हर जगह विरोध के बाद हुई थी इंदिरा गांधी और फ़िरोज़ की शादी

इंदिरा गांधी और फ़िरोज गांधी

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी और फ़िरोज गांधी की शादी की तस्वीर
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि फ़िरोज़ उनकी बेटी इंदिरा के लायक वर नहीं हैं. फ़िरोज़ न तो हिंदू थे और न ही कश्मीरी, लेकिन इससे नेहरू को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था क्योंकि उनकी खुद की बहनों विजयलक्ष्मी और कृष्णा के पति कश्मीरी नहीं थे.

नेहरू ने बहनों के विवाह का बिल्कुल विरोध नहीं किया था लेकिन दोनों बहनों के पति ऑक्सफ़र्ड के पढ़े हुए थे और सभ्रांत, समृद्ध परिवार से आते थे. रंजीत पंडित बैरिस्टर भी थे और संस्कृत के बहुत बड़े अध्येता भी.

दूसरी तरफ़ फ़िरोज़ गांधी बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते थे. उनके पास न तो विश्वविद्यालय डिग्री थी और न ही कोई नौकरी और न ही नियमित आय का कोई ज़रिया.

कैथरीन फ़्रैंक इंदिरा गांधी की जीवनी 'इंदिरा, द लाइफ़ ऑफ़ इंदिरा नेहरू गाँधी' में लिखती हैं, "फ़िरोज़ ज़ोर-ज़ोर से बोलने वाले, गालियाँ देने वाले मुँहफट शख़्स थे. उसके ठीक विपरीत नेहरू बहुत सभ्य सुसंस्कृत और नाप-तोलकर बोलने वाले व्यक्ति थे."

कैथरीन ने लिखा, "दूसरे पिताओं की तरह नेहरू भी अपनी बेटी को खोना नहीं चाहते थे. इंदिरा के ख़राब स्वास्थ्य का मुद्दा भी था. उनकी पत्नी कमला नेहरू भी अपनी मृत्यु-शैया पर इंदिरा और फ़िरोज़ की शादी के बारे में अपना गहरा संदेह व्यक्त कर चुकी थीं. कमला की नज़र में फ़िरोज़ अस्थिर और भरोसेमंद शख़्स नहीं थे."

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बुआओं का गहरा एतराज़

जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी

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इमेज कैप्शन, जवाहरलाल नेहरू इंदिरा गांधी औऱ फिरोज़ गांधी की शादी के पक्ष में नहीं थे

जब इंदिरा ने फ़िरोज़ से शादी करने की मंशा अपनी बुआ कृष्णा से बताई तो उन्होंने उन्हें थोड़ा इंतज़ार करने और कुछ और लड़कों से मिल लेने की सलाह दी.

कृष्णा हठीसिंग अपनी किताब 'वी नेहरूज़' में लिखती हैं, "इस पर इंदिरा तुनक कर बोलीं, 'क्यों ? आपने तो दस दिन के अंदर राजा भाई से शादी करने का फ़ैसला कर लिया था. मैं तो फ़िरोज़ को बरसों से जानती हूँ. मैं और इंतज़ार क्यों करूँ और दूसरे लड़कों से क्यों मिलूँ ?''

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जब इंदिरा ने अपनी दूसरी बुआ विजयलक्ष्मी से इस बारे में बात की तो उनका रवैया भी उनके पक्ष में नहीं था.

पुपुल जयकर इंदिरा की जीवनी में लिखती हैं, "नान (विजयलक्ष्मी) ने बिल्कुल मुँहफट अंदाज़ में उनको सलाह दी तुम फ़िरोज़ से प्रेम संबंध बनाओ लेकिन शादी करने के बारे में मत सोचो. इंदिरा ने इस सलाह का बहुत बुरा माना. उन्हें ये अपना और फ़िरोज़ के अपमान जैसा लगा."

अभी नेहरू परिवार के अंदर ये बात चल ही रही थी कि इलाहाबाद के अख़बार 'द लीडर' ने अपने पहले पन्ने पर हेडलाइन लगाई, 'मिस इंदिरा नेहरूज़ इंगेजमेंट.' जब लीडर ने ये ख़बर ब्रेक की तो नेहरू कलकत्ता में थे. वापस आकर उन्होंने एक बयान जारी किया जिसे 'बॉम्बे क्रोनिकल' और दूसरे अख़बारों ने छापा.

नेहरू ने कहा, "मैं इंदिरा और फ़िरोज़ की शादी के बारे में छपी ख़बरों की पुष्टि करता हूँ. मेरा मानना रहा है कि शादी के बारे में माता-पिता सिर्फ़ सलाह भर दे सकते हैं लेकिन अंतिम फ़ैसला लड़का-लड़की को ही करना होता है. जब मुझे इंदिरा और फ़िरोज़ के इस फ़ैसले के बारे में पता चला तो मैंने इसे तहेदिल से स्वीकार किया. महात्मा गांधी ने भी उन्हें अपना आशीर्वाद दे दिया है. फ़िरोज़ गांधी एक युवा पारसी हैं जो हमारे परिवार के बरसों से दोस्त और साथी रहे हैं."

रामनवमी के दिन हुई शादी

महात्मा गांधी की इंदिरा गांधी के साथ 1939 की एक तस्वीर

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इमेज कैप्शन, महात्मा गांधी ने इंदिरा गांधी और फ़िरोज गांधी की शादी का समर्थन किया था

महात्मा गांधी ने भी अपने अख़बार 'हरिजन' में लेख लिखकर इस विवाह को अपना समर्थन दे दिया. लेकिन गांधी के समर्थन के वावजूद इस शादी के प्रति लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ.

कुछ लोगों को लग रहा था कि इस विवाह से भारत की सदियों पुरानी पंरपरा को चोट पहुंच रही है. एक तो ये माता-पिता का तय किया विवाह नहीं था और दूसरे ये दोनों अपने धर्म से बाहर शादी कर रहे थे.

इलाहाबाद के आनंद भवन में विरोध स्वरूप भेजे जाने वाले तारों की झड़ी लगी थी. कुछ बधाई के टेलीग्राम भी आए. प्रेस में हर जगह इस शादी पर बहस हुई.

बहुत सालों बाद इंदिरा गांधी ने अर्नोल्ड मिकालिस को दिए इंटरव्यू में याद किया, "लगता था, पूरा भारत हमारी शादी के ख़िलाफ़ था."

पंडितों से सलाह मशविरे के बाद शादी के लिए 26 मार्च का दिन चुना गया. वो एक शुभ दिन था क्योंकि उस दिन रामनवमी थी.

कृष्णा हठीसिंग लिखती हैं, "ठीक नौ बजे दुल्हन अपने कमरे से बाहर निकली. उसने अपने पिता के हाथ के चरखे से जेल में काते गए सूत की गुलाबी रंग की साड़ी पहन रखी थी. उसके बॉर्डर पर रुपहले रंग की कढ़ाई की गई थी. इंदिरा ने ताज़ा फूलों का हार और काँच की चूड़ियाँ पहन रखी थीं. इंदिरा इतनी सुंदर पहले कभी नहीं लगी थीं. उनका चेहरा ऐसा लग रहा था मानो ग्रीक सिक्के पर बनी सुंदर आकृति."

फ़िरोज़ ने परंपरागत खादी की सफ़ेद शेरवानी और चूड़ीदार पाजामा पहन रखा था.

हिंदू रीति के अनुसार शादी

इंदिरा गांधी और फिरोज़ गांधी

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी फिरोज़ गांधी से शादी करने को लेकर कहा था कि मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ये शादी क़ानूनी थी या ग़ैर-क़ानूनी

ये समारोह आनंद भवन के बाहर बगीचे में एक मंडप के नीचे हो रहा था. इंदिरा और फ़िरोज़ एक चबूतरे पर अग्नि के सामने बैठे हुए थे. नेहरू के बग़ल में एक आसन था जो उनकी दिवंगत पत्नी कमला नेहरू की याद में खाली रखा गया था.

आमंत्रित व्यक्ति बरामदे में कुर्सियों और क़लीनों पर बैठे हुए थे. आनंद भवन के बाहर हज़ारों ग़ैर आमंत्रित लोगों का हुजूम इस दृश्य को देख रहा था.

इस भीड़ में अमेरिकी फ़ैशन पत्रिका के फ़ोटोग्राफ़र नॉरवन हेन भी थे. वो उस ज़माने में स्थानीय ईविंग क्रिश्चयन कालेज में पढ़ा रहे थे, वो अपने 8 एमएम के मूवी कैमरे से इस दृश्य को फ़िल्माने की कोशिश कर रहे थे.

कैथरीन फ़्रैंक लिखती हैं, "इंदिरा और फ़िरोज़ का विवाह न तो परंपरागत था और न ही क़ानूनी. उस ज़माने के ब्रिटिश क़ानून के अनुसार दो अलग-अलग धर्मों के लोग तभी शादी कर सकते थे जब वो अपने धर्म का परित्याग कर दें. सात साल पहले इंदिरा के चचेरे भाई बीके नेहरू ने भी लगभग इसी अंदाज़ में एक हंगेरियन यहूदी लड़की फ़ोरी से शादी की थी."

बीके नेहरू की शादी के समय भी महात्मा गांधी की सलाह ली गई थी. उनकी सलाह पर ही दोनों की शादी हिंदू राति से की गई थी लेकिन उस शादी को न तो हिंदू कानून से मान्यता मिली थी और न ही ब्रिटिश कानून से.

सालों बाद जब इंदिरा की एक और जीवनीकार उमा वासुदेव ने इस बारे में इंदिरा गांधी से प्रश्न किया तो उनका जवाब था, 'मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ये शादी क़ानूनी थी या ग़ैर-क़ानूनी.'

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फ़िरोज़ ने पवित्र पारसी धागा पहना

इंदिरा गांधी

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इमेज कैप्शन, फ़िरोज़ गांधी ने इंदिरा गांधी को कुछ कपड़े उपहार में दिए

पूरा विवाह समारोह दो घंटे तक चला. इस दौरान पंडित लगातार चाँदी के चम्मच से अग्नि में देसी घी डालता रहा. पहले इंदिरा बरामदे में जवाहरलाल नेहरू के बग़ल में बैठीं. फिर वो दूसरी तरफ़ जा कर फ़िरोज़ गांधी की बग़ल में बैठ गईं.

फ़िरोज़ ने इंदिरा को कुछ कपड़े उपहार में दिए. इंदिरा ने फ़िरोज़ को अपने हाथों से कुछ खिलाया.

इंदिरा की भतीजी नयनतारा सहगल अपनी किताब 'प्रिज़न एंड चॉकलेट केक' में लिखती हैं, "इसके बाद उन दोनों की कलाइयाँ फूलों से बाँध दी गई. पंडित ने घी डालकर ज्वाला को और तेज़ कर दिया. इसके बाद इंदिरा और फ़िरोज़ ने खड़े होकर आग के चारों तरफ़ सात फेरे लेकर सप्तपदि की रस्म पूरी की. इसके बाद वहाँ मौजूद लोगों ने उनके ऊपर फूलों की पंखड़ियों की वर्षा की."

बर्टिल फ़ॉक फ़िरोज़ गांधी की जीवनी 'फ़िरोज़ द फॉरगॉटेन गांधी' में लिखते हैं, "जब फ़िरोज़ अपने शादी के कपड़े पहन रहे थे रत्तीमाई गांधी ने उनसे ख़ास तौर से कहा कि वो अपनी शेरवानी के नीचे पारसी पवित्र धागा धारण करें. उस दिन फ़िरोज़ इंदिरा से भी गोरे लग रहे थे.

समारोह में पारसी समुदाय के बहुत से लोग शामिल हुए थे. उनमें वो लोग भी शामिल थे जो आनंद भवन के बाहर प्रदर्शन करके इस शादी का विरोध करना चाहते थे. लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने रत्तीमाई गांधी से अनुरोध किया था कि वो उन्हें ऐसा न करने के लिए मना लें."

इस शादी में शामिल होने वालों में नेशनल हेरल्ड के संपादक रामाराव भी थे. वो हाथ में पेंसिल और नोटबुक लेकर इस शादी में शामिल हुए ताकि वो अपने अख़बार में इसकी रिपोर्टिंग भी कर सकें.

कई बड़े कांग्रेसी नेता शादी में शामिल हुए

महात्मा गांधी

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इमेज कैप्शन, महात्मा गांधी इंदिरा गांधी की शादी में नहीं आ पाए थे

शाम को आनंद भवन के गार्डन में दिए गए भोज में रोटी और हरी सब्ज़ियों का साधारण खाना रखा गया था. इस शादी में शामिल होने वालों में सरोजिनी नायडू, उनकी बेटी पद्मजा नायडू और मशहूर वैज्ञानिक मैरी क्यूरी के बेटी ईव क्यूरी भी थीं.

पुपुल जयकर लिखती हैं, "आम तौर से भारतीय शादियों में अपने घर से विदा होते समय लड़कियाँ रोती हैं. लेकिन इंदिरा गाँधी बिल्कुल नहीं रो रही थीं. जवाहरलाल नेहरू की आँखें ज़रूर नम थीं. कई महत्वपूर्ण व्यक्ति इस शादी में नहीं आ पाए थे. महात्मा गांधी भी इस शादी में नहीं आ पाए थे क्योंकि वो 26 मार्च को ब्रिटेन से आए सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स से मिलने दिल्ली रवाना हो चुके थे. शादी के दिन क्रिप्स वहाँ मौजूद नहीं थे लेकिन शादी के बाद वो नवदंपत्ति को बधाई देने ख़ास तौर से इलाहाबाद पहुंचे थे."

कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद भी शादी में नहीं पहुंच सके थे क्योंकि उनकी ट्रेन लेट हो गई थी लेकिन शाम को दिए गए भोज में वो ज़रूर शामिल हुए थे.

इंदिरा की शादी के दिन भी राजनीतिक गतिविधियाँ रोकी नहीं गई थीं. भोज से तुरंत पहले आनंद भवन के ड्राइंग रूम में क्रिप्स मिशन पर अपना रुख़ तय करने के लिए कांग्रेस के चोटी के नेतृत्व की बैठक हुई थी.

दो दिन बाद जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के सभी चोटी के नेता डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, भुला भाई देसाई और सैयद महमूद इलाहाबाद से दिल्ली के लिए रवाना हुए.

कश्मीर में हनीमून

शादी के तुरंत बाद इंदिरा और फ़िरोज़ 5 फ़ोर्ट रोड में किराए के एक मकान में शिफ़्ट हो गए थे. उस समय फ़िरोज़ के पास कोई नौकरी नहीं थी लेकिन वो अख़बारों में लेख लिखकर कुछ पैसे कमा लेते थे.

वो कुछ बीमा पॉलिसियाँ भी बेचते थे जिससे उन्हें कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी. विवाह के दो दिन बाद फ़िरोज़ की माँ रत्तीमाई गांधी ने जॉर्ज टाउन के अपने निवास पर एक हाई-टी का आयोजन किया था जिसमें इलाहाबाद के सभ्रांत लोग शामिल हुए थे.

दो महीने बाद इंदिरा और फ़िरोज़ अपने हनीमून के लिए कश्मीर रवाना हुए.

वहाँ से इंदिरा ने नेहरू को तार भेजा.

'काश, हम आपको यहाँ की ठंडी हवा भेज सकते!'

नेहरू का तुरंत जवाब आया,

'शुक्रिया, लेकिन तुम्हारे पास वहाँ आम नहीं हैं !'

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