मीडिया और राजनीति के बीच मनमोहन सिंह की चुप्पी के पीछे की क्या थी रणनीति?

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साल 2024 के अंत में देश की राजनीतिक दुनिया को एक गहरा झटका लगा, जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की तबीयत बिगड़ी और अस्पताल पहुँचने के कुछ घंटों के भीतर ही उनके निधन की ख़बर आ गई.
डॉक्टर मनमोहन सिंह एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला.
1990 के दशक की शुरुआत में जब उन्होंने उदारीकरण की दिशा की तरफ़ क़दम उठाया तो इसे भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया. उनके निर्णय और नीतियां भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुईं.
2004 से लेकर अगले दस वर्षों तक प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश को न केवल घरेलू बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक नई दिशा दी.

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2008 में वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान उनकी सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता ने भारत को उस चुनौती से बाहर निकाला.
उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश ने कई महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक सुधार देखे, जिनमें से कुछ की आलोचनाएं भी हुईं, उनके कार्यकाल को बिना किसी विवाद के देखा नहीं जा सकता.
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने उनके कार्यकाल, उनके निर्णयों और उनके द्वारा छोड़ी गई विरासत पर चर्चा की.
इस चर्चा में पंकज पचौरी शामिल हुए, जो जनवरी 2012 से आगे के कार्यकाल में डॉक्टर मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे.
'मेरा काम ख़ुद बोलेगा'

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वर्ष 2004 से लेकर 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले मनमोहन सिंह को आर्थिक उदारीकरण के नायक के तौर पर देखा जाता है.
साल 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार में मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया था.
उनकी बनाई नीतियों ने देश में लाइसेंस राज को ख़त्म कर उदारीकरण के ऐसे दरवाजे़ खोले जिसने भारत को न सिर्फ़ गंभीर आर्थिक संकट से बचाया, बल्कि देश की दशा और दिशा दोनों बदल दी.
पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने कहा, "2013 में दिल्ली में प्रेस क्लब को भूमि आवंटित की गई थी, और सरकार के सहयोग से वहां एक नई बिल्डिंग बनानी थी. इसके लिए सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. प्रेस क्लब के प्रतिनिधि हमारे पास आए और उन्होंने अनुरोध किया कि कम से कम इस प्रेस क्लब की नई बिल्डिंग की नींव का पत्थर डॉक्टर मनमोहन सिंह रख दें."
"हम इस प्रस्ताव से ख़ुश हुए और इसे लेकर डॉक्टर साहब के पास गए. उन्हें पूरी जानकारी दी, लेकिन उन्होंने कहा, 'चुनाव क़रीब हैं और मैं प्रेस का पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहता.' इस कारण उनके लिए प्रेस क्लब के साथ काम करना कठिन था, क्योंकि वे हमेशा निष्काम भाव से काम करते थे."
पचौरी बताते हैं कि वास्तव में उन्हें किसी पुरस्कार या सम्मान में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उनका कहना था, 'मैं अपना काम कर रहा हूं, और मेरा काम ख़ुद बोलेगा'.
पंकज पचौरी ने कहा, "उनकी सबसे बड़ी ताक़त यह थी कि वह अलग-अलग विचारधाराओं और हितों को एकजुट करके काम को अंजाम देते थे. यह सबसे महत्वपूर्ण बात है, जो हमें उनसे सीखनी चाहिए."
"चाहे राजनीतिक दल हों, राज्यों की सरकारें हों, या विभिन्न धर्म और संप्रदायों के लोग, उनका हमेशा यह मानना था कि जितने अधिक लोग एक साथ आकर काम करेंगे, उतना ही काम मज़बूत होगा."
आलोचनाओं पर क्या कहते थे?

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2004 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने से इनकार करने के बाद मनमोहन सिंह पीएम बने थे. तब सोनिया गांधी पर उनके विदेशी मूल को लेकर सवाल उठे थे.
कुछ लोगों का ये भी कहना था कि भले ही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाए गए हों, लेकिन असली ताक़त तो सोनिया गांधी के पास है.
इस पर पंकज पचौरी ने कहा, "हम और आप समझते हैं कि एक पार्टी सेना की तरह काम करती है, जहां जो जनरल साहब बोलते हैं, वह सिपाही तक पहुंचता है, लेकिन डॉक्टर मनमोहन सिंह ऐसा नहीं मानते थे."
"कई नीतियों पर उनकी आलोचना हुई, जैसे 'मनरेगा', 'राइट टू फूड', 'राइट टू एजुकेशन' और 'मिड डे मील'. ये सारी योजनाएं आज भी जारी हैं, और इन पर अब ज़्यादा पैसा ख़र्च किया जा रहा है. ये योजनाएं सरकार चलाने के लिए अब और भी महत्वपूर्ण बन गई हैं."
पचौरी बताते हैं, "उस समय मीडिया में उनकी बहुत आलोचना हो रही थी, सिर्फ मीडिया में नहीं, बल्कि अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान कई सवाल उठाए गए. तब वे कहते थे, 'जो मैंने किया है, वह ठीक किया है, और आप लोग उसे समझ नहीं पा रहे हैं. समय ही मुझे सही साबित करेगा'. और इतिहास ने ऐसा किया है. अगर आप पिछले 10 साल का रिकॉर्ड देखें, तो उन योजनाओं को मज़बूती से लागू किया गया."
"हम उन्हें एक आर्थिक उदारवादी अर्थशास्त्री के रूप में देखते हैं, लेकिन उनका दूसरा पहलू यह था कि आर्थिक उदारवाद के जितने फ़ायदे हैं, अगर हम उनका सही तरीके से बंटवारा नहीं करेंगे, तो भारत जैसे देश में समस्याएं पैदा होंगी. इसलिए अगर हम उनके दोनों कार्यकालों को देखें, तो भारत की जीडीपी में पहले जितनी ग्रोथ हुई उतनी बाद में भी नहीं हुई."
कम क्यों बोलते थे मनमोहन सिंह?

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मनमोहन सिंह को आमतौर पर कम बोलने वाले लोगों में शुमार किया जाता था.
इस पर पंकज पचौरी ने बताया, "डॉक्टर मनमोहन सिंह कम बोलते थे क्योंकि वह एक लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति थे. वे लिखे हुए शब्द को अधिक महत्व देते थे, इसलिए उनकी प्रेस रिलीज़ और स्पीच ज़्यादा होती थीं."
वो कहते हैं, "प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए उन्हें मनाना मुश्किल था, लेकिन एक बात थी जो आसानी से हो जाती थी. जब भी संसद सत्र शुरू होता, तो प्रधानमंत्री संसद जाते थे और उस दिन के प्रमुख 3-4 मुद्दों को देखकर, कार से उतरकर सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाकर पत्रकारों से बात करते थे."
उन्होंने बताया, "इसके अलावा, जब भी वे विदेश यात्रा करते थे, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के यात्रा का विश्लेषण किया करते थे. उनका मानना था कि हमें लोगों को बताना चाहिए कि इस यात्रा से हमें क्या हासिल हुआ."
पचौरी बताते हैं, "एक बार उन्होंने 69 मिनट में 62 सवालों के जवाब दिए, जो किसी भी प्रधानमंत्री ने न पहले किया था, न अब किया है."
'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर'
मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने उन्हें लेकर एक किताब भी लिखी थी, जिसका नाम 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' है.
इस पर पंकज पचौरी कहते हैं, "डॉ. मनमोहन सिंह इस किताब 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' पर हंसा करते थे, क्योंकि उनका कहना था कि प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री किसने बनाया? संसद में उनकी पार्टी ने ही उन्हें चुना था."
"इस किताब में कई ऐसी बातें हैं जो निजी बातचीत का उपयोग करके वित्तीय लाभ के लिए लिखी गई थीं, ताकि किताब की बिक्री बढ़े."
पचौरी बताते हैं, "वे इस चीज़ से बहुत आहत हुए थे और उन्होंने साफ कहा, 'मेरी पीठ में छुरा भोंका गया है'."
सोनिया गांधी के साथ कैसे थे रिश्ते?

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डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक अहम सवाल उभरकर सामने आया था कि भले ही पद सिंह के पास हो लेकिन वास्तविक नियंत्रण सोनिया गांधी के पास ही रहेगा. .
यह आरोप उनके कार्यकाल के दौरान बार-बार मीडिया और राजनीतिक दलों द्वारा लगाया जाता था.
इस पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने कहा, "सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह के बीच कोई दरार नहीं थी. दोनों का दृष्टिकोण एक जैसा था और उनका एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट था. एक तरफ डॉ. सिंह उदारवादी, पूंजीवादी, और फ्री मार्केट के पक्षधर थे, जबकि सोनिया गांधी समाजवादी और पुनर्वितरण के पक्ष में थीं."
"यह दोनों दृष्टिकोण एक साथ काम कर रहे थे. सोनिया गांधी एनएसई (नेशनल एडवाइज़री काउंसिल) के माध्यम से अपनी नीतियां लागू करती थीं, जबकि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के ज़रिए अपनी आर्थिक नीतियों को लागू करते थे. यही सहयोग और संतुलन था, जिसकी वजह से 10 साल के भीतर लगभग 26-27 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठने में सफल हुए."
राहुल गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह

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2013 में राहुल गांधी ने 'दांग़ी सांसदों और विधायकों' पर लाए गए यूपीए सरकार के अध्यादेश को 'बेतुका' करार देते हुए कहा था कि इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए.
राहुल गांधी ने उन्हीं की पार्टी की सरकार के होते हुए ये क़दम उठाया, जिसके बाद मीडिया प्रधानमंत्री पद के पावर के बारे में अलग अलग प्रतिक्रिया देने लगा.
इस पर पंकज पचौरी ने कहा, "कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद की स्थिति कमज़ोर हुई, लेकिन जहां तक यह बात है कि राहुल गांधी ने काग़ज़ फाड़ दिया, वह पूरी तरह से सही नहीं है. जो काग़ज़ राहुल गांधी ने फाड़े थे, वह असल में वह काग़ज़ नहीं थे."
पचौरी ने आगे कहा, "राहुल गांधी का सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर अपनी असहमति जताना उनकी खुद की शैली है और इसके बाद उन्होंने 24 घंटे के भीतर माफी भी मांगी."
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के निधन पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लिखा, ''मनमोहन सिंह जी ने बेहद बुद्धिमानी और निष्ठा के साथ भारत का नेतृत्व किया. उनकी विनम्रता और अर्थशास्त्र की गहरी समझ ने पूरे देश को प्रेरित किया. श्रीमती कौर और उनके परिवार के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना. मैंने एक गुरु और मार्गदर्शक खो दिया है. हममें से लाखों लोग उनके प्रशंसक थे. हम पूरे गर्व के साथ उन्हें याद करेंगे.''
पीएम मोदी के बारे में क्या सोचते थे मनमोहन सिंह?

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इस पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने कहा, "उस समय नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी के उम्मीदवार थे, तो स्वाभाविक ही है कि वह उस व्यक्ति पर हमले करेंगे जो उस समय प्रधानमंत्री के पद पर बैठा हुआ था."
पचौरी ने बताया, "डॉ. मनमोहन सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस सवाल का पूरी तरह से जवाब दिया था. उन्होंने कहा कि वह नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत विशेषताओं पर टिप्पणी नहीं करना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में वह विनाशकारी साबित होंगे."
डॉ. मनमोहन सिंह के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर लिखा, ''भारत ने अपने सबसे सम्मानित नेताओं में से एक डॉ. मनमोहन सिंह जी को खो दिया है. साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने एक सम्मानित अर्थशास्त्री के रूप में अपनी पहचान बनाई. उन्होंने वित्त मंत्री सहित सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दीं और हमारी आर्थिक नीति पर गहरी छाप छोड़ी. प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बहुत प्रयास किए.''
उन्होंने लिखा है, ''डॉ. मनमोहन सिंह जी और मेरे बीच नियमित बातचीत होती थी जब वो प्रधानमंत्री थे और मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था. हम शासन से जुड़े कई विषयों पर विस्तार से चर्चा करते थे. उनकी विद्वता और विनम्रता हमेशा नज़र आती थी.''
क्या बेहतर कर सकते थे मनमोहन सिंह?
कौन सी वो चीज़ थी जो डॉ. मनमोहन सिंह के काम को और भी बेहतर बना सकती थी?
इस सवाल पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने कहा, "मैंने आखिरी कार्यक्रम जो मीडिया में किया, वह डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ था और उस समय सरकार के खिलाफ था. उस कार्यक्रम का नाम 'महंगाई मार गई' था, क्योंकि उस वक्त महंगाई अपने चरम पर थी."
पचौरी ने आगे कहा, "आधुनिक गवर्नेंस में यह साफ हो गया है कि बिना संवाद, बिना मीडिया को साथ लिए, या मीडिया को ठीक से प्रबंधित किए बिना, आप एक आधुनिक लोकतांत्रिक सरकार नहीं चला सकते. यह एक गलती थी, जो डॉ. मनमोहन सिंह ने की."
उन्होंने यह भी कहा, "उनकी पुरानी नीतियां अब पर्याप्त नहीं थीं, क्योंकि मीडिया ने उनकी नीतियों के रहते हुए एक आर्थिक सेक्टर का रूप ले लिया था और इसे एक आर्थिक सेक्टर की तरह ही संभालने की ज़रूरत थी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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