शेख़ मुजीब: अगरतला षड्यंत्र के 'देशद्रोही' से 'बंगबंधु' बनने की कहानी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
सन 1961 में जब शेख़ मुजीब-उर-रहमान को जेल से रिहा किया गया तो उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ा दीं, उन्होंने एक भूमिगत संगठन की स्थापना की जिसका नाम 'स्वाधीन बांग्ला विप्लवी परिषद' रखा गया.
सन 1962 में मार्शल लॉ हटा लिए जाने के बाद ढाका के पलटन मैदान में एक बड़ी रैली हुई जहाँ पूर्वी पाकिस्तान के नेताओं ने अयूब शासन की बंगालियों के प्रति रवैए की जमकर निंदा की.
सन 1962 के मध्य तक शेख़ मुजीब को यक़ीन हो गया कि अयूब को सत्ता से हटाने के लिए कुछ साहसी क़दमों की ज़रूरत होगी. उन्होंने अपने ख़ास साथी नासेर से ढाका में भारत उप उच्चायोग के अधिकारियों से संपर्क स्थापित करने के लिए कहा.
सैयद अनवारुल करीम अपनी किताब 'शेख़ मुजीब: ट्रायंफ एंड ट्रेजडी' में लिखते हैं, "नासेर ने भारत के ख़ुफ़िया अधिकारियों से संपर्क किया. तय हुआ कि शेख़ मुजीब भारत के ख़ुफ़िया अधिकारियों से अगरतला में मिलेंगे. उस ज़माने में सुरक्षा व्यवस्था इतनी मज़बूत नहीं थी इसलिए भारत की सीमा में घुसना इतना मुश्किल नहीं था लेकिन जब शेख़ मुजीब भारत आने के बारे में सोच रहे थे तभी चीन ने भारत पर हमला कर दिया. उस समय तो उनकी यात्रा टल गई लेकिन उन्होंने भारत आने का विचार त्यागा नहीं."

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शेख मुजीब की त्रिपुरा के मुख्यमंत्री से मुलाक़ात
अंतत: 27 जनवरी 1963 को शेख़ मुजीब अपने कुछ साथियों के साथ अगरतला के लिए रवाना हुए.
उन्होंने इस यात्रा के बारे में अपनी पार्टी के साथियों और यहाँ तक कि अपने नेता हुसैन सुराहवर्दी तक को विश्वास में नहीं लिया. उन्होंने ये यात्रा ट्रेन, जीप और पैदल चलकर पूरी की.
फ़ैज़ अहमद अपनी किताब 'अगरतला मामला : शेख़ मुजीब ओ बांगलार बिद्रोह' में लिखते हैं, "श़ेख मुजीब 29 जनवरी, 1963 को अगरतला पहुंचे. वहाँ उमेश लाल सिन्हा उनको अपने भाई सचींद्र लाल सिन्हा से मिलवाने ले गए. मुख्यमंत्री सचींद्र लाल ने उन्हें अपनी बहन के घर ठहराया.
शेख़ मुजीब से बात करने के बाद मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने दिल्ली गए. नेहरू ने इस बातचीत पर बहुत उत्साह नहीं दिखाया. उन्होंने सिन्हा से सिर्फ़ ये कहा कि हम किसी भी प्रजातांत्रिक आंदोलन को राजनीतिक रूप से मदद देने के लिए तैयार हैं. इससे ज़्यादा हम कुछ नहीं कर सकते.

असली अगरतला षड्यंत्र कुछ और था
सन 1967 में पाकिस्तान की सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान में रबींद्रनाथ टैगौर के संगीत और साहित्य पर प्रतिबंध लगा दिया. पाकिस्तान की सैनिक सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीब की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें अगरतला षड्यंत्र केस में फँसा दिया.
हालांकि इस फ़ैसले का शेख़ मुजीब की जनवरी, 1963 में हुई अगरतला यात्रा से कोई संबंध नहीं था. इस षड्यंत्र का संबंध पाकिस्तानी नौसेना के लेफ़्टिनेंट कमांडर मोअज़्ज़म हुसैन था.
मोअज़्ज़म पाकिस्तानी सेना में बंगालियों के साथ हो रहे भेदभाव के कथित रवैये से असंतुष्ट थे. सन 1964 में उन्होंने शेख मुजीब से संपर्क कर उनसे सशस्त्र विद्रोह की अपनी योजना पर बातचीत की.
सैयद अनवारुल करीम शेख़ मुजीब की जीवनी में लिखते हैं, "शेख़ मुजीब ने मुअज़्ज़म के प्रस्ताव को ये कहते हुए नामंज़ूर कर दिया कि वो नहीं चाहते कि पाकिस्तानी सैन्य शासन की जगह बंगाली सैन्य शासन ले लेकिन मोअज़्ज़म ने अपनी योजना को आगे बढ़ाते हुए बर्मा के करेन विद्रोहियों से हथियार ख़रीदे."
मोअज्ज़म ने कुछ धन भी जमा किया जो उन्होंने नौसेना के अपने साथी अमीर हुसैन मियाँ को दिया. अमीर हुसैन ने उस पैसे का ग़बन कर लिया. मोअज़्ज़म ने इस विश्वासघात के लिए अमीर को रास्ते से हटाने की योजना बनाई.
करीम लिखते हैं, "उन्होंने जिस आदमी को अमीर की हत्या का काम सौंपा वो अमीर का मित्र निकला. उसने उसे ये बात बता दी कि उसकी जान को ख़तरा है. सन 1967 में अमीर ने खुफ़िया एजेंसी आईएसआई के सामने पूरी योजना का भंडाफोड़ कर दिया."
शेख मुजीब की दोबारा गिरफ़्तारी

सन 1965 के युद्ध में आईएसआई की काफ़ी किरकिरी हो चुकी थी.
पत्रकार सैयद बदरुल अहसन शेख़ मुजीब की जीवनी में लिखते हैं, "जब आईएसआई को इस योजना की जानकारी मिली तो उन्होंने सोचा कि इसको उजागर कर वो अपनी खोई हुई विश्वसनीयता को दोबारा पा सकते हैं."
सारे षड्यंत्रकारियों को दिसंबर, 1967 में गिरफ़्तार कर लिया गया. जब उन्हें यातनाएं दी गईं तो उन्होंने क़बूलनामे में शेख़ मुजीब को इस पूरे षड्यंत्र का सरगना बता दिया.
ब्रिगेडियर आरपी सिंह और हितेश सिंह अपनी किताब 'फ़्रॉम ईस्ट पाकिस्तान टू बांग्लादेश रिकलक्शंस ऑफ़ 1971 लिबरेशन वार' में लिखते हैं, "जनवरी, 1968 में घोषणा की गई कि सेना के 28 बंगाली लोग और कुछ अन्य लोगों को भारत की मदद से पाकिस्तान से अलग होने का षड्यंत्र रचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है. शेख़ मुजीब पहले से ही जेल में थे. 17-18 जनवरी की रात को उन्हें जगाकर कहा गया कि उन्हें रिहा किया जा रहा है. जैसे ही वो जेल से बाहर निकले उन्हें फिर गिरफ़्तार कर ढाका कैंट ले जाया गया."
उन्हें छह महीने तक एकांतवास में रखा गया और किसी से भी, यहां तक कि परिजनों तक से नहीं मिलने दिया गया. मुकदमा शुरू होने से सिर्फ एक दिन पहले 18 जून को उनके वकील अब्दुस सलाम ख़ान को उनसे मिलने की अनुमति दी गई.
गवाह अपने बयान से पलटे

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जब जनरल याह्या ख़ान ने पूरे मामले की जानकारी राष्ट्रपति अयूब ख़ान को दी तो उन्होंने शेख़ मुजीब के नाम को आरोपियों में शामिल किए जाने पर आपत्ति की, लेकिन याह्या अपनी बात पर अड़े रहे और षड्यंत्रकारियों की सूची में शेख़ मुजीब का नाम सबसे ऊपर रखा गया.
इस मुक़दमे के लिए एक विशेष न्यायाधिकरण बनाया गया जिसके प्रमुख थे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसए रहमान. इसके दो और सदस्य ढाका हाईकोर्ट में जज थे.
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री और नामी वकील मंज़ूर क़ादिर को अभियोजन पक्ष का वकील बनाया गया.
एसए करीम लिखते हैं, "अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि षड्यंत्रकारी ढाका में भारतीय उप उच्चायोग के प्रथम सेक्रेटेरी जीएन ओझा से उनके दफ़्तर और चटगाँव में लेफ़्टिनेंट कमांडर मोअज़्ज़म के घर पर कई बार मिले थे. मुकदमा शुरू होते ही अभियोजन पक्ष का केस कमज़ोर होने लगा क्योंकि कई गवाहों ने अपने बयान बदल दिए. एक गवाह ने तो यह कह दिया कि उसे आर्मी इंटेलिजेंस ने शेख़ मुजीब के ख़िलाफ़ गवाही देने के लिए यातनाएं दी हैं और उसके इक़बालिया बयान को एक ब्रिगेडियर ने डिक्टेट कराया है."
शेख़ मुजीब की लोकप्रियता बढ़ी

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इस बीच अक्तूबर, 1968 से पश्चिमी पाकिस्तान में अयूब का विरोध बढ़ने लगा. पेशावर की एक सभा में उनकी हत्या करने का भी प्रयास किया गया.
ब्रिगेडियर आरपी सिंह और हितेश सिंह लिखते हैं, "सैनिक शासन ने सोचा था कि अगरतला षड्यंत्र केस का प्रचार कर वो शेख़ मुजीब को राजनीतिक रूप से बदनाम कर देंगे. लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा ही. रातोंरात वो बंगाली राष्ट्रवाद के प्रतीक बन गए. ब्रिटेन में पूर्वी पाकिस्तान के प्रवासियों ने एक फंड बनाया और बैरिस्टर सर टॉमस विलियम्स को शेख़ मुजीब की वकालत करने ढाका भेजा."
जब विलियम्स ढाका आए तो पाकिस्तान की पुलिस और जासूसों ने उनका पीछा किया. एक दिन उनके कमरे में घुसकर उनके सामान और कागज़ों की तलाशी ली गई.
इस मुकदमे को अंतरराष्ट्रीय प्रेस में ज़बरदस्त कवरेज मिला. पूरी दुनिया को लग गया कि ये बनाया हुआ केस है.
पाकिस्तान की सैनिक सरकार पर दबाव पड़ने लगा कि वो बेक़सूर लोगों को सज़ा न दे. जैसे जैसे मुक़दमा आगे बढ़ा शेख मुजीबुर रहमान के पक्ष में जन आंदोलन बढ़ता चला गया.
मौलाना भसानी मुजीब के समर्थन में उतरे

अवामी लीग के सभी चोटी के नेता जेल में बंद थे, पार्टी शेख़ के पक्ष में बन रही सहानुभूति लहर का फ़ायदा नहीं उठा सकी.
शेख़ मुजीब की समझ में आ गया कि देश में सिर्फ़ एक नेता ही जन- आंदोलन का नेतृत्व कर सकता है और वो हैं मौलाना भसानी.
फ़ैज़ अहमद लिखते हैं, "राजनीतिक विरोध के बावजूद मौलाना भसानी शेख मुजीब को अपने बेटे की तरह मानते थे. शेख़ मुजीब ने एक पत्रकार के ज़रिए मौलाना भसानी से संपर्क किया. जैसे ही मुजीब का संदेश भसानी को मिला तो उन्होंने कहा, अगर शेख़ चाहते हैं तो मैं इस आंदोलन का नेतृत्व करूँगा."
मौलाना भसानी ने अपने गाँव से ढाका तक का मार्च शुरू किया. ढाका के पलटन मैदान में हुई रैली में उन्होंने अयूब सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने छात्रों से पश्चिम पाकिस्तान का अनुकरण करने के लिए कहा जहाँ वो अयूब के ख़िलाफ़ आंदोलन में सबसे आगे थे.
जनवरी, 1969 में सारे पूर्वी पाकिस्तान में छात्र सड़कों पर उतरकर अगरतला षड्यंत्र केस को वापस लेने और शेख़ मुजीब की रिहाई की माँग करने लगे. पाकिस्तान सरकार ने अंतिम सुनवाई के लिए 6 फ़रवरी, 1969 की तारीख़ तय की.
अयूब ने गोलमेज़ सम्मेलन बुलाया
5 जनवरी, 1969 को सर्बदलीय छात्र संग्राम परिषद का गठन हुआ जिसने सरकार से उनकी सभी 11 माँगें मानने के लिए कहा. इसमें शेख़ मुजीब की 6 सूत्री माँगें भी शामिल थीं.
छात्र परिषद की माँगों ने सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन को और हवा दी. जनवरी में रिटायर्ड एयर मार्शल असग़र खाँ ने पूर्वी पाकिस्तान का दौरा किया. उन्होंने शेख मुजीब की पत्नी फ़ज़ीलातुन्निसा से मुलाकात की और एक राजनीतिक रैली में भी भाग लिया.
पूरे पूर्वी पाकिस्तान में पुलिस फ़ायरिंग की कई घटनाएं हुईं जिसमें कई लोग मारे गए. इसी दौरान शेख़ के सहयोगी कमाल होसैन ने सरकारी वकील और अयूब ख़ाँ के संवैधानिक सलाहकार मंज़ूर क़ादिर से मुलाकात कर अनुरोध किया कि सरकार आम लोगों की माँगों पर ध्यान दे.
मंज़ूर क़ादिर ने वादा किया कि वो सरकार तक उनकी बात पहुंचा देंगे. एक फ़रवरी, 1969 को अयूब ख़ाँ ने एक रेडियो प्रसारण में कहा कि वो 17 फ़रवरी को रावलपिंडी में होने वाली गोलमेज़ बातचीत के लिए विपक्षी नेताओं को आमंत्रित करेंगे.
अवामी लीग ने घोषणा की कि वो इस बातचीत में तभी हिस्सा लेंगे जब शेख़ मुजीब को रिहा कर दिया जाएगा.
हड़तालों और रैलियों का सिलसिला
तभी 14 फ़रवरी, 1969 को हुई एक घटना ने स्थिति और विस्फोटक बना दी. इस मामले से जुड़े एक शख़्स एयरफ़ोर्स सार्जेंट ज़हूर-उल-हक़ को जेल में ही एक पाकिस्तानी हवलदार ने गोली मार दी.
इसके बाद पूरे पूर्वी पाकिस्तान मे हड़तालों, रैलियों और बंद का जो सिलसिला शुरू हुआ तो उसने रुकने का नाम नहीं लिया. करीब दस लाख लोगों ने ज़हूर-उल-हक़ की शव यात्रा में भाग लिया.
सहानुभूति लहर एक जन आंदोलन के रूप में बदल गई और अंत में लोग अगरतला केस वापस लिए जाने के साथ साथ राष्ट्रपति अयूब ख़ाँ के इस्तीफ़े की माँग करने लगे.
ज़हूर-उल-हक़ की शव यात्रा हिंसक हो गई और भीड़ के कुछ लोगों ने अगरतला ट्रायबुनल केस के प्रमुख जस्टिस एसए रहमान के घर में आग लगा दी. जस्टिस रहमान किसी तरह जीवित बच निकलने में कामयाब हो गए.
मुजीब ने पैरोल की अर्ज़ी देने का प्रस्ताव ठुकराया

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अयूब ख़ाँ अपनी बुलाई गोलमेज़ कॉन्फ़्रेंस की सफलता के लिए चाहते थे कि उसमें अवामी लीग हर हालत में भाग ले.
ताजुद्दीन अहमद के नेतृत्व में अवामी लीग का एक दल इस सम्मेलन में भाग लेने रावलपिंडी पहुंचा. उन्होंने कानून मंत्री एसएम ज़फ़र से बात की. उन्होंने उन्हें बताया कि कानूनी अड़चनों की वजह से शेख़ मुजीब को सिर्फ़ पैरोल पर ही छोड़ा जा सकता है.
मशहूर राजनयिक ग़ुलाम वाहेद चौधरी ने अपनी किताब 'द लास्ट डेज़ ऑफ़ युनाइटेड पाकिस्तान' में लिखा, "अवामी लीग की टीम लाहौर और कराची होती हुई ढाका लौटी. लाहौर में एयर मार्शल असग़र ख़ाँ ने उनसे मिलकर सरकार के रवैये पर अपनी पीड़ा व्यक्त की. जब टीम के सदस्यों ने ढाका लौट कर शेख़ मुजीब को क़ानून मंत्री का पैरोल लेने का प्रस्ताव बताया तो उन्होंने उसे अपनी पत्नी की सलाह पर सिरे से ख़ारिज कर दिया."
उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि अगर वो पैरोल की अर्ज़ी देंगे तो उनकी प्रतिष्ठा को बहुत नुकसान पहुंचेगा. उन्होंने ये भी कहा कि अगर वो बिना शर्त छोड़े जाने की अपनी माँग पर अड़े रहते हैं तो अयूब ख़ाँ उन्हें छोड़ने के लिए बाध्य हो जाएंगे.
शेख़ मुजीब की रिहाई
22 फ़रवरी, 1969 को अयूब ख़ाँ ने खुद ही अगरतला षड्यंत्र केस वापस ले लिया. तुरंत ही शेख़ मुजीब और दूसरे लोगों की रिहाई के आदेश जारी किए गए.
एसए करीम लिखते हैं, "ढाका का माहौल बहुत तनावपूर्ण था, पूर्वी कमान के जीओसी जनरल मुज़फ़्फ़रउद्दीन ने ब्रिगेडियर राव फ़रमान अली से कहा कि वो ख़ुद शेख़ मुजीब को उनके धानमंडी निवास में लेकर जाएं. जैसे ही मुजीब अपने घर पहुंचे, पूरे घर में खुशियाँ मनाई जाने लगीं. राव फ़रमान अली से भी कहा गया कि वो इन ख़ुशियों मं शामिल हों."
23 फ़रवरी, 1969 को छात्र नेता तुफ़ैल अहमद के नेतृत्व में शेख़ मुजीबुर रहमान के सम्मान में एक जनसभा आयोजित की गई. रेसकोर्स मैदान में हुई इस सभा में करीब 10 लाख लोगों ने भाग लिया.
इसी सभा में तुफ़ैल अहमद ने घोषणा की कि अब से शेख़ मुजीब को 'बंग बंधु' कहकर पुकारा जाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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