सेम सेक्स मैरिज की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर क्या कह रहे हैं समलैंगिक जोड़े

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, .
समलैंगिक विवाह को वैधता देने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समलैंगिक विवाह पर संसद में इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि यह पूरे समाज पर असर डालने वाला विषय है.
इस मामले में अब तक की सुनवाई को एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोग काफ़ी उम्मीद से देख रहे हैं.
अभिषेक आईआईटी दिल्ली में पीएचडी के छात्र हैं और समलैंगिक भी हैं. 28 साल के अभिषेक की डेटिंग ऐप पर मुलाक़ात 28 साल के वकील सूरज तोमर से हुई थी. जान-पहचान और बातचीत का सिलसिला प्यार तक पहुंचा और बीते तीन साल से दोनों एक-दूसरे के साथ हैं.

इमेज स्रोत, Abhishek
इन दोनों को पूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को मान्यता देगी. उनका कहना है, "ऐसा नहीं है कि दो मर्द या दो औरत बच्चों को प्यार नहीं दे सकते हैं. उनका मानना है कि समलैंगिक विवाह क़ानून होने से हम लोगों को सरकारी लाभ मिलेगा जैसे स्वास्थ्य होम लोन इत्यादि."
दोनों का यह भी मानना है कि क़ानूनी प्रावधान नहीं होने के चलते वे शादी नहीं कर पा रहे हैं. इन दोनों का मानना है कि समलैंगिक विवाह उनके लिए फंडामेंटल राइट(मौलिक अधिकार) है और यह उनको मिलना चाहिए.

इमेज स्रोत, Getty Images
समलैंगिक जोड़ों के लिए समाज का डर
नागपुर के सुबोध 30 साल के हैं और पेशे से फ़ैशन डिज़ाइनर हैं. 2011 में उन्होंने अपनी मां को अपने समलैंगिक होने के बारे में बताया. उन्होंने कहा, "डर था कि अपने परिवार से यह सब बात कैसे बताएंगे पर जब परिवार वालों से बताया तो सबने अपना लिया."
उन्होंने यह भी कहा, "जब अनुच्छेद 377 को मंज़ूरी दे दी गई है तो शादी को क्यों नहीं दिया जा रहा, समलैंगिक विवाह को मंज़ूरी मिलने के बाद हमारा कोई शोषण नहीं कर सकता."
बच्चे को गोद लेने की बात पर उन्होंने कहा, "अगर सिंगल पैरंट्स बच्चे को गोद ले सकते हैं तो हम क्यों नहीं जहां बच्चे को एक फ़ादर या एक मदर से प्यार और केयर मिल रहा है. वहां समलैंगिक विवाह के बाद दो फ़ादर और दो मदर से मिलेगा."
हालांकि सुबोध का मानना है कि समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मंज़ूरी मिलने के बाद भी लोगों की सोच बदलने में काफ़ी वक्त लगेगा.

इमेज स्रोत, AFP
समलैंगिक जोड़ों को सरकार से कितनी उम्मीद
लेस्बियन, बाई सेक्सुअल, ट्रांस पर्सन नेटवर्क संस्थान से जुड़ी हुई रितिका कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट हमारी मांगों को संसद में ना भेज कर खुद इस मसले का हल करे. सरकार से हमें कोई उम्मीद नहीं है हमें जो भी उम्मीद है वह सुप्रीम कोर्ट से है क्योंकि अनुच्छेद 377 वाले मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया था."
भारत में समलैंगिक विवाह को मंज़ूरी नहीं मिली तो...
37 साल के अर्थशास्त्री सात्विक यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया से बिज़नेस इकोनॉमिस्ट में पीएचडी कर रहे हैं. उन्होंने भारत को अगस्त 2020 में हमेशा के लिए छोड़ा था.
सात्विक 2007 में अपने मास्टर्स के लिए यूके गए थे 2009 में मास्टर इनका पूरा हुआ उसके बाद वह वही काम करने लगे बाद में यह लंदन छोड़कर भारत आए क्योंकि इन्हें अपने देश की संस्कृति से प्यार था.
लेकिन यहां उन्हें अपने समलैंगिक साथी के साथ रहने में काफ़ी मुश्किलें हुईं.

इमेज स्रोत, Satwik
उनका दावा है कि अपने पार्टनर के साथ रहने के लिए इन्हें घर नहीं मिल रहा था जिससे नाराज़ होकर उन्होंने अपने साथी के साथ देश को छोड़ने का फै़सला किया.
उन्होंने बताया, "हमारा आठ साल का रिलेशनशिप है. हम अभी भी चाहते हैं कि हमारी भारत में शादी हो और यह तभी होगा जब भारत में समलैंगिक विवाह को मंज़ूरी दी जाएगी."
इनका ये भी मानना है कि समलैंगिक विवाह की मान्यता नहीं होने के चलते कई जोड़े देश छोड़ रहे हैं और इससे देश को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
समलैंगिक विवाह की मंज़ूरी न होने पर भी भारत में समलैंगिक विवाह
मौसमी बनर्जी कोलकाता से हैं और उनकी उम्र 35 साल है और वह एक एमएनसी कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे लेस्बियन हैं और उनकी शादी बीते फरवरी महीने में हुई है. उनकी यह शादी कोलकाता के शोभा बाज़ार के परिवार और दोस्तों की उपस्थिति में एक मंदिर में हुई है.

इमेज स्रोत, Mausami Banerjee
उन्होंने बताया, "शादी लीगल ना होने के कारण हम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं. जैसे हर नॉर्मल कपल को जो पूरी सुविधा सरकार द्वारा मुहैया कराई जाती है वैसे ही हम लोगों को भी मिलनी चाहिए. वह अपनी वाइफ़ को कोई भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दे पा रही हैं."
मौसमी कहती हैं, "शादी लीगल होने से हमें सामाजिक सुरक्षा मिलेगी और लोग हमें अलग तरीक़े से नहीं देखेंगे. लोगों की सोच बदलेगी और समाज में हमें बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए."
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















