अमित शाह के आंबेडकर वाले बयान पर छिड़े विवाद से क्या कांग्रेस कोई फ़ायदा उठा पाई?

राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे हाथों में भीमराव आंबेडकर की तस्वीर पकड़े हुए.

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इमेज कैप्शन, भीमराव आंबेडकर पर गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी के ख़िलाफ़ कांग्रेस ने संसद परिसर में भी प्रदर्शन किया था

"आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता."

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भाषण का ये वही छोटा सा हिस्सा है जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसको लेकर देशभर में विपक्ष हमलावर नज़र आ रहा है.

ज़बरदस्त हंगामे के बीच संसद का शीतकालीन सत्र इस हफ़्ते समाप्त हुआ. संसद सत्र के अंतिम सप्ताह में बीआर आंबेडकर को लेकर गृह मंत्री के इस बयान से ज़बरदस्त हंगामा हुआ.

इससे पहले प्रियंका गांधी के संसद में पहले भाषण से लेकर 'वन नेशन वन इलेक्शन' यानी पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का विधेयक भी चर्चा का विषय रहा.

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अमित शाह ने संसद में संविधान पर चर्चा के दौरान कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि वह केवल आंबेडकर का नाम लेती है लेकिन काम बिल्कुल उलट करती है.

मगर उनके भाषण के पहले हिस्से की क्लिप अगले दिन विपक्ष ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए उसे डॉक्टर आंबेडकर के लिए अपमानजनक बताया और गृह मंत्री से इस्तीफ़े की माँग की.

वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव मात्र कुछ हफ़्तों दूर है ऐसे में विपक्ष ने इसे बड़े मुद्दे के तौर पर उठाया है.

तो क्या बीजेपी इस बयान के बाद बैकफ़ुट पर आ गई है? क्या लोकसभा चुनाव में संविधान परिवर्तन के मुद्दे पर जैसे भाजपा को नुक़सान की बात कही गई, वैसे ही अब फिर चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की तैयारी है?

क्या जितनी तेज़ी से प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे पर ट्वीट किए और गृह मंत्री अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके सफ़ाई दी वो ये दिखाता है कि पार्टी कोई चांस नहीं लेना चाहती?

प्रियंका गांधी का पहला संसद सत्र किस ओर इशारा कर रहा है और वन नेशन वन इलेक्शन पर क्या बीजेपी आगे समर्थन जुटा सकेगी?

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बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा की.

इस चर्चा में शामिल हुईं द ट्रिब्यून की एसोसिएट एडिटर और ब्यूरो ऑफ़ चीफ़ अदिति टंडन और हिंदुस्तान टाइम्स की नेशनल पॉलिटिकल एडिटर सुनेत्रा चौधरी.

अमित शाह के भाषण से बीजेपी को नुक़सान?

 केद्रीय गृह मंत्री अमित शाह

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इमेज कैप्शन, संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संविधान पर चर्चा के दौरान एक लंबे भाषण के छोटे से अंश को लेकर ऐसा हंगामा हुआ कि संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी
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कांग्रेस का कहना है कि अमित शाह ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का अपमान किया है.

वहीं बीजेपी कह रही है कि कांग्रेस नेहरू के ज़माने से ही डॉ. आंबेडकर का अपमान करती आ रही है, बीजेपी ने आंबेडकर का सम्मान किया है और उनकी नीतियों को लागू किया है.

क्या अमित शाह के इस भाषण से भाजपा को नुक़सान हुआ है या सब कुछ पहले जैसा ही है?

इस पर हिंदुस्तान टाइम्स की नेशनल पॉलिटिकल एडिटर सुनेत्रा चौधरी का कहना है कि बीजेपी के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि पार्टी हमेशा प्रो-एक्टिव रहती है, जैसे ही विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे को उठाना शुरू किया, वैसे ही बीजेपी ने सक्रियता दिखाई.

"प्रधानमंत्री ने भी ट्वीट किया और आरोप लगाया कि कांग्रेस इसका ग़लत इस्तेमाल कर रही है. हालांकि, प्रधानमंत्री के ट्वीट में वायरल हो रहे वीडियो क्लिप के बजाय, भाषण का दूसरा हिस्सा था, जिसमें यह संदेश दिया गया कि अगर कुछ वायरल करना है, तो यह हिस्सा वायरल करें."

इस बयान के वायरल होने के बाद कई लोगों का मानना था कि बीजेपी ने इस भाषण से ख़ुद का नुक़सान किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह बीजेपी के लिए सेल्फ़-गोल साबित हुआ?

इस सवाल का जवाब देते हुए सुनेत्रा ने कहा, "यह कभी नहीं देखा गया कि अमित शाह किसी मुद्दे पर सफ़ाई देते हों, लेकिन इस बार उन्होंने शाम को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर के सभी सवालों का जवाब दिया.

"यह दिखाता है कि पार्टी को स्थिति को संभालने के लिए सफ़ाई देनी पड़ी, जो कि आमतौर पर बीजेपी की रणनीति से मेल नहीं खाता है."

सुनेत्रा चौधरी का मानना है कि बीजेपी का बहुत जल्दी प्रतिक्रिया देना उनकी ताक़त है, लेकिन अगर यह स्थिति कांग्रेस के साथ होती, तो उन्हें इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए कुछ दिन लगते.

इस पर द ट्रिब्यून की ब्यूरो चीफ़ अदिति टंडन का कहना है, "मेरे हिसाब से यह सेल्फ़ गोल नहीं है, क्योंकि शीतकालीन सत्र के पहले दिन से ही हमने देखा कि राजनीति में मुद्दों की दिशा तेज़ी से बदली है."

"शीतकालीन सत्र के पहले दिन अदानी का मुद्दा गरम था और विपक्ष ने इसे लेकर पहले तीन दिन तक बहस की. इसके बाद सरकार और विपक्ष ने संविधान अपनाने की 75वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा के लिए एक डिबेट की मांग की, जिसे मंज़ूरी मिल गई."

"फिर अदानी के मुद्दे से बात संविधान तक पहुंची, लेकिन जब डिबेट शुरू हुई तो यह मुद्दा बीआर आंबेडकर तक चला गया और जैसे ही विपक्ष ने इसे उठाया, मुद्दे की दिशा बदल गई."

वो आगे कहती हैं, "इसके बाद, विपक्ष ने अपना प्रदर्शन जारी रखा, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी ने अपनी रणनीति इस तरह बदली कि सभी सांसद मकर द्वार पर एकत्रित हो गए. इस दौरान विपक्ष को शायद यह समझना चाहिए था कि उन्हें बीच में जाने के बजाय, बगल से निकल जाना चाहिए था, क्योंकि इस दौरान मुद्दा फिर से बदल गया."

उनका कहना है कि विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किसी मुद्दे को कितना समय तक बनाए रखते हैं, अगर वे एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे पर जल्दी चले जाते हैं, तो यह कहना मुश्किल हो जाता है कि इसका भाजपा के लिए नुक़सान हुआ है या नहीं.

अदिति टंडन के मुताबिक़, राजनीति में विपक्ष का काम ही है मुद्दे उठाना और इस दौरान अगर सत्तारूढ़ पार्टी थोड़ी सी भी चूक करती है, तो उसे उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है.

कहां चूक रही है कांग्रेस?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल

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इमेज कैप्शन, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन इसके बाद पार्टी की स्थिति में उतनी मज़बूती नहीं दिखाई दी है

लोकसभा में अच्छी वापसी के बाद यह माना जा रहा था कि कांग्रेस फिर से उस जोश के साथ लौट रही है जो कभी पार्टी के पास हुआ करती थी. लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस की राजनीति को फिर से सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है.

कांग्रेस किसी भी मुद्दे को बनाए रखने में कामयाब क्यों नहीं हो पा रही है?

इस पर अदिति टंडन का कहना है, "कांग्रेस और विपक्ष को सबसे पहले यह तय करना होगा कि उनके लिए क्या मुद्दा है."

वो कहती हैं, "जब लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 400 पार का नारा दिया, तो विपक्ष ने यह संदेश देने में सफलता पाई कि बीजेपी संविधान बदलने की कोशिश कर रही है और इसने सत्तारूढ़ पार्टी को कुछ हद तक कमज़ोर किया, जो विपक्ष के लिए बड़ी सफलता थी. लेकिन उसके बाद विपक्ष ने क्या किया, उस सेट नैरेटिव को भी हाथ से निकल जाने दिया."

अदिति टंडन के मुताबिक़, विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन उनकी कमी यह है कि वे किसी मुद्दे को बनाए नहीं रख पाते.

इस पर सुनेत्रा चौधरी का कहना है, "बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, लेकिन जब आपने राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को सुना, तो आपने देखा कि उन्होंने नीला टीशर्ट पहना हुआ था, जो जय भीम के नाम पर था, लेकिन उसमें आंबेडकर के बारे में कोई ख़ास बात नहीं की."

"राहुल गांधी फिर से अदानी के मुद्दे पर ही बात करने लगे. इससे आंबेडकर के समर्थकों को यह संदेश समझ में नहीं आया."

सुनेत्रा के अनुसार, कांग्रेस ने अलग-अलग शहरों में राजभवन जाने की बात की थी, लेकिन इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखाई दी. वहीं अगर बीजेपी होती तो वे इस पर ज़रूर कुछ करती.

इस पर अदिति टंडन कहती हैं कि कांग्रेस का अदानी मुद्दा बार-बार उठाने के बावजूद वह इसे प्रभावी रूप से बनाए नहीं रख पा रही है, क्योंकि यह मुद्दा सभी लोगों के लिए नहीं, बल्कि कुछ विशेष वर्गों के लिए प्रासंगिक है.

"इसलिए, कांग्रेस को अपनी रणनीतिक टीम के साथ मिलकर यह तय करना चाहिए कि वह कौन से मुद्दे उठाएंगे जो व्यापक जनसमर्थन प्राप्त कर सकें."

प्रियंका के संसद में आने से क्या बदला है?

प्रियंका गांधी

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इमेज कैप्शन, प्रियंका गांधी ने अपने पहले संबोधन में बीजेपी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी घेरा और कहा कि पीएम भारत का नहीं आरएसएस का संविधान समझते हैं

केरल की वायनाड लोकसभा सीट से सांसद बनीं कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने 13 दिसंबर 2024, शुक्रवार को लोकसभा में अपने पहले भाषण में संविधान, आरक्षण और जाति जनगणना का मुद्दा उठाया.

संसद में प्रियंका के पहले भाषण से कांग्रेस नेता और उनके भाई राहुल गांधी काफ़ी संतुष्ट दिखे. उन्होंने प्रियंका के भाषण को संसद में दिए गए अपने पहले भाषण से अच्छा बताया.

कई लोगों का मानना है प्रियंका गांधी के आने से विपक्ष में मज़बूती आई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मज़बूती बरक़रार रहेगी?

इस पर अदिति टंडन का कहना है कि प्रियंका गांधी का संविधान पर डिबेट में लीड स्पीकर के रूप में सामने आना बेहद महत्वपूर्ण था.

उन्होंने कहा, "प्रियंका गांधी को देखकर ऐसा लगा जैसे वह अपनी दादी, इंदिरा गांधी की नकल कर रही थीं. उनका पल्लू ओढ़ने का तरीक़ा, उनका चाल-ढाल और उनका अंदाज़ सबकुछ इंदिरा गांधी के रिप्ले जैसा था."

अदिति टंडन के मुताबिक़, प्रियंका गांधी का भाषण छोटा और प्रभावी था, जिसमें उन्होंने भाजपा को सीधा संदेश दिया.

अदिति ने बताया कि जब प्रियंका बोल रही थीं, तो राजनाथ सिंह ने उन्हें सराहनीय इशारा दिया, जो संसद की शक्ति को दर्शाता है. वो कहती हैं, "संसद में हमें यह याद रखना चाहिए कि आप एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन दुश्मन नहीं होते."

इस पर सुनेत्रा चौधरी का कहना है, "जब प्रियंका गांधी ने अपना पहला भाषण दिया, मैं उस दिन संसद में थी. बाहर खड़े होने के दौरान एक भाजपा के मंत्री आए और उन्होंने पूछा कि प्रियंका का भाषण कैसा था. भाजपा को यह अच्छी तरह से पता है कि प्रियंका गांधी नेचुरल पॉलिटिशियन हैं."

सुनेत्रा के मुताबिक़, प्रियंका गांधी का भाषण ऐसा था कि कोई नहीं कह सकता कि यह उनका पहला भाषण था. वो कहती हैं, "राहुल गांधी को ऐसा भाषण देने में काफी समय लगा, लेकिन प्रियंका का आत्मविश्वास पहले ही दिन से स्पष्ट था."

सुनेत्रा कहती हैं, "प्रियंका को अभी तक यह पूरी तरह से नहीं पता कि संसद में उनके मुद्दे और स्टाइल क्या होंगे. वह अभी भी इन्हें तय करने की कोशिश कर रही हैं."

"प्रियंका ने अमित शाह से मिलकर एक सकारात्मक क़दम उठाया, क्योंकि वह उनके सबसे बड़े विरोधी माने जाते हैं और उन्होंने भी प्रियंका को समय दिया जो एक अच्छा संकेत था."

सुनेत्रा ने प्रियंका के दो बैग्स के बारे में कहा, "एक पॉलिटिकल एडिटर के रूप में मैं यह समझ नहीं पा रही कि प्रियंका गांधी के दो बैग्स का क्या संदेश था और वह क्या कहना चाहती हैं."

उनका मानना है कि प्रियंका गांधी के संसद में आने से विपक्षी दलों में नई ऊर्जा आएगी.

राहुल के लिए प्रियंका बनेंगी चुनौती?

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी

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इमेज कैप्शन, राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी के भाषण को संसद में दिए गए अपने पहले भाषण से अच्छा बताया

अदिति टंडन का कहना है, "एक कारण था कि सोनिया गांधी ने प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने में देरी की, यह आसान या अनायास नहीं हुआ था. प्रियंका शुरू से ही राजनीति के लिए तैयार थीं. 20 साल की उम्र से ही वह अमेठी और रायबरेली में अपनी मां के लिए प्रचार करती आ रही थीं, तो यह कहना ग़लत होगा कि वह इसके लिए तैयार नहीं थीं."

"लेकिन परिवार में एक अनकही समझ थी कि राहुल गांधी ही पार्टी को आगे लेकर जाएंगे और कांग्रेस की पूरी लीडरशिप में यह बात स्पष्ट थी."

अदिति का कहना है कि भाजपा प्रियंका और राहुल के बीच को विरोधी दिखाने की कोशिश करेगी, लेकिन जो लोग कांग्रेस को थोड़ा भी समझते हैं, उन्हें यह पता है कि सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका तीनों एकजुट हैं.

"उनके परिवार ने इतना खोया है, इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक, परिवार में इतने दुख देखे हैं कि वे उस दुख के धागों को कभी नहीं तोड़ेंगे."

लेकिन साथ ही अदिति का मानना है कि सत्ता कभी भी किसी को बदल सकती है, लेकिन फ़िलहाल प्रियंका गांधी अपने भाई राहुल के ख़िलाफ़ नहीं जाएंगी.

इस भाषण का दिल्ली चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?

दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी, अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और मंत्री सौरभ भारद्वाज

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इमेज कैप्शन, भीमराव आंबेडकर पर गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी ने भी प्रदर्शन किया है

जब एक ओर संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था, तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की तरफ़ से महिलाओं के लिए योजना और 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों को मुफ़्त इलाज जैसी घोषणाएं की जा रही थीं.

यह घोषणाएं एक तरफ़ तो जनकल्याणकारी योजनाओं के रूप में दिखती हैं, लेकिन जब यह चुनाव से सिर्फ़ 2 महीने पहले की जाती हैं तो यह घबराहट को भी दर्शा सकती हैं.

10 सालों से मज़बूती से सरकार चलाने के बाद इन घोषणाओं को देखें, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह घबराहट का संकेत है या फिर किसी बड़े चुनावी लक्ष्य को हासिल करने के लिए इन योजनाओं को लागू किया जा रहा है.

इस पर सुनेत्रा चौधरी का कहना है, "घबराहट का असर साफ़ दिखाई दे रहा है. मैंने उन लोगों से बात की जो अरविंद केजरीवाल के लिए प्रचार कर रहे थे और उन्होंने बताया कि उन्हें यह समझ में आ गया है कि यहां के लोगों में बहुत गुस्सा है."

"पानी में बदबू आ रही है, सड़कें ठीक से नहीं बनी हैं और लोग जो ज़मीनी स्थिति देख रहे हैं, वो इसी को लेकर नाराज़ हैं."

सुनेत्रा ने आगे कहा, "आम आदमी पार्टी के जिन वोटरों पर ज़्यादा भरोसा किया गया है, वे ग़रीब और पिछड़े लोग हैं. पिछले पांच सालों में उन्हें किसी भी बड़े सुधार का अनुभव नहीं हुआ है, जिस कारण उनकी नाराज़गी और बढ़ी है."

उन्होंने यह भी बताया कि आम आदमी पार्टी का कहना है कि उनके सर्वे में लोगों का ग़ुस्सा विधायकों के ख़िलाफ़ था, न कि अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़.

"यह गुस्सा स्थानीय मुद्दों और विधायकों की विफलता से जुड़ा है. यही कारण है कि अब पार्टी में घबराहट और चिंता का माहौल है."

इस पर द ट्रिब्यून की ब्यूरो चीफ़ अदिति टंडन का कहना है, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि अरविंद केजरीवाल जो राजनीतिक मामलों का सामना कर रहे हैं, वह और उनके बड़े नेता जेल गए, इसके बावजूद उनका जो राजनीतिक नियंत्रण है उन्होंने उसे कभी हाथ से नहीं जाने दिया."

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