नज़रिया: '150 या 1200 साल, भारत की ग़ुलामी कितने साल की'

रणवीर सिंह

इमेज स्रोत, Padmavati Official Trailer Grab

इमेज कैप्शन, रणवीर सिंह फ़िल्म पद्मावती में अलाउद्दीन ख़िलजी के किरदार में
    • Author, प्रोफेसर इरफ़ान हबीब
    • पदनाम, इतिहासकार

इतिहास को बीते कुछ दिनों से जैसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, ये नई बात नहीं है.

अब चूंकि इन लोगों का राज हो गया है तो इतिहास को अपने तरीके से पेश करना चाहते हैं. अब इतिहास रहा ही नहीं, ये तो एक तरह की पौराणिक कथाएं हैं.

इतिहास को गलत तरह से पेश करने वाले दो चीज़ें ज़्यादा करना चाहते हैं. एक भारत के कल्चर को सबसे पुराना बताना. दुनिया में आर्य थ्योरी रद्द हो चुकी है. यहां वही चल रही है कि आर्य हिंदुस्तान से गए और सबसे पहले हमने हर चीज़ खोजी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ये कहते नज़र आते हैं कि गणेशजी से मालूम होता है कि हम अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गेन ट्रांसप्लांट) भी कर सकते हैं.

ऐसा ही रवैया नाज़ियों का भी था कि आर्य जर्मनी से निकले थे. बिलकुल इसी तरह भारत में भी नाज़ियों की नकल की जा रही है कि भारत से निकले आर्यों ने पूरी दुनिया को कल्चर दिया.

गणेश की मूर्ति

इमेज स्रोत, Getty Images

'आज़ादी के आंदोलन में अपना एक भी हीरो नहीं'

ये लोग गुलामी को 700 एडी से मानते हैं. 1200 साल की गुलामी मुसलमानों की हुई और फिर अंग्रेज़ों की. अब इसमें ये लोग देखते ही नहीं कि अगर कोई कई पीढ़ी से भारत में रह रहा है तो वो किसी दूसरे मुल्क का राज नहीं माना जाएगा.

इसमें हिंदुस्तान की संपत्ति बाहर थोड़ी गई, जैसा अंग्रेज़ों के शासनकाल में 'ड्रेन ऑफ़ वेल्थ' हुआ था. कई अंग्रेज़ इकोनॉमिस्ट भी इस बात को मानते हैं.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब
इमेज कैप्शन, इतिहासकार इरफ़ान हबीब

ये लोग ब्रिटिश और मुसलमानों शासकों के राज को मिलाकर एक मान रहे हैं. ऐसा करने का मकसद यूं समझिए कि हिंदुस्तान की आज़ादी के आंदोलन में इन लोगों का कोई हाथ नहीं रहा तो इस मामले को बढ़ा दिया जाए कि 1200 साल की गुलामी को 150 साल ही क्यों मानते हो.

ऐसा करने से इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों को दो फ़ायदे होते हैं. एक तो ये है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल तैयार करने में सफल होते हैं.

दूसरा आज़ादी के आंदोलन में अपनी ज़ीरो भूमिका को छिपा दिया जाए. राष्ट्रीय आंदोलन में इनके पास एक अपना हीरो नहीं है. कभी सरदार पटेल को लेते हैं, कभी भगत सिंह को. जबकि भगत सिंह का इनसे क्या वास्ता?

इसलिए ये लोग एक ऐसी कहानी पेश करना चाह रहे हैं, जिसका इतिहास से कोई ताल्लुक न हो.

तिरंगा

इमेज स्रोत, Getty Images

धर्म और कॉर्पोरेट का नारा: फ़ायदे का सौदा?

अगर आप कॉर्पोरेट सेक्टर की बात मान लें और धर्म का नारा दें. ये वोटों के लिहाज़ से तो बहुत अच्छा है.

धर्म से आप मामूली इंसान को पकड़ लेते हैं और कॉर्पोरेट्स की मदद से रुपया मिल जाता है. आप इलेक्ट्रॉल बॉन्ड को देख लीजिए. इसे लाने की ज़रूरत ही क्या थी. अब कंपनियां इलेक्ट्रॉल बॉन्ड खरीद लेंगी और शेयर होल्डर्स को मालूम ही नहीं चलेगा कि कंपनी किसी पार्टी को फंड दे रही है.

ये सब ट्रिक्स हैं. यही इनकी पॉलिसी चल रही है.

नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों का असर छोटे उद्योगों पर ज़्यादा हुआ, बड़े उद्योगों को इससे कोई नुकसान नहीं हुआ. मूडीज़ ने रेटिंग को बीएए3 से बढ़ाकर बीएए2 कर दिया है. इससे ये साबित होता है कि प्राइवेट और कॉर्पोरेट सेक्टर को इन्होंने काफी खुश कर दिया है.

रणवीर सिंह पद्मावती फि़ल्म में

इमेज स्रोत, PADMAVATI FILM TRAILER GRAB

'मुसलमानों के खिलाफ़ बनाई जा रही हैं फ़िल्में'

ज़ाहिर है कि 'पद्मावती' फिल्म काल्पनिक है. लेकिन आप देखेंगे कि इस फ़िल्म का प्रभाव ये है कि मुसलमानों पर हमला किया जाए.

'पद्मावती' में अलाउद्दीन खिलजी को जिस तरह से पेश किया जा रहा है, वो ऐतिहासिक तौर पर बिलकुल प्रमाणित नहीं है. आपको फिल्म बनानी थी तो इतने राजपूत राजा थे, रानियां थीं और कई जंग हुई. लेकिन वो आप नहीं लेते हैं.

'पद्मावती' पर छिड़ी बहस ये भी बताती है कि भारत में आज भी जातिवाद ख़त्म नहीं हुआ है. कहा जा रहा है कि 'राजपूत प्राइड' पर असर हो रहा है. ये राजपूत प्राइड क्या चीज है. एक तरफ आप कहते हैं कि जातिवाद खत्म करना है और दूसरी तरफ ऐसी बातें?

मैं ये देख रहा हूं कि ऐसी फ़िल्में बनाई जा रही हैं, जिनमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भावनाएं भड़काई जा सकें.

(बीबीसी संवाददाता विकास त्रिवेदी से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)