डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर इस साल क्यों होगा भारत?

शी जिनपिंग, पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताते हैं, लेकिन भारत की नीतियों के ख़िलाफ़ कई बार बोल भी चुके हैं

देश और दुनिया में कई हलचलों के साथ साल 2024 ख़त्म हो गया, लेकिन किसी भी साल का अंत सिर्फ़ एक तारीख़ का बदलना नहीं होता.

उस साल की घटनाएं और उठापटक आगामी वर्षों तक अपनी छाप छोड़ती हैं. इस वजह से 2024 में जो कुछ भी हुआ उसका असर हमें 2025 में भी दिखाई देगा.

पिछले साल, आधी दुनिया में चुनाव हुए और जिन सरकारों ने सत्ता संभाली या जिन नेताओं को चुना गया, उनके कार्यों का असर 2025 में और स्पष्ट होगा.

इन चुनावों के परिणाम और नई सरकारों के फै़सले न केवल उस देश की राजनीति को प्रभावित करेंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी उनके प्रभाव से कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

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अब सवाल यह है कि भारत में इस साल दिल्ली और बिहार में होने वाले अहम चुनावों या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल पूरे होने के क्या प्रभाव होंगे?

इसके अलावा अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का शासन वापस लौटने पर इसके दुनिया भर में क्या प्रभाव होंगे? भारत के लिए, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में हो रहे घटनाक्रमों के क्या मायने होंगे?

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बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इन सभी सवालों पर चर्चा की.

इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी, कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ स्वस्ति राव, राजनीतिक विश्लेषक जय मृग और लंदन से वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत शामिल हुए.

भारत के लिहाज़ से 2025 में क्या बदलेगा?

पीएम मोदी

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इमेज कैप्शन, दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ़ एक बार यात्रा की है. इसमें एक नाम पाकिस्तान का भी है
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साल 2025 भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साल माना जा रहा है और इसके कई कारण हैं. 2024 में हुए चुनावों ने कुछ ऐसे मुद्दे और घटनाएं सामने रखी हैं, जिनसे आगामी राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा असर पड़ेगा.

इन चुनावों के परिणाम ने राजनीतिक दलों को एक नया रास्ता दिखाया है और अब वे उसी फॉर्मुला पर काम करना चाहते हैं, जो आगामी चुनावों में उनकी स्थिति को मज़बूत कर सके.

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक प्रमुख पहलू है, जो 2024 के चुनावों में सामने आया. ख़ासतौर पर विधानसभा चुनावों में महिलाओं ने काफ़ी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया और राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित किया.

इसका एक बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र में देखा गया, जहां महिलाओं ने एक गेम चेंजर के रूप में उभरकर राजनीति को नई दिशा दी.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने 2025 के संदर्भ में कुछ अहम बिंदुओं पर चर्चा की. उनके मुताबिक़ भाजपा और आरएसएस के बीच रिश्ते पुनः संतुलित होंगे.

उन्होंने कहा, "आरएसएस भाजपा से उतनी खुश नहीं है, लेकिन वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहते जिससे राहुल गांधी और कांग्रेस मज़बूत हो जाएं."

उनके मुताबिक़ 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दलित समुदाय में एक नई ऊर्जा और महिला वोटरों में अलग नज़रिया देखने को मिला है.

यह संकेत देते हैं कि दलित वर्ग अब अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा है और इसका असर आगामी वर्षों में और भी अधिक दिख सकता है.

एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बारे में उन्होंने कहा, "एआई बहुत तेज़ी से बढ़ेगा, जिससे हमारी ज़िंदगी में उथल-पुथल हो सकती है. इसके बारे में हम न तो अभी तक तैयारी कर पाए हैं और न ही इसके असर को ठीक से समझ सके हैं."

कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ स्वस्ति राव ने बताया कि आने वाले समय में भारत को कुछ अहम मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देना होगा.

उन्होंने कहा, "हमारा आर्थिक विकास जो कोविड के समय से अब तक बना हुआ है, उसे बनाए रखने के लिए हमें ठोस क़दम उठाने होंगे. यह हमारी आर्थिक स्थिरता और भविष्य के विकास के लिए बेहद ज़रूरी है."

स्वस्ति राव ने सुरक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव की बात की और कहा, "सुरक्षा मानचित्र बहुत तेज़ी से बदल रहा है. जब हम अपने एयरक्राफ्ट इंजन पर विचार कर रहे थे और यह तय कर रहे थे कि किस इंजन को हम विकसित करेंगे, तब तक चीन ने जेनरेशन-6 लड़ाकू विमान का अनावरण कर दिया. यह वो ही चीन है जो कुछ साल पहले 5 जेनरेशन के विमानों को विकसित करने के चरण में था."

उन्होंने यह भी कहा, "जो फ़ैसले हमें लेने में 30 साल लगते हैं, हमें उन्हें कम समय में लेना पड़ेगा."

राजनीतिक विश्लेषक जय मृग के मुताबिक़, 2025 में एक महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष कौन बनेगा?

जय मृग ने कहा, "जिस तरह से हमने महाराष्ट्र चुनाव में घटनाएं देखीं, उसने हमारी राजनीति के आयाम को बदल दिया है."

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भारत के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियां

पुतिन, पीएम मोदी और शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, साल 2025 भारत के लिए कई चुनौतियां लेकर आने वाला है

रूस-यूक्रेन और इसराइल-हमास युद्ध, पड़ोसी बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन, चीन का बांध, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और अशांति में डूबा मध्य पूर्व.

साल 2025 भारत के लिए कई ऐसी चुनौतियां लेकर आने वाला है, जिन्हें हल करना आसान नहीं होगा.

वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत ने भारत के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा की और कुछ अहम बिंदुओं को उजागर किया है.

वैश्वीकरण से संरक्षणवाद की ओर बढ़ना: शिवकांत के मुताबिक़ एक सबसे बड़ी घटना यह होगी कि दुनिया वैश्वीकरण से संरक्षणवाद की ओर बढ़ेगी और इस प्रक्रिया का नेतृत्व डोनाल्ड ट्रंप करेंगे.

उन्होंने कहा, "दुनिया धीरे-धीरे सैनिक शक्ति के बजाय आर्थिक शक्ति के इस्तेमाल की तरफ़ बढ़ रही है. ट्रंप का अमेरिका सैनिक शक्ति का उपयोग छोड़ने वाला नहीं है, लेकिन वह इसे धौंस के रूप में इस्तेमाल करना चाहेंगे. यह भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि भारत की व्यापार नीति और आर्थिक नीति अभी भी संरक्षणवाद पर केंद्रित हैं."

चीन की बढ़ती ताक़त: दूसरी बड़ी चुनौती चीन की बढ़ती ताक़त है. शिवकांत ने कहा, "भारत को यह समस्या है कि चीन के साथ जो व्यापार है, उसे हम कैसे संतुलित बनाए रखें." उन्होंने यह भी कहा कि सीमा विवाद पर पिछले साल कुछ सकारात्मक क़दम उठाए गए हैं, लेकिन भारत को चीन के साथ क़दम उठाने में बहुत सोच-समझकर आगे बढ़ना होगा क्योंकि चीन पर पूरा भरोसा करना मुश्किल है."

चीन का ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाना: शिवकांत कहते हैं, "एक और महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने जा रहा है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए कई मुसीबतें पैदा कर सकता है. यह भारत के लिए एक और गंभीर समस्या होगी क्योंकि इसका असर पानी की आपूर्ति और पर्यावरण पर पड़ सकता है.

पाकिस्तान का कश्मीर मुद्दा: इस पर शिवकांत कहते हैं, "पाकिस्तान इस साल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता प्राप्त कर रहा है और वह लगातार कश्मीर के मुद्दे को उठाता रहेगा. यह भारत के लिए एक लंबी और निरंतर चुनौती बनी रहेगी, क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा."

दक्षिण एशिया में नेतृत्व की चुनौती: शिवकांत का मानना है, "दक्षिण एशिया में फ़िलहाल कोई मज़बूत नेतृत्व नहीं है और भारत इस स्थिति में है कि वह दक्षिण एशिया का नेतृत्व करे. अगर भारत को रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखना है और चीन के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा बढ़ानी है, तो उसे दक्षिण एशिया के देशों का नेतृत्व करना होगा. हालांकि, यह काम भारत के लिए काफी मुश्किल होगा, क्योंकि दक्षिण एशिया में कई देशों के बीच अलग-अलग हित और असहमति हैं."

ट्रंप के आने से क्या बदलेगा?

डोनाल्ड ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति पद के लिए शपथ ग्रहण समारोह 20 जनवरी को होगा

ट्रंप के दोबारा चुने जाने पर दुनिया भर में बात हो रही है कि उनकी विदेश नीति क्या होगी? भारत के लिए भी यह बात अहम है कि दक्षिण एशिया को ट्रंप किस तरह से हैंडल करते हैं.

ट्रंप की विदेश नीति का दक्षिण एशिया पर कैसा असर पड़ेगा और भारत इसे किस रूप में लेगा.

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताते हैं लेकिन भारत की नीतियों के ख़िलाफ़ कई बार बोल भी चुके हैं.

वरिष्ठ पत्रकार शिवकांत ने डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद संभावित बदलावों पर चर्चा करते हुए कहा, "ट्रंप के आने से यूरोप की समस्याएं और बढ़ने वाली हैं."

"ऐसा लगता नहीं है कि यूरोप का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार चीन और अमेरिका के बीच आपसी व्यापार पर कोई रियायती दर लागू हो पाएगी, जिससे अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद मिले. ट्रंप की व्यापार नीति यूरोप के लिए कठिन हो सकती है."

शिवकांत ने कहा, "इस स्थिति में भारत एक विकल्प के तौर पर उभर सकता है, लेकिन ट्रंप जिस तरह का व्यापार समझौता चाहते हैं, मुझे लगता है कि भारत वह नहीं कर पाएगा. भारत को समावेशी विकास के लिए कुछ रियायतें चाहिए, जिन्हें यूरोप अभी देने के लिए तैयार नहीं है. इसलिए, इस साल यूरोप की स्थिति बेहद पेचीदा होने वाली है और इसका असर युद्ध विराम पर भी पड़ेगा."

उन्होंने कहा, "इसराइल ट्रंप के आने का इंतज़ार कर रहा है क्योंकि वे ट्रंप को मौका देंगे ताकि वह कह सकें, "मैंने आते ही युद्ध विराम करा दिया'. ऐसा इसलिए क्योंकि इसराइल ने जो कुछ भी हासिल करना था, वह पहले ही हासिल कर चुका है."

सीरिया के बारे में शिवकांत ने कहा, "सीरिया उसी राह पर जा सकता है जिस पर वह पहले था. भले ही वहां नई सरकार आ चुकी हो, लेकिन लोग अभी तक इस नई सरकार की प्रकृति और दिशा को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं."

उन्होंने कहा, "इस साल मध्य पूर्व में शांति बनी रह सकती है, लेकिन इसके अलावा, यूरोप में स्थिति अभी भी जटिल बनी रहेगी."

भारत के साथ पड़ोसी देशों के रिश्ते

भारत के पीएम नरेंद्र मोदी, बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस, पाकिस्तान के पीएम शहबाज़ शरीफ़ और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा

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इमेज कैप्शन, भारत के इस साल बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल के साथ रिश्ते चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं

साल 2024 में भारत के ज्यादातर पड़ोसी देशों में राजनीतिक उथल-पुथल मची रही. कई ऐसी घटनाएं हुईं जिससे भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कहीं-कहीं कड़वाहट महसूस की गई.

बांग्लादेश से लेकर मालदीव तक ने भारत को कई मौकों पर मुश्किल में डालने का काम किया. वहीं चीन के साथ सीमा विवाद पर प्रगति भी देखने को मिली.

कूटनीतिक मामलों की विशेषज्ञ स्वस्ति राव ने भारत के पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों पर अपनी राय साझा की और कहा, "जहां तक पड़ोसी देशों की बात है, ये हमेशा भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा रहे हैं."

उन्होंने कहा, "भारत रूस नहीं है कि अगर उसके पड़ोसी देश में सरकारें उसके अनुकूल नहीं बनतीं तो वह उन पर हमला कर दे. हालांकि, हर देश यह चाहता है कि उसके पड़ोसी देश उसके लिए अनुकूल हों."

स्वस्ति राव ने आगे कहा, "चीन की विदेश नीति यह है कि वह एक बहु पोलर दुनिया चाहता है, यानी दुनिया में कई ताकतें हों, लेकिन एशिया में वह एकध्रुवीय सत्ता चाहता है, जिसमें सिर्फ चीन का राज हो. वहीं, भारत न केवल बहु पोलर दुनिया बल्कि बहु पोलर एशिया भी चाहता है, यानी भारत भी एक ताक़त बनकर उभरना चाहता है."

पाकिस्तान और बांग्लादेश के संदर्भ में स्वस्ति राव ने कहा, "एक और समस्या यह है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के मामले में पिछले दस वर्षों में एक भ्रांति फैली हुई है कि अमेरिका सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है. लेकिन ऐसा नहीं है. असल में, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए 90 प्रतिशत से ज़्यादा हथियारों की सप्लाई चीन द्वारा की जाती रही है."

स्वस्ति राव ने बांग्लादेश के हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "बांग्लादेश में जो कुछ हुआ है और 1971 की जो परंपरा है, उसे जिस तरह से मिटाया जा रहा है, वह भारत के लिए बहुत ही चिंताजनक है. भारत को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को दोगुना करने की ज़रूरत है. हम केवल इस पर निर्भर नहीं रह सकते कि हम उन्हें आमंत्रण देंगे और सब कुछ ठीक हो जाएगा."

दिल्ली और बिहार में होने वाले चुनाव

राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल

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इमेज कैप्शन, अरविंद केजरीवाल ने साफ़ कर दिया है कि दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच कोई भी गठबंधन नहीं होगा

दिल्ली विधानसभा चुनाव फरवरी में हो सकते हैं और इसके लिए तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने साफ़ कर दिया है कि वह इस चुनाव में कांग्रेस के साथ कोई भी गठबंधन नहीं करेंगे.

बिहार में भी इस साल चुनाव होने हैं, लेकिन इस बार का चुनाव थोड़ा अलग हो सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार प्रशांत किशोर की नई पार्टी जनसुराज भी इस चुनाव में भाग लेने जा रही है.

ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि जनसुराज पार्टी किस पार्टी को ज़्यादा नुक़सान पहुंचा सकती है.

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर के प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी स्ट्रैटेजी और जनता से जुड़ाव हमेशा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाता है.

  • दिल्ली चुनाव

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने दिल्ली चुनाव के बारे में कहा, "साल 2025 क्षेत्रीय पार्टियों के लिए बहुत अहम होगा. दिल्ली में इस बार खास टक्कर देखने को मिल रही है. भाजपा की स्थिति मज़बूत नज़र आ रही है, लेकिन अगर कांग्रेस 8-9 फीसदी की और बढ़त हासिल करती है तो फिर अरविंद केजरीवाल के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. हालांकि, अगर कांग्रेस अपनी वर्तमान स्थिति पर रहती है तो फिर केजरीवाल के लिए जीत आसान हो जाएगी."

उन्होंने यह भी कहा, "अगर आप दिल्ली की जनता से बात करेंगे तो वह अरविंद केजरीवाल को गरीबों और पिछड़ों का हिमायती मानती है और इसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है."

इस पर राजनीतिक विश्लेषक जय मृग ने दिल्ली चुनाव पर टिप्पणी करते हुए कहा, "2014 से दिल्ली का इतिहास यह बताता है कि यह राज्य हमेशा लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच पलट जाता है. पहले कांग्रेस से टूटे हुए लोग ही नए दल बना पाते थे, लेकिन 2007-08 के बाद फरवरी 2015 में आम आदमी पार्टी का दिल्ली की सत्ता में पूर्ण रूप से आना, यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था. आम आदमी पार्टी की स्थापना से लेकर अब तक यह केवल तीन साल का वक्त रहा है और इसने दिल्ली की राजनीति को एक नई दिशा दी है."

  • बिहार चुनाव

नीरजा चौधरी ने बिहार चुनाव के संदर्भ में कहा, "अगर नीतीश कुमार भाजपा से हाथ मिलाते हैं तो उनकी जीत तय है और अगर वे आरजेडी के साथ जाते हैं, तो भी उनकी जीत होती है. लेकिन अब देखना यह है कि क्या होता है, क्योंकि प्रशांत किशोर अब एक नए तत्व के रूप में सामने आए हैं."

उन्होंने आगे कहा, "बिहार में हुए हालिया उपचुनावों में प्रशांत किशोर ने आरजेडी को अधिक नुकसान पहुंचाया है. अब उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, और यह चुनाव के परिणामों को प्रभावित कर सकता है."

इस पर जय मृग ने बिहार चुनाव पर अपनी राय रखते हुए कहा, "अगर हम प्रशांत किशोर के वोट देखें, तो कुछ जगहों पर अच्छे परिणाम आए हैं. एक दल में उन्होंने केवल डेढ़-दो साल निवेश किया है और उसमें जो नतीजे आए हैं, वे मेरे हिसाब से ख़राब परिणाम नहीं कहे जा सकते."

क्या इंडिया ब्लॉक एक साथ रह पाएगा?

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इस सवाल पर अपनी राय देते हुए कहा, "कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन बाकी राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा. "

"कांग्रेस का संगठन अभी भी कमज़ोर है, जो एक ज़मीनी हकीकत है. इसलिए इंडिया गठबंधन फिलहाल तो एकजुट हो सकता है, लेकिन समय के साथ इस पर चरमराने का खतरा बना रहेगा."

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