बूंद-बूंद पानी को तरसने वाला क़तर फ़ुटबॉल पिचों के लिए कहां से ला रहा है पानी

फुटबॉल मैदान में खेल रहा एक खिलाड़ी

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इमेज कैप्शन, पानी की क़िल्लत के मामले में क़तर दुनिया के सबसे प्रभावित देशों में शामिल है

रविवार को क़तर के लुसैल स्टेडियम में जब अर्जेंटीना और फ़्रांस के बीच वर्ल्ड कप का फ़ाइनल मुक़ाबला खेला जाएगा, इस स्टेडियम की पिच पर टूर्नामेंट की शुरुआत से 300 टन पानी पड़ चुका होगा.

क़तर के रेगिस्तानी वातावरण में मैदान की घास को खेलने लायक और उसके मौलिक रूप में बनाए रखने के लिए ग्राउंड स्टाफ़ रोज़ाना दस हज़ार लीटर से अधिक पानी का छिड़काव कर रहे हैं.

क़तर में ऐसी दर्जनों पिचें हैं जिनका इस्तेमाल टूर्नामेंट के मैचों और खिलाड़ियों के अभ्यास के लिए किया जा रहा है.

पानी की क़िल्लत के मामले में क़तर दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है. पिचों को गीला और मैदान को हरा भरा रखने के लिए इस विशाल मात्रा में इस्तेमाल किया जा रहा पानी उन चुनौतियों को रेखांकित करता है जो इस टूर्नामेंट का आयोजन करने में क़तर के सामने पेश आ रही हैं.

क़तर को अपनी प्रगति को भी बनाए रखना है और पर्यावरण पर इसके प्रभाव को भी सीमित करना है.

एक रेगिस्तानी देश

वर्ल्ड कप के आठ स्टेडियमों में ग्राउंड स्टाफ़ के सामने जो चुनौतियों हैं वो और भी अधिक मुश्किल हो सकती थीं.

अगर ये वर्ल्ड कप मूल योजना के मुताबिक गर्मियों में खेला जाता. तब प्रत्येक पिच को, जिनमें 136 अभ्यास पिचें भी शामिल हैं रोज़ाना 50 हज़ार लीटर पानी की ज़रूरत होती.

क़तर के मैदनों में पिच तैयार करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि उनके देश के हालात की तुलना में क़तर की चुनौतियां बिलकुल अलग थीं.

आपात स्थिति में ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए क़तर की राजधानी दोहा के उत्तर में 425000 वर्ग मीटर पर इमरजेंसी ग्रास रिज़र्व (आपात स्थिति के लिए घास) उगाई गई थी. इसके लिए रिसायकिल किए गए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. जबकि वर्ल्ड कप के मैचों और अभ्यास पिचों के लिए पानी कृत्रिम तरीक़े से बनाया जा रहा है. ये पानी डीसेलिनेशन (अलवणीकरण) प्रक्रिया के ज़रिए बनाया जा रहा है.

क़तर यूनिवर्सिटी में जल विज्ञान के एसोसिएट प्रोफ़ैसर राधोउयान बिन हमादोउ कहते हैं, "अगर प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पानी पर निर्भर रहा गया होता तो क़तर में सिर्फ़ 14000 लोग ही रह रहे होते."

"इससे वर्ल्ड कप स्टेडियम का एक चौथाई हिस्सा भी नहीं भरता."

क़तर में कोई नदी नहीं है और यहां प्रतिवर्ष 10 सेंटीमीटर से भी कम बारिश होती है.

बढ़ती समस्या

वर्ल्ड कप में मैचों के लिए 8 पिचें हैं जबकि अभ्यास के लिए 136 पिचें हैं

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क़तर में क़रीब 29 लाख लोग रहते हैं. कत़र की आबादी और वहां मौजूद पानी जितने लोगों के लिए उपलब्ध हो सकता है उसमें बड़ा फ़ासला है. ऐसे में क़तर को अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पानी को कहीं और तलाशना पड़ता है.

यूके सेंटर फॉर एन्वायरनमेंट, फिशरीज़ और एक्वाकल्चर साइंस के मध्य पूर्व कार्यक्रम के निदेशक डॉ. विल ले क्वीज़ेन कहते हैं, "ज़रूर के इस पानी की अधिकतर मात्रा डीसेलिनेशन से आती है और घरेलू और व्यक्तिगत इस्तेमाल का लगभग 100 प्रतिशत पानी इसी प्रक्रिया से प्राप्त होता है."

इस प्रक्रिया के तहत समंदर से खारा पानी लिया जाता है, उससे नमक और दूसरी अशुद्धताओं को दूर किया जाता है और फिर ये पानी पीने और कपड़े धोने लायक हो जाता है.

क़तर बड़ी मात्रा में इस प्रक्रिया से पानी बनाता है लेकिन उसे उत्पादन की गति को और तेज़ी से बढ़ाना होगा क्योंक क़तर आगे बढ़ रहा है, विकसित हो रहा है और वह वर्ल्ड कप जैसा और विशाल खेल आयोजन की योजनाएं बना रहा है.

वर्ल्ड कप के दौरान क़रीब दस लाख पर्यटक भी क़तर आए हैं. ऐसे में पानी की खपत लगभग 10 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान ज़ाहिर किया गया है.

लेकिन क़तर के पास समंदर का किनारा होने की वजह से पानी की अनिश्चितकालीन उपलब्धता है और गैस और प्राकृतिक संसाधन तथा वित्तीय संसाधन होने की वजह से उसके पास इस प्रक्रिया से पानी बनाने के लिए ज़रूरी ऊर्जा संसाधन भी है. लेकिन इस प्रक्रिया की एक प्रमुख कमी है- इसमें ऊर्जा की खपत बहुत ज़्यादा होती है.

डॉ. ले क्वीज़ेन कहते हैं, "समूचे खाड़ी क्षेत्र में डीसेलिनेशन के लिए इस्तेमाल होने वाली 99.9 प्रतिशत ऊर्जा हाईड्रोकार्बन ईंधन की सस्ती आपूर्ति से आती है."

लेकिन तेल और गैस जैसे हाइड्रोकार्बन ईंधन बहुत ज़्यादा प्रदूषण करते हैं. लेकिन पर्यावरण को लेकर भी क़तर के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं.

क़तर साल 2030 तक अपने ग्रीनहाउस उत्सर्जन में 25 फ़ीसदी कटौती करने का इरादा रखता है. वर्ल्ड कप की आयोजन समिति ने दावा किया है कि ये वर्ल्ड कप ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन वर्ल्ड कप है.

लेकिन कार्बन मार्केट वाच जैसे पर्यावरण समूह क़तर के इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.

लेकिन एक बात को ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. क़तर अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए वास्तविक बदलाव कर रहा है और जल उत्पादन भी इसमें शामिल है.

हरित गोल

क़तर में घरेलू इस्तेमाल का लगभग सारा पानी डीसेलिनेशन के ज़रिए ही मिलता है

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डॉ. ले क्वीज़ेन कहते हैं, "कई काम चल रहे हैं."

"वो डीसेलिनेशन के लिए सौर ऊर्जा के विकल्प पर काम कर रहे हैं. ये सौर पैनल से बिजली उत्पादित करके इसक इस्तेमाल रिवर्स ओसमोसिस के लिए कर सकते हैं. इसके अलावा सूर्य की सीधी गर्मी का इस्तेमाल पानी को भाप बनाने में किया जा सकता है."

रिवर्स ओसमोस प्रक्रिया में पानी को एक मेंमब्रेन से गुज़ारा जाता है, इससे अशुद्धिया प्रभावी ढंग से दूर हो जाती हैं, जबकि पानी को गर्म करके वाष्पीकरण किया जाता है और फिर उसे कंडेंस किया जाता है. जिससा शुद्ध पानी मिल जाता है और सभी अशुद्धियां दूर हो जाती हैं.

हाल ही में राजनीतिक विवाद के बाद क़तर के पड़ोसियों ने क़तर का बहिष्कार कर दिया था जिसके बाद उसे खाद्य पदार्थों की कमी से जूझना पड़ा था.

इसके बाद से क़तर कृषि और दुग्ध उत्पादन को घरेलू स्तर पर बढ़ावा दे रहा है. सूखी ज़मीन पर कृषि और जानवरों को पालने के तरीकों पर ज़ोर दिया जा रहा है. लेकिन इससे भी क़तर के सीमित प्राकृतिक जल संसाधनों पर और अधिक दबाव ही बढ़ेगा.

डॉ. बे हमादोऊ कहते हैं, "जल संसाधनों का एक तिहाई कृषि में इस्तेमाल होते हैं जबकि क़तर के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि की भूमिका 1 प्रतिशत से भी कम हैं. ये लगभग 0.1 प्रतिशत ही है."

अन्य देशों की तरह क़तर का खाद्य उत्पादन में प्राकृतिक संसाधनों का भारी निवेश आर्थिक फ़ायदे के लिए नहीं है बल्कि क़तर ये सुनिश्चित करना चाहता है कि आपात स्थिति में अपनी आबादी को खाद्य पदार्थ उपलब्ध करा सके.

क़तर के पास ऊर्जा संसाधनों के विशाल भंडार हैं लेकिन वो सौर ऊर्जा में भारी निवेश कर रहा है

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इस क्षेत्र के बाहर रहने वाले लोगों को क़तर की ऊर्जा योजनाएं अजीब लग सकती हैं, लेकिन डॉ. ले क्वीज़ेन कहते हैं कि क़तर के सामने जो चुनौतियां हैं वो अन्य देशों से बहुत अलग नहीं हैं.

"सूखे देशों में आपको पानी की ज़रूरत होती है, सर्द देशों में आपको अपने आपको गर्म रखने की ज़रूरत होती है. ऐसे में हम सभी के सामने अपनी-अपनी चुनौतियां हैं जिनका सामना करना है."

डॉ. बेन हमादोऊ कहते हैं, "मैं इस बात को लेकर आशान्वित हूं कि क़तर और ये क्षेत्र ऊर्जा की बेहद अधिक मांग करने वाली इन प्रक्रियाओं पर पार पाने में कामयाब होंगे. क्योंकि पानी के बिना तो रहा नहीं जा सकता है. "

अफ़वाहें हैं कि क़तर साल 2036 में ओलंपिक खेलों का आयोजन करने का इरादा रखता है, ऐसे में क़तर के सामने और अधिक चुनौतियां होंगी.

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