समलैंगिकों को अगर शादी का अधिकार मिल गया, तो क्या बदलेगा उनके जीवन में

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने वाली याचिका पर अभी सुनवाई चल रही है.
इस सुनवाई के पहले दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पर्सनल लॉ पर विचार किए बिना वो ये देखेगा कि क्या विशेष विवाह क़ानून के ज़रिए समलैंगिकों को अधिकार दिए जा सकते हैं या नहीं.
वहीं याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील मुकुल रोहतगी का कहना था कि समुदाय को मूलभूत अधिकारों के तहत शादी का अधिकार दिया जाना चाहिए, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में दी गई है.
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की बात की जाए, तो इसके ज़रिए अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह को पंजीकृत किया जाता है और मान्यता दी जाती है.

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मीनाक्षी सान्याल समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'सेफो फ़ार इक्ववेलिटी' (Sappho for Equality) की सह-संस्थापक हैं.
उनका कहना है कि वे इसे समलैंगिकों की शादी नहीं, बल्कि 'मैरिज इक्वलिटी राइटस' बोलती हैं. अगर शादी करने का अधिकार है, तो ये सबके लिए होना चाहिए. वे विशेष विवाह अधिनियम के 30 दिनों के नोटिस वाले प्रावधान पर चिंता ज़ाहिर करती है.
कोलकाता से बीबीसी के साथ बातचीत में वे कहती हैं, ''ये मेरी और मेरे पार्टनर की बात नहीं हैं. मैं पिछले दो दशक से एक्टिविस्ट रही हूँ और हमने इतना कुछ अनुभव किया है. अब चाहे किसी का जेंडर और सेक्शुअल ओरिेएंटेशन (किसी के प्रति भावनात्मक, रोमांटिक चाहत होना) कुछ भी हो, हमें ये अधिकार मिलना चाहिए.''
वे सुप्रीम कोर्ट में विशेष विवाह अधिनियम पर की गई टिप्पणी पर कहती हैं, ''क्या इस अधिनियम के 30 दिन के नोटिस पीरियड को हटाया जाएगा? हमने हाल ही में LGBTQ+ समुदायों के अनुभवों को सुना था. उन्हें घर के अंदर अपनी पहचान को लेकर कई तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है. ऐसे में अगर समुदाय के लोग शादी करना चाहते हैं और 30 दिन का नोटिस लगा दिया जाता है और अगर इस दौरान परिवार को पता चल जाता है, तो उनका व्यवहार क्या होगा आप ख़ुद सोचिए.''
हालाँकि गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने 30 दिन के नोटिस पीरियड को 'पितृसत्तात्मक' निजता का हनन और ऐसे कपल की सुरक्षा को लेकर ख़तरा बताया हैं.
-क्या है विशेष विवाह अधिनियम

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दरअसल विशेष विवाह अधिनियम की धारा 5 के मुताबिक़, शादी करने वाले व्यक्ति को सूचना देनी होती है और विवाह अधिकारी के कार्यालय के बाहर एक विशिष्ट स्थान पर शादी के संबंध में नोटिस लगाना होता है.
इस शादी का नोटिस लगने के 30 दिनों के भीतर अगर कोई आपत्ति नहीं करता है, तो विवाह करवा दिया जाता है.
वकील प्रतीक श्रीवास्तव कहते हैं कि विशेष विवाह अधिनियम जेंडर न्यूट्रल नहीं है. इसका सेक्शन 4 सी शादी के लिए लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल की बात करता है. साथ ही इसका सेक्शन 24 और सेक्शन 25 बताता है कि अगर सेक्शन 4 के तहत शादी नहीं होती, तो वो अमान्य हो जाती है.
'हमसफ़र ट्रस्ट' के संस्थापक रह चुके अशोक काक कहते हैं, ''विशेष विवाह अधिनियम में केवल सहमति देने वाले दो भारतीय नागरिकों की बात होनी चाहिए, जो बालिग हैं और वो एक दूसरे से शादी कर सकते हैं. वहीं इसमें मनोचिकित्सकों से ये सर्टिफ़िकेट लिया जा सकता है कि वे शादी करने के लिए फ़िट हैं.''
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दलील दी गई कि क़ानूनी दृष्टि में शादी का अर्थ एक बायोलॉजिकल पुरुष और बायोलॉजिकल महिला के बीच का रिश्ता रहा है.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिला और पुरुष में भेद करने की कोई पुख़्ता अवधारणा नहीं है.
वहीं जानकार कहते हैं कि कोई भी संबंध जो क़ानूनी है, वहाँ अधिकार होते ही हैं.
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली वकील वीना गोडा मुंबई से फ़ोन पर बताती हैं, ''शादी एक ऐसा रिश्ता है, जिसे क़ानूनी मान्यता दी गई है. जो एक रिश्ते को क़ानूनी दायरे में बांध देता है और फिर एक दंपती या स्पाउस (लीगल पार्टनर) के तौर पर स्वीकार्य हो जाते हैं, जो मिलकर एक परिवार बनाते हैं और इसमें सबके अधिकार होते हैं.''
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किस तरह के अधिकार मिलेंगे?
जानकारों का मानना है कि अगर समलैंगिक विवाह को मान्यता मिलती है, तो जिन-जिन कागज़ात में स्पाउस का उल्लेख है, वहाँ उन्हें पूर्ण अधिकार मिलेंगे.
वकील वीना गोडा बताती हैं कि परिवार कई तरह के अधिकारों का लाभार्थी बनाता है, जैसे- पेंशन, इंश्योरेंस, ग्रैच्यूटी, मेडिकल क्लेम आदि.
वकील प्रतीक श्रीवास्तव LGBTQ+ समुदायों के मुद्दों को उठाते रहते है.
वे वीना की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि इंश्योरेंस, ग्रैच्यूटी में नॉमिनी में स्पाउस या लीगल एयर ( ख़ून के रिश्ते) का विकल्प दिया जाता है.
वहीं समलैंगिकों की शादी को स्वीकृति दे दी जाती है, तो उन्हें पेंशन का भी अधिकार मिलेगा, क्योंकि वहाँ नॉमिनी का विकल्प दिया गया है.
अशोक काक बताते हैं कि वित्तीय मामलों में समुदाय को मदद तो मिलेगी, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
वे कहते हैं, ''अगर कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाता है, तो उस व्यक्ति का परिवार, पार्टनर को अस्पताल आने नहीं देता. वहीं समलैंगिक किराए पर घर लेने की कोशिश करते हैं, तो दिक़्क़त आती है.

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भारत में LGBTQ+समुदाय की संख्या करोड़ों में है. वहीं साल 2012 में सरकारी आँकड़ों में इस समुदाय की आबादी 25 लाख बताई गई है.
साल 2020 में आई प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट की मानें, तो कई देशों में समलैंगिकता को लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है. भारत की बात की जाए, तो साल 2014 में ये स्वीकार्यता 15 प्रतिशत थी. वो बढ़कर अब 37 प्रतिशत हो गई है.
वकील सोनाली कड़वासरा कहती हैं कि समलैंगिकों को शादी की मान्यता दी जाती है, तो कई क़ानूनों में भी संशोधन करने होंगे. क्योंकि भारत में कई क़ानून में दंपती का ज़िक्र आता है. ऐसे में कई चुनौतियाँ आ सकती हैं.
वे बताती हैं कि अगर समलैंगिकों की शादी को स्वीकृति मिल जाती है, तो एक तरीक़ा ये हो सकता है कि शादी के रजिस्ट्रेशन के समय वे (समलैंगिक जोड़ा) बता सकते हैं कि पारिवारिक स्वरूप में कौन क्या (पति कौन, पत्नी कौन) ज़िम्मेदारी निभाएगा.
यानी उन्हें कहा जा सकता है कि वो अपने रिश्ते में ख़ुद के बारे में बताएँ.
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क्या चुनौतियाँ पेश आ सकती हैं?
घरेलू हिंसा
सोनाली कड़वासरा के अनुसार, ''अगर घरेलू हिंसा का मामला होता है तो हर महिला को ऐसी हिंसा के ख़िलाफ़ शिकायत करने का अधिकार है. ऐसे में अगर समलैंगिक विवाह में दोनों महिलाएँ हैं, तो दोनों में से कौन घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज करा सकेगा? और अगर दोनों पुरुषों ने विवाह किया है, तो ऐसा मामला आने पर क्या दोनों ही शिकायत दर्ज करा पाएँगे या नहीं? ऐसे में ये सवाल अहम हो जाता है.''
भारत में महिलाओं को घर में होने वाली हिंसा से बचाने के लिए महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 लाया गया था.
इसके बाद, दूसरे मुद्दों की बात की जाए, तो अगर समलैंगिक, शादी के बाद किसी कारणवश तलाक़ लेने का फैसला करते हैं, तो भरण पोषण के लिए कौन ज़िम्मेदार होगा?
भरण पोषण का अधिकार
कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसिजर (CrPC) के सेक्शन 125 के अनुसार, एक शादीशुदा संबंध में पत्नी को पति से भरण पोषण के लिए सहायता लेने का अधिकार दिया गया है.
वहीं क़ानून ये कहता है कि किसी परिवार में बेटे से माता-पिता, शादी के बाद पत्नी या पिता से बच्चे भरण पोषण की मांग कर सकते हैं, लेकिन समलैंगिक विवाह में दोनों में से किसे ये सहायता लेने का अधिकार होगा और कौन इसे देगा या दोनों ही एक-दूसरे से मांग कर सकते हैं?

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गोद लेने का अधिकार
वकील वीना गोडा और सोनाली कड़वासरा के अनुसार, ''क़ानून एकल महिला या पुरुष को बच्चा गोद लेने का अधिकार देता है. वहीं क़ानून ये भी कहता है कि गोद ली जाने वाली बच्ची और पुरुष में 21 साल का फ़र्क होना चाहिए.''
दोनों वकील चुनौती के बारे में बताते हुए कहती हैं, ''ऐसे में ये देखना होगा कि अगर दोनों समलैंगिक महिला हैं और बच्ची गोद लेना चाहती हैं या समलैंगिक पुरुष लड़का गोद लेना चाहते हैं, तो क्या ये अधिकार दिया जाएगा? साथ ही इस परिवार में पिता और माँ की भूमिका में कौन होगा?''
क़ानून ये कहता है कि कोई दंपती (पति-पत्नी) दो साल तक स्थायी शादी में हैं, तो उन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार मिल सकता है.
वहीं नेशनल कमिशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये बच्चों के कल्याण के ख़िलाफ़ होगा और उनके विकास पर इसका प्रभाव पड़ेगा.
बच्चे की कस्टडी
क़ानून के अनुसार, पाँच साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी का अधिकार माँ को मिलता है. ऐसे में अगर समलैंगिक शादी में तलाक़ का मामला सामने आता है, तो किसे बच्चे की कस्टडी लेने का अधिकार मिलेगा.
क़ानून में बच्चे का वेलफ़ेयर या कल्याण सर्वोपरि माना गया है. ऐसे में इस शादी में किसके अधिकार को ज़्यादा तरजीह दी जाएगी.
संपत्ति का अधिकार
क़ानून में परिवार की परिभाषा बताई गई है. किसी व्यक्ति का पैतृक और पिता द्वारा अर्जित संपत्ति में अधिकार होता है.
अगर अभिभावक अपनी संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करते हैं, तो व्यक्ति को कोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती देनी होगी.
अगर वसीयत दस्तावेज़ नहीं होता है, तो उस सूरत में भारतीय विरासत क़ानून या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की मदद ली जाती है.
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के मुताबिक़, मृत्यु का प्रमाण पत्र जारी होने के बाद संपत्ति का क़ानूनी उत्तराधिकारियों के बीच बराबर-बराबर हिस्से में बँटवारा होता है.
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