क़तर के पर्पल आईलैंड की कहानी, कैसे यहां से शुरू हुई रंगों की दुनिया में क्रांति

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क़तर के एक किनारे पर एक छोटा सा द्वीप है जो सऊदी अरब से लगता है. इस जगह को 'कुदरत का खजाना' भी कहते हैं. न केवल इसका नाम आपको अपनी ओर खींचता है बल्कि इसका इतिहास भी. ये 'पर्पल आईलैंड' है.
एक ऐसे देश में जहां सालाना औसतन 71 मिलीमीटर की बारिश भी मुश्किल से हो पाती है, वहां ये हर मौसम में हरा-भरा रहता है. इस वजह से ये सबके लिए ख़ास बन जाता है. ये पूरी तरह मैंग्रोव से घिरा है.
तरह-तरह के पंछी जिनमें फ्लैमिंगो और दूसरे समुद्री जीवों के साथ छोटा सा बीच और खारे पानी की कुदरती झीलें भी हैं. यहां कुछ पुरानी संरचनाओं के खंडहर भी हैं जो आपके मन में कौतूहल जगा सकते हैं.
कुछ समुद्री घोंघों के अवशेष यहां मिले थे, जिनकी वजह से ईसा के 2000 साल पहले इस द्वीप का नाम पड़ा था और एक दिलचस्प उद्योग की शुरुआत हुई थी.
ये छोटे समुद्री घोंघे ही थे जिनसे दुनिया के सबसे पुराने, सबसे महंगे, सबसे मशहूर और सबसे चमकीले रंग तैयार किए जाते थे. दरअसल, पर्पल आईलैंड आज की तारीख में भी इस शानदार रंग के उत्पादन की सबसे पुरानी जगह के तौर पर जानी जाती है.
ये जामुनी रंग ही था जिसने आज के लेबनान और उस दौर के फोएनीशियाई शहर टायर को डाई इंडस्ट्री के केंद्र के रूप में शोहरत दिलाई.
टायर शहर के जामुनी रंग के कपड़ों ने फोएनीशिया की सभ्यता को लोकप्रिय बनाया. कुछ इतिहासकार तो ये भी दावा करते हैं कि फोएनीशिया का मतलह 'लैंड ऑफ़ पर्पल' ही होता है.
यहां से जामुनी रंग ट्यूनिश झील के किनारे बसे प्राचीन शहर कारथेज से होता हुआ रोमनों के बीच पहुंचकर राजशाही और सत्ता का प्रतीक बन गया.
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बदबू से निकलती विलासिता
दरअसल पर्पल या बैंगनी रंग जितना सुंदर दिखता है, उसे बनाने की प्रक्रिया उतनी ही श्रमसाध्य और बदबूदार है. दरअसल, इस खूबसूरत रंग का यही विरोधाभास है.
ये रंग राजशाही, विलासिता, बौद्धिक ऊंचाई और आध्यात्मिक आदर्शों से जोड़ा जाता है लेकिन हजारों वर्षों से यह छोटे-छोटे समुद्री घोंघों के गुदा के पीछे पाए जाने वाली एक ग्रंथि से निकाला जाता रहा है.
न सिर्फ इसे निकालने का तरीका सही नहीं है बल्कि इस दौरान भारी दुर्गंध फैलती है. हालांकि इस रंग को ऊंचाई का प्रतीक माना जाता है कि लेकिन इसे निकालने की यह प्रक्रिया गंदगी से सनी हुई है.
दरअसल, इस प्रक्रिया में हजारों घोंघों की ग्रंथियों को निकाल कर कुचलने के बाद उन्हें सड़ाया जाता है. फिर उन्हें धूप में सुखाया जाता है. कपड़े के टुकड़े के रंगने के लिए इस तरह ये रंग निकाला जाता है.
रोमन लेखक प्लिनी द एल्डर ने अपनी कृति 'नैचुरल हिस्ट्री' इस प्रक्रिया का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस श्रमसाध्य प्रक्रिया को पूरा करने में कम से कम दो सप्ताह लगता था.
इस तरह घोंघों से निकाले गए रंग से रंगे गए कपड़े सुखाये जाने के बाद भी दुर्गंध से भरे रहते थे.
लेकिन कपड़ों में इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे रंग जहां जल्दी धुंधले पड़ जाते थे वहीं इस तरह के बैंगनी रंग मौसम और कपड़ों के साथ और खिल जाते थे. इस रंग की जादुई गुणवत्ता की वजह से से ही इसकी कीमत बेहद ज्यादा होती थी.
310 ईस्वी में रोमन सम्राट डाइक्लोटियन के वक्त में एक पाउंड पर्पल रंग की कीमत डेढ़ लाख डेनेरियस (रोमन मुद्रा) थी. यानी इसमें तीन पाउंड सोना मिल जाता है. आज के सोने की कीमत के हिसाब से इसकी कीमत 85 हजार डॉलर होती.
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देवता और अप्सरा
इस बेशकीमती रंग की उत्पति के बारे में कोई कहानी भी जरूर रही होगी. जो लोग इस रंग के कपड़े पहनते थे, उन लोगों के पास इसकी कोई कहानी तो होगी ही.
दूसरी सदी के ग्रीक व्याकरणविद जूलियस पोलक्स इसके बारे में बताते हैं. उनके मुताबिक एक दिन रोमन देवता हरक्यूलिस एक सुंदर अप्सरा के साथ समुद्र तट पर घूम रहे थे. उस वक्त उनका कुत्ता एक सड़े हुए कुत्ते को खाने लगा.
कुत्ते का मुंह पूरा बैंगनी हो गया. अप्सरा ने जैसे ही इसे देखा, उसने हरक्यूलिस को इस सुंदर रंग के कपड़े लाने का आग्रह किया. पोलक्स की इस कहानी के लिखे जाने तक ये रंग लोगों की ऊंची गरिमा का प्रतीक बन चुका था.
यह प्राचीन ग्रीक में सदियों तक स्थायी ताकत का प्रतीक बना रहा. हालांकि हमेशा ऐसा नहीं था. ईसा पूर्व पांचवीं सदी में ग्रीक लोग महंगे कपड़ों को बर्बरता का प्रतीक मानते थे और अपनी पहचान को इससे दूर रखते थे.
लेकिन बाद में फारस के राजाओं ने इस रंग के कपड़ों को पहनना शुरू किया. लेकिन ग्रीक-फारस के बीच की लड़ाइयों ( ईसा पूर्व 492-449) के बाद यह अत्याचार और पतन का प्रतीक बन गया.
लेकिन फिर पर्पल रंग का डर खत्म हो गया. इसके बाद की सदी में इसकी लोकप्रियता में इजाफा शुरू हो गया. फिर भूमध्य सागर क्षेत्र में इसके उत्पादन के कई केंद्र उभर आए.
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मौत का रंग
समय के साथ पर्पल रंग के कपड़े पहनने के संबंध में कानून बन गया. कानून बना कर ऐसे कपड़े पहनने को नियंत्रित किया जाने लगा. जिसकी जितनी बड़ी सामाजिक और राजनीतिक हैसियत होती थी वो उतने बैंगनी रंग के लबादे ओढ़ सकता था.
क्लियोपेट्रा इसे काफी पसंद करती थीं. जब जूलियस सीजर मिस्र में उसके दरबार में पहुंचे वो पर्पल के शेड्स से काफी प्रभावित हुए. वहां से वह बैंगनी रंग का चोगा पहन कर लौटे और एलान किया कि वही उस रंग का कपड़ा पहन सकता है.
प्लिनी द एल्डर का कहना है कि इसके कुछ साल के बाद जूलियस सीजर की हत्या कर दी गई. ये वो रंग था जिसके जरिये रोम के ताकतवर और इलिट लोग खुद को आम लोगों से अलग दिखाते थे. यह सीनेटर को आम लोगों से अलग करता था.
देवताओं को प्रसन्न करने के लिए लोग इस रंग के कपड़े पहनते थे. ये किसी भी कपड़े की चमक बढ़ा देता है. सोने के साथ इस रंग के कपड़े पहने जाते थे. लेकिन इसका इस्तेमाल सावधानी के साथ करना होता था.
रोमन इतिहास सुटोनियस के मुताबिक सम्राट कालिगुला से मिलने के जाते वक्त मुरतानिया के राजा बैंगनी रंग के कपड़े पहने थे. नतीजतन उनकी हत्या कर दी गई.
जब चालीसवीं सदी के दौरान एक ग्लैडिएटर शो के दौरान जब वो एक क्लोक (बिना बांह का लंबा कोटनुमा लबादा) पहन कर गए तो हर किसी ने उनकी तारीफ की. लेकिन कालिगुला ने इसे शाही आक्रामकता के तौर पर देखा और अपने मेहमान को मरवा दिया.
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रंग की बारीकियां
रक्तपात की वजह बन चुका ये रंग कई दिलचस्प तथ्यों की ओर ध्यान दिलाता है. ये थक्केदार लाल रंग के रंग से जितना मिलता-जुलता होता था. इसकी कीमत उतनी ही होती थी. ऐसे रंग को दैवीय माना जाता था.
बैंगनी रंग की चमक और गहराई में अंतर इस बात पर निर्भर करता था कि डाई के लिए घोंघे कहां से लाए गए. किस तरह के रसायनों का इस्तेमाल किया गया और किस वक्त पर ये सुखाया गया है.
इन चीजों के आधार पर ही बैंगनी रंग अलग-अलग शेड्स को होते थे. रोमन बिट्रुवियस ने अपनी कृति कृति 'डी आर्किटेक्चर' में इस रंग का विस्तार से वर्णन करते हुए इसे सबसे बेहतरीन, और आकर्षक बताया है.
उत्तरी इलाकों के नजदीक ये काले रंग से मिलता है. पश्चिम में लीड ब्लू की तरह है तो पूरब और पश्चिम के कुछ इलाकों में ये पर्पल है. लेकिन दक्षिण में लाल है क्योंकि यह सूरज के नजदीक है.
प्राचीन समय में इसका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इसका जिक्र न सिर्फ होमर के ओडिसी और इलियड में किया गया है बल्कि में बाइबिल में इसका उल्लेख है.
मार्क के गॉस्पेल के मुताबिक इसा मसीह को पर्पल रंग के लबादे में ही प्रताड़ित किया गया था. ताकि 'यहूदियों के राजा' के तौर पर उनका मखौल उड़ाया जा सके.
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सुल्तान मेहमत द्वितीय के समय
इस रंग के महत्व को देखते हुए रंगरेज राजाओं के लिए आय के महत्वपूर्ण स्रोत हुआ करते थे. या तो उनसे टैक्स वसूला जाता था ये उनके कपड़े जब्त कर लिए जाते थे.
जब रोमन साम्राज्य के पतन की शुरुआत होने लगी मशहूर शहर टायर शहर पर अरबी लोगों ने कब्जा कर लिया है. उसके बाद राजसी रंगरेज या ड्राई क्लीनर्स कॉन्स्टेंटिनोपल चले गए.
साल 1453 में जब सुल्तान मेहमत द्वितीय ने जब इस शहर पर कब्जा किया तब ईसाई धर्म में बैंगनी रंग से उच्च वर्ग के पुरोहितों की पहचान होती थी.
पर्पल और इसके आय से वंचित होने के बाद 1446 में पॉप पोल द्वितीय ने आदेश दिया कि इस रंग को उतने ही महंगे लाल रंग से बदला जाए. यह रंग एक तरह के कीड़े से बनाया गया था और इसमें एलम डाला जाता था.
इटली में इसके खनन पर उन्हीं का नियंत्रण था. टायर के बैंगनी रंग बनाने का विवरण खो गया. लिहाजा वो उन घोंघों के लिए खुशकिस्मती थी जो विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए थे.
हालांकि ये लोगों को जीवन में गहरे जड़ जमा चुका था और बाद में यह राजसी लोगों का पसंदीदा रंग बना रहा.
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रंगों की दुनिया में क्रांति
साल1856 में एक महत्वाकांक्षी ब्रिटिश केमिस्ट विलियम हेनरी पेरकिन मलेरिया की दवा की खोज कर रहे थे तो उस दौरान कुछ अंश बचा रह गया जो टायर शहर के पर्पल कलर का मुक़ाबला कर सकता था.
ये इतिहास में पहला सिथेंटिक डाई था. .ये डाई था- पेरकिन एनिलाइन, पर्पल मेलविन, मॉव और वायलेट या पर्पल.
इसके बाद पर्पल सबसे बेशकीमती रंग बन गया. लेकिन इस बार ये इतना महंगा नहीं था. लेकिन इससे रंगों की दुनिया में एक क्रांति आ गई.
ये न सिर्फ आधुनिक रसायन उद्योग की शुरुआत थी बल्कि इसने पहली बार हर किसी के लिए रंगों का इंद्रधनुष बना दिया था.
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