क़तर में नौसेना के पूर्व अधिकारियों को सज़ा-ए-मौत से बचाने के लिए क्या कर सकता है भारत?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय नौसेना के आठ पूर्व अधिकारियों को क़तर में मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद सभी की नज़रें भारत सरकार के अगले क़दम पर हैं.
भारत का विदेश मंत्रालय कह चुका है कि भारत सरकार इस फ़ैसले से स्तब्ध है और सभी क़ानूनी विकल्प तलाश रही है.
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने सोमवार सुबह इन आठ भारतीयों के परिवारों से मुलाक़ात की.
इस मुलाक़ात की जानकारी एक्स (पहले ट्विटर) पर देते हुए उन्होंने लिखा,"आज सुबह क़तर में हिरासत में लिए गए 8 भारतीयों के परिवारों से मुलाक़ात की. इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार मामले को सर्वोच्च महत्व देती है."
"हम परिवारों की चिंताओं और दर्द को पूरी तरह से समझते हैं. सरकार उनकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रयास करना जारी रखेगी. उस संबंध में परिवारों के साथ नज़दीकी तालमेल बनाए रखेंगे."

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पीएम मोदी के भरोसेमंद अफ़सर को कमान
ख़बरों की मानें तो भारतीय नौसेना के इन आठ पूर्व कर्मियों की मदद के लिए की जा रही कोशिशों की कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद राजनयिक दीपक मित्तल को सौंपी गई है.
दीपक मित्तल साल 1998 बैच के इंडियन फॉरेन सर्विस (आईएफ़एस) ऑफिसर हैं और फ़िलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत हैं.
वो क़तर में भारत के राजदूत के तौर पर काम कर चुके हैं और माना जाता है कि क़तर की सरकार में शीर्ष स्तर पर उनके अच्छे सम्बन्ध हैं जिस वजह से उन्हें ये ज़िम्मेदारी सौंपी गई है.
मित्तल को उच्च श्रेणी का वार्ताकार माना जाता है. साल 2019 में मित्तल तब सुर्ख़ियों में आए थे जब हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में कुलभूषण जाधव मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा हाथ मिलाने के संकेत का जवाब 'नमस्ते' से दिया.

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पाकिस्तानी अधिकारी का बढ़ा हुआ हाथ और नमस्ते करते हुए मित्तल की तस्वीर उस वक़्त ख़ूब चर्चा में रही थी.
अप्रैल 2020 में मित्तल को क़तर में भारत के राजदूत के तौर पर नियुक्त किया गया था.
साल 2021 में क़तर में भारत के राजदूत के पद पर रहते हुए मित्तल ने तालिबान के शीर्ष नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानेकज़ई के साथ बातचीत की थी.
ये पहली बार था जब भारत ने तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर काबिज़ होने के बाद उनसे औपचारिक राजनयिक बातचीत की थी.

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क्या विकल्प हैं भारत के पास?
इस वक़्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन आठ भारतीयों को बचाने के लिए भारत के पास क्या विकल्प हैं.
जानकारों की मानें तो भारत के लिए सबसे बढ़िया विकल्प क़तर से अपने अच्छे रिश्तों का इस्तेमाल करना होगा.
ए.के. महापात्रा दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर हैं.
वे कहते हैं, "सबसे पहले तो भारत के पास डिप्लोमैटिक ऑप्शन है. क़तर कोई दुश्मन देश नहीं है. भारत के साथ उसकी दोस्ती है, आर्थिक रिश्ते हैं. भारत की क़रीब 40 फ़ीसदी गैस की सप्लाई क़तर से होती है. क़रीब 6-7 लाख भारतीय वहां काम करते हैं. भारतीय कंपनियों ने वहां निवेश किया है. तो इस मसले की वजह से दोनों देशों के बीच ये सब कुछ दांव पर नहीं लगाया जा सकता."
महापात्रा के मुताबिक़, "भारत सरकार को पहले तो कूटनीतिक स्तर पर इसका हल खोजना होगा क्योंकि क़तर की तरफ़ से अभी तक बहुत सी जानकारियां नहीं दी गई हैं."
महापात्रा का कहना है कि भारत क्षेत्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि हमास के इसराइल पर 7 अक्टूबर के हमले के बाद पश्चिम एशिया में एक विभाजन या ध्रुवीकरण उभर रहा है. एक तरफ़ ईरान, तुर्की, क़तर और कुछ हद तक पाकिस्तान है और दूसरी तरफ़ अरब देश हैं."
"ओमान और कुवैत जैसे अरब देशों के क़तर के साथ अच्छे रिश्ते हैं. तो इन देशों के ज़रिये भी बातचीत कर भारत क़तर पर दबाव बनवा सकता है. साथ ही भारत, अमेरिका से भी क़तर पर दबाव डलवा सकता है. क़तर में अभी भी अमेरिका का दबदबा है. क़तर में अभी भी एक अमेरिकी नौसैनिक बेस है."

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क़तर के अमीर से मिलेगी माफ़ी?
जिन आठ भारतीयों को मौत की सज़ा सुनाई गई है, उनके पास अभी भी ऊपरी अदालतों में अपील करने का मौका है और भारत सरकार ये अपील दायर करने में उन्हें पूरी मदद कर रही है.
ये देखना अभी बाक़ी है कि इन अपीलों का क्या नतीजा निकलता है.
जानकारों का कहना है कि अगर अदालती कार्रवाइयों के बाद भी भारत इन आठ लोगों को बचाने में सफल नहीं होता तो क़तर के अमीर से इन लोगों के लिए माफ़ी ही उनकी जान बचा पाएगी.
भारत के क़तर से अच्छे संबंधों, ख़ासकर व्यापारिक संबंधों की वजह से ये उम्मीद जताई जा रही है कि क़तर के अमीर से इन आठ भारतीयों के लिए माफ़ी हासिल करना भारत सरकार के लिए मुश्किल नहीं होगा.
रणनीतिक विचारक, लेखक और टिप्पणीकार ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा, "भारतीय कूटनीति क़तर को आठ पूर्व भारतीय नौसेना कर्मियों के ख़िलाफ़ मामला वापस लेने या उन्हें ज़मानत देने के लिए मनाने में असमर्थ रही. अब, एक गुप्त मुक़दमे के बाद उनकी दोषसिद्धि और मौत की सज़ा के बाद, वे आठों अगली अदालत में अपील कर सकते हैं. अगर वे असफल होते हैं तो उच्चतम अदालत, कैसेशन की अदालत में जा सकते हैं."
चेलानी ने लिखा, "मामले की राजनीतिक प्रकृति को देखते हुए, उनका भाग्य अनिवार्य रूप से क़तर के अमीर के हाथों में है, जिनके पास किसी भी क़ैदी को माफ़ करने या सज़ा कम करने की शक्ति है. अमीर हर साल, रमज़ान और 18 सितंबर को मनाए जाने वाले क़तर के राष्ट्रीय दिवस पर कई क़ैदियों को माफ़ कर देते हैं. अगर आठों को फांसी दी गई तो भारत के साथ क़तर के संबंधों को अपूरणीय क्षति होगी."

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प्रोफ़ेसर ए.के. महापात्रा कहते हैं, "क़तर में लोकतंत्र नहीं है. वो एक राजशाही शासन है. उनके शासक इस मामले में माफ़ी भी दे सकते हैं. वो चाहें तो मौत की सज़ा की जगह कुछ साल क़ैद की सज़ा भी दे सकते हैं. इसके बाद उन्हें कोशिश कर के भारत भी लाया जा सकता है."
अनिल त्रिगुणायत जॉर्डन और लीबिया में भारत के राजदूत के रूप में काम कर चुके हैं. उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय के वेस्ट एशिया डिविज़न में भी काम किया है.
त्रिगुणायत भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वो कहते हैं, "मेरी नज़र में एक विकल्प द्विपक्षीय वार्ता है. क़तर के साथ भारत के जिस तरह के संबंध हैं, उसे देखते हुए क़तर के अमीर इन लोगों को माफ़ी दे सकते हैं. यह अंतिम उपाय हो सकता है और इसे सरकार से सरकार के स्तर पर करना होगा."
वो कहते हैं, "हमने सज़ायाफ़्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर क़तर के साथ एक समझौते पर दस्तख़त किए हैं. ये समझौता क़तर के अमीर की भारत यात्रा के दौरान किया गया था. हो सकता है कि अपील कोर्ट इन लोगों की सज़ा कम कर के उम्रक़ैद कर दे और उसके बाद भारत उन्हें क़तर से भारत ट्रांसफर करने की बात कर सकता है."

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आईसीजे में क़ानूनी लड़ाई?
प्रोफ़ेसर महापात्रा के मुताबिक़ अगर इस मसले का कोई कूटनीतिक हल नहीं निकलता है तो भारत के पास एक विकल्प और है.
वे कहते हैं, "इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में क़ानूनी लड़ाई लड़ी जा सकती है. जैसा कुलभूषण जाधव के मामले में किया गया था."
वहीं अनिल त्रिगुणायत के मुताबिक़ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में जाना भारत के लिए आखिरी विकल्प होगा. वे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि इस विकल्प का इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ेगी. सब कुछ राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा."
वे कहते हैं, "हर देश का अपना एक क़ानून होता है. तो क़तर को कानूनी कार्रवाई तो पूरी करनी ही पड़ेगी. सभी देश अपनी क़ानूनी प्रक्रियाओं को लेकर संवेदनशील होते हैं. निचली अदालत में सात बार सुनवाई हुई है. अब ऊपर की अदालत में अपील की जाएगी."
अनिल त्रिगुणायत कहते हैं कि केवल कूटनीति ही आख़िरकार इस मसले का हल निकालेगी. उनके मुताबिक़ क़तर को भी ये देखना होगा कि "भारत उनकी गैस का सबसे बड़ा ख़रीदार है."
वो कहते हैं, "उस देश के साथ हमारा कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी नहीं है."

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'भारत को संदेश देना चाहता है क़तर'
क़तर फारस की खाड़ी पर एक छोटा गैस समृद्ध देश है. क़तर अमेरिका का क़रीबी सहयोगी है लेकिन साथ ही उस पर इलज़ाम लगते रहे हैं कि हमास के साथ उसके गहरे सम्बन्ध हैं.
इसराइल और हमास के बीच चल रहे संघर्ष में क़तर की मध्यस्थता की वजह से ही हाल ही में दो अमेरिकी बंधकों की रिहाई संभव हो पाई थी.
तो ये साफ़ है कि क़तर के इसराइल से रिश्ते अच्छे नहीं हैं.
क़तर एक सन्देश देना चाह रहा है कि उसे भारत की इसराइल और फ़लस्तीन नीति पसंद नहीं आ रही है.
आधिकारिक तौर पर क़तर ने इन आठ भारतीयों पर लगे आरोपों पर कुछ नहीं कहा है लेकिन ये माना जा रहा है कि इन लोगों पर क़तर में इसराइल के लिए जासूसी करने का इलज़ाम है.
इसी वजह से इस बात की भी चर्चा हो रही है कि क्या इन भारतीयों को सुनाई गई मौत की सज़ा का भारत के इसराइल के प्रति रुख़ से कुछ लेना देना है?
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं, "क़तर एक सन्देश देना चाह रहा है कि उसे भारत की इसराइल और फ़लस्तीन नीति पसंद नहीं आ रही है. क़तर के लिए भारत की स्थिति समझना आसान नहीं है क्योंकि उनपर आतंकी हमले नहीं हुए हैं. इसलिए वो इस मामले को इस्लामिक लेंस से देखते हैं."
अनिल त्रिगुणायत कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि दोनों बातों का कोई सम्बन्ध है क्योंकि इन आठ लोगों का मामला एक साल से चल रहा था. अब तक आए बयानों में भारत ने कहा है कि आतंकवाद ऐसी चीज़ है जिस पर वह समझौता नहीं करेगा और ये सही भी है. भारत का मानना है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो हिंसा को उचित ठहराए."
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं कि भारत के लिए इस वक़्त क़तर से सीधा टकराव नासमझी होगी क्योंकि बहुत से हित दांव पर लगे हैं.
वे कहते हैं, "भारत सरकार को बहुत सतर्क और सावधान रहना होगा. हमें स्थिति को तूल नहीं देना चाहिए."
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