मंदिर-मस्जिद विवाद के बारे में आरएसएस चीफ़ मोहन भागवत क्या बोले?

इमेज स्रोत, Getty Images
"मंदिर-मस्जिद के रोज़ नए विवाद निकालकर कोई नेता बनना चाहता है तो ऐसा नहीं होना चाहिए, हमें दुनिया को दिखाना है कि हम एक साथ रह सकते हैं."
ये बातें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को पुणे में 'हिंदू सेवा महोत्सव' के उद्घाटन के दौरान कहीं. इसके अलावा भी भागवत ने कई अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी है.
भागवत के भाषण की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि इस वक्त देश में संभल, मथुरा, काशी जैसे कई जगहों की मस्जिदों के प्राचीन समय में मंदिर होने के दावे किए गए हैं. इनके सर्वे की मांग हो रही है और कुछ मामले अदालतों में लंबित हैं.
भागवत ने कहा, "हमारे यहां हमारी ही बातें सही, बाक़ी सब ग़लत, यह चलेगा नहीं... अलग-अलग मुद्दे रहे तब भी हम सब मिलजुल कर रहेंगे. हमारी वजह से दूसरों को तकलीफ़ न हो इस बात का ख्याल रखेंगे. जितनी श्रद्धा मेरी मेरी ख़ुद की बातों में है, उतनी श्रद्धा मेरी दूसरों की बातों में भी रहनी चाहिए."

उन्होंने कहा कि हर धर्म और दूसरे के देवी-देवताओं (अराध्य) का सम्मान करना चाहिए.
भागवत ने ये भी कहा कि रामकृष्ण मिशन में आज भी 25 दिसंबर (बड़ा दिन) मनाते हैं, क्योंकि यह हम कर सकते हैं, क्योंकि हम हिंदू हैं और हम दुनिया में सब के साथ मिलजुल कर रह रहे हैं. यह सौहार्द अगर दुनिया को चाहिए तो उन्हें अपने देश में यह मॉडल लाना होगा.
भागवत की बात पर आई प्रतिक्रियाएं
अयोध्या में राम मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने मोहन भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया दी है.
उनका कहना है, "मंदिर और मस्जिद का संघर्ष एक सांप्रदायिक मुद्दा है और जिस तरह से ये मुद्दे उठ रहे हैं, कुछ लोग नेता बनते जा रहे हैं. अगर नेता बनना ही इसका मक़सद है तो इस तरह का संघर्ष उचित नहीं है. लोग महज़ नेता बनने के लिए इस तरह के संघर्ष शुरू कर रहे हैं, तो यह सही नहीं है."
वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी भागवत के कहे का हवाला देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा है, "आरएसएस चीफ़ मोहन भागवत कहते हैं कि कौन अल्पसंख्यक है और कौन बहुसंख्यक? यहां सब बराबर हैं. इस देश की रीत ये रही है कि यहां सब अपनी मर्ज़ी से पूजा अर्चना कर सकते हैं. हमें सिर्फ़ सौहार्द से रहने और क़ानून का पालन करने की ज़रूरत है."
शशि थरूर ने लिखा है कि वह ख़ुद भी इससे बेहतर बयां नहीं कर सकते थे. साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई है कि बाकी संघ परिवार भागवत के बयान पर ध्यान देगा.
कांग्रेस के ही एक और सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत को ये रचनात्मक सलाह उन लोगों को देनी चाहिए जो संविधान का अपमान कर रहे हैं ताकि देश में शांति और समृद्धि बनी रहे.

इमेज स्रोत, Getty Images
मोहन भागवन ने हाल के समय में देश के कई इलाक़ों में उठ रहे मंदिर और मस्जिद के विवाद पर भी बोला है.
हाल के दिनों में राजस्थान के अजमेर शरीफ़ दरगाह से जुड़ा विवाद और संभल में एक मस्जिद से जुड़े ऐसे ही विवाद की काफ़ी चर्चा हुई है.
अजमेर की एक स्थानीय अदालत ने अजमेर शरीफ़ दरगाह के नीचे 'मंदिर' का दावा करने वाली याचिका को हाल ही में स्वीकार कर लिया था.
जबकि दरगाह से कुछ ही दूरी पर स्थित 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' को लेकर अजमेर के डिप्टी मेयर ने दावा किया है कि इसकी जगह पहले 'मंदिर और कॉलेज' था.
कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद के बारे में भी इसी तरह का दावा किया गया था और ज़िला अदालत ने मामले में सर्वे का आदेश दिया था.
सर्वे के दिन ही संभल में हिंसा भी भड़की थी, जिसमें पुलिस ने चार लोगों की मौत की पुष्टि की थी.
मोहन भागवत ने कहा है कि अब श्रद्धा स्थल के आदर की बात आती है तो राम मंदिर होना चाहिए. वो बना भी. वह हिंदुओं का श्रद्धा स्थान है. वो आगे कहते हैं कि ऐसा सोच कर बार-बार दुश्मनी के लिए ऐसे ही प्रकरण निकालने से कोई नेता नहीं बन सकता. ये नहीं होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि आखिरकार हमें दुनिया को दिखाना है कि हम एक साथ रह सकते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
औरंगज़ेब का ज़िक्र
मोहन भागवत ने कहा कि अभी अपना देश संविधान के मुताबिक़ चलता है. यहां पर किसी का राज नहीं चलता. जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है. जो चुनकर आएगा, वह शासन चलाएगा. शासन जनता का होता है.
भागवत ने ये भी कहा, "अब वर्चस्व का ज़माना ख़त्म हो गया है. आपको यह बात समझनी चाहिए और यह सब पुरानी लड़ाइयां हैं. इन लड़ाइयों को भूलकर हमें सबको संभालना चाहिए."
भागवत ने भाषण में कहा है कि भारत में सभी को एक साथ रहना चाहिए और यही भारत की संस्कृति सिखाती है.
उन्होंने आगे कहा है, "लेकिन समय-समय पर इसमें भी अवरोध पैदा किए गए. आख़िरी बार औरंगज़ेब ने यह अवरोध पैदा किया था. उसके बाद फिर एक बार कट्टरवाद का राज आया."
भागवत ने कहा कि साल 1857 में दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने जब गौहत्या बंदी का आदेश निकाला और दावा किया कि उस वक़्त एक मौलवी और एक संत के प्रयासों के बाद तय हुआ था कि राम मंदिर हिंदुओं को देंगे.
संघ प्रमुख ने कहा, "आज़ाद भारत में हम सबको रहना है, ऐसा सब ने कहा तो फिर अब यह अलग-अलग बातें क्यों होती हैं. यहां वर्चस्व की भाषा क्यों होती है. कौन अल्पसंख्यक और कौन बहुसंख्यक, सब एक जैसे ही हैं."
"इस देश की परंपरा ही ऐसी है. बस आपस में अच्छे से रहो नियम-कानून मानकर चलते रहो. इसलिए इस वर्चस्ववाद,कट्टरवाद को भूलकर हम सबको भारत की समावेशी संस्कृति के तहत एकजुट हो जाना चाहिए...जो डराते हैं उनको डर लगे, इतना सशक्त हो जाओ...पर किसी को डराओ मत."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















