दक्षिण भारत हमेशा गांधी परिवार का संकटमोचक बनकर क्यों उभरता है?

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- Author, इमरान कु़रैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल की वायनाड सीट से प्रियंका गांधी ने रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की है.
उनकी ये जीत दक्षिण भारत के वोटरों के इंदिरा गांधी के परिवार के प्रति लगाव का एक और सुबूत है.
इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक ने, अपने मुश्किल राजनीतिक दौर में दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल का रुख़ किया.
इन नेताओं ने जब-जब दक्षिण की राह पकड़ी, ये उनके बचाव में आ खड़ा हुआ.

इंदिरा गांधी ने कर्नाटक की चिकमंगलूर (1978) और आंध्र प्रदेश की मेडक सीट (1980) से चुनाव लड़ा था. 1999 में सोनिया गांधी ने कर्नाटक की बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा. वहीं 2019 और 2024 में राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ा.
इस बार प्रियंका गांधी ने अपने भाई की सीट वायनाड से लड़कर चुनावी डेब्यू किया है.
राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली और वायनाड लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन उन्होंने रायबरेली सीट अपने पास रखने का फै़सला किया.
वायनाड सीट से इस उपचुनाव में प्रियंका गांधी की जीत का अंतर अप्रैल 2024 में उनके भाई राहुल गांधी की जीत के अंतर से अधिक था. वहीं 2019 में राहुल गांधी को इस सीट पर जितने वोट मिले थे उसकी तुलना में प्रियंका गांधी को 21 हज़ार वोट ही कम मिले.

ये वायनाड के मतदाताओं के साथ गांधी परिवार के मज़बूत संबंधों का सुबूत है. इस उपचुनाव में जितने वोट पड़े वो पिछले चुनाव से लगभग नौ फ़ीसदी कम थे.
केरल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चासंलर और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफ़ेसर जे प्रभास ने बीबीसी हिंदी से कहा, "राहुल गांधी के लिए जो चीज़ 2019 में कारगर रही थी, प्रियंका गांधी के लिए भी वही कारगर रही."
"इसके अलावा केरल के लोगों के दिलों में इंदिरा गांधी के प्रति विशेष आदर है. उनके लिए ये एक पारिवारिक रिश्ते की तरह है. इसे आप इंदिरा प्रियंका चुनाव कह सकते हैं. इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी (इंदिरा गांधी का पूरा नाम) नाम, इंदिरा प्रियंका गांधी में तब्दील हो गया."
सेक्युलर राजनीति के प्रतिनिधि

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प्रोफे़सर प्रभास जैसे राजनीतिक टिप्पणीकार का मानना है कि प्रियंका गांधी को ये जीत उनके करिश्मे की वजह से मिली है.
वरिष्ठ टिप्पणीकार जोसफ़ मलियाकन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "केरल हमेशा इंदिरा गांधी के परिवार के प्रति आकर्षित रहा है. यहां के लोगों में इस परिवार के प्रति ख़ास लगाव है. आप ये भी न भूलें कि दक्षिण भारत में इस परिवार की जड़ें कितनी गहरी हैं."
इस बात पर दूसरे टिप्पणीकार भी सहमत हैं. कांग्रेस के नेताओं ने भी इस बात पर अपनी सहमति बीबीसी के साथ साझा की. वामपंथी दलों और बीजेपी के कुछ कार्यकर्ताओं ने भले ही 'ऑफ़ रिकॉर्ड' लेकिन यही बात कही.
लेकिन एक अन्य टिप्पणीकार केजी जैकब ने बीबीसी हिंदी से कहा, "वायनाड मुख्य रूप से अल्पसंख्यकों की गोलबंदी वाला चुनाव क्षेत्र है. इसी के मद्देनज़र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ये ऐसी सीट है जहां बहुसंख्यक अल्पसंख्यक हैं. लोग प्रियंका गांधी को भारत में सेक्युलर राजनीति के भरोसेमंद प्रतिनिधि के तौर पर देखते हैं. मुस्लिम और ईसाई, दोनों उन्हें इसी तरह देखते हैं."
आख़िर दक्षिण भारत गांधी परिवार का मददगार क्यों साबित हुआ है? जैकब इसकी एक और वजह बताते हैं.
वो कहते हैं, "बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों की तुलना में दक्षिण भारत के लोगों को ये ज़्यादा अच्छी तरह से पता है कि सरकारें उनके जीवन में क्या बदलाव ला सकती हैं."
"मसलन, लोगों को पता है कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में तीन साल की होते ही बच्चियां आंगनबाड़ी में जाने लगती हैं और एक तरह से उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी राज्य ले लेता है. जिसे आप सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश कहते हैं, वो दक्षिण में अब प्रासंगिक नहीं है."

क्या राहुल गांधी के अंदर कोई अपराधबोध था कि उन्होंने वायनाड सीट से इस्तीफ़ा देकर रायबरेली का प्रतिनिधित्व करना पसंद किया.
क्या इसी वजह से प्रियंका अपने चुनाव अभियान के दौरान अपनी अपीलों में इतनी भावुक हो गईं.
जैकब ने कहा, "वायनाड के वोटरों के लिए ये बात कोई मायने नहीं रखती. उनके लिए यही बात मायने रखती है कि राहुल गांधी ही भारत के कुछ नेताओं में ऐसे हैं जो प्रधानमंत्री की आंख में आंख मिलाकर बात कर सकते हैं और कह सकते हैं वो देश को बर्बाद कर रहे हैं. वायनाड के लोगों को यही सबसे अधिक संतोष देता है."
जैकब ने कहा, "वायनाड के लोगों के लिए एक सांसद के तौर पर राहुल गांधी के काम की तुलना में उनकी राष्ट्रीय स्तर पर निभाई जा रही भूमिका ज़्यादा अहमियत रखती है. ये निष्कर्ष वायनाड और केरल में दूसरी जगहों के लोगों से की गई मेरी बातचीत पर आधारित है. उनके लिए वो सेक्युलर राजनीति के भरोसेमंद प्रतिनिधि हैं."
विपक्ष का दबा हुआ प्रचार अभियान

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प्रोफे़सर प्रभास ने कहा कि इस सीट के राजनीतिक स्वरूप ने भी प्रियंका गांधी के पक्ष में काम किया. यहां तक कि न तो लेफ्ट फ्रंट (सीपीआई के उम्मीदवार सत्यन मोकेरी ) और न ही एनडीए (बीजेपी उम्मीदवार नव्या हरिदास) उन्हें कोई बड़ी चुनौती दे पाया.
इस उपचुनाव की काफी चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि सीपीआई और बीजेपी का प्रचार अभियान भी कोई बहुत मज़बूत नहीं रहा.
फिर भी बीजेपी की नव्या हरिदास अपनी पार्टी का वोट 1.09 लाख तक ले गईं. वहीं अप्रैल 2024 में केरल के बीजेपी अध्यक्ष के सुरेंद्रन जब इस सीट पर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ लड़े थे, तो उन्हें 1.41 लाख वोट मिले थे.
इसी तरह सीपीआई के उम्मीदवार सत्यन मोकेरी ने 2.11 लाख वोट हासिल किए. सात महीने पहले जब एनी राजा राहुल गांधी के ख़िलाफ़ खड़ी थीं तो उन्होंने 2.83 लाख वोट हासिल किए थे.
राजनीतिक टिप्पणीकार एनपी चेकुट्टी ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मोकेरी गंभीर उम्मीदवार थे लेकिन सीपीआई के प्रचार अभियान में हताशा दिख रही थी. जबकि एक तरफ प्रियंका गांधी और दूसरी ओर नव्या हरिदास का प्रचार अभियान ज़्यादा दमदार था. बीजेपी की उम्मीदवार नव्या हरिदास अपने प्रचार अभियान के दौरान काफी अच्छे तरीके से बोलीं. "
चेकुट्टी ने ये भी कहा, "लोकसभा या केरल विधानसभा उपचुनाव की एक खास बात ये रही है कि जहां भी त्रिकोणीय मुक़ाबला था ये सीधे कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधे मुक़ाबले में बदल गया. ये स्थिति लोकसभा सीट पर भी रही और पलक्कड में विधानसभा उपचुनाव में भी."
एलडीएफ़ और एनडीए राजनीतिक ज़मीन बचा रहे थे?

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केजी जैकब ऐसा नहीं सोचते. उन्होंने कहा, "केरल की राजनीति में एलडीएफ़ और यूडीएफ़ आमने-सामने हैं. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोनों इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं."
"राहुल और प्रियंका, दोनों एलडीएफ़ पर हमला नहीं करते हैं. सिर्फ एक बार राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के ख़िलाफ़ एक ‘बेहूदी’ टिप्पणी की. लेकिन उसके बाद से वो बेहद सतर्क दिखे हैं."
जैकब वोटरों की नज़रिये को समझाते हुए कहते हैं, "सच तो ये है कि लोग बांटने वाली राजनीति से परेशान हैं. आपको याद होगा कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता 2019 में अपना झंडा लहराते हुए जा रहे थे (जब राहुल गांधी अपना पर्चा दाखिल करने जा रहे थे) तो बीजेपी-आरएसएस ने ये प्रचार किया था कि ये पाकिस्तानी झंडा है. इस तरह से चीज़ों को तोड़ने-मरोड़ने से यहां लोगों के दिलों को चोट पहुंची है."
प्रियंका की चुनौतियां

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प्रियंका गांधी ने अपने प्रचार अभियान के दौरान वायनाड के लोगों के सामने आ रही दो दिक्कतों पर अपना ध्यान केंद्रित किया.
उन्होंने इन दो चीज़ों का ख़ासतौर पर हवाला दिया. पहला, मेडिकल कॉलेज अस्पताल की स्थापना की ज़रूरत, जो राज्य सरकार के काम के दायरे में आता है.
यहां गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों को विशेषज्ञों के इलाज के लिए कोझिकोड ले जाना पड़ता है. घाट क्षेत्र से यहां पहुंचने में डेढ़ घंटे से ज़्यादा का समय लग जाता है.
दूसरा, उन्होंने मैसूरु, कर्नाटक और वायनाड के बीच नाइट ट्रैफिक पर प्रतिबंध की ओर भी इशारा किया. ये पेचीदा मामला है क्योंकि रात में यातायात की वजह से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु से सटे जंगलों में रहने वाले जानवरों पर असर पड़ता है.
इस संबंध में उनकी अपील का मतलब ये था कि वो कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार से वाहनों की आवाजाही से जुड़े नियमों में ढील देने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकती हैं.
लेकिन कर्नाटक के नेता उनकी अपील मानने के लिए शायद तैयार न हों क्योंकि इससे उनके राज्य में वोटरों पर असर पड़ सकता है. साथ ही उन्हें इस कारण पर्यारणविदों के विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है.
प्रोफे़सर प्रभास के मुताबिक़ केरल में प्रियंका की मौजूदगी से कांग्रेस में बदलाव दिख सकता है. आने वाले दिनों में ये देखने वाली बात होगी कि वो इन मुद्दों से कैसे निपटती हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
















