बांग्लादेश में ख़िलाफ़त की मांग लेकर सड़क पर निकला प्रतिबंधित संगठन, यूनुस सरकार की हो रही आलोचना

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बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित चरमपंथी इस्लामी संगठन हिज़बुत तहरीर के प्रदर्शन के बाद मोहम्मद यूनुस सरकार सवालों के घेरे में आ गई है.
शुक्रवार को जुमे की नमाज़ के बाद हिज़बुत तहरीर ने बांग्लादेश की राजधानी ढाका के बैतुल मुकर्रम नेशनल मॉस्क इलाक़े में एक प्रदर्शन मार्च निकाला था.
मार्च को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे. इस दौरान ग्रेनेड के धमाकों की आवाज़ भी सुनी गई.
कट्टरपंथी संगठन के इस क़दम को यूनुस सरकार का मौन समर्थन माना जा रहा है और सोशल मीडिया पर इसकी तीखी आलोचना हो रही है.

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हिज़बुत तहरीर ने सात मार्च, शुक्रवार को बैतुल मुकर्रम से 'मार्च फ़ॉर ख़िलाफ़त' निकालने का आह्वान किया था. हालांकि इस चरमपंथी संगठन से जुड़े प्रदर्शनकारी ढाका शहर के अलग अलग जगहों पर दिखे.
यह संगठन बांग्लादेश में ख़िलाफ़त या शरिया क़ानून लागू करने की मांग कर रहा है.
एक ख़लीफ़ा के शासन को ख़िलाफ़त कहा गया है. इस्लाम में ख़लीफ़ा एक अध्यात्मिक नेता होता है जो पैग़ंबर मोहम्मद के उत्तराधिकारी होने का दावा करता है. ख़लीफ़ा अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ उत्तराधिकारी है.
जुमे की नमाज़ के बाद क्या हुआ

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बीबीसी बांग्ला के अनुसार, मार्च निकालने के एलान के बाद से ही बैतुल मुकर्रम नेशनल मॉस्क इलाक़े में पुलिस बल की भारी तैनाती की गई थी.
जुमे की नमाज़ के बाद प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा जुलूस निकला और पुलिस बैरिकेड को पार करते हुए आगे बढ़ा.
पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की और इस दौरान प्रदर्शनकारियों के बीच भिड़ंत हो गई. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे. इस दौरान ग्रेनेड के धमाकों की आवाज़ भी सुनी गई.
पुलिस की कार्रवाई के बाद भीड़ तितर-बितर हो गई. पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में लिया है और हालात नियंत्रण में हैं.
हालांकि गुरुवार की रात को ही ढाका मेट्रोपोलिटन पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा था कि प्रतिबंधित संगठन हिज़बुत तहरीर के कार्यकर्ता अगर कोई मीटिंग, रैली या प्रदर्शन करते हैं तो उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.

बयान के अनुसार, बांग्लादेश के क़ानून के मुताबिक़ हिज़बुत तहरीर एक प्रतिबंधित संगठन है. सरकार ने इसे सार्वजनिक सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हुए इस पर 22 अक्तूबर 2009 को प्रतिबंध लगाया था
एंटी टेरररिज़्म एक्ट 2009 के अनुसार, किसी भी प्रतिबंधित संगठन द्वारा मीटिंग, रैली, प्रदर्शन, पोस्टर और पर्चे बांटने और अन्य किसी तरह के प्रोपेगैंडा समेत अन्य गतिविधियां करना दंडनीय है.
पुलिस ने गुरुवार को ही इस संगठन से जुड़े तीन लोगों को गिरफ़्तार किया था.
सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना

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प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन के खुलकर प्रदर्शन आयोजित किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने बांग्लादेश की यूनुस सरकार की आलोचना की है.
शेख़ हसीना सरकार में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री रहे मोहम्मद ए अराफ़ात ने हिज़बुत तहरीर के जुलूस को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "इस्लामी संगठन हिज़बुत तहरीर को शेख़ हसीना ने प्रतिबंधित किया था. जिहादियों और इस्लामी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कड़े रुख़ के चलते इस ग्रुप के सदस्य हमेशा से उनसे नफरत करते थे. इसीलिए जुलाई अगस्त में हुए प्रदर्शनों में उन्होंने हिंसक हिस्सेदारी की थी. यूनुस सरकार ने चरमपंथियों के प्रति नरम रुख़ अपनाया है, सिर्फ़ इसलिए कि वे शेख़ हसीना के विरोधी हैं."
मोहम्मद अराफ़ात के अनुसार, 'बीते सात महीनों में यूनुस ने न केवल शीर्ष जिहादियों को जेल से निकाला, बल्कि उन अधिकारियों को दंडित किया जिनका काउंटर टेररिज़्म में बड़ा योगदान रहा है. संगठन ने इस अवसर का फ़ायदा अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए किया है. और कुछ इलाक़ों में प्रशासन के सामने ही भर्ती अभियान चलाया है.'

उन्होंने आरोप लगाया कि 'यूनुस सरकार के नेतृत्व में बांग्लादेश कट्टरपंथी और तालिबानीकरण के रास्ते पर जा रहा है.'
ढाका ट्रिब्यून ने लिखा है कि संगठन के तीन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, उन पर आरोप लगाया है कि वे 'चरमपंथी विचारधारा फैलाकर और हिंसा भड़काकर बांग्लादेश की एकता, सुरक्षा और अखंडता को तोड़ना चाहते हैं.'
आसिफ़ुर रहमान चौधरी ने सवाल उठाया है, "सैकड़ों पत्रकारों और पुलिस प्रशासन के सामने हिज़बुत तहरीर ने पहले से घोषित मार्च फ़ॉर ख़िलाफ़त जुलूस निकाला. अगर बांग्लादेश में यूनुस की अगुवाई वाली सरकार का उन्हें समर्थन नहीं है, तो वे ऐसा करने की हिम्मत कैसे कर पाए?"
बांग्लादेश वॉच नाम के एक एक्स अकाउंट से लिखा गया है, "आज के प्रदर्शन से, इस तरह के ग्रुपों और इस्लामी चरमपंथियों के प्रति अंतरिम सरकार के नरम रवैये का सीधा ख़ामियाज़ा सामने आने वाला है."
हिज़बुत तहरीर के बारे में क्या पता है?

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बांग्लादेश में पूर्व की अवामी सरकार ने 22 अक्तूबर 2009 में हिज़बुत तहरीर पर प्रतिबंध लगा दिया था.
सरकारी प्रेस नोट में इस संगठन को 'शांति, क़ानून व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा' के लिए ख़तरा बताया गया था.
वैचारिक रूप से हिज़बुत तहरीर पूरी दुनिया में इस्लामिक ख़िलाफ़त स्थापित करना चाहता है. वे लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हैं. वे क़ुरान और सुन्नाह पर आधारित संविधान चाहते हैं. इस मक़सद के लिए संगठन के पास एक मसौदा संविधान भी लिखा हुआ है.
जर्मनी, तुर्की और पाकिस्तान के अलावा कई अरब देशों समेत पूरी दुनिया भर में अलग अलग समय पर हिज़बुत तहरीर पर प्रतिबंध लगाया गया था.
साल 2024 में इस संगठन पर ब्रिटेन में भी प्रतिबंध लगाया गया था.
इन प्रतिबंधों को लेकर संगठन ने एक बयान कारी कर कहा कि भिन्न राजनीतिक विचारधारा रखने के कारण उन पर दुनिया के कुछ देशों में प्रतिबंध लगाया गया है.
हालांकि अमेरिका और कनाडा समेत कुछ देशों में यह संगठन क़ानूनी रूप से सक्रिय है.
कट्टर भारत विरोधी रुख़

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पिछले साल व्यापक जनउभार के बाद अवामी लीग की सरकार का पतन हो गया था, इसके बाद से ही यह चरमपंथी संगठन कई सार्वजनिक कार्यक्रमों की घोषणा करते हुए सामने आने लगा था.
छात्र आंदोलन के बाद जनउभार को संगठन ने खुलकर राजनीति में आने के मौके के रूप में देखा.
शेख़ हसीना सरकार के पतन के दो दिन बाद ही, सात अगस्त 2024 को इस संगठन के कार्यकर्ताओं ने बांग्लादेश की संसद के सामने एक रैली आयोजित की थी.
उस दौरान संगठन के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को इस्लामिक ख़िलाफ़त वाले बैनर के साथ देखा गया था. इस दौरान उन्होंने ख़िलाफ़त लाने की मांग करते हुए पर्चे भी बांटे थे.
उसी दिन संगठन ने ढाका यूनिवर्सिटी में एक सार्वजनिक सभा का भी आयोजन किया.
इसके अलावा संगठन ने ढाका के अंदर और बाहर कई सभाएं, रैलियां और प्रदर्शन मार्च आयोजित किया.
इसके अलावा संगठन के कार्यकर्ताओं ने कई जगहों पर सदस्य बनाने के स्टाल भी लगाए थे. अगस्त में जब बाढ़ आई थी, उस दौरान ढाका में हिज़बुत तहरीर ने भारत के ख़िलाफ़ एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था, जिसका नाम दिया था 'भारत की जल आक्रामकता के ख़िलाफ़ प्रदर्शन.'
पिछले साल ही 9 सितंबर को हिज़बुत तहरीर ने ढाका प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित कर प्रतिबंध हटाए जाने की मांग की थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित















