सऊदी क्राउन प्रिंस की पीएम मोदी के साथ बैठक, रिश्तों पर क्या होगा असर

पीएम मोदी के साथ जो बाइडन और मोहम्मद बिन सलमान

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जी20 के मंच पर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने जब हाथ मिलाया, तो उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों का हाथ थाम लिया.

तीनों नेताओं की एक साथ हाथ थामे यह तस्वीर कूटनीति के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसके कई मायने निकाले जा रहे हैं.

दरअसल, हाल के वर्षों में पीएम मोदी और क्राउन प्रिंस के बीच जो नज़दीकी बढ़ी है, उसका असर दुनिया के कई बड़े मंचों पर दिखाई दे रहा है.

राजधानी दिल्ली में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन समाप्त हो चुका है. सम्मेलन में शामिल नेता वापस लौट चुके हैं, लेकिन सऊदी के क्राउन प्रिंस अब भी दिल्ली में मौजूद हैं.

वजह है कि क्राउन प्रिंस भारत के राजकीय दौरे पर भी हैं और वे सोमवार को पीएम मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर रहे हैं.

पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने खाड़ी देशों के साथ संबंधों को मज़बूत करने पर विशेष ज़ोर दिया है और इसमें सऊदी अरब की भूमिका सबसे अहम है.

पीएम मोदी साल 2016 और 2019 में दो दफा सऊदी अरब का दौरा कर चुके हैं. उस दौरान भारत-सऊदी अरब के बीच कई अहम मुद्दों पर सहमति बनी और कई समझौते हुए.

मध्य-पूर्व में सऊदी अरब एक बड़ी ताक़त है. खासकर इस्लामिक देशों पर इसका प्रभाव है. कहा जाता है कि पीएम मोदी ने सऊदी अरब से नजदीकी बढ़ाकर पाकिस्तान को किनारा करने की भी काफ़ी हद तक कोशिश की है, जिसका असर भी दिखाई दे रहा है.

2019 में भारत यात्रा के बाद क्राउन प्रिंस का यह दूसरा दौरा है. जानकारों के मुताबिक, इस द्विपक्षीय वार्ता से कई समीकरण बदलने वाले हैं.

भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापार

भारत-सऊदी के बीच व्यापार

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भारत और सऊदी अरब के बीच सालाना व्यापार पाँच हज़ार करोड़ डॉलर से ज़्यादा का है. भारत ने साल 2022-23 में क़रीब एक हज़ार करोड़ डॉलर का निर्यात और क़रीब चार हज़ार डॉलर का सऊदी से आयात किया है. यह व्यापार पिछले पाँच सालों में दोगुना हो गया है.

भारत की 700 से ज़्यादा कंपनियां सऊदी अरब में काम कर रही हैं, जिन्होंने क़रीब 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर की निवेश किया हुआ है. इनमें एलएनटी, टाटा, विप्रो, टीसीएस, शापूरजी जैसे बड़ी कंपनियां शामिल हैं.

वहीं भारत में सऊदी निवेश की बात करें तो यह मार्च 2021 तक 300 करोड़ अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा का था. इसमें सऊदी की अरामको, सबिक, ई-हॉलिडे जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. इतना ही नहीं सऊदी ने फर्स्टक्राइ, ग्रोफर्स, ओला, ओयो, पेटीएम और पॉलिसीबाजार जैसे भारतीय स्टार्ट-अप में बड़े पैमाने पर निवेश किया है.

इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स में सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं, “क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को समाज, कल्चर, राजनीति और आर्थिक तौर पर डायवर्सिफाई कर रहे हैं. वे तेल इकोनॉमी से हटकर मैन्युफैक्चरिंग, पर्यटन और टेक्नॉलजी जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं. ऐसे में उनके सामने भारत एक इमर्जिंग मार्केट है, इसलिए भारत का साथ आना उनके लिए जरूरी है.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 2030 तक भारत की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचाने की बात कर रहे हैं.

ऐसे में दुनिया भारत को एक बड़े बाजार के तौर पर भी देख रही है. इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं, “सऊदी अरब के पास बहुत पैसा है, जिसे वह निवेश करना चाहता है. उसे मालूम है कि भारत उसके लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक है, जहां से भविष्य में अच्छा रिटर्न मिल सकता है.”

सचदेव कहते हैं, “सऊदी अरब नियोम प्रोजेक्ट बना रहा है, जिसका बजट 500 अरब डॉलर (क़रीब 37 लाख करोड़ रुपए) है. इसके लिए वह भारत से टैलेंट और निवेश की मांग कर रहा है. भारत की मदद से एक हाइड्रोजन प्लांट पर वहां काम भी शुरू हो गया है.”

इस प्रोजेक्ट के तहत सऊदी अरब में भविष्य की एक इको-सिटी बसाए जाने की योजना है. इस शहर में सब कुछ पर्यावरण के अनुकूल होगा. यह कच्चा तेल मुक्त सऊदी अरब के 'विजन 2030' का एक हिस्सा है.

यह इको-सिटी विकसित करने वाले डेवलपर्स के मुताबिक यह शहर 26,500 वर्ग किमी (क़रीब इसराइल और फलस्तीन जितना बड़ा इलाका) में फैला होगा. वहीं यहां पर सऊदी अरब की न्यायिक प्रणाली काम नहीं करेगी, बल्कि इस प्रोजेक्ट में निवेश करने वाले इसके लिए ख़ुद स्वायत्त कानूनी व्यवस्था तैयार करेंगे.

सऊदी के क्राउन प्रिंस के साथ पीएम मोदी

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जी20 में क्राउन प्रिंस के साथ पीएम मोदी

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भारत पर भरोसा

सऊदी दशकों से अमेरिका के क़रीबी रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने अपनी विदेश नीति में बदलाव किए हैं.

सीनियर रिसर्च फेलो फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं, “नए तरह का बहुपक्षीय वर्ल्ड ऑर्डर उभर रहा है, जिसमें सऊदी अरब अपने आप को प्लेस कर रहा है. वह प्रो अमेरिका की छवि से दूर जा रहा है और चीन, रूस, भारत, एससीओ, ब्रिक्स जैसी जगहों पर आगे बढ़कर हाथ मिला रहा है.”

वे कहते हैं, “सऊदी नहीं चाहता है कि उसे दुनिया सिर्फ सिर्फ़ तेल बेचने या फिर मक्का, मदीना के चलते इस्लामिक नजरिए से जाने. वह ग्लोबल कम्युनिटी का हिस्सा बनना चाहता है.”

कुछ ऐसी ही बातें रॉबिंद्र सचदेव भी करते हैं. वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में सऊदी अरब, भारत को एक भरोसेमंद दोस्त की तरह देखता है.

वे कहते हैं, “एक नया वर्ल्ड मैट्रिक्स बन रहा है. दुनिया रिकंस्ट्रक्शन में है और इस स्थिति में सऊदी अरब अपने लिए अलग-अलग पार्टनर तलाश रहा है. पहले वो सिर्फ अमेरिका के साथ रहता था, लेकिन मोहम्मद बिन सलमान के आने के बाद से चीजें बदल रही हैं.

सचदेव कहते हैं, “इसी का नतीजा है कि महाराष्ट्र में 4400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ‘वेस्ट कोस्ट रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स प्रोजेक्ट’ लगाने की तैयारी हो रही है, जिसमें सऊदी अरब की अरामको, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी और भारत की इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन मिलकर काम कर रही हैं.”

क्राउन प्रिंस के साथ पीएम मोदी

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एक नए ट्रेड रूट की रूपरेखा

पीएम नरेंद्र मोदी ने शनिवार, 9 सितंबर को दिल्ली में ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ लॉन्च किया है. इस परियोजना में अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ-साथ सऊदी अरब की अहम भूमिका है.

जानकारों का मानना है कि सोमवार को पीएम मोदी के साथ जब क्राउन प्रिंस की मुलाकात होगी, तो इस प्रोजेक्ट के बारे में मुख्य रूप से बात हो सकती है.

इस परियोजना के तहत मध्य पूर्व में स्थित देशों को एक रेल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जिसके बाद उन्हें भारत से एक शिपिंग रूट के माध्यम से लिंक किया जाएगा.

फ़िलहाल भारत या उसके आसपास मौजूद देशों से निकलने वाला सामान जहाजों के जरिए स्वेज नहर से होते हुए भूमध्य सागर पहुंचते हैं, जिसके बाद वे यूरोपीय देशों में एंट्री लेते हैं. वहीं अमेरिका, कनाडा और लैटिन अमेरिकी देशों तक सामान पहुंचाने के लिए जहाजों को भूमध्य सागर से होते हुए अटलांटिक महासागर में प्रवेश करना होता है.

जानकारों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद सामान दुबई से इसराइल में स्थित हाइफ़ा बंदरगाह तक ट्रेन से जा सकता हैं और उसके बाद आसानी से यूरोप में एंट्री पा सकता है. 

सीनियर रिसर्च फेलो फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं, “इस प्रोजेक्ट पर काफ़ी समय से काम चल रहा है. इसे चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना (बीआरआई) को काउंटर करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है.”

बीआरआई प्रोजेक्ट को चीन ऐतिहासिक दौर के सिल्क रूट की तर्ज़ पर बना रहा है. इसके जरिए चीन की योजना ख़ुद को यूरोप और दूसरे देशों से जोड़ने की है.

2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस ऐतिहासिक व्यापार मार्ग को बनाने की शुरुआत की थी. एक दशक के अंदर ही चीन का यह प्रोजेक्ट अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशियानिका तक फैल चुका है. इसके तहत चीन पूरी दुनिया में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश करता है

रॉबिंद्र सचदेव कहते हैं कि ‘इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ की मदद से भारत 'ग्लोबल साउथ' का लीडर बन सकता है और चीन को चुनौती दे सकता है.

सऊदी अरब का भारत के साथ रिश्ता

भारत और सऊदी अरब के बीच सदियों से आर्थिक, सामाजिक और आर्थिक संबंध रहे हैं. 1947 में राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद से दोनों देशों के नेता एक दूसरे के यहां आते-जाते रहे हैं.

पहली बार साल 1955 में सऊदी अरब के राजा सऊद बिन अब्दुल अजीज 17 दिवसीय यात्रा पर भारत आए थे, जिसके एक साल बाद तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने सऊदी अरब का दौरा किया था.

इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी 1982 में सऊदी अरब की यात्रा की और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का काम किया.

दोनों देशों के बीच साल 2006 में राजा अब्दुल्ला की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण क्षण था, जिसके बाद दिल्ली डिक्लेरेशन पर साइन हुए और संबंधों को एक नई गति मिली.

साल 2010 में पीएम मनमोहन सिंह ने भी सऊदी अरब की यात्रा की थी जिसके बाद रियाद डिक्लेयरेशन पर साइन हुए थे, जिसने रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने का काम किया.

2014 में तत्कालीन क्राउन प्रिंस सलमान बिन अब्दुल अजीज अल-सऊद ने भारत की यात्रा की. अगर पीएम मोदी की बात करें तो उन्होंने साल 2016 में रियाद की यात्री की थी और ख़ास बात यह है कि इस यात्रा के दौरान उन्हें किंग सलमान ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा था.

इसके बाद क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जब साल 2019 में भारत की यात्रा की तो उन्होंने देश में दस हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर के निवेश के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे.

इसी दौरान भारत का हज कोटा भी बढ़ाया गया था जिसके बाद अब करीब दो लाख भारतीय सालाना हज यात्रा कर पाते हैं.

नेताओं की यात्राओं के अलावा सऊदी अरब में करीब 2 करोड़ 40 लाख भारतीय रहते हैं, जो वहां का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है जो दोनों देशों को जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

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