इंदिरा गांधी और निक्सन की कोल्ड वार!

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
इंदिरा गांधी को अपने शासनकाल में कई नामों से पुकारा गया. राम मनोहर लोहिया ने उन्हें गूंगी गुड़िया कहा तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें साक्षात दुर्गा की संज्ञा दी.
याहिया ख़ाँ ने उन्हें अपमानजनक ढ़ंग से ‘वो औरत’ कह कर पुकारा तो रिचर्ड निक्सन ने उन्हें ‘बूढ़ी चुड़ैल’ और ‘बूढ़ी कुतिया’ तक कहा. दक्षिण में उनके चाहने वाले उन्हें ‘अम्मा’ कहते रहे तो कुछ ने उन्हें सिर्फ़ ‘वो’ कह कर संबोधित किया.
1968 में जब वो अमरीका गईं तो राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के सामने भी समस्या आई कि उन्हें किस नाम से पुकारा जाए.
जाने माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा याद करते हैं कि अमरीका में तत्कालीन राजदूत बीके नेहरू ने उन्हें बताया कि जिस दिन इंदिरा को जॉनसन से मिलना था, जॉनसन के ख़ासमख़ास जैक वेलेंटी का उनके पास ये जानने के लिए फ़ोन आया कि आज होने वाली बैठक में जॉनसन को उन्हें किस तरह संबोधित करना चाहिए?

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नेहरू ने कहा कि मुझे पता नहीं कि वो किस तरह संबोधित किए जाना पसंद करती हैं लेकिन मैं उनसे पूछ कर आपको बताता हूँ. जब नेहरू ने इंदिरा के सामने ये सवाल रखा तो वो मुस्कराईं और बोलीं जॉनसन मुझे प्राइम मिनिस्टर कह सकते हैं या मेरे नाम से भी मुझे पुकार सकते हैं.
जब नेहरू कमरे से बाहर निकलने लगे तो इंदिरा ने उन्हें रोक कर हंसते हुए कहा, "उनको बता दीजिए कि मेरे मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य मुझे सर कह कर भी पुकारते हैं."
जॉनसन इंदिरा गांधी से इस क़दर प्रभावित हुए कि वो उनसे मिलने राजदूत बीके नेहरू के घर बिन बुलाए, बिना किसी पूर्व सूचना के सारे प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए जा पहुंचे.

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हतप्रभ नेहरू ने उनसे पूछा, "राष्ट्रपति महोदय आप खाने के लिए तो रुकेंगे ना?" जॉनसन ने तपाक से जवाब दिया, "आप क्या समझते हैं मैं यहाँ किस लिए आया हूँ?"
आनन फ़ानन में डाइनिंग टेबल के सीटिंग अरेंजमेंट को बदला गया. मेज़ पर सिर्फ़ 18 कुर्सियाँ ही लगाई जा सकती थीं. सारे मेहमानों की कुर्सियाँ पहले से ही तय थीं. अतिरिक्त कुर्सी के लिए कोई जगह नहीं थी.
पी एन हक्सर ने पेशकश की कि वो अपना खाना दूसरे कमरे में खाएंगे ताकि लिंडन जॉनसन इंदिरा गांधी के बग़ल में बैठ कर भोज का आनंद उठा सकें.
वहाँ पहले से मौजूद उप राष्ट्रपति ह्यूबर्ट हंफ़्री ने मज़ाक किया, "मुझे पहले से ही पता था मिस्टर प्रेसिडेंट कि आप मुझे इन सुंदर महिलाओं के बग़ल में नहीं बैठने देंगे."

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अगले दिन व्हाइट हाउज़ के भोज के बाद जॉनसन ने इंदिरा गांधी से अपने साथ डांस करने के लिए कहा. इंदिरा गांधी ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "मेरे देशवासी मेरा आपके साथ डांस करना पसंद नहीं करेंगे."
इंदिरा गांधी और रिचर्ड निक्सन में पहले दिन से ही नहीं बनी. जब 1967 में निक्सन उनसे दिल्ली में मिले तो बीस मिनट में ही इंदिरा इतनी बोर हो गईं कि उन्होंने निक्सन के साथ आए भारतीय विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी से हिंदी में पूछा, "मुझे इन्हें कब तक झेलना होगा?" दोनों के बीच ये ठंडापन 1971 में बदस्तूर जारी था.
नवंबर, 1971 में जब इंदिरा गांधी पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे अत्याचार के प्रति दुनिया का ध्यान खींचने अमरीका गईं तो व्हाइट हाउज़ में हुए स्वागत भाषण में निक्सन ने बिहार के बाढ़ पीड़ितों के प्रति तो अपनी सहानुभूति दिखाई लेकिन पूर्वी पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया.

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इंदिरा गांधी ने भी बिना लाग लपेट के कहा कि राष्ट्रपति निक्सन एक मानव निर्मित त्रासदी को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
जैसे ही फ़ोटोग्राफ़र हटे, इंदिरा ने निक्सन की वियतनाम और चीन नीति पर बोल कर बातचीत की शुरुआत की.
बाद में विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब व्हाइट हाउज़ इयर्स में लिखा, "इंदिरा ने कुछ इस अंदाज़ में निक्सन से बात की जैसे एक प्रोफ़ेसर पढ़ाई में थोड़े कमज़ोर छात्र का मनोबल बढ़ाने के लिए उससे बात करता है."
किसिंजर आगे लिखते हैं कि निक्सन ने "भावहीन शिष्टता के ज़रिए किसी तरह अपने ग़ुस्से को पिया."

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बाद में किसिंजर ने दोनों के बीच बातचीत को ‘डायलॉग ऑफ़ द डेफ़’ यानि बहरों की बातचीत की संज्ञा दी और कहा कि बातचीत के बाद निक्सन के इंदिरा गांधी के प्रति उद्गारों को सार्वजनिक रूप से नहीं बताया जा सकता.
अगले दिन तो इंतहा ही हो गई जब निक्सन ने इंदिरा गांधी से मिलने के लिए ओवल हाउज़ के बग़ल के कमरे में उन्हें 45 मिनट तक इंतज़ार कराया.
इंदिरा की जीवनीकार कैथरीन फ़्रैंक लिखती हैं, "इंदिरा इस अपमान के घूंट को पी गईं, लेकिन उन्होंने निक्सन की अभद्रता का जवाब बारीक कौशल के साथ दिया."
पाकिस्तान पर बातचीत के लिए तैयार हो कर आए निक्सन से उन्होंने पाकिस्तान के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा. उन्होंने उनसे अमरीकी विदेश नीति के बारे में तीखे सवाल पूछे.
इस बैठक मे मौजूद पीएन हक्सर ने कैथरीन फ़्रैंक को बताया कि उनकी नज़र लगातार निक्सन के चेहरे पर लगी हुई थी.

वो उनको एक ‘मुखौटे की तरह’ लग रहा था. उनके चेहरे पर कभी एक अस्वाभाविक मशीनी मुस्कान आती थी, तो कभी उनकी ज़रूरत से ज़्यादा घनी भौंहें चढ़ जाती थीं.
उनके अंदर भावनाओं की थोड़ी बहुत लौ तब दिखाई देती थी, जब दबाव के चलते उनके शरीर से बेइंतहा पसीना छूट निकलता था. ये बातचीत बुरी तरह असफल रही और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की हार ने उनके संबंधों में और कटुता ला दी.
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