इंदिरा गांधी को दुनिया के कौन से नेता पसंद थे और कौन नापसंद

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
जब इंदिरा गांधी ज़िम्बाब्वे की आज़ादी के समारोह में भाग लेने हरारे पहुंचीं तो उन्हें हरारे के मोनोमोटापा होटल में ठहराया गया.
वहाँ दुनिया के दूसरे नेताओं के साथ-साथ पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ भी पहुंचे हुए थे. उन्होंने इंदिरा गांधी को संदेश भिजवाया कि वो उनसे मिलने आना चाहते हैं.
इंदिरा गाँधी के कार्यालय में काम कर चुके और बाद में भारत के विदेश मंत्री बने नटवर सिंह अपनी किताब ‘वॉकिंग विद लायंस, टेल्स फ़्रॉम द डिप्लोमेटिक पास्ट’ में लिखते हैं, ''प्रोटोकॉल का तकाज़ा था कि इंदिरा गाँधी ज़िया उल हक़ से मिलने जाएँ क्योंकि वो शासनाध्यक्ष थीं जबकि ज़िया राष्ट्राध्यक्ष थे."
"जब मैंने ये बात ज़िया के स्टाफ़ को बताई तो ज़िया ने कहलवाया ये बात उन पर लागू नहीं होती. मैं इंदिरा गाँधी के होटल में जाकर उनसे मुलाकात करूँगा.”

नटवर सिंह लिखते हैं, “जब वो इंदिरा से मिलने आए तो इंदिरा गांधी ने उनसे मज़ाक किया, 'दुनिया मुझे तानाशाह और आपको लोकतांत्रिक कहती है.' चलते-चलते उन्होंने इंदिरा गाँधी को एक किताब भेंट की. उनके जाने के बाद जब इंदिरा ने उस किताब को पलट कर देखा तो उनकी भौहें चढ़ गईं."
"उस किताब में छपे नक्शे में पूरे कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया था. उन्होंने फ़ौरन मुझे आदेश दिया कि मैं वो किताब जनरल ज़िया को लौटा दूँ. मैंने वो किताब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को अपने विरोध नोट के साथ वापस भिजवा दी.''
इंदिरा को नापसंद थे श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्द्धने
इंदिरा गाँधी को श्रीलंका के राष्ट्रपति जूनियस जयवर्द्धने बिल्कुल पसंद नहीं थे. एक बार जब उन्होंने इंदिरा को अपने देश आमंत्रित किया तो उन्होंने ये कहकर इनकार कर दिया कि वो अभी अपनी यात्रा के पुराने कार्यक्रम को ही पूरा नहीं कर पाई हैं.
इंदिरा गाँधी कार्यालय में काम कर चुके और संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत रहे चिन्मय गरेखान अपनी किताब 'सेंटर्स ऑफ़ पावर' में लिखते हैं,''जयवर्द्धने से इंदिरा की नाराज़गी का कारण था कि वो अपने देश में सिर्फ़ सिंहला लोगों को खुश रखना चाहते थे. उनके मन में तमिल लोगों के लिए रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं थी."
"दूसरे वो अपने देश की समस्या को एक विदेशी मुद्दा बनाकर भारत को उसमें एक विलेन के रूप में दिखाना चाहते थे. इंदिरा गाँधी को मालूम था कि श्रीलंका ने अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान से सैनिक सहायता का अनुरोध कर रखा था. जब इंदिरा गाँधी ने इसका ज़िक्र जयवर्द्धने से किया तो वो इससे साफ़ मुकर गए थे.''
ब्रिटेन से कूटनीतिक तक़रार
सन 1983 में जब नई दिल्ली में राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों का शिखर सम्मेलन हुआ तो ब्रिटेन की महारानी सम्मेलन का उदघाटन करने दिल्ली आईं.
पता चला कि वो इस यात्रा के दौरान मदर टेरेसा को ऑर्डर ऑफ़ मेरिट से सम्मानित करेंगी और ये समारोह राष्ट्रपति भवन में आयोजित किया जाएगा.
नटवर सिंह अपनी आत्मकथा, 'वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़' में लिखते हैं, '' इंदिरा गाँधी ने मुझसे कहा कि मैं ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर से तुरंत संपर्क कर उन्हें बताऊँ कि ये समारोह राष्ट्रपति भवन में नहीं हो सकता. अगर महारानी मदर टेरेसा को सम्मानित ही करना चाहती हैं तो वो ऐसा ब्रिटिश उच्चायोग या ब्रिटिश उच्चायुक्त के निवास पर कर सकती हैं.''
मार्गरेट थैचर ने जब ये सुना तो उन्होंने कहा कि अब बहुत देर हो चुकी है क्योंकि निमंत्रण पत्र भेजे जा चुके हैं.
नटवर सिंह लिखते हैं, ''उन्होंने मुझसे दोबारा थैचर के पास जाने के लिए कहा. उन्होंने संदेश भिजवाया, महारानी बेशक राष्ट्रपति भवन में सम्मान समारोह करें लेकिन उन्हें बता दिया जाए कि अगले दिन ये मामला भारतीय संसद में उठाया जाएगा और महारानी का नाम इसमें बेवजह घसीटा जाएगा.''
नतीजा ये हुआ कि राष्ट्रपति भवन में होने वाला सम्मान समारोह रद्द कर दिया गया. महारानी ने मदर टेरेसा को मुग़ल गार्डन में चाय पर बुलाया और उनके हाथ में चुपके से ऑर्डर ऑफ़ मेरिट पकड़ा दिया.
मदर टेरेसा को इस बात का अंदाज़ा ही नहीं लगने दिया गया कि उनको सम्मान देने के पीछे कितनी कूटनीतिक कलाबाज़ियाँ खेली जा रही थीं.
निक्सन का डिनर निमंत्रण ठुकराया
अक्तूबर, 1970 में जब इंदिरा गाँधी संयुक्त राष्ट्र संघ की 25वीं वर्षगाँठ में भाग लेने न्यूयॉर्क गईं तो वहाँ के अख़बारों में छपा कि राष्ट्रपति निक्सन ने सम्मेलन में भाग ले रहे सभी राष्ट्राध्यक्षों को अगले दिन व्हाइट हाउस में भोज पर आमंत्रित किया है. इंदिरा गाँधी ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया.
नटवर सिंह अपनी किताब 'हार्ट टु हार्ट' में लिखते हैं, ''अगले दिन अमेरिका में हमारे राजदूत लक्ष्मीकांत झा न्यूयॉर्क पहुंच गए. उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि आप व्हाइट हाऊस के भोज में शामिल होने के लिए कब वॉशिंग्टन पहुंच रही हैं?''
इंदिरा ने जवाब दिया मुझे तो आमंत्रित ही नहीं किया गया है. झा बोले 'बाकी सब शासनाध्यक्ष तो भोज में जा रहे हैं.' इस पर इंदिरा बोलीं, 'मैं अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार न्यूयॉर्क से जाऊँगी. औपचारिक निमंत्रण के बिना वॉशिंग्टन जाने का मेरा कोई इरादा नहीं हैं.''
राजदूत झा ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि उनकी ग़ैर-मौजूदगी से ग़लत संकेत जाएगा लेकिन इंदिरा नहीं मानीं.
नटवर सिंह लिखते हैं कि इंदिरा गांधी का इरादा पक्का था. उन्होंने कहा, ''अख़बारों के ज़रिए निमंत्रण देने का मतलब दावत देना नहीं, आदेश देना हुआ.''
रोनाल्ड रीगन और सोवियत संघ से दो टूक
अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और इंदिरा गाँधी एक-दूसरे को अक्सर विनम्र पत्र लिखा करते थे लेकिन चिन्मय गरेखान का मानना है कि ऐसा वो सिर्फ़ दिखावे के लिए करते थे. दोनों का दिल इसमें नहीं था.
गरेखान अपनी किताब 'सेंटर्स ऑफ़ पावर्स’ में लिखते हैं, ''रीगन को अपने देश के अलावा किसी दूसरे देश में दिलचस्पी नहीं थी, जिसमें पश्चिमी देश भी शामिल थे. वो एक 'अमेरिकी किले' की अवधारणा में यकीन करते थे जिसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं थी.
अमेरिकी अधिकारी अक्सर हमें क्षेत्र की बड़ी ताकत बताते थे और हम इसी में ख़ुश हो जाते थे. रीगन को चीन के बारे में भी कोई ख़ास चिंता नहीं थीं.
इंदिरा गाँधी अपने पिता की तरह अपने-आपको सोवियत संघ के साथ समान वैचारिक धरातल पर नहीं पाती थीं.
गरेखान लिखते हैं,''लोगों को बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि वो सोवियत नेताओं के बहुत करीब थीं. मैंने खुद अपनी आँखों ने उन्हें भारत में सोवियत राजदूत को बाक़ायदा डाँटते देखा है. भारतीय कम्युनिस्ट दलों पर सोवियत संघ का बहुत प्रभाव था.''
गरेखान लिखते हैं, ''जब 1977 के चुनाव में कम्युनिस्टों ने इंदिरा के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार किया तो उन्होंने सोवियत नेताओं को बार-बार याद दिलाया कि इन नेताओं ने उनकी हालत ख़राब करने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों से हाथ मिला लिया. वो सोवियत नेताओं को गर्मजोशी भरे संदेश ज़रूर भेजती रहीं लेकिन उन्हें ये ग़लतफ़हमी नहीं थी कि वो उनका हर हालत में साथ देंगे.''
विदेशी नेताओं से मंत्रणा में महारत

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विदेशी नेताओं से बातचीत करने में इंदिरा को महारत हासिल थी.
इंदिरा गांधी के काफ़ी निकट रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर लिखते हैं,'' विदेशी नेताओं से बातचीत में उनका एक-एक वाक्य सधा हुआ होता था. उन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ भी जिनसे भारत के रिश्ते अच्छे नहीं होते थे, बातों कोई कड़वाहट नहीं होती थी, उनका ठहराव, चुप्पी, जान-बूझकर दिया गया अंडरस्टेटमेंट, जवाबी सवाल सभी बताते थे कि वो कितनी निपुण कूटनीतिज्ञ थीं.''
राजनीतिक मामलों पर पकड़ लेकिन आर्थिक मामलों में रुचि नहीं
विदेशी राजनेताओं से राजनीतिक मामलों पर बातचीत के लिए इंदिरा गांधी को अपने साथ गए अधिकारियों से बहुत कम सहायता की ज़रूरत पड़ती थी.
द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर वो अपने प्रधान सचिव पीसी एलेक्ज़ेंडर को बोलने के लिए कहती थीं.
एलेक्ज़ेंडर लिखते हैं, ''इन बातचीतों में अनुभव के आधार पर मुझे ये अंदाज़ा लग गया था कि मुझे कब बात आगे बढ़ानी है और अपनी टिप्पणी देनी है. हम दोनों के बीच बहुत अच्छी समझ विकसित हो गई थी."
"कभी-कभी उनकी टीम के कुछ सदस्य ग़ैर-ज़रूरी होने पर भी बोलने की कोशिश करते थे. वो बिना ये आभास दिए हुए कि वो किसी का अनादर कर रही हैं, इस तरह के लोगों को चुप कराने में दक्ष थीं.''
तंज़ानिया और ज़ाम्बिया के राष्ट्रपतियों से दोस्ती

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दुनिया के बहुत कम नेता ऐसे थे जिनके सानिध्य में इंदिरा को अच्छा लगता था.
इनमें तंजानिया के राष्ट्रपति जूलियस नेरेरे, ज़ांबिया के राष्ट्रपति केनेथ काउंडा और गयाना के फ़ोर्बेस बर्नहैम शामिल थे.
चिन्मय गरेखा लिखते हैं, “युगांडा के राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे का साथ इंदिरा की इतनी बेतकल्लुफ़ी नहीं होती थी जितनी नेरेरे, काउंडा और बर्नहैम के साथ. इस तीनों के साथ माहौल में कोई तनाव नहीं रहता था. ये नेता एक दूसरे की खिंचाई भी करते थे और चुटकुले भी सुनाते थे. ये तीनों इंदिरा को सलाह देने में भी पीछे नहीं रहते थे.”
मोज़ाम्बीक के समोरा मशेल से भी इंदिरा की बहुत बनती थी. दुनिया के कई नेता इंदिरा से आर्थिक सहयोग की माँग करते थे लेकिन वो किसी को कोई वादा नहीं करती थीं यहाँ तक कि काउंडा और नेरेरे को भी नहीं. वो सिर्फ़ ये कहा करती थीं, हम इसके बारे में सोचेंगे.”
राजनीति के अलावा दूसरे विषयों में भी रुचि
इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव के रूप में काम कर चुके पीसी एलेक्ज़ेंडर का मानना है इंदिरा की जो चीज़ उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती थी वो है राजनीति के अलावा कई दूसरे विषयों में उनकी रुचि.
एलेक्ज़ेंडर अपनी किताब ‘माई इयर्स विद इंदिरा गाँधी’ में लिखते हैं, “जो लोग उन्हें नज़दीक से जानते हैं, उनको पता है कि इंदिरा की राजनीति ही नहीं, फूलों, पेड़ों, जंगलों, पर्यावरण, पहाड़ों, कला और स्थापत्य में इंदिरा की दिलचस्पी ग़ज़ब की थी.”
पढ़ने की शौकीन

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इंदिरा गांधी को पढ़ना बहुत पसंद था. कार के छोटे सफ़र के दौरान भी वो किताबों के कुछ पन्ने पढ़कर बिताती थीं.
पीसी एलेक्ज़ेंडर लिखते हैं, “मुझे ये आश्चर्यजनक लगता था कि इंदिरा जैसी व्यस्त महिला भी पढ़ने के लिए समय निकाल सकती थीं. कभी-कभी वो हमें किसी किताब के दिलचस्प अंश के बारे में बताती थीं.”
पीसी एलेक्ज़ेंडर लिखा है, “अगर आप कोई चीज़ दिल से करना चाहें तो आप हमेशा उसके लिए समय निकाल सकते हैं. इंदिरा मानती थीं कि एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए चार घंटे की नींद काफ़ी है. उनकी एक बात अच्छी थी कि वो कहीं भी, जब भी चाहें सो सकती थीं.”
लेखकों का साथ पसंद
समाज के एक तबक़े में इंदिरा गांधी की छवि एक कठोर, तानाशाह और चालाक शासक की थी.
नटवर सिंह लिखते हैं, “सच्चाई से इसका दूर-दूर का वास्ता नहीं था. वो एक बहुत बड़ी मानवतावादी थीं. उन्हें लेखकों, कवियों और चित्रकारों का साथ पसंद था.”
इसके ठीक विपरीत इंदिरा गांधी के कार्यालय में संयुक्त सचिव के पद पर काम कर चुके और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव बने बिशन टंडन की राय उनके बारे में बहुत अच्छी नहीं थीं.
टंडन अपनी किताब ‘पीएमओ डायरी’ में लिखते हैं, “मेरा हमेशा से ये विश्वास रहा है कि इस देश का नेतृत्व करने के लिए तीन गुणों की आवश्यकता है, चरित्र, योग्यता और सहिष्णुता. दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री में इन तीनों की कमी है. सहिष्णुता तो उनमें छू तक नहीं गई है. योग्यता उनमें राजनीतिक पैंतरेबाज़ी की है पर मुझे सदा यही अनुभव हुआ है कि मैं एक ऐसे व्यक्ति से बातें कर रहा हूँ जिसकी सारी चिंताएँ दिखावे में हैं.”
व्यवस्थित जीवन शैली

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इंदिरा गाँधी बहुत सफ़ाई पसंद थीं. ग़लत जगह पर फूलदान, टेढ़ी कुर्सी, तिरछी लटकी हुई तस्वीर, मेज़ पर अव्यवस्थित ढ़ंग से रखे काग़ज़-पेन, पेंसिलें और स्टेशनरी का सामान तुरंत उनका ध्यान खींचते थे. अक्सर वो उन्हें ठीक करने के लिए अर्दली का इंतज़ार नहीं करती थी, बल्कि खुद अपने हाथों से करती थी.
पीसी एलेक्ज़ेंडर याद करते हैं, “एक बार मैंने देखा कि वे अपने हाथ में गीला तौलिया लेकर पौधों के पत्ते साफ़ कर रही हैं. उन्होंने मुझे देखकर वो काम रोका नहीं, बल्कि कहा आप बोलते रहिए, मैं इन पौधों को पोंछते हुए आपकी बात सुनती रहूँगी.”
बेहतरीन मेज़बान
इंदिरा गांधी जो भोज दिया करती थीं उसका मेन्यू और यहाँ तक कि बैठने की व्यवस्था भी खुद तय करती थीं.
कभी-कभी प्रोटोकॉल तोड़कर उन लोगों को विदेशी महमानों के बग़ल में बैठाया जाता था जो उनसे ठीक-ठाक बातचीत कर सकें.
पीसी एलेक्ज़ेंडर ने लिखा था, “कई वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री सिर्फ़ अपने ही देश के लोगों से बात करते थे और बग़ल में बैठे विदेशी मेहमान को नज़र अंदाज़ कर देते थे. वो उन लोगों को इस बात के लिए टोकती थीं कि उन्होंने उस मौके का इस्तेमाल विचारों के आदान-प्रदान और निजी संपर्क बनाने के लिए नहीं किया. उनकी तेज़ नज़र खाना परोसने वाले वेटरों पर भी रहती थी.”
67 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह फ़िट

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रोज़ 17-18 घंटे काम करने के बावजूद 67 साल की उम्र में भी इंदिरा थकती नहीं थीं. वो काफ़ी कम खाती थीं, उन्हें इस बात की हमेशा फ़िक्र रहती थी कि वो कितनी कैलोरी ले रही हैं.
पीसी एलेक्ज़ेंडर लिखते हैं, “वो सोमवार को बिल्कुल खाना नहीं खाती थीं, किसी धार्मिक कारण से नहीं, बल्कि शरीर के सिस्टम को आराम देने के लिए. अगर उन्हें सोमवार को किसी राजकीय भोज में शामिल होना होता था तो वो किसी दूसरे दिन उपवास रखती थीं.”
एलेक्ज़ेंडर याद करते हैं, “एक बार उनके पास लोकसभा से बुलावा आया कि उन्हें तुरंत सदन में पहुंचना है. वो जिस गति से लोकसभा की तरफ़ गईं, मुझे उनके साथ-साथ चलने में बहुत दिक्कत हुई. लौटते समय मैंने उनसे मज़ाक में कहा कि आप बहुत आसानी से पीटी ऊषा को हरा देंगीं. इस पर उनका जवाब था, मैं 65 साल की उम्र से बड़ों की दौड़ में किसी को भी हरा सकती हूँ जिसमें पुरुष भी शामिल हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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