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असम में बीजेपी सरकार बेदखली अभियान के तहत क्या बंगाली मुसलमानों को बना रही है निशाना?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
असम के ग्वालपाड़ा में 12 जुलाई को बड़े पैमाने पर 'अतिक्रमण' हटाए जाने के बाद 17 जुलाई को पुलिस के साथ झड़प में 19 साल के शौकर अली की मौत हो गई.
इस झड़प में प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ पुलिस के कई जवान भी घायल हुए.
शौकर अली के चाचा माणिक चान का दावा है कि पुलिस की गोली शौकर की गर्दन के पास लगी थी, जिससे उसकी मौत हो गई.
असम के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अखिलेश सिंह का कहना है कि लोगों को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा जिसमें गोलीबारी भी शामिल थी.
इसमें तीन स्थानीय लोगों को गोली लगी. उनमें से एक की मौत हो गई है और दो का इलाज चल रहा है.
बीते एक महीने के दौरान असम के चार ज़िलों में बेदखली अभियान चलाया गया, जहाँ तीन हज़ार से ज़्यादा परिवारों को बेदखल किया गया है.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक़ 2021 में उनकी सरकार के सत्ता में आने के बाद से क़रीब 50 हज़ार लोगों के क़ब्ज़े से 160 वर्ग किलोमीटर ज़मीन छुड़ाई गई है.
स्थानीय लोगों और विपक्ष ने सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और मतदाता सूची से बाहर करने की साज़िश का आरोप लगाया है.
राज्य सरकार ने बेदखली को जनसांख्यिकीय संतुलन से जोड़ा है, जबकि वकीलों ने इसे कोर्ट के आदेश का उल्लंघन बताया है.
ग्वालपाड़ा ज़िले के पाइकन रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में भी यह बेदखली अभियान जारी है. यहाँ 140 हेक्टेयर वन भूमि को ख़ाली कराने की शुरुआत 12 जुलाई को हुई थी.
इस दौरान क़रीब 1,080 परिवारों के घरों पर बुलडोज़र चला दिया गया. हालाँकि, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान किसी तरह की कोई अप्रिय घटना नहीं हुई थी.
कार्रवाई के बाद कई प्रभावित परिवार तिरपाल से बने टेंट में उसी जगह अस्थायी रूप से रह रहे थे.
गुरुवार सुबह जब अधिकारी बुलडोज़र से गिराई गई बस्ती तक पहुँचने वाले मुख्य मार्ग को खोदकर बंद करने की कोशिश कर रहे थे, तभी वहाँ हिंसक झड़प हो गई.
कांग्रेस का आरोप
शौकर अली के जनाज़े में स्थानीय कांग्रेस सांसद रकीबुल हुसैन के साथ मौजूद रहे विधायक अबुल कलाम रशीद आलम ने मीडिया से कहा, "बेदखली स्थल पर भड़की हिंसा के लिए अधिकारी ही ज़िम्मेदार थे. पीड़ितों को न तो खाना दिया गया और न ही रहने के लिए कोई वैकल्पिक ठिकाना दिया गया."
शौकर अली के चाचा माणिक चान ने बीबीसी से कहा, "शौकर की मौत के सदमे के बाद उसकी माँ बीमार पड़ गई है. उनका इलाज चल रहा है. पिता दिल के मरीज़ हैं. आख़िर मेरे भतीजे ने ऐसा क्या अपराध किया था? हम लोगों के घर छीन लिए गए और हम पर ही गोलियाँ चलाई जा रही हैं."
17 जुलाई को हुई हिंसक झड़प के बारे में पुलिस महानिरीक्षक (क़ानून-व्यवस्था) अखिलेश सिंह ने मीडिया को बताया, "वन विभाग और पुलिस की टीम इलाक़े में गश्त कर रही थी, तभी स्थानीय लोगों ने सरकारी ड्यूटी पर तैनात लोगों पर हमला कर दिया. इस हिंसा में 10 सिपाही घायल हो गए और संपत्ति को भी नुक़सान पहुँचा है, जिसका हम जायज़ा ले रहे हैं."
लोगों ने हिंसा के बारे में क्या बताया?
इलाक़े के लोगों ने उस दिन की हिंसा के बारे में अपना पक्ष रखा है.
ग्वालपाड़ा के रहने वाले अनीमुल, हिंसक झड़प वाले दिन की घटना के बारे में कहते हैं, "12 जुलाई को ज़मीन ख़ाली करवाने के बाद कुछ लोग उसी इलाके़ में प्लास्टिक के तंबुओं में अस्थायी तौर पर रह रहे थे. लेकिन प्रशासन ने गुरुवार को उस जगह तक जाने वाली सड़क को जेसीबी से खोद दिया."
"दरअसल, इस बुलडोज़र अभियान के बाद ग़रीब और असहाय पीड़ितों की मदद के लिए कुछ लोग खाने-पीने का सामान पहुँचा रहे थे, लेकिन सड़क खोदने से वहाँ तक पहुँचना मुश्किल हो गया. जब प्रभावित लोगों ने इसका विरोध किया तो माहौल बिगड़ गया. इस बीच पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें शौकर अली नाम के एक युवक की मौत हो गई."
पुलिस ने खाने-पीने का सामान रोकने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
लेकिन वन अधिकारी सनीदेव इंद्रदेव चौधरी ने मीडिया से कहा कि वन विभाग का उद्देश्य बेदखली स्थल तक पहुँचने के लिए एक रास्ते को छोड़कर बाक़ी सभी रास्तों को बंद करना था, ताकि लोगों को वहां आने से रोका जा सके.
वन अधिकारी ने दावा किया कि बेदखली वाली जगह के आस-पास बस्ती के बाहर के लोग भी शिविर लगा रहे थे ताकि वे मुआवज़े का दावा कर सकें.
पिछले एक महीने में धुबरी, लखीमपुर, नलबाड़ी और ग्वालपाड़ा सहित कई ज़िलों में चलाए गए अभियान में तीन हज़ार से अधिक परिवार विस्थापित हुए हैं, जिनमें अधिकांश बांग्ला बोलने वाले मुसलमान हैं.
मतदाताओं की संख्या को क्यों बताया जा रहा है कारण?
राज्य के अलग-अलग ज़िलों में चलाए जा रहे बेदखली अभियान को लेकर कुछ लोग इसे असम के चुनावी क्षेत्रों की जनसंख्या संरचना से जोड़कर देख रहे हैं.
असम की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि राज्य के निचले इलाक़ों में कई विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं, जिससे बीजेपी का चुनावी गणित प्रभावित हो रहा है.
राज्य की राजनीति को चार दशकों से कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी बताते हैं, "निचले असम में मतदाताओं की डेमोग्राफ़ी का संबंध 1976 के चुनावी क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़ा है. उस समय कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों का फ़ायदा लेने के लिए जनसंख्यकीय बदलाव किया था, जिससे राज्य की क़रीब 30 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीतते रहे."
गोस्वामी के मुताबिक़, "अब यही काम मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कर रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी क्षेत्रों में परिसीमन के ज़रिए मुस्लिम निर्णायक सीटों का प्रभाव कम किया गया. फ़िलहाल असम की 126 विधानसभा सीटों में से 102 सीटों पर हिंदू उम्मीदवार प्रभावी हैं, जबकि शेष सीटों पर किसी भी पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवार जीत सकते हैं."
बैकुंठ नाथ गोस्वामी का मानना है कि आगामी चुनावों को देखते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लिए यह समय सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा हटवाने का 'उपयुक्त मौक़ा' है.
उन्होंने कहा, "जो लोग सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किए हुए हैं, वे ज़्यादातर बांग्ला बोलने वाले मुसलमान हैं. इन पर लंबे समय से बांग्लादेशी 'मियां' होने के आरोप लगते रहे हैं. लिहाज़ा, इन्हें हटाने से बीजेपी की हिंदुत्व आधारित राजनीति को मज़बूती मिलती है और चुनाव में ध्रुवीकरण का फ़ायदा होता है."
असम में चल रहे बेदखली अभियान और मतदाताओं की जनसांख्यिकी के मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया कहते हैं, "राज्य में हाल में हुए परिसीमन में इस बात का पता चला था कि कुछ संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की जनसांख्यिकी बदली है. असल में कुछ चुनावी क्षेत्रों को मुसलमान बहुल कर दिया गया था, तो कुछ क्षेत्रों में हिंदू मतदाता ज़्यादा थे. सीएम हिमंत इस बात को इसलिए बोल रहे हैं, क्योंकि परिसीमन के बाद उनको ऐसे काफ़ी तथ्य मिले हैं. लेकिन किसी क्षेत्र में एक विशेष श्रेणी के मतदाताओं की तादाद बढ़ना ग़ैर क़ानूनी बात नहीं है."
पत्रकार ठाकुरिया के अनुसार इस तरह के मतदाताओं की जनसांख्यिकी में सुधार के लिए सरकार को चुनावी सुधार करने की आवश्यकता है, ताकि कई अलग-अलग जगह नाम वाले वोटरों की धांधली को रोका जा सके.
बेदखली अभियान के पीछे मतदाताओं की जनसांख्यिकी को बड़ा कारण मानने के सवाल पर असम बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते है, "सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करना ग़ैर क़ानूनी है. ग्वालपाड़ा में तो लोगों ने संरक्षित वनांचल पर ही कब्ज़ा कर लिया था. कुछ नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए इन लोगों को सरकारी ज़मीन पर बसाते हैं ताकि अपने वोट बैंक को मज़बूत कर सकें.यह केवल मतदाताओं के जनसांख्यिकी का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि इस तरह के अतिक्रमण से पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुँच रहा है. इस तरह ज़मीन के अवैध कब्ज़े से समाज में आक्रोश बढ़ता है. हमारी सरकार अवैध कब्ज़े के ख़िलाफ़ कठोर क़दम उठा रही है."
राज्य में बेदखली अभियान के नाम पर बंगाली मूल के मुसलमानों को निशाना बनाने के सवाल पर बीजेपी नेता गुप्ता कहते है, "कोर्ट के आदेश के बाद सरकारी ज़मीन ख़ाली करवाई जाती है. इसको लेकर जो लोग मुसलमानों को निशाना बनाने की बात कहते हैं, वो दरअसल हमारी पार्टी के ख़िलाफ़ राजनीतिक आरोप लगाते हैं. बीजेपी धर्म और भाषा के नाम पर राजनीति नहीं करती. हमारा मुसलमानों के साथ न कोई झगड़ा है और न ही उनसे कोई ईर्ष्या है. हमारे लिए सभी नागरिक बराबर हैं, लेकिन कांग्रेस के लोग मुसलमानों को भड़काते है ताकि उनका वोट बैंक सुरक्षित रहे."
ग्वालपाड़ा में परिसीमन से पहले दो विधानसभा सीटें थीं, जिन पर मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत होती रही थी. लेकिन अब परिसीमन के बाद इन दो में से एक सीट को अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित कर दिया गया है.
ग्वालपाड़ा में हुए बेदखली अभियान और मतदाताओं की जनसंख्यिकी से जुड़े सवाल पर छात्र नेता अनीमुल ने कहा, "राज्य में परिसीमन मुख्यमंत्री सरमा के कार्यकाल में हुआ. अब वे लगातार कह रहे हैं कि सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने वाले अल्पसंख्यकों की वजह से मतदाताओं की जनसांख्यिकी में बदलाव हुआ है. जबकि ग्वालपाड़ा पश्चिम सीट को एसटी के लिए आरक्षित करने से मुस्लिम बहुल कई गाँव ग्वालपाड़ा पूर्व सीट में शामिल हो गए, जिससे वहाँ मुस्लिम मतदाताओं की तादाद बढ़ गई है."
सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का जवाब
कांग्रेस विधायक अबुल कलाम रशीद आलम ने आरोप लगाया है कि लोगों को मतदाता सूची से हटाने के लिए एक राजनीतिक साज़िश रची जा रही है.
उन्होंने कहा कि पिछले महीने ग्वालपाड़ा पूर्वी विधानसभा क्षेत्र के हसीला बीला गाँव से जिन 660 परिवारों को बेदखल किया गया, वे सभी उनके निर्वाचन क्षेत्र से हैं.
विधायक आलम ने कहा, "प्रशासन के लोगों ने उस सड़क को खोद डाला, जिससे मदद के तौर पर खाना और पानी मुहैया कराया जा रहा था. इस वजह से राहत कार्य ठप हो गया. और जब लोग भड़क गए, तो उन्होंने जान से मारने के लिए गोली चलाई."
इस समय सोशल मीडिया पर बेदखली अभियान और विस्थापित परिवारों की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें महिलाएँ रोते-बिलखते दिखाई दे रही हैं.
पीड़ितों का आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सालों से बसे लोगों के घरों पर बुलडोज़र चलवा दिए.
ग्वालपाड़ा समेत राज्य के अन्य हिस्सों में चलाए गए बेदखली अभियानों की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बताया, "असम में अतिक्रमण की गई 40 हज़ार एकड़ ज़मीन ख़ाली कराई गई है, जो क़रीब 150 वर्ग किलोमीटर के बराबर है. यह चंडीगढ़ के क्षेत्रफल से भी अधिक है."
मुख्यमंत्री का दावा है कि जिन लोगों से ज़मीन खाली कराई गई, वे सभी भूमिहीन नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "इन लोगों के पास एक विशिष्ट क्षेत्र में ज़मीन होती है और वे जंगल की भूमि पर क़ब्ज़ा करने और निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्यिकी को बदलने के लिए एक नए क्षेत्र में चले जाते हैं. अगर हम शुरुआत में ही निचले और मध्य असम में जनसंख्यिकीय आक्रमण को पहचान पाते, तो इसे रोका जा सकता था. लेकिन अब यह बदलाव लगभग अपरिवर्तनीय हो चुका है."
सीएम सरमा ने आगे कहा, "जब हम इन्हें सरकारी ज़मीन से हटाते हैं, तो ये किसी और निर्वाचन क्षेत्र में चले जाते हैं. इस तरह धीरे-धीरे हर क्षेत्र में शिफ़्ट होते रहते हैं और 20 साल बाद उनके 40–45 हज़ार वोट बन जाते हैं."
एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा, "जिन लोगों को हमने बेदखल किया है, हमारे डिप्टी कमिश्नरों ने उनके नाम पहले ही मतदाता सूची से हटा दिए हैं. हमने निचले असम में देखा है कि असमिया लोग पूरी तरह से अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं. क्योंकि हमारे राज्य में नागरिकता 1951 से नहीं, बल्कि 1971 से मानी जाती है."
इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी एक दिवसीय असम यात्रा के दौरान राज्य सरकार के बेदखली अभियानों का मुद्दा उठाया था.
खड़गे ने कहा था कि अगर कांग्रेस अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता में आती है, तो वह गिराए गए घरों का पुनर्निर्माण कराएगी.
मुख्यमंत्री सरमा ने इसके जवाब में कहा कि कांग्रेस नेताओं के भाषणों ने बेदखल परिवारों को 'उकसाया', जिसके बाद हिंसा हुई.
हाई कोर्ट के आदेश की 'अनदेखी' के आरोप
पिछली 10 जुलाई को गुवाहाटी हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद वन विभाग ने पाइकन रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में यह बेदखली अभियान चलाया था.
हालाँकि, गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील एआर भुइयां इस कार्रवाई को बलपूर्वक किया गया बेदखली अभियान बताते हैं.
राज्य में इस तरह के कई बेदखली मामलों में कोर्ट में मुक़दमे लड़ रहे वकील भुइयां ने बीबीसी से कहा, "हमने बलपूर्वक किए गए इस बेदखली अभियान के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. हम चाहते हैं कि जिन अधिकारियों ने हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया है, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो और भूमिहीन पीड़ितों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था की जाए."
वकील भुइयां के अनुसार यह बेदखली अभियान मानवाधिकारों का हनन है और प्रभावित लोगों को हाई कोर्ट के आदेश में उल्लिखित किसी भी सुविधा का लाभ नहीं दिया गया.
दरअसल, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अपने आदेश के सबसे अंतिम पैरा में लिखा है, "अधिकारी उनके पुनर्वास की आगे की व्यवस्था किए जाने तक याचिकाकर्ताओं को वैकल्पिक आश्रय, पर्याप्त भोजन और आवास उपलब्ध कराएँ."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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