तरुण खेतान

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इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर तरुण खेतान कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका हो या यूके यहां सभी नियुक्ति आवेदन के आधार पर की जाती है

प्रोफ़ेसर तरुण खेतान ने कहा, "आप नियुक्ति कैसे कर रहे हो? पारदर्शिता का सीधा संबंध योग्यता से है. दक्षिण अफ्रीका हो या यूके यहां सभी नियुक्ति आवेदन के आधार पर की जाती है."

खेतान कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका में नियुक्ति के लिए जो इंटरव्यू लिया जाता है वह भी टीवी पर लाइव टेलीकास्ट होता है. वहां हर जज की नियुक्ति ही पब्लिक इंटरव्यू के बाद की जाती है.

उन्होंने कहा, "दुनिया भर में नियुक्ति को लेकर बड़ा बदलाव हुआ है. श्रीलंका, नेपाल, या फिर सेशेल्स में संविधान परिषद है और सभी संवैधानिक नियुक्त यही करती है. फिर चाहे वह जज हो, चुनाव आयुक्त हो या फिर मानवधिकार आयोग.

उन्होंने कहा कि इस परिषद में राजनेता होते हैं लेकिन सब सत्ता पक्ष के नहीं होते हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बराबरी के मत इसमें होते हैं. इससे जो नियु​क्ति होती है वह निष्पक्षता की गारंटी होती है.

पारदर्शी होनी चाहिए जजों की नियुक्ति

इंसाफ का तराजू

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इमेज कैप्शन, ऐसा देखा गया है कि कॉलेजियम की कई सिफारिशों को साल दर साल लटका दिया जाता है

इंदिरा जयसिंह ने कहा, "राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर विरोध यह नहीं था कि सरकार के प्रतिनिधि इसमें क्यों हैं. सवाल इसमें प्रधानता का था. सरकार के प्रतिनिधि रख दो, विपक्ष के नेता को रख दो और अन्य सरकारी प्रतिनिधि रखते हुए नाम के लिए केवल एक जज रख दो तो फिर कहां स्वतंत्रता होगी?"

उन्होंने कहा कि यही वजह थी कि 2015 में इस आयोग को असंवैधनिक घोषित किया गया लेकिन सरकार कह रही है कि नियुक्ति आयोग लाएंगे, आखिर आप दस साल तक कर क्या रहे थे? अब तक क्यों आप चुप बैठे थे? फैसला आने के बाद आप कानून क्यों नहीं लाए? इसलिए कि यह सरकार के सिस्टम को बहुत शूट कर रहा है.

जयसिंह कहती हैं, "अगर आप बैकडोर से अपना काम करवा सकते हो तो फिर फ्रंटडोर से क्यों करोगे? उनको क्या तकलीफ है? सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश उन्हें पसंद नहीं हो तो वह नहीं नियुक्त करते हैं. ऐसे कितने मामले हैं कि पॉकेट विटो दे दिया नियुक्त नहीं किया है. ये बहुत बुरी बात है कि जब सरकार और न्यायपालिका बैकडोर से हाथ मिलाते हैं. हमें इससे बहुत तकलीफ होती है."

उन्होंने कहा, "कॉलेजियम की कई सिफारिशों को साल दर साल लटका दिया जाता है और कई लोगों को चार दिन में नियुक्ति मिल जाती है. आखिर ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का जवाब मुझे कौन देगा? यह किसी एक सरकार का सवाल नहीं है. यह एक तरह की प्रकिया है. इस प्रकिया में बदलाव की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि आप बदलाव करो, कुछ भी करो लेकिन पारदर्शिता रखो. आयोग को लेकर जब चर्चा चल रही थी तो मेरा एक ही सुझाव था कि पूरी प्रकिया को टेलीविजन पर प्रसारित करो. आप जिसको नियुक्त करना चाहते हो करो लेकिन हम सवाल सामने से करेंगे.

न्याय में देरी क्यों?

न्यायपालिका की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों के मुताबिक़, ज़िला न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक बदलाव की ज़रूरत है.

इंदिरा जयसिंह ने कहा, "न्यायपालिका के पूरे तंत्र में बदलाव की ज़रूरत है. ज़िला से लेकर उच्चतम न्यायालय तक फैला तंत्र इतना भारी हो गया है कि अब आम लोगों को यह लगने लगा कि उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. अदालतों में तारीख पर तारीख दी जाती है या अंतिम समय में घोषणा कर दी जाती है कि आज तो जज साहब नहीं बैठेंगे."

उन्होंने कहा, "हां, कुछ लोग रात को 12 बजे भी अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं लेकिन इसका स्वागत होना चाहिए. मैं भी 12 बजे रात को अपने क्लायंट के लिए पहुंच जाऊंगी. जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए यह कदम हमेशा ही स्वीकार्य है."

जयसिंह कहती हैं कि सवाल यह है कि इस तंत्र में इतना ठहराव क्यों आ गया है. खर्चे और वकीलों की फीस आसमान छू रही है. किसी भी अदालत में जाओ तीन-चार से ज़्यादा वकील नहीं दिखाई देगा. आज के जमानें में लोग कहते हैं कि अगर आपको केस जल्दी लगवाना है तो फलां वकील के पास जाओ. ये न्याय नहीं है.

उन्होंने कहा कि अदालतों में आप देखोगे घंटों घंटों तक बहस चल रही है. आखिर आप अपनी बहस पेपर पर लिखकर क्यों नहीं दे सकते हैं? ऐसे में न्यायपालिका में बदलाव की बहुत ज़रूरत है. हमारे देश में जज कम हैं इसलिए देरी हो रही है. यह बात अर्धसत्य है. हमें ज्यादा जज चाहिए लेकिन जो काम करते हैं.

न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा करती है राजनीतिक नियुक्ति

जज और तिरंगा

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इमेज कैप्शन, जजों की राजनीतिक नियुक्ति के बीच कूलिंग पीरियड ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर तरुण खेतान ने कहा, "रिटायर्ड जज को कतई भी सांसद, मंत्री या फिर राज्यपाल नहीं बनाया जाना चाहिए. ये न्यायिक स्वतंत्रता पर न केवल सवाल खड़े करता है बल्कि उसकी वैधता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा देता है. इनकी नियुक्ति में कूलिंग पीरियड की ज़रूरत है."

न्याय में देरी के मसले पर प्रोफ़ेसर तरुण खेतान ने कहा, "यह केवल जजों की कमी की बात नहीं बल्कि वकीलों के कब्जे़ की बात है. अगर हम किसी बिल्डर को हर दिन काम का पैसा देंगे तो बिल्डिंग बनाने में ज्यादा समय लगाएगा. वहीं अगर हम सौदा करते हैं कि वह काम पांच दिन में करे या 50 दिन में एक निर्धारित राशि मिलेगी तो वह काम तेज़ी से होगा."

खेतान ने कहा कि यही बात वकालत में भी लागू होती है. वकीलों के हिसाब से भी यही नियम अगर लाने की कोशिश करें तो प्रति पेशी चार्ज न करके प्रति केस चार्ज करें तो समय कम लगेगा. आप केस के अनुसार फीस अलग अलग रख सकते हो. वो बांध देता है और फिर वकील का इंटरेस्ट केस को जल्दी खत्म करने का हो जाता है.

उन्होंने कहा, "अभी हमारा सिस्टम प्रति पेशी है और वकील का इंटरेस्ट होता है यह जितनी देर तक चलेगा उतनी समय तक उन्हें लाभ मिलेगा. ये मामूली बदलाव है लेकिन इसका बड़ा असर पड़ेगा."

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