क़तर: पूर्व भारतीय नौसैनिकों की सज़ा कम होना भारत के लिए कितनी बड़ी कामयाबी

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भारतीय विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया है कि क़तर की एक अदालत ने भारतीय नौसैनिकों को दी गयी मौत की सज़ा कम कर दी है.
इन सैनिकों को दाहरा ग्लोबल नामक एक मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी.
ये सैनिक फिलहाल क़तर की जेल में क़ैद हैं. और ये ख़बर आने से पहले तक इनके भविष्य को लेकर आशंकाएं बनी हुई थीं.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक संक्षिप्त प्रेस रिलीज़ जारी करके इस ख़बर की पुष्टि की है. विदेश मंत्रालय ने बताया है कि वह इस मामले में जारी किए विस्तृत फ़ैसले का इंतज़ार कर रहा है.
क़तर से आई इस ख़बर को भारत सरकार की एक बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है. क्योंकि ये फ़ैसला पीएम मोदी और क़तारी अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल-थानी के साथ मुलाक़ात के कुछ हफ़्तों बाद ही आया है.
विदेश मंत्रालय ने क्या बताया?

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भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर जारी प्रेस रिलीज़ में कहा है कि क़तर की अदालत ने भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों की मौत की सज़ा कम करने का फ़ैसला किया है.
विदेश मंत्रालय के बयान में लिखा गया है, "दहरा ग्लोबल केस मामले में आज क़तर की अदालत का आदेश आया है, जिसमें सज़ा को कम कर दिया गया है. हमें पूरे आदेश का इंतज़ार है. क़तर में हमारे राजदूत और अन्य अधिकारी सज़ा पाए लोगों के परिजनों के साथ आज अदालत में मौजूद थे."
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इस बयान में ये भी बताया गया है कि ‘हम शुरू से ही उन लोगों के साथ खड़े हैं. हम लगातार कांसुलर और क़ानूनी मदद पहुंचाना जारी रखेंगे. हम इस मामले को क़तारी प्रशासन के समक्ष भी उठाएंगे.’
‘इस मामले में जारी सुनवाई गुप्त और संवेदनशील होने की वजह से इस समय इस मुद्दे पर इससे अधिक कुछ भी कहना उचित नहीं होगा.’
इससे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने 21 दिसंबर को बताया था कि ये मामला अपीलीय अदालत में है और इस मामले में तीन बार सुनवाई हो चुकी है.
इसके साथ ही 21 दिसंबर को उन्होंने बताया था कि भारतीय राजदूत को आठों पूर्व अधिकारियों से मिलने के लिए कॉन्सुलर एक्सेज़ मिल गयी है.
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इसके लगभग एक हफ़्ते बाद ही इन सैनिकों की सज़ा को कम करने की ख़बर आई है.
विदेश मंत्रालय की नियमित प्रेस ब्रीफ़िंग में इस मामले पर विस्तृत बयान आने की संभावना है.
आख़िर क्या है मामला?

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भारतीय नौसेना के इन आठ पूर्व अधिकारियों की नाटकीय ढंग से गिरफ़्तारी और उसके बाद उन्हें मौत की सज़ा सुनाए जाने का सिलसिला अब से लगभग 17 महीने पहले क़तर में ही शुरू हुआ था.
क़तरी ख़ुफिया विभाग ने साल 2022 के अगस्त महीने की 30 तारीख़ की रात एकाएक क़तर में ही काम करने वाले आठ पूर्व नौसैनिकों को उठा लिया.
इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद इन्हें दोहा के एक जेल में बाक़ी क़ैदियों से अलग रखा गया. लेकिन इन्हें गिरफ़्तार करने की कोई वजह नहीं बताई गयी.
लेकिन स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़ गिरफ़्तार किए गए भारतीयों पर दोहा में काम कर रहे एक सबमरीन प्रोजेक्ट की संवेदनशील जानकारियाँ इसराइल से साझा करने का आरोप है. क़तर में ऐसे आरोपों के साबित होने पर मौत की सज़ा का प्रावधान है.
ये भारतीय नागरिक क़तर की नौसेना के लिए काम करने वाली एक कंपनी दाहरा ग्लोबल टेक्नोलॉजीज एंड कंसल्टिंग सर्विसेज़ के लिए काम करते थे.
ये कंपनी क़तर की नौसेना के सबमरीन प्रोग्राम से जुड़ी थी. इस प्रोग्राम का मकसद रडार से बचने में सक्षम हाइटेक इतालवी तकनीक पर आधारित सबमरीन हासिल करना था.
क़तर ने बाद में इस कंपनी को बंद करके इसके लगभग 70 कर्मचारियों को मई, 2023 के अंत तक देश छोड़ने का आदेश दिया. इस कंपनी में काम करने वालों में ज़्यादातर कर्मचारी भारतीय नौसेना के पूर्व कर्मचारी थे.

इसके बाद क़तर की एक अदालत ने 26 अक्टूबर, 2023 को गिरफ़्तार किए गए 8 भारतीय नागरिकों को मौत की सज़ा सुनाई.
भारत सरकार ने इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे स्तब्ध करने वाली ख़बर बताया.
इसके साथ ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस मामले में अपील दायर करने की ओर कदम उठाएगा.
इसके बाद 20 नवंबर को अपीलीय अदालत में पहली और 23 नवंबर को दूसरी सुनवाई हुई. अब तक भारतीय राजदूत को काउंसलर एक्सेज़ हासिल नहीं थी.
इसका मतलब ये है कि क़तर में मौजूद भारतीय राजदूत इन आठ पूर्व नौसैनिकों से मिलने में सक्षम नहीं थे.
लेकिन इस घटनाक्रम में बड़ा बदलाव 1 दिसंबर को पीएम मोदी और क़तर के अमीर की दुबई में हुई मुलाक़ात के बाद आया.
इस मुलाक़ात के सिर्फ़ दो दिन बाद तीन दिसंबर को भारतीय राजदूत को काउंसलर एक्सेज़ मिल गयी. इसके बाद सात दिसंबर को एक और सुनवाई हुई.
और 28 दिसंबर को क़तर की अदालत ने मौत की सज़ा को कम कर दिया.
आगे क्या हो सकता है?

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ये ख़बर आने के बाद से लगातार सवाल उठ रहे हैं कि इस मामले में अब क्या हो सकता है. एक सवाल ये पूछा जा रहा है कि क्या अब इन पूर्व नौ-सैनिकों को वापस भारत लाया जा सकेगा.
इस सवाल के साथ साल 2014 में भारत और क़तर के बीच हुए उस समझौते का ज़िक्र किया जा रहा है जिसमें दोनों देशों के बीच सजा काट रहे कैदियों की अदला-बदली के लिए सहमति बनी थी.
इस संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद कतर में कैद भारतीय कैदियों को अपनी सजा का शेष हिस्सा भारत में काटने के लिए यहां लाया जाएगा ताकि वे अपने परिजनों के निकट रह सकें और उनका सामाजिक पुनर्वास संभव हो सके. इसी तरह भारत में सजा काटने वाले कतर के कैदियों को उनके देश वापस भेजा जाएगा.
हालांकि, ताज़ा ख़बर के बाद भारत सरकार की ओर से उठाए जा रहे अगले कदम की कोई जानकारी नहीं दी गयी है.
भारत की कूटनीतिक जीत?

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भारत के पूर्व कूटनीतिज्ञ अनिल त्रिगुणायत ने क़तर की अपीलीय अदालत की ओर से लिए गए इस फ़ैसले का स्वागत किया है.
उन्होंने कहा, “कतर और भारत के आपसी रिश्ते काफ़ी मजबूत रहे हैं. ये मामला इन रिश्तों में एक अड़चन जैसा रहा है. निजी तौर पर कहूं तो मुझे लगता है कि अपीलीय अदालत की ओर से इन लोगों की सज़ा कम किया जाना अच्छा है. मैं आशा करता हूं कि वे न केवल दोषमुक्त होंगे. बल्कि हमारे अच्छे द्विपक्षीय संबंधों को देखते हुए जल्द से जल्द घर लौट आएंगे.”
त्रिगुणायत अपनी इस उम्मीद के तार्किक आधार को बयां करते हुए कहते हैं – ‘हम एक दूसरे से बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं. हम क़ानून की इज़्ज़त करते हैं. और हमें क़तर के क़ानून पर पूरा भरोसा है. मुझे पूरी उम्मीद है कि भारतीयों को जल्द से जल्द भारत आने दिया जाएगा.’
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कमोडोर उदय भास्कर ने इस मुद्दे पर बीबीसी के साथ विशेष बातचीत की है.
भास्कर ने कहा, “क़तर की ओर से सज़ा कम करने का फ़ैसला भारत के कूटनीतिक प्रयासों की वजह से ही हुआ है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन जैसा कि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि इस मामले में विस्तृत फ़ैसले का बारीकी अध्ययन किया जाना ज़रूरी है. क्योंकि जब तक इस फ़ैसले की ठीक ढंग से जांच न की जा सके तब तक ये नहीं कहा जा सकता कि ये अंतिम निर्णय है.”
इस फ़ैसले का स्वागत करने के साथ ही कमोडोर उदय भास्कर एक अन्य पहलू की ओर इशारा करते हैं.
वह कहते हैं, “इस फ़ैसले के साथ ही एक चिंता ये ख़त्म हो गयी है कि कहीं इन्हें फांसी न दे दी जाए. ये चिंता अब थोड़ी दूर हुई है. लेकिन जब तक जजमेंट नहीं आएगा तब तक मैं व्यक्तिगत रूप से स्वीकार नहीं कर सकता हूं कि हमारे अफ़सरों ने इस तरह की कार्रवाई की है. ऐसे में मुझे लगता है कि इन्हें दोषी मानना या अपराधी समझना जल्दबाजी होगा.”
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