केरल: बच्चे के सेक्स चेंज के लिए मां-बाप पहुंचे अदालत तो ये मिला आदेश

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से
बिना स्पष्ट जननांग के साथ पैदा हुए शिशु का लिंग क्या मां बाप तय कर सकते हैं?
ये अनोखा सवाल केरल हाईकोर्ट के सामने आया, जहां सामाजिक बहिष्कार के भय से सात साल के एक बच्चे के अभिभावकों ने सेक्स चेंज सर्जरी की अनुमति मांगी है.
अदालत ने अपने फैसले में उनकी मांग ठुकरा दी लेकिन साथ ही इस मामले में विचार करने के लिए एक कमेटी गठित करने का निर्देश दिया.
इस बच्चे के जननांग पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं. बच्चे में क्लिटोरिस का आकार बड़ा है जो पुरुष जननांग जैसा है.
लेकिन बच्चे में गर्भाशय और अंडाशय भी हैं. मूत्राशय और योनि का निकास एक है और यहां से अलग नलिकाएं गर्भाशय और मूत्राशय को जाती हैं.
इसके अलावा बच्चे के क्रोमोसोम्स कैरियोटाइप 46XX हैं जिसका मतलब है कि अनुवांशिक रूप ये 'फ़ीमेल' गुणसूत्र हैं.
तकनीकी रूप से मेडिकल साइंस में इसे ‘कांजेनाइटल एड्रीनल हाइपरप्लेक्सिया’ कहते हैं.
साधारण शब्दों में, ये जननांगों के विकास में एक विकृति है जो 130 करोड़ की आबादी में क़रीब 10 लाख मामले में होती है.

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स्पष्ट क़ानून नहीं
अभिभावक के वकील टीपी साजिद ने बीबीसी हिंदी को बताया, “अभिभावक फल विक्रेता हैं. जन्म के समय ही वे बच्चे का ऑपरेशन कराना चाहते थे. लेकिन दो मेडिकल कॉलेजों तिरुअनंतपुरम और कोझिकोड के डॉक्टरों ने सेक्स चेंज की सर्जरी करने से मना कर दिया और उनसे कहा गया कि ये तभी हो सकता है जब कोर्ट आदेश दे.”
साजिद ने कहा, “हमने अदालत का दरवाज़ा इसलिए खटखटाया क्योंकि अभिभावकों को सामाजिक बहिष्कार का डर था.”
लेकिन एकल पीठ के जस्टिस वीजी अरुण ने कहा, “गैर सहमति वाले सेक्स चेंज सर्जरी कराने की अनुमति मांगी गई है. कैरियोटाइप-46XX की क्रोमोसोम विश्लेषण रिपोर्ट अनुमति देने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि इस गुणसूत्र में किशोरवय तक पुरुष जननांग की तरह विकसित होने की प्रवृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता.”
एमिकस क्यूरी इंदुलेखा जोसेफ़ ने बीबीसी हिंदी को बताया, “भारत में जननांग के पुनर्निर्धारण वाली सर्जरी को लेकर स्पष्ट कानून नहीं है.”
उन्होंने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि अभिभावकों की सहमति को बच्चे की सहमति नहीं माना जा सकता.
ये फैसला एक ट्रांसवुमन के जन्म प्रमाणपत्र से जुड़ा है जो एक पुरुष से विवाह करना चाहती थी.

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सेक्स और जेंडर दो अलग धारणाएं
अपने आदेश में जस्टिस अरुण ने लिखा है कि आम बोलचाल की भाषा में लिंग (जेंडर) और सेक्स को एक मान लिया जाता है लेकिन इंसान की पहचान और जैविकता से जुड़ी दो अलग अलग धारणाएं हैं.
उन्होंने कहा, “सेक्स या लिंग एक व्यक्ति की जैविक विशिष्टता को दर्शाता है, ख़ासकर उनके प्रजनन की शारीरिक संरचना और क्रोमोसोम के संयोजन के संबंध में. जबकि दूसरी तरफ़ जेंडर एक सामाजिक और सांस्कृतिक धारणा है जो महिला पुरुष या थर्ड जेंडर के साथ जुड़ी पहचान, भूमिकाओं, व्यवहार और उम्मीदों को अपने आप में समेटे हुए है.”
एक लेख को कोट करते हुए आदेश कहता है, “चूंकि उभयलिंगी में दोनों लिंग होते हैं, इसलिए वे लैंगिक अंतर से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देते हैं और दोनों लिंगों के साथ रहने की क्षमता होने की वजह से समलैंगिकता का ख़तरा बढ़ जाता है.”
जस्टिस अरुण ने कहा, “जननांग रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की मंज़ूरी देना, भारत के संविधान की धारा 14, 19 और 21 के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है और बिना सहमति के सर्जरी बच्चे की निजता और गरिमा का उल्लंघन है.”
उन्होंने कहा, “अगर किशोरवय में जाने पर बच्चे में एक ख़ास जेंडर की ओर रुझान पैदा होता है, जो सर्जरी जेंडर से अलग है तब इस तरह की सर्जरी की इजाज़त देने से गंभीर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.”
जस्टिस अरुण ने ट्रांसजेंडर पर्संस प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स एक्ट 2019 के अध्ययन के बाद कहा कि जेंडर चुनने का अधिकार उस व्यक्ति के अलावा और किसी के पास नहीं है, यहां तक कि अदालत के भी पास नहीं.

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स्वास्थ्य और मानसिक समस्याएं
इंदुलेखा जोसेफ़ ने कहा कि एक निकास की वजह से ऐसी सर्जरी में कुछ मेडिकल दिक्कतें भी पैदा हो सकती हैं और इससे मूत्राशय और मूत्रनली आदि में संक्रमण हो सकता है.
उनके मुताबिक, “जब बच्चा किशोरवय में प्रवेश करेगा तो ये अतिरिक्त जटिलता पैदा करेगी. लेकिन इस सवाल का जवाब सर्जरी में नहीं है. बच्चा किसी भी जानलेवा ख़तरे के प्रति अतिसंवेदनशील नहीं है.”
वो मानती हैं कि परिवार के सदस्यों या दोस्तों में इस बात की जानकारी की हालत में अभिभावकों और बच्चे पर अत्यधिक दबाव होगा, “लेकिन सामाजिक दबाव से लड़ना फिर भी संभव है, बजाय ऐसी स्थिति पैदा करना कि जब बच्चा बड़ा हो तो उसका सेक्सुअल रुझान उलट हो जाए.”
हालांकि जस्टिस अरुण ने सरकार को एक राज्य स्तरीय, विभिन्न क्षेत्रों के एक्सपर्ट को लेकर एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया है.
इसमें एक पीडियाट्रिशन, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिक सर्जन और चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट होंगे.
यह कमेटी दो महीने के अंदर बच्चे का निरीक्षण करेगी और तय करेगी कि उभयलिंगी होने की वजह से बच्चा किसी जानलेवा ख़तरे का सामना तो नहीं कर रहा है. अगर ऐसा है तो सर्जरी के लिए मंज़ूरी दी जा सकती है.
अदालत ने यह भी कहा कि सरकार तीन महीने के अंदर शिशुओं और बच्चों में सेक्स चेंज सर्जरी को लेकर आदेश जारी करे.
आदेश के अनुसार, “इस बीच, इस तरह की सर्जरी की अनुमति सिर्फ राज्य स्तरीय कमेटी के सुझाव पर ही दी जाएगी, जो यह तय करेगी कि बच्चे या शिशु के जीवन को बचाने के लिए सर्जरी ज़रूरी है.”
याचिकाकर्ता दंपति के दो और बच्चे हैं और दोनों लड़के हैं.
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