संयुक्त अरब अमीरात: वो ख़ानदान जिसने रेगिस्तान में बसी सल्तनत को ग्लोबल पावर बनाया

संयुक्त अरब अमीरात

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महज 50 साल पहले तक अरब प्रायद्वीप के रेगिस्तान में कबायली रियासतों के एक समूह के रूप में उनकी पहचान थी लेकिन अब क़रीब आधी शताब्दी बाद जहां ज़्यादातर खुले बाज़ार और तंबू की तरह घर हुआ करते थे, उन्हें गगनचुंबी इमारतों से भरे और विशाल डिज़ाइन वाले हाईवे से जुड़े शहर ने बदल डाला है.

जहां जीवनयापन के लिए खज़ूर बिने जाते थे, मोती तलाशे जाते थे और ऊंटों की नस्लें पाली जाती थीं, वहां अब समूचे अरब प्रायद्वीप का सबसे बड़ा आर्ट म्यूज़ियम पेरिस के लवरे इन पेरिस, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और पेरिस के सोरबोन यूनिवर्सिटी की शाखा खुल गई है.

आज वहां दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, सबसे भव्य होटल (सात सितारा), दुनिया की सबसे महंगी पेंटिंग (लियोनार्डो द विंची की साल्वाटर मुंडी यानी सेवियर ऑफ़ द वर्ल्ड) और दुनिया के सबसे बड़े शॉपिंग सेंटर मौजूद हैं.

इतना ही नहीं, वो दुनिया के उन कुछ देशों में शामिल हैं जिन्होंने अंतरिक्ष में अपने मिशन भेजे हैं साथ ही अपने दफ़्तरों में साढ़े चार दिन का कार्यदिवस करने वाला भी वो पहला मुल्क है.

अरब देशों के बीच अपने तेल के कुओं की बदौलत आधुनिकता और टेक्नोलॉजी के ज़बरदस्त समावेश वाला संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पूर्व और पश्चिम के बीच एक गेटवे बन गया है.

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एक बड़ा वैश्विक ताक़त

फारस की खाड़ी में पश्चिमी देशों का सहयोगी और दुनिया के सबसे विवादास्पद तानाशाही में से एक सऊदी अरब आज एक बड़ी वैश्विक ताक़त है.

आधी सदी से भी कम समय में सऊदी अरब में हुए इस कायापलट के पीछे जिस एक शख़्स की ओर इशारा करने में मध्य पूर्व के जानकार हिचकते नहीं वो हैं- शेख़ ख़लीफ़ा बिन ज़ायेद बिन सुल्तान अल नहयन, जिनका बीते महीने (मई 2022) निधन हो गया है.

दुनिया के सबसे अमीर शख़्स माने जाने वाले अबू धाबी के अमीर और शासक शेख़ ख़लीफ़ा बिन ज़ायेद बिन सुल्तान अल नहयन यूएई के दूसरे राष्ट्रपति और वो विवादास्पद शख़्स रहे हैं जिन्होंने क्षेत्रीय विकास के बल पर दुनिया के नक्शे पर अपने देश की जगह बनाई.

2014 में स्ट्रोक का शिकार होने के बाद उन्होंने शासन का रूटीन काम छोड़ दिया था लेकिन उनकी मौजूदगी हर जगह दिखती थी. उनकी तस्वीरें हर जगह दिखती रहीं, होटलों की लॉबी में, सरकारी दफ़्तरों में और यहां तक कि दुकानों और रेस्तरां में भी. शासकीय काम की देखरेख बिना कोई आश्चर्य उनके भाई मोहम्मद बिन ज़ायेद बिन सुल्तान अल नहयन के हाथों में आ गई, जिनके बारे में माना जाता है कि वे पिछले दशक में अमीरात विदेश नीति के प्रमुख रहे. अब वे देश के राष्ट्रपति बन गए हैं.

शेखों के इस राजवंश ने किस तरह एक कबायली राज्य से अपने देश को मध्य पूर्व का सबसे ताक़तवर मुल्क बनाने में कामयाब हुआ?

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कैसे हुआ था यूएई का गठन?

1960 के दशक के अंत तक में ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में से अरब के प्रायद्वीपों को छोड़ना शुरू कर दिया था. एक सदी पहले अंग्रेज़ वहां तब आए थे जब वहां से गुज़रने वाले मालवाहक जहाजों को कुछ लड़ाकू कबायली लूट लेते थे. उन पर नियंत्रण पाने के लिए ही अंग्रेज़ वहां आए थे. हालांकि वहां तेल की खोज कर ली गई थी लेकिन अंग्रेजों को वहां रहने में लाभ से ज़्यादा ख़तरा दिखा तो उन्होंने मुल्क छोड़ दिया. इसके पीछे बड़ी वजह छह अमीरातों (दुबई, अबु धाबी, शारजाह, अजमान, उम अल क़्वैन, फ़ुजैराह) के शेखों का आपसी मामलों के निपटारे और समन्वय के लिए एक परिषद के गठन का फ़ैसला था.

दिसंबर 1971 में ये सभी छह अमीरात एकजुट हुए और एक नए अर्ध-स्वायत्त देश संयुक्त अरब अमीरात का गठन किया. कुछ महीनों बाद एक अन्य अमीरात रास अल ख़ैमाह भी इनसे जुड़ गया जो आज भी संयुक्त अरब अमीरात के नक्शे पर मौजूद है.

अबू धाबी के तत्कालीन अमीर, ज़ायेद बिन सुल्तान अल-नहयन (ख़लीफ़ा के पिता और मोहम्मद) इस मुल्क़ के पहले राष्ट्रपति चुने गए. तेल की खोज हो चुकी थी, और बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था में पैसे लगाए गए और जनता के पैसे में इज़ाफ़े की एक प्रक्रिया शुरू हुई.

ये प्रक्रिया फारस की खाड़ी (सऊदी अरब, ओमान, क़तर, बहरीन और कुवैत) के सुन्नी राष्ट्रों की तरह ही थी.

'फ्रॉम डेज़र्स किंग्डम टु ग्लोबल पावर- द राइज़ ऑफ़ द अरब गल्फ़' में इतिहासकार रोरी मिलर ने दावा किया है कि इन देशों की अपार आर्थिक सफलता के पीछे तेल की कमाई को विभिन्न हितधारकों में बांटने की एक मजबूत प्रक्रिया और बचत को अचल संपत्तियों- जैसे कि रियल स्टेट, आर्ट और स्टॉक में बदलने की मुहिम रही.

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जेबल अली

खाड़ी के अन्य देशों में यूएई ने ख़ुद को एक छोटे से अंतराल में धनवान बनाने में सफलता पाई, यहां विकास भी सबसे अधिक किया गया और प्रति व्यक्ति आय भी सर्वाधिक रही.

सभी अमीरातों के पास समान रूप से तेल मौजूद नहीं थे और ये अबू धाबी के विकास की सबसे बड़ी वजह बना, वो अपनी तेल संपन्नता की वजह से यूएई के आर्थिक विकास की कामयाबी का सबसे बड़ा हथियार बन गया.

अर्ध-स्वायत्त अमीरात होने की वजह से, आर्थिक और विकास योजनाओं में बदलाव करके उन्हें मजबूत बनाने की क्षमता का मौजूद होना, जिसने उनकी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में बड़ा किरदार निभाया. कुछ अमीरात ने पर्यटन पर दांव लगाया तो अन्य ने विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए रणनीति बनाई और इस तरह 1985 में दुबई के बाहरी इलाके में एक बड़ा वाणिज्यिक बंदरगाह और व्यापार केंद्र जेबल अली मुक्त क्षेत्र स्थापित किया गया.

अपने स्थापना के लगभग 40 साल बाद यह आज भी दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र है.

आज ये कई गुना विशाल हो गया है. यह मध्य पूर्व का सबसे बड़ा बंदरगाह है. यह लगातार 24 साल मध्य पूर्व का सबसे बेहतरीन बंदरगाह भी रहा है. जल, वायु और ज़मीन के रास्ते जुड़ा ये बंदरगाह आज यूएई की अर्थव्यवस्था में बड़ा किरदार निभा रहा है. टैक्स में छूट, सीमा शुल्क में लाभ के साथ यहां विदेशी मालिकों के लिए लचीलापन मौजूद है.

यह अमीरातों के संस्थापक ज़ायेद बिन सुल्तान अल-नहयन की दूरदर्शिता थी जिसकी वजह से उनका देश 20वीं सदी के अंत तक दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा. हालांकि कई इस पर सहमत नहीं हैं कि नई सदी का विज़न शेख़ ख़ालीद और उनके सौतेले भाई की देन है.

ज़ायेद बिन सुल्तान अल-नहयन

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नई सदी- शेख़ ने यूएई के विकास के लिए क्या किया?

संयुक्त अरब अमीरात के नए और केवल दूसरे राष्ट्रपति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था कि वो 2008 में आई आर्थिक तंगी से कैसे निपटेंगे जिसने दुबई को बुरी तरह से प्रभावित किया था. शेख़ ने फ़ैसला लिया और अमीरात में करोड़ों डॉलर के बेल आउट फंड (राहत कोष) डाले गए, जिसकी वजह से दुनिया का सबसे बड़ा टावर बुर्ज दुबई खड़ा हुआ, जिसका नाम बदल कर इसके आधिकारिक उद्घाटन के समय जनवरी 2010 में बुर्ज ख़लीफ़ा कर दिया गया.

इसके नेताओं ने तेल सम्पदा का इस्तेमाल यहां सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्रों को आकर्षित करने और विदेशों में अपनी छवि को बढ़ाने में भी इस्तेमाल किया.

चाहे सरकारी हों या निजी, अमीरात के पैसे बड़ी बड़ी कंपनियों, प्रमुख रियल स्टेट, वित्त संस्थाओं, बड़े ब्रांड और यहां तक कि फ़ुटबॉल क्लब (जैसे- मैनचेस्टर सिटी) में निवेश किए गए.

अमीरात ने हाल के वर्षों में पश्चिम में कुछ सबसे महंगी इमारतों के निर्माण में भी निवेश किया है.

शेख़ ख़लीफ़ा ने तेल पर आर्थिक विकास की निर्भरता को कम करने के लिए अक्षय ऊर्जा अनुसंधान में निवेश को बढ़ावा देने का प्रयास किया.

हालांकि उन्होंने निर्यात के मद्देनज़र तेल और गैस में निवेश को बढ़ावा दिया. पिछले साल ही यूएई ने कार्बन उत्सर्जन को 2050 तक नेट-ज़ीरो करने के लक्ष्य की घोषणा की है. साथ ही उसने इस दौरान कम कार्बन उत्सर्जन वाले शहर मसदर का विकास जारी रखा है.

वीडियो कैप्शन, श्रीलंका में आर्थिक संकट के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों पर सरकार बल प्रयोग कर रही है.

मानवाधिकार उल्लंघन पर आलोचना भी हुई

सरकार के आलोचकों का कहना है कि तेल से हुआ विकास वैसे समाज के निर्माण में असफल रहा है जहां मानवाधिकारों का सम्मान किया जाता हो.

कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने यूएई की उसके प्रतिबंधात्मक समाज को लेकर आलोचना की है, जहां प्रेस या समूहों को कोई स्वतंत्रता नहीं है और व्यवस्था के आलोचकों को जेल में डाल दिया जाता है और कभी कभार मार भी दिया जाता है.

एमनेस्टी ने 2021 की अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि अमीरात सरकार में मनमानी गिरफ़्तारियां, जेल में अमानवीय व्यवहार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के उल्लंघन समेत गंभीर मानवाधिकारों के उल्लंघन जारी हैं.

शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद बिन सुल्तान अल नहयन

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वैसे तो ये मध्य पूर्व में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला देश है लेकिन अमूमन 20 हज़ार से 1 लाख लोगों को वहां स्टेटलेस माना जाता है, जिसकी वजह से उन्हें उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है जो वहां स्वास्थ्य, घर, शिक्षा, नौकरी जैसी चीज़ों में अमीरात के लोगों को हासिल है.

हाल ही में विश्वस्तर पर यूएई के प्रभाव का सबसे अहम असर तब देखने को मिला जब शेख़ ख़लीफ़ा की मौत हुई.

अमेरिका ने उनके अंतिम संस्कार में उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भेजा तो क्यूबा और भारत जैसे देशों ने आधिकारिक शोक की घोषणा की.

अबू धाबी निवेश परिषद दुनिया की सबसे बड़ी सॉवरेन वेल्थ फंड में से एक है. सॉवरेन वेल्थ फंड इंस्टीट्यूट के अनुमानों के मुताबिक इसके पास 700 बिलियन डॉलर का कोष है.

अपने भाई की मौत से पहले मोहम्मद बिन ज़ायेद बिन सुल्तान अल नहयन जब उनकी छाया के पीछे थे तब से ही उन्हें उस अरब नेता के रूप में देखा गया है जिन्होंने अपने देश के प्रभाव को दूर देशों तक फैलाने की पुरज़ोर कोशिश की है.

संयुक्त अरब अमीरात यूरोप में अपनी सेना भेजने वाला पहला आधुनिक अरब राज्य है. 1999 में उन्होंने नेटो के समर्थन में कोसोवो में अपनी सेना भेजी थी.

वीडियो कैप्शन, सीक्रेट स्कूलों के ज़रिए कैसे तालीम हासिल कर रही हैं अफ़ग़ान लड़कियां

इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान आया- अमीरात की सेना ने वहां भी नेटो के साथ काम किया, फिर मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड को कुचलने में किरदार निभाया, और 2011 में मुअम्मर गद्दाफ़ी के ख़िलाफ़ मिशन पर अपने युद्धक विमानों को लीबिया भेजा, ये वो देश है जहां यूएई सैन्य रूप में सक्रिय रहा है.

कुछ सालों बाद वो इस्लामिक देश सीरिया में अमेरिकी नेतृत्व वाले एयरस्ट्राइक में शामिल हुआ और तुर्की के साथ एक रणनीतिक संघर्ष में शामिल हुआ जो सोमालिया, सूडान, जिबूती और सोमालीलैंड तक पहुंच गया.

एक विवादास्पद निर्णयों में मोहम्मद बिन ज़ायेद अल-नहयन ने भी फ़ैसला लिया कि सऊदी के नेतृत्व वाले यमन युद्ध में शामिल हुआ जाए. उन्होंने बहरीन में अपनी सेना भेजी और क़तर और अपने खाड़ी के अन्य पड़ोसियों पर कुछ प्रतिबंध लगाने का निर्णय भी लिया.

लेकिन ये यमन में युद्ध था जहां मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन की वजह से संयुक्त अरब अमीरात को विश्व स्तर पर बहुत आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. वहां उसके सैनिकों पर न केवल बहुत से मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगे बल्कि स्थानीय चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा के साथ जुड़ाव का आरोप भी लगा.

आज वे ग्रीस और साइप्रस के सहयोगी भी हैं. तुर्की के ऊर्जा दावों के विरुद्ध इसराइल और मिस्र के साथ पूर्वी भूमध्य सागर में काम भी कर रहे हैं. तो आज का ये शक्तिशाली देश क़रीब 50 साल पहले महज कुछ कबायली राज्यों से मिलकर बना था.

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