शेख़ मुजीब और इंदिरा गांधी के बीच हुए समझौते पर क्यों हुआ था विवाद?

इंदिरा गांधी और शेख़ मुजीबुर रहमान ने 1972 में मैत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए थे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी और शेख़ मुजीबुर रहमान ने 1972 में मैत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए थे
    • Author, तारेकुज्जमां शिमुल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, ढाका

भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बांग्लादेश को आजादी हासिल होने के करीब तीन महीने बाद ढाका के दौरे पर आई थीं. यह बांग्लादेश के आज़ाद होने के बाद किसी विदेशी राष्ट्र प्रमुख का पहला दौरा था.

उस समय इंदिरा गांधी का जोरदार स्वागत किया गया था. बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख़ मुजीबुर रहमान उनकी अगवानी के लिए अपने परिवार के साथ एयरपोर्ट पर मौजूद थे. उस मौके पर एक दिन की सरकारी छुट्टी का भी एलान किया गया था.

इंदिरा गाधी ने इस दौरे पर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. 19 मई, 1972 को हुए उस समझौते को औपचारिक रूप से 'भारत-बांग्लादेश मैत्री समझौता' कहा जाता है. 25 साल के लिए होने वाले इस समझौते को लेकर उस समय राजनीतिक हलकों में काफी बहस छिड़ी थी और विवाद हुआ था.

उस समय के विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे 'ग़ुलामी का समझौता' भी करार दिया था.

उस समझौते में ऐसा क्या था कि विवाद हो गया था? इस रिपोर्ट में इन पहलुओं की ही चर्चा की गई है.

समझौते की पृष्ठभूमि

बांग्लादेश की 1971 की जीत के बाद 'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

इमेज स्रोत, THE DAILY ITTEFAQ

इमेज कैप्शन, बांग्लादेश की 1971 की जीत के बाद 'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

साल 1972 में इंदिरा गांधी के ढाका की धरती पर कदम रखने से ठीक एक साल पहले पाकिस्तान की तत्कालीन सैन्य सरकार ने 'ऑपरेशन सर्च लाइट' नाम के एक सैन्य अभियान के तहत यहां बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्याएं की थी.

25 मार्च को हुए उस हत्याकांड के बाद बांग्लादेश ने स्वाधीनता का एलान किया था.

उसके बाद एक रक्तरंजित युद्ध शुरू हो गया था. उस युद्ध के दौरान बांग्लादेश के एक करोड़ से भी ज्यादा लोग शरणार्थी बन गए थे. भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने उन शरणार्थियों को शरण देने के साथ ही गुरिल्ला लड़ाकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की और उनको हथियार हासिल करने में भी सहायता दी थी.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

आगे चल कर एक दौर ऐसा भी आया, जब भारत सीधे इस युद्ध में शामिल हो गया. मुक्ति वाहिनी और मित्र वाहिनी के संयुक्त हमले की वजह से 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी सैनिकों ने ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया. उसी दिन दुनिया के नक्शे पर स्वाधीन बांग्लादेश का जन्म हुआ.

नौ महीने तक मुक्ति युद्ध चलने के दौरान इंदिरा गांधी जिस तरह बांग्लादेश के साथ खड़ी होकर मदद करती रहीं, उसी वजह से स्वाधीनता हासिल होने के बाद शेख़ मुजीबुर रहमान ने कृतज्ञतावश उनको बांग्लादेश के दौरे पर आने का न्योता दिया था.

न्योता स्वीकार करते हुए इंदिरा गांधी 17 मार्च, 1972 को ढाका पहुंचीं. 'राजहंस' नाम का एक विशेष विमान उस दिन उनको लेकर सुबह करीब साढ़े दस बजे तेजगांव एयरपोर्ट पर उतरा. विमान से उतरने के बाद वहां मौजूद शेख़ मुजीब ने खुद उनकी अगवानी की. इंदिरा गांधी के सम्मान में उस दिन सरकारी छुट्टी का भी एलान कर दिया गया था.

हालांकि, उसी दिन शेख़ मुजीब का जन्मदिन भी था. इसलिए कई लोगों के मन में छुट्टी की वजह को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी.

इसी वजह से बांग्लादेश सरकार के तत्कालीन मुखिया ने अपने भाषण में साफ कर दिया कि इंदिरा गांधी के ढाका दौरे के उपलक्ष्य में ही छुट्टी का एलान किया गया है.

17 मार्च, 1972 को 'द डेली इत्तेफ़ाक' अखबार ने पहले पेज पर छपी खबर में शेख़ मुजीब के हवाले से लिखा था, "भविष्य में मेरे जन्मदिन पर सरकारी छुट्टी नहीं रहेगी. इस दिन को 'कड़ी मेहनत और वृहत्तर कल्याण के प्रति समर्पण' के दिन के रूप में मनाया जाएगा."

रात्रि भोज में भाषण

इंदिरा गांधी ने 17 मार्च 1972 को सुहरावर्दी उद्यान में एक सार्वजनिक बैठक में हिस्सा लिया

इमेज स्रोत, THE DAILY ITTEFAQ

इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी ने 17 मार्च 1972 को सुहरावर्दी उद्यान में एक सार्वजनिक बैठक में हिस्सा लिया

इंदिरा गांधी तेजगांव एयरपोर्ट से बांग्लादेश वायु सेना के एक हेलीकॉप्टर से सीधे बंग भवन पहुंचीं. उस दौरे में वहीं उनके रहने का इंतजाम किया गया था. उस समय महबूब तालुकदार बंग भवन में विशेष अधिकारी के तौर पर तैनात थे. वो आगे चल कर बांग्लादेश के चुनाव आयुक्त भी बने.

तालुकदार ने 'बंग भवन में पांच साल' नाम की किताब में इस बात का जिक्र किया है कि इंदिरा गांधी के दौरे के लिए उस दिन बंग भवन को खास तौर पर सजाया गया था.

उन्होंने लिखा है, "भवन की आंतरिक साज-सज्जा के लिए कोलकाता से खासतौर पर श्रीमती बसंत चौधरी को बुलाया गया था. बसंत चौधरी एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और रंगमंच कलाकार थे. उकी पत्नी मशहूर इंटीरियर डेकोरेटर थीं. उस महिला ने दिन-रात मेहनत कर बंग भवन को बेहतरीन तरीके से सजाया था."

इंदिरा गांधी ने अपने दौरे के पहले दिन शाम को ढाका के सुहरावर्दी उद्यान में आयोजित एक जनसभा में हिस्सा लिया था. इस सभा के लिए मैदान के एक किनारे पर नाव के आकार का एक विशालकाय मंच बनाया गया था. महबूब तालुकदार ने अपनी पुस्तक में लिखा है, "उस मंच को इंदिरा गांधी मंच नाम दिया गया था."

भारतीय प्रधानमंत्री अपने दौरे के दूसरे दिन एक नागरिक अभिनंदन समारोह के अलावा बंग भवन में आयोजित रात्रि भोज में भी शामिल हुई थीं.

उन्होंने उस मौके पर कहा था, "कुछ भीतरी और बाहरी ताकतें भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूदा मैत्रीपूर्ण माहौल को खराब करने की कोशिश करेंगी."

'द डेली इत्तेफ़ाक' ने अगले दिन उनके इस भाषण का जिक्र करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा था, "इंदिरा गांधी ने पूरा विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध धीरे-धीरे और मजबूत और सफल होगा."

मैत्री समझौते पर हस्ताक्षर

इंदिरा गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी ने मुक्ति संग्राम के दौरान बांग्लादेश का पक्ष लिया था

इस दौरे में बांग्लादेश की ओर से श्रीमती गांधी के चीफ ऑफ प्रोटोकॉल रहे फारूक चौधरी के मुताबिक मैत्री समझौते पर दौरे के दूसरे दिन यानी 18 मार्च को हस्ताक्षर किए गए थे.

चौधरी ने अपनी मौत से कुछ साल पहले बीबीसी बांग्ला के साथ एक बातचीत में कहा था कि उस समझौते पर हस्ताक्षर इंदिरा गांधी के दौरे के दूसरे दिन शीतालक्ष्य नदी में एक नौका विहार के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे. वह समझौता जमीन पर नहीं, बल्कि पानी पर हुआ था.

लेकिन 19 मार्च को तत्कालीन 'द डेली इत्तेफ़ाक' में 'मुजीब-इंदिरा के बीच कामयाब बातचीत' शीर्षक एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 19 मार्च को शीतालक्ष्य नदी में नौका विहार जरूर हुआ था. लेकिन उस दौरान दोनों नेताओं के बीच समझौते पर सिर्फ बातचीत हुई थी. उस पर हस्ताक्षर अगले दिन यानी 19 मार्च को किए गए थे.

'द डेली इत्तेफ़ाक' ने 20 मार्च को अपने पहले पेज पर "मैत्री सहयोग शांति" को अपनी मुख्य खबर का शीर्षक बनाया था.

उसमें लिखा गया था, "इंदिरा गांधी के दौरे के आखिर में उनके ढाका से रवाना होने से पहले बंग भवन में दोनों नेताओं ने 12-सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं."

उस समझौते में क्या था?

'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

इमेज स्रोत, THE DAILY ITTEFAQ

इमेज कैप्शन, 'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

'भारत-बांग्लादेश मैत्री समझौते' के नाम से मशहूर उस समझौते में कुल 12 बिंदु थे. उसमें लिखा था कि दोनों देश एक-दूसरे की स्वाधीनता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे और कोई भी एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा.

दोनों में से कोई भी पक्ष दूसरे हस्ताक्षरकर्ता देश के खिलाफ होने वाले किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होगा. एक-दूसरे के खिलाफ हमला नहीं करेंगे और ऐसे किसी भी काम के लिए अपनी जमीन के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे, जिससे दूसरे की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती हो.

इसके अलावा समझौते में शांति और सुरक्षा से संबंधित कई अन्य मुद्दों का भी जिक्र किया गया था. उसमें दोनों देशों के बीच शिक्षा, खेल-कूद, वैज्ञानिक और तकनीकी सहायता का भी जिक्र था.

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह समझौता काफी हद तक साल 1971 के भारत-सोवियत समझौते की तर्ज पर किया गया था.

कई इतिहासकारों का तो मानना है कि दोनों समझौते हूबहू एक जैसे थे. फर्क सिर्फ यही था कि सोवियत संघ के साथ समझौते की मियाद जहां 20 साल थी, वहीं बांग्लादेश के साथ इसकी मियाद 25 साल थी.

फारूक चौधरी ने साल 2011 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, इस समझौते में कोई नया 'तत्व' नहीं था. यह भारत और सोवियत संघ के बीच हुए समझौते की नकल या कॉपी थी.

लेकिन चौधरी की निगाह में यह समझौता उस समय बांग्लादेश में आर्थिक सहयोग, सुरक्षा और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने की दिशा में एक खास कदम था.

उन्होंने बीबीसी से कहा था, "हमने सोचा कि इससे हमारी सुरक्षा बढ़ेगी. तब तक हमें नहीं पता था कि पाकिस्तान के इरादे क्या हैं. इसलिए एक देश के साथ समानता के आधार पर हम अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए हमने इसे और मजबूत किया."

अरुंधती घोष उस समय ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग में प्रथम सचिव थी. उनकी निगाह में यह समझौता दोनों देशों के बीच एक 'महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक मामला' था.

उन्होंने साल 2011 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "मुझे लगता है कि यह समझौता उसका एक सबूत था कि हमें जिस नई मैत्री की जरूरत थी, हमारे बीच वह बनी रहेगी."

बांग्लादेश
इंदिरा गांधी के ढाका पहुंचने के दिन 'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

इमेज स्रोत, THE DAILY ITTEFAQ

इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी के ढाका पहुंचने के दिन 'द डेली इत्तेफ़ाक' में प्रकाशित समाचार

कई इतिहासकारों ने लिखा है कि यह समझौता भले इंदिरा गांधी के ढाका दौरे के दौरान हुआ. लेकिन उससे एक महीने पहले शेख़ मुजीब के भारत के अपने पहले राष्ट्रीय दौरे के दौरान ही इस पर सहमति बन गई थी.

स्वाधीन बांग्लादेश के राष्ट्र प्रमुख के तौर पर शेख़ मुजीबुर रहमान साल 1972 की फऱवरी के पहले हफ्ते में दो दिन के दौरे पर कोलकाता गए थे. उनसे मुलाकात के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी दिल्ली से वहां पहुंची थीं.

दोनों नेताओं के बीच कोलकाता के राजभवन में मुलाकात हुई थी. शेख़ मुजीब ने उसी दौरान इंदिरा गांधी को बांग्लादेश दौरे का न्योता दिया था. शेख़ मुजीब ने अपने उसी दौरे के दौरान बांग्लादेश से भारतीय सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर भी जोर दिया था.

फारूक चौधरी ने अपनी आत्मकथा 'जीवनेर बालुकाबेलया' में लिखा है, "अपने दो दिनों के दौरे में भी बंगबंधु मुजीब बांग्लादेश से भारतीय सैनिकों की वापसी के मुद्दे पर सक्रिय थे."

शेख़ मुजीब के उस दौरे के दूसरे दिन इंदिरा गांधी के साथ बातचीत के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि 25 मार्च, 1972 तक भारतीय सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. लेकिन हकीकत में उससे दो हफ्ते पहले ही भारतीय सैनिक बांग्लादेश से वापस आ गए थे.

'गुलामी का समझौता'

शेख़ मुजीबुर रहमान

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, शेख़ मुजीबुर रहमान ने इंदिरा गांधी को बांग्लादेश आने का निमंत्रण दिया था

फारूक चौधरी का कहना था कि समझौते पर दोनों देशों के बीच कोई मतभेद नहीं था. लेकिन इस पर हस्ताक्षर होने के बाद इसकी काफी आलोचना होने लगी.

कुछ राजनीतिक दल और उनके मुखपत्र कहे जाने वाले दैनिक अखबार इस समझौते के खिलाफ होकर इसकी आलोचना में शामिल हो गए.

इनमें मौलाना अब्दुल हमीद खान भसानी का अखबार 'हक कथा', फिरदौस अहमद कुरैशी के संपादन में निकलने वाले 'देश बांग्ला' और जेएसडी के मुखपत्र के रूप में हाल में प्रकाशित होने वाले 'द डेली गणोकंठो' जैसे अखबार शामिल थे.

इन अखबारों की खबरों में इंदिरा-मुजीब समझौते को 'गुलामी का समझौता' बताया जा रहा था.

वरिष्ठ पत्रकार आबेद खान उस समय 'द डेली इत्तेफ़ाक' अखबार में काम करते थे. खान ने साल 2022 में बीबीसी बांग्ला के साथ एक बातचीत में कहा था, "आलोचना का मुद्दा महज एक ही था. ऐसा करने वालों का कहना था कि इस समझौते का मतलब यह है कि शेख़ मुजीब ने बांग्लादेश को लीज पर भारत के हाथों में सौंप दिया है."

उस समय की विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने मुजीब-विरोधी और समझौता-विरोधी बयानबाजी जारी रखी और इसे 'गुलामी का समझौता' कहते रहे.

बांग्लादेश

लेकिन लेखक और राजनीतिक शोधकर्ता मोहिउद्दीन अहमद के मुताबिक, राजनीतिक पार्टियों सिर्फ इस समझौते का विरोध करने के लिए ही ऐसा कर रही थीं.

अहमद इस बात का जिक्र करते हैं कि इंदिरा-मुजीब समझौता साल 1971 के अगस्त में हुए भारत-सोवियत समझौते की हूबहू नकल थी. लेकिन इसे लेकर भारत में कोई विरोध नहीं हुआ.

वो कहते हैं, "हमारे देश में इसका विरोध हुआ था. इसकी वजह यह है कि यहां सरकार चाहे कुछ भी करे, कुछ लोग हमेशा उसका विरोध करेंगे."

लेकिन उस समय 'द डेली गणोकंठो' अखबार में पत्रकार के तौर पर काम करने वाले अहमद को यह याद नहीं है कि उस समय किसी राजनीतिक पार्टी ने इस मुद्दे पर हड़ताल बुलाई हो. हालांकि, उस समय राजनीतिक पार्टियां 'बात-बात पर हड़ताल' की अपील कर देती थीं.

अहमद बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "सिर्फ 'विरोध' करने के लिए ही लोग समझौते का विरोध कर रहे थे. वो जब सत्ता में पहुंचे तो उन्होंने उस समझौते को रद्द नहीं किया था."

फारूक चौधरी की निगाह में यह एक 'हार्मलेस यानी नुकसान-रहित', लेकिन 'जरूरी' समझौता था.

चौधरी ने साल 2011 में बीबीसी बांग्ला से कहा था, "साल 1997 में दुनिया साल 1972 के मुकाबले पूरी तरह बदल चुकी थी. तब सोवियत संघ का कोई अस्तित्व नहीं था. वह रूस बन गया था. बीते समय ने इसे अप्रासंगिक बना दिया है. मैंने इस समझौते की मौत तो देखी है. पहली बात यह है कि इसकी कोई जरूरत नहीं है. लेट इट डाई ए नेचुरल डेथ (इसे अपनी स्वाभाविक मौत मरने दें)."

उनका कहना था, "जिनको इस समझौते के नवीनीकरण की आशंका थी, उनकी आशंका गलत साबित हुई है. मुझे लगता है कि वह समझौता समय की मांग थी. उस समझौते ने तब हमारा साहस बढ़ाया था और ताकत बढ़ाई थी. हमारी संप्रभुता को मजबूत किया था. इसका एक मनोवैज्ञानिक महत्व था."

कितना फायदा हुआ था?

ढाका के तेजगांव हवाई अड्डे पर 19 मार्च, 1972 को इंदिरा गांधी को विदाई देते शेख़ मुजीब

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ढाका के तेजगांव हवाई अड्डे पर 19 मार्च, 1972 को इंदिरा गांधी को विदाई देते शेख़ मुजीब

यह सवाल जरूर है कि भारत-बांग्लादेश मैत्री समझौता कहां तक लागू हुआ और इससे असल में कुछ फायदा हुआ या नहीं?

पूर्व राजदूत हुमायूं कबीर बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "हकीकत यह है कि किसी भी पक्ष ने समझौते की शर्तों को लागू करने का अनुरोध नहीं किया या कोई भी उसे अमली जामा पहनाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ा."

डॉ. अनिसुज्जमान ने साल 2015 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा 'विपुला पृथ्वी' में लिखा है, "जितनी चर्चा हुई थी, उस लिहाज से समझौते के सामान्य हिस्से पर भी अमल नहीं किया गया."

ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग में प्रथम सचिव रहीं अरुंधती घोष मानती हैं कि साल 1975 में हुए तख्तापलट और इससे जुड़ी घटनाओं ने इस समझौते पर अमल नहीं होने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.

घोष का कहना था, "शेख़ साहब की हत्या के बाद कुछ दिनों तक कई तरह की गलतफहमियां पैदा हो गई थीं. मुझे लगता है कि जिस मकसद से वह समझौता हुआ था, उस पर पूरी तरह अमल नहीं किया जा सका."

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा था, "मैं जब तक वहां थी, तब तक दोस्ती बनी हुई थी. लेकिन हमारी ओर से कई गलतफहमियां पैदा हो गई थीं."

19 मार्च, 1997 को समझौते की मियाद खत्म होने के समय बांग्लादेश में अवामी लीग की सरकार सत्ता में थी. लेकिन भारत और बांग्लादेश में से किसी ने उसके नवीनीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)