पायल कपाड़िया की फ़िल्म को कान फ़िल्म समारोह में मिला ज्यूरी अवॉर्ड

फ़िल्म समकालीन मुंबई शहर के दृश्यों से शुरू होती है

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भारतीय फ़िल्म निर्माता पायल कपाड़िया की नई फ़िल्म 'ऑल वी इमेजिन एज़ लाइट' को कान फ़िल्म समारोह में ज्यूरी अवॉर्ड मिला है.

बीते तीन दशकों में भारत की यह पहली फ़िल्म है जिसने कान फिल्म समारोह की मुख्य प्रतिद्वंदी श्रेणी में अवॉर्ड जीता है. यह कान फिल्म समारोह का दूसरा सबसे बड़ा अवार्ड है.

यह फ़िल्म समकालीन मुंबई शहर के दृश्यों से शुरू होती है लेकिन हमें बॉलीवुड सितारों और अरबपति उद्योगपतियों की अमीर, कुलीन मुंबई को नहीं दिखाती है.

फ़िल्म निर्माता ने मुंबई शहर की गलियों के साथ यहां के प्रवासियों की वास्तविक आवाज़ों को जगह दी है. वो प्रवासी जो इस शहर की धड़कन भी हैं.

ये कपाड़िया की पहली नैरेटिव फ़ीचर फ़िल्म है, जो गुरुवार रात को कान फ़िल्म समारोह के मुख्य कॉम्पिटीशन सेक्शन में प्रदर्शित हुई. फ़िल्म जब ख़त्म हुई तो आठ मिनट तक यहां मौजूद दर्शक खड़े होकर तालियां बजाते रहे.

पायल कपाड़िया

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इमेज कैप्शन, पायल कपाड़िया

ये ना सिर्फ़ फ़िल्म निर्माता बल्कि भारत के लिए भी एक अहम उपलब्धि है. बीते तीस सालों में ये पहली बार है जब कान फ़िल्म समारोह के मुख्य कॉम्पिटीशन सेक्शन में कोई भारतीय फ़िल्म प्रदर्शित हुई हैं.

इस फ़िल्म ने 38 वर्षीय निर्देशिका पायल कपाड़िया को भी सुर्ख़ियों में ला दिया है.

भारतीय फ़िल्मों को अंतरारष्ट्रीय पुरस्कार

द गार्डियन ने फ़िल्म को फ़ाइव स्टार
इमेज कैप्शन, द गार्डियन ने फ़िल्म को फ़ाइव स्टार दिए हैं.

इस पुरस्कार के साथ ही कपाड़िया फ्रांसिस, फ़ोर्ड कोपोला, योर्गोस लैंथिमोस, अली अब्बास, जैक्स ऑडियार्ड और जिया झांगके जैसे निर्देशकों की क़तार में शामिल हो गई हैं.

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बीते चार दशकों में भारतीय फ़िल्मों ने अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में ठीकठाक प्रदर्शन किया है.

1988 कान फ़िल्म समारोह में मीरा नायर की सलाम बॉम्बे ने 'कैमरा डी’ओर' पुरस्कार जीता था. साल 2001 में 11 सितंबर को हुए हमलों से कुछ दिन पहले ही मीरा नायर की मॉनसून वेडिंग ने वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'द गोल्डन लॉयन' पुरस्कार जीता था.

निर्देशक रितेश बत्रा की 2013 में आई चर्चित फ़िल्म द लंचबॉक्स ने कान समारोह में ‘ग्रैंड गोल्डन रेल अवॉर्ड’ जीता था. इसी साल सनडांस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में शुचि तलाती की 'गर्ल विल बी गर्ल्स' ने ग्रैंड जूरी एंड ऑडियंस प्राइज़ अपने नाम किया था.

लेकन कान में 'पाम डी’ओर' या इस फ़िल्म फ़ेस्टिवल के अन्य मुख्य पुरस्कारों में से एक के जीतने की संभावना अभी तक दुनिया में सर्वाधिक फ़िल्म बनाने वाले भारतीय फ़िल्म उद्योग से दूर ही रही है.

लेकिन इस साल, कपाड़िया की इस ख़ूबसूरत और प्रभावशाली फ़िल्म ने भारत के लिए ये प्रतिष्ठित पुरस्कार जीतने की उम्मीद पैदा कर दी है.

अभी तक फ़िल्म को मिली समीक्षाएं तारीफ़ों से भरी हैं.

द गार्डियन ने फ़िल्म को फ़ाइव स्टार देते हुए इसे, ‘शानदार…. मानवता से भरी हुई एक दिलचस्प’ फ़िल्म बताया है. आलोचकों ने इस फ़िल्म को सत्यजीत रे की महानगर और अरण्य दिन-रात्रि के बराबर रखा है.

वहीं इंडी-वायर ने अपनी ए-ग्रेड समीक्षा में कहा है कि कपाड़िया की ये ड्रामा फ़िल्म मुंबई को एक रोमांटिक नज़रिया देती है, जो ‘लोग किन तरीकों से इस शहर में अपनी जगह को भरते हैं…भले ही अकेले या किसी के साथ’ से प्रतिबिंबित होता है.

दो नर्सों की कहानी

पायल कपाड़िया

पायल कपाड़िया चर्चित कलाकार नलिनी मलानी की बेटी हैं और मुंबई शहर, इसकी विविधता और बहु-संस्कृति से भलीभांति परिचित हैं.

कपाड़िया कहती हैं, "मुंबई एक ऐसी जगह भी है जहां दूसरी जगहों की तुलना में महिलाओं के लिए काम करना कुछ आसान है."

"मैं ऐसी महिलाओं के बारे में फ़िल्म बनाना चाहती थी जो अपना घर छोड़कर किसी और जगह पर काम करने जाती हैं."

‘इन ऑल वी नो एज़ लाइट’ फ़िल्म में कपाड़िया ने केरल से आकर मुंबई शहर के अस्पताल में काम कर रहीं और यहां एक छोटे और भीड़ से भरे अपार्टमेंट में एक साथ रह रहीं दो नर्सों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को दर्शाया है.

एक नर्स- प्रभा (कानी कुसरूती, जिन्होंने गर्ल्स विल बी गर्ल्स में भी सहयोगी भूमिका निभाई हैं) शादीशुदा हैं. उनका पति अब जर्मनी में रहता है और उनसे कभी-कभी ही बात करता है. लेकिन फिर अचानक एक दिन उन्हें अपने पति से सरप्राइज़ गिफ़्ट में राइस कुकर मिलता है. वो इस कुकर को ऐसे गले लगा लेती हैं जैसे ये उनकी शादी में प्यार की आख़िरी निशानी हो.

दूसरी नर्स- अनु (दिव्या प्रभा) थोड़ा अधिक साहसी हैं, वो एक युवा मुसलमान पुरुष शियाज़ (हृदु हारून) के साथ रोमांस कर रही हैं, जो केरल से ही है.

अनु हिंदू हैं और उनका परिवार शियाज़ के साथ उनके रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा.

2.2 करोड़ की घनी आबादी वाला मुंबई शहर जहां हर कोई अपनी जगह तलाशने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में भीड़भाड़ वाले और सख़्त मॉनसून के माहौल में अनु और शियाज़ को कोई निजी जगह नहीं मिल पाती है.

लेकिन इसी बीच अचानक उनके अस्पताल में काम करने वाली एक तीसरी नर्स- पार्वती (ये किरदार इस साल कान में दो फ़िल्मों में दिख रहीं छाया कदम ने निभाया है)- शहर छोड़ने का फ़ैसला करती है. वो जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि जिस झुग्गी में वो रह रही हैं उसे शहर के अमीरों के लिए हो रहे पुनर्विकास के लिए हटाया जा रहा है.

'ए नाइट ऑफ़ नोइंग नथिंग'

फिल्म को मिल सकता कान में पुरस्कार

क्या ये इन किरदारों की ज़िंदगी को बदलने का मौका हो सकता है?

जगह के लिए मशक्कत की राजनीति, कपाड़िया की छात्रों के संघर्ष पर बनीं पिछली फ़िल्म- ए नाइट ऑफ़ नोइंग नथिंग- से अलग नहीं हैं.

इस फ़िल्म को साल 2022 में डायरेक्टर्स फोर्टनाइट साइडबार सेक्शन में प्रदर्शित किया गया था. इस फ़िल्म ने कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल का शीर्ष डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म अवॉर्ड ‘गोल्डन आई’ जीता था.

'ए नाइट ऑफ़ नोइंग नथिंग' में देश के प्रतिष्ठित फ़िल्म एवं टेलिविज़न इंस्टीट्यूट पुणे में साल 2015 में हुई छात्रों की हड़ताल को दिखाया गया था. कपाड़िया भी इस हड़ताल का हिस्सा थीं और साल 2018 में निर्देशन में डिग्री के साथ उन्होंने स्नातक की उपाधि ली थी.

2022 में दिए एक इंटरव्यू में कपाड़िया ने कहा था कि ये फ़िल्म ‘सार्वजनिक विश्वविद्यालय और जिन मूल्यों के लिए वो खड़े हैं- वो जगह जहां हर वर्ग, हर समाज के लोग एक साथ भौतिक और बौद्धिक आज़ादी का आनंद ले सकें, के लिए लिखा गया एक प्रेम पत्र है.’

इसी तरह की भावना ‘ऑल वी इमेजिन एज़ लाइट’ में भी दिखाई देती है.

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