भारतीय नाविकों का दर्द: महीनों से जहाज़ पर फंसे और वेतन का इंतज़ार

- Author, नियाज़ फ़ारूक़ी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
मानस कुमार (बदला हुआ नाम) अप्रैल से यूक्रेन के समुद्री जलक्षेत्र में एक कार्गो जहाज़ पर फंसे हुए हैं.
भारतीय नाविक मानस कुमार 14 सदस्यीय दल का हिस्सा थे जो पॉपकॉर्न लेकर मॉल्डोवा से तुर्की जा रहा था. यह जहाज़ 18 अप्रैल को डेन्यूब नदी पर रोका गया, जो यूक्रेन और रोमानिया को अलग करती है.
यूक्रेन ने दावा किया कि यह जहाज़ 'अंका' रूस के 'शैडो' बेड़े का हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेनी अनाज चोरी करके तीसरे देशों को बेचने के लिए किया जा रहा था.
लेकिन कुमार (अंका के चीफ़ ऑफ़िसर) ने कहा कि जहाज़ तंज़ानिया के झंडे के साथ चल रहा था और तुर्की की एक कंपनी इसे मैनेज कर रही थी.
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हालांकि दस्तावेज़ों से यह साफ़ नहीं है कि जहाज़ का मालिक कौन है. जहाज़ के दल में मानस कुमार, पांच अन्य भारतीय नागरिक, दो अज़रबैजानी और छह मिस्रवासी शामिल हैं.
कुमार का कहना है कि पांच महीने बाद भी सभी लोग जहाज़ पर मौजूद हैं, जबकि यूक्रेनी अधिकारियों ने उन्हें बता दिया था कि वे जा सकते हैं क्योंकि वे जांच के दायरे में नहीं हैं.
समस्या यह है कि जहाज़ छोड़ने का मतलब है सैलरी गंवा देना, जो जून तक कुल मिलाकर एक लाख दो हज़ार 828 डॉलर थी.
यह आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) के साझा डेटाबेस में दर्ज है, जो छोड़े गए जहाज़ों पर नज़र रखता है.
बीबीसी ने जहाज़ की मैनेजमेंट कंपनी और मालिकों से संपर्क किया है, जिनकी जानकारी दल ने दी है.
कुमार ने कहा कि नौकरी मिलने के समय दल को जहाज़ के अतीत की जानकारी नहीं थी. अब वह ऐसी स्थिति में फंसे हुए हैं जो उनके वश से बाहर है और वे जल्द समाधान चाहते हैं.
उन्होंने कहा कि मालिक और भारतीय शिपिंग अधिकारी हमसे हर दिन कहते हैं कि एक दिन और इंतज़ार करो, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है.
बीबीसी से बातचीत में कुमार कहते हैं, "यह युद्ध क्षेत्र है. हम बस जल्द से जल्द घर लौटना चाहते हैं."

भारत दुनिया में वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाज़ों पर नाविक और दल उपलब्ध कराने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है.
लेकिन यह उन नाविकों की सूची में भी सबसे ऊपर है जिन्हें 'अबैंडंड सीफ़ेयरर्स' कहा जाता है. यह शब्द मरीन लेबर कन्वेंशन 2006 में इस्तेमाल किया गया है, जब जहाज़ के मालिक जहाज़ पर मौजूद दल से रिश्ता तोड़ देते हैं और उन्हें घर वापसी, ज़रूरी सुविधाएं और वेतन नहीं देते.
वैश्विक स्तर पर नाविकों का प्रतिनिधित्व करने वाले अंतरराष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फ़ेडरेशन (आईटीएफ़) के अनुसार, 2024 में 312 जहाज़ों पर 3,133 नाविक फंसे थे- जिनमें 899 भारतीय थे.
मोहम्मद ग़ुलाम अंसारी एक पूर्व नाविक हैं जो अलग-अलग देशों से भारतीय दल को वापस लाने में मदद करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में ग़ुलाम अंसारी कहते हैं, "कई लोगों के लिए बिना वेतन जहाज़ छोड़ना मुमकिन नहीं है. ख़ासकर अगर उन्होंने नौकरी पाने या ट्रेनिंग सर्टिफ़िकेट हासिल करने के लिए पहले ही एजेंटों को भारी रक़म दी हो."

समस्या की जड़ क्या है?
आईटीएफ़ के अनुसार, नाविकों को बिना ज़िम्मेदारी के छोड़ दिए जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि जहाज़ों का ऐसे देशों में रजिस्ट्रेशन किया जाता है जहां शिपिंग नियम कमज़ोर हैं.
इस प्रक्रिया को 'फ़्लैग ऑफ़ कन्वीनियंस' कहा जाता है.
अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुसार, जहाज़ को उसके मालिक के देश से अलग किसी और देश में रजिस्टर्ड या 'फ़्लैग' किया जा सकता है.
आईटीएफ़ की वेबसाइट कहती है, "कोई भी देश जहाज़ की रजिस्ट्री बना सकता है और जहाज़ मालिकों से शुल्क वसूल सकता है. लेकिन वहां दल की सुरक्षा और भलाई के नियम बहुत ढीले हो सकते हैं और अक्सर वह देश असली ज़िम्मेदारियां निभाने में नाकाम रहता है."
यह सिस्टम असली मालिक की पहचान छिपा देता है, जिससे संदिग्ध मालिक जहाज़ चला सकते हैं.
आईटीएफ़ के आंकड़ों के मुताबिक़, 2024 में क़रीब 90 प्रतिशत छोड़े गए जहाज़ 'फ़्लैग ऑफ़ कन्वीनियंस' के तहत चल रहे थे.
शिपिंग इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि शिपिंग इंडस्ट्री की वैश्विक प्रकृति के कारण भी जटिलताएं पैदा होती हैं. अक्सर जहाज़ के मालिक, मैनेजर, रजिस्ट्रेशन और दल अलग-अलग देशों से होते हैं.
9 जनवरी 2025 को कैप्टन अमिताभ चौधरी (बदला हुआ नाम) एक कार्गो जहाज़ इराक़ से संयुक्त अरब अमीरात ले जा रहे थे. इस दौरान जब मौसम ख़राब हुआ तो उन्हें मजबूरन तय रास्ते में थोड़ा सा बदलाव करना पड़ा.
कुछ ही मिनट बाद, यह तंज़ानिया फ़्लैग वाला जहाज़ 'स्ट्रैटोस' नीचे चट्टानों से टकरा गया और उसके तेल भरे टैंक को नुक़सान पहुंचा.
इससे सऊदी अरब के जुबैल बंदरगाह के पास जहाज़ को अचानक रोकना पड़ा.
नौ भारतीय और एक इराक़ी नागरिक वाले दल ने कई बार जहाज़ को फिर से चलाने की कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे.
वे जहाज़ में फंसे हुए थे. उन्होंने मदद के लिए क़रीब छह महीने तक इंतज़ार किया, इसके बाद जहाज़ को फिर से चलाया जा सका.
अमिताभ चौधरी ने बीबीसी को बताया कि इस बीच, जहाज़ के इराक़ी मालिक ने वेतन देने से इनकार कर दिया और कहा कि रुके रहने से उन्हें नुक़सान हुआ है.
बीबीसी ने जहाज़ के मालिकों से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगी, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.

'जहाज़ की लकड़ी जलानी पड़ी ताकि खाना पका सकें'
नाविक अक्सर भारत के समुद्री नियामक, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ शिपिंग को ज़िम्मेदार मानते हैं.
यह संस्था जहाज़, उनके मालिक और भर्ती एजेंसियों की जांच करने की ज़िम्मेदारी रखती है, लेकिन उस पर लापरवाही का आरोप लगता है. डीजी शिपिंग ने इन आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
कुछ लोग कहते हैं कि दल को भी सावधान रहना चाहिए.
आईटीएफ़ प्रतिनिधि सुशील देवरुखकर ने कहा, "जब आपको नौकरी मिलती है, तो आपके पास डीजी शिपिंग को अपने कॉन्ट्रैक्ट में गड़बड़ी की जानकारी देने का समय होता है. लेकिन एक बार काग़ज़ पर साइन कर देने के बाद आप फंस जाते हैं और समाधान के लिए हर जगह भटकना पड़ता है."
कभी-कभी भारतीय मालिक वाले जहाज़ों पर काम करने वाले दल को भी परेशानी झेलनी पड़ती है, चाहे वह भारत के ही पानी में क्यों न चल रहा हो.
कैप्टन प्रबजीत सिंह 'निर्वाण' नाम के तेल टैंकर पर काम कर रहे थे, जो भारत में बना और भारत के मालिकाना हक़ वाला जहाज़ था लेकिन कुरासाओ का झंडा लिए हुए था.
इसमें उनके साथ 22 और भारतीय थे. हाल ही में यह जहाज़ नए मालिक को बेचा गया था, जो इसे कबाड़ करना चाहता था और वेतन को लेकर पुराने और नए मालिक में विवाद था.
अप्रैल की शुरुआत में, प्रबजीत सिंह इस जहाज़ को गुजरात के एक बंदरगाह पर तोड़ने के लिए ले जा रहे थे, तभी एक भारतीय अदालत ने इसे 'दल को वेतन न मिलने' के कारण ज़ब्त करने का आदेश दे दिया.
यह जानकारी आईएलओ-आईएमओ डेटाबेस में दर्ज है.
कैप्टन प्रबजीत सिंह ने बताया कि कुछ ही दिनों में दल को एहसास हो गया कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया है.
वह कहते हैं, "हमारे पास खाने-पीने का पर्याप्त सामान नहीं था. जहाज़ का डीज़ल ख़त्म हो गया था और पूरा जहाज़ अंधेरे में डूबा हुआ था. हमें मजबूरी में जहाज़ की लकड़ी तोड़कर जलानी पड़ी ताकि खाना पका सकें."
अक्तूबर 2024 में नौकरी पर रखे गए प्रबजीत सिंह ने उम्मीद की थी कि इस काम से अच्छी कमाई होगी, इसी वजह से बिना वेतन जहाज़ छोड़ना उनके लिए संभव नहीं था.
7 जुलाई को अदालत के आदेश के बाद समझौता हुआ और दल उतर सका. आईएलओ-आईएमओ डेटाबेस के अनुसार, अदालत के आदेश के बावजूद दल को अब तक वेतन नहीं मिला है.
खाड़ी क्षेत्र में, स्ट्रैटोस जहाज़ के दल ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि नीचे बने छेद से जहाज़ डूब न जाए.
लेकिन तुरंत सामने आई चुनौती भूख थी.
अमिताभ चौधरी ने बीबीसी को बताया, "कई दिनों तक हमें सिर्फ़ चावल या आलू खाना पड़ा क्योंकि सामान ख़त्म हो गया था."
क़रीब छह महीने बाद दल ने किसी तरह जहाज़ को फिर से तैराने में कामयाबी पाई, लेकिन हादसे में उसका रडार टूट गया था, जिससे वह चलने लायक़ नहीं रहा.
दल अब भी जहाज़ पर ही है और वेतन मिलने का इंतज़ार कर रहा है.
अमिताभ चौधरी कहते हैं, "हम अब भी वहीं हैं, उन्हीं हालात में. दिमाग़ काम करना बंद कर चुका है, समझ नहीं आता अब और क्या करें. क्या हमें कुछ मदद मिल सकती है? हम बस घर जाना चाहते हैं और अपनों से मिलना चाहते हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

















