सीरिया में क्या अब तुर्की और ईरान एक दूसरे से टकराएंगे?

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इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा है कि सीरिया में बशर अल-असद को सत्ता से बेदख़ल करने और विद्रोही समूहों को सत्ता तक पहुँचाने के पीछे तुर्की है.

ट्रंप ने कहा कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन बहुत ही चालाक और सख़्त हैं. फ्लोरिडा में एक न्यूज़ कॉन्फ़्रेंस में ट्रंप ने कहा कि सीरिया से असद के जाने के बाद तुर्की यहाँ अहम विदेशी ताक़त बनकर उभरा है.

ट्रंप ने कहा कि तुर्की ने सीरिया में एक मुश्किल सत्ता परिवर्तन किया है, जिसमें बहुत लोगों की जान नहीं गई.

पिछले हफ़्ते ही अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा था कि अमेरिका सीरिया के सत्ताधारी विद्रोही गुट हयात तहरीर अल-शम (एचटीएस) के संपर्क में है.

ट्रंप अगले महीने जो बाइडन की जगह लेने जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि ट्रंप ने अर्दोआन को संदेश देने की कोशिश की है. अर्दोआन से ट्रंप के संबंध काफ़ी अस्थिर रहे हैं.

थिंक टैंक फाउंडेशन फोर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसिज के कार्यकारी निदेशक जोनाथन स्कैन्ज़र ने ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा, ''ट्रंप ने एक तरह से सीरिया के नए शासक और उसके साझेदारों को चेतावनी दी है कि सतर्क रहें क्योंकि उनकी नज़र बनी हुई है.''

एचटीएस का तुर्की से जटिल संबंध रहा है. सीरिया में तुर्की का दबदबा बढ़ना और ईरान का कम होना दोनों एक साथ हुआ है.

ईरान का बशर अल-असद से अच्छा संबंध था लेकिन असद को सत्ता ही नहीं सीरिया भी छोड़कर भागना पड़ा. कहा जा रहा है कि अब तक अज़रबैजान में ही तुर्की और ईरान आमने-सामने थे लेकिन अब सीरिया में भी आमने-सामने आ गए हैं.

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इमेज कैप्शन, सीरिया से बशर अल-असद के जाने के बाद तुर्की में रह रहे लाखों सीरियाई शरणार्थी वापस सीरिया लौट रहे हैं

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ट्रंप के आने के बाद ईरान के ख़िलाफ़ सख़्ती बढ़ने की बात कही जा रही है और यह अमेरिका के लिए अच्छा ही है कि सीरिया में नेटो सदस्य तुर्की की पकड़ मज़बूत हो गई है.

लेकिन अर्दोआन नेटो के साथ उस हद तक ही रहते हैं, जब तक उनके हित सधते हैं. यानी अर्दोआन तुर्की के हित के लिए ईरान से टकरा सकते हैं लेकिन अमेरिका के लिए ईरान से शायद ही दुश्मनी मोल लेंगे.

अर्दोआन की ख़्वाहिश रही है कि ऑटोमन साम्राज्य के दौरान तुर्की का आसपास के इलाक़ों में जितना प्रभाव था, वो प्रभाव आज भी रहे.

बशर अल-असद के जाने के बाद सीरिया में तुर्की को दबदबा बढ़ाने का मौक़ा मिला है. ईरान के टिप्पणीकार भी कह रहे हैं कि तुर्की अपना प्रभाव ऑटोमन साम्राज्य की तरह बढ़ाना चाहता है. वहीं कई लोग अर्दोआन को महत्वाकांक्षी बता रहे हैं.

सात दिसंबर को जब बशर अल-असद सत्ता से बाहर हुए तो तुर्की पहला देश था, जिसने स्वागत किया था. तुर्की ने अपने सीनियर अधिकारियों को सीरिया में विद्रोही गुटों के नेताओं से मिलने के लिए भेजा था. तुर्की के इंटेलिजेंस चीफ़ इब्राहिम कालिन और क़तर के ख़ुफ़िया प्रमुख ख़ल्फ़ान अल-काबी पहले विदेशी अधिकारी थे, जो असद की सत्ता जाने के बाद 12 दिसंबर को दमिश्क पहुँचे थे.

ईरानी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जफ़र हक़पनाह ने सुधारवादी अख़बार एतेमाद से 15 दिसंबर को कहा कि सीरिया में तुर्की निर्णायक ताक़त के रूप में उभरा है.

जफ़र हक़पनाह ने एतेमाद को दिए इंटरव्यू में कहा है, ''आपको यह बात दिमाग़ में रखनी चाहिए कि तुर्की के पास ऑटोमन साम्राज्य की विरासत है. तुर्की की जो भौगोलिक स्थिति है, वह भी उसे क्षेत्रीय ताक़त बनने में मदद करती है. सीरिया में तुर्की ने बढ़त हासिल की है लेकिन इसराइल के आने से उसकी चुनौती बढ़ गई है. अमेरिका और यूरोप से भी सीरिया में तुर्की को चुनौती मिलेगी.''

''इराक़ की तरह सीरिया में तेल और गैस नहीं है. ऐसे में सीरिया के निर्माण में पैसे की चुनौती बनी रहेगी. इसराइल सीरिया में अपनी मौजूदगी ज़्यादा मज़बूत करेगा, ऐसे में तुर्की से टकराव बढ़ना लाजिमी है. ज़ाहिर है कि सीरिया में ईरान और तुर्की के हित भी टकराएंगे. सीरिया में तुर्की ईरान की जगह ले सकता है. अब तक दोनों देश अज़रबैजान में ही आमने-सामने थे, अब सीरिया में भी आ सकते हैं.''

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इमेज कैप्शन, तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और बशर अल-अशद के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे

'ऑटोमन साम्राज्य वाली मानसिकता'

पहले विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य का पतन हुआ था और नया तुर्की बना था. अर्दोआन ने कहा था कि सीरियाई शहर एलेप्पो, दमिश्क, इदलिब और रक़्क़ा कभी तुर्की के हिस्सा थे.

पूर्व कंजर्वेटिव सांसद मंसूर हक़ीक़तपुर ने सुधारवादी अख़बार डेली अरमान-ए मेल्ली से 15 दिसंबर को कहा था कि ईरान तुर्की को आसानी से मध्य-पूर्व में दबदबा बढ़ाने की इजाज़त नहीं दे सकता है.

मंसूर ने अरमान-ए मेल्ली से कहा है, ''तुर्की का नव-उस्मानिया गैंग सीरिया में जो कुछ भी हुआ, उससे ख़ुश है. मुझे लगता है कि उन्हें एचटीएस के समर्थन की क़ीमत चुकानी पड़ेगी. तुर्की के दुःसाहस से न केवल इस इलाके़ की सुरक्षा पर ख़तरा बढ़ा है बल्कि इसकी क़ीमत ईरान को भी चुकानी पड़ेगी. तुर्की नेटो का सदस्य है जो हमेशा अमेरिका के इशारे पर चलता है. हालांकि तुर्की की इन नीतियों पर ईरान चुप है. तुर्की का सीरिया में हनीमून ख़त्म होते ही अर्दोआन की असली मुश्किलें शुरू होंगी.''

मंसूर ने कहा, ''विश्व राजनीति की अपनी जटिलताएं हैं. ईरान चाहता है कि इलाक़े में शांति रहे लेकिन यह पड़ोसी देशों के व्यवहार पर भी निर्भर करता है. हम उन्हें व्यवहार ठीक करने का वक़्त देंगे लेकिन मध्य-पूर्व में मनमानी की अनुमति नहीं दे सकते हैं. तुर्की चाहता है कि उस्मानिया सल्तनत वाली सरहद हासिल कर ले.''

''अगर तुर्की का यही व्यवहार जारी रहा तो इस इलाक़े के लोगों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ सकता है. जब इसराइल का फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ अत्याचार चरम पर था, तब भी तुर्की ने इसराइल को तेल और स्टील भेजना बंद नहीं किया. इसराइली सैनिकों के लिए हथियार के निर्माण में तुर्की से निर्यात होने वाले स्टील की अहम भूमिका रही है. तुर्की को इस व्यवहार के लिए कभी माफ़ी नहीं मिलेगी.''

कायहान ईरान का हार्डलाइनर न्यूज़पेपर है. इसने अपने एक विश्लेषण में लिखा है, ''अर्दोआन ने कहा था कि अगर पहले विश्व युद्ध के बाद अलग तरीक़े से सीमांकन होता तो एलेप्पो, दमिश्क, इदलिब और रक़्का तुर्की में होते. अर्दोआन ने ये बातें अपनी पार्टी के एक सम्मेलन में कही थी. अर्दोआन ने इस सम्मेलन में कहा था- तुर्की के विपक्षी नेता पूछते हैं कि हम सीरिया में क्या कर रहे हैं? अब मैं उनसे पूछता हूँ कि पता चला कि हम सीरिया में क्यों थे? उन्हें पता चला कि बशर अल-असद कहाँ हैं?''

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इमेज कैप्शन, अर्दोआन के ख़िलाफ़ ईरान में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं

पिछले हफ़्ते ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह अली ख़ामेनेई ने तुर्की का बिना नाम लिए निशाना साधा था. ख़ामेनेई ने कहा था कि पड़ोसी देश इसराइल और अमेरिका के साथ मिलकर साज़िश रच रहा है. लेकिन तुर्की ईरान का मददगार भी रहा है. जब पश्चिम के प्रतिबंधों के कारण ईरान लाचार रहा, तब तुर्की ज़रूरी सामान ईरान पहुँचाता था.

ईरान और तुर्की के बीच इस साल के पहले दस महीनों में 10 अरब डॉलर का कारोबार हुआ. अगले पाँच सालों में इसे तीन गुना करने की तैयारी है. अगर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है तो कारोबारी संबंध पटरी से उतर सकते हैं.

ईरान के लोगों के लिए तुर्की प्रॉपर्टी में निवेश के लिए पसंदीदा देश है. तुर्की के रीयल एस्टेट में ईरान के लोग तीसरे सबसे बड़े ख़रीदार हैं. दोनों देशों के बीच ये संबंध भी सीरिया के आईने में देखे जाएंगे.

मॉस्को में आरयूडीएन यूनिवर्सिटी में सीनियर लेक्चरर अहमद वखशितेह ने जर्मन प्रसारक डीडब्ल्यू से कहा, ''हाल में जो कुछ भी हुआ, उससे तुर्की की स्थिति मज़बूत हुई है. तुर्की अभी ईरान की मुश्किल स्थिति का फ़ायदा उठा सकता है.''

''तुर्की चाहता है कि ईरान के ज़रिए अज़रबैजान तक लैंड कॉरिडोर बने. इसके लिए तुर्की ईरान पर दबाव डालेगा. लेकिन ईरान को डर है कि अज़बैजान इसका इस्तेमाल आर्मीनिया के ख़िलाफ़ कर सकता है. रूस सीरिया और अज़रबैजान में हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं है. ऐसे में तुर्की का दबदबा बढ़ेगा.''