उस्मानिया हुकूमत के आख़िरी ख़लीफ़ा का क्या था भारत से रिश्ता और एक दस्तावेज़ का रहस्य

खलीफा अब्दुल मजीद को भारत में दफनाए जाने की योजना थी

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    • Author, इमरान मुल्ला
    • पदनाम, इतिहासकार और पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए

महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले की बंजर ज़मीन वाले इलाके़ में एक शानदार लेकिन वीरान मक़बरा है.

यह कोई साधारण मक़बरा नहीं है. यहां लगभग 15 मीटर लंबा और आठ मीटर चौड़ा गड्ढा है जहां मज़ार होनी चाहिए थी.

सबसे ख़ास मक़बरे का गुंबद है, जो ओटोमन तुर्की शैली में बना हुआ है.

ये मक़बरा 20वीं शताब्दी में बनाया गया. इसे तुर्की के आख़िरी ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद द्वितीय के लिए बनवाया गया था जो एक चित्रकार, कवि और संगीत प्रेमी थे.

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अब्दुल मजीद ओटोमन साम्राज्य या उस्मानिया सल्तनत के आख़िरी सदस्य थे जिन्हें ख़लीफ़ा नियुक्त किया गया. वो पैग़ंबर मोहम्मद के राजनीतिक उत्तराधिकार का प्रतिनिधित्व करते थे.

ओटोमन साम्राज्य का अंत होने के बाद उन्होंने भारतीय रियासत हैदराबाद में अपने राजवंश के शासन को जारी रखने का लक्ष्य रखा.

ओटोमन साम्राज्य का अंत होने के बाद नवंबर 1922 में तुर्की की सरकार ने उन्हें इस्तांबुल में ख़लीफ़ा नियुक्त किया था.

लेकिन तीन मार्च 1924 में तुर्की ने ख़लीफ़ा की नियुक्ति को समाप्त कर दिया और अब्दुल मजीद को उनके परिवार के साथ स्विट्ज़रलैंड जाने वाली ट्रेन में भेज दिया.

हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान जिन्हें एक समय टाइम्स मैगज़ीन ने दुनिया का सबसे अमीर शख़्स बताया गया था उनकी तरफ़ से उन्हें मदद मिली.

अब्दुल मजीद की मदद के लिए आगे आए निज़ाम

फलकनुमा महल का दरबार

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ब्रिटिश शासन के तहत आने वाली भारत की सबसे बड़ी रियासत हैदराबाद के सातवें निज़ाम मुस्लिम थे. लेकिन उन्होंने बड़े पैमाने पर मौजूद हिंदू आबादी पर शासन किया. हालांकि उन्होंने मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और सूफ़ी दरगाहों को संरक्षण दिया.

हैदराबाद को मुग़ल सम्राज्य की सांस्कृतिक विरासत माना जाता था और इसके महल भव्यता के लिए जाने जाते थे.

मुस्लिम समुदाय में अपनी प्रतिष्ठा में इज़ाफ़ा करने के लिए निज़ाम ने अब्दुल मजीद की मदद की पेशकश की.

अक्टूबर 1924 में फ्रांस के नीस शहर में समुद्र किनारे बने विला में अब्दुल मजीद बस गए जिसकी कीमत निज़ाम ने चुकाई.

अब्दुल मजीद ने वहां से ख़लीफ़ा को पुनर्जीवित करने की मुहिम चलाई. उन्होंने मार्च 1931 में मौलाना शौकत अली के साथ गठजोड़ किया. मौलाना शौकत अली भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का चेहरा थे और महात्मा गांधी के क़रीबी थे.

अब्दुल मजीद का ध्यान उसी साल दिसंबर में यरूशलम में होने वाले इस्लामिक कांग्रेस पर केंद्रित था.

अब्दुल मजीद ने यरूशलम जाकर कांग्रेस को संबोधित करने और ख़लीफ़ा के लिए समर्थन जुटाने की योजना बनाई. उनकी योजना को ब्रिटिश सरकार ने झटका दिया और ब्रिटिश शासन के तहत आने वाले फ़लस्तीन में अब्दुल मजीद की एंट्री पर रोक लगा दी.

हालांकि उन्होंने एक और योजना बनाई थी.

शौकत अली और ब्रिटिश बुद्धिजीवी मार्माड्यूक पिकथॉल ने अक्तूबर 1931 में अब्दुल मजीद की बेटी राजकुमारी दुर्रुशेहवर और निज़ाम के सबसे बड़े बेटे प्रिंस आज़म जाह की शादी करवाई.

टाइम मैगज़ीन ने रिपोर्ट किया, "क्या इन युवाओं को शादी करके एक बेटे को जन्म देना चाहिए. उन्हें सच्चा ख़लीफ़ा घोषित किया जा सकता है."

अब्दुल मजीद ने घोषणा की, "यह शादी पूरे मुस्लिम जगत पर अच्छा प्रभाव डालने में विफल नहीं होगी."

शादी नीस में नवंबर में हुई. कुछ दिन बाद शौकत अली के बयान के आधार पर बॉम्बे के उर्दू अख़बारों ने ख़लीफ़ा की बहाली की भविष्यवाणी को हेडलाइन्स में जगह दी.

इससे ब्रिटिश अधिकारी घबरा गए और उन्होंने निज़ाम को अब्दुल मजीद की हैदराबाद यात्रा को रद्द करने के लिए बाध्य किया.

दस्तावेज़ को लेकर हैं सवाल

मकबरे का अंदरूनी हिस्सा

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कुछ लोगों का मानना है कि शादी के थोड़े दिन बाद अब्दुल मजीद ने ऐसे दस्तावेज़ पर साइन किया जिससे दुनिया का इतिहास बदल सकता था.

यह दस्तावेज़ 2021 में सैयद अहमद ख़ान को हैदराबाद में अपने घर पर मिला. इस परिवार ने अप्रैल 2024 में मुझे मेरी रिसर्च के लिए अपने घर बुलाया.

ख़ान ने मुझे बताया कि उन्हें दिसंबर 2021 में अपने दादा के दस्तावेज़ों में से ये दस्तावेज़ मिला. सैयद मोहम्मद अमरुद्दीन ख़ान सातवें निज़ाम के सैन्य सचिव थे और 99 साल की उम्र में साल 2012 में उनका निधन हुआ.

ये दस्तावेज़ मोटे पेपर पर अरबी लिपी में निज़ाम को संबोधित करते हुए लिखा गया था और इस पर अब्दुल मजीद के हस्ताक्षर थे. इसे नीस में शादी के एक हफ्ते बाद लिखा गया था.

इस दस्तावेज़ के मुताबिक़, इसके ज़रिए अब्दुल मजीद ने ख़लीफ़ा के पद को निज़ाम के लिए ट्रांसफ़र किया. इसे प्रिंस आज़म और दुर्रुशेहवर के बेटे के जन्म तक गोपनीय रखा जाना था.

तुर्की के लेखक मुरात बरदाच समेत कुछ एक्सपर्ट्स ने इस दस्तावेज़ को फ़र्ज़ी बताया है.

मुरात बरदाच ने बताया, "इस दस्तावेज़ को कुछ साल पहले बनाया गया है. इसलिए ये फ़र्ज़ी है."

उन्होंने कहा, "इस दस्तावेज़ पर जो हस्ताक्षर हैं वो उन लोगों के असल हस्ताक्षर नहीं हैं."

लेकिन कुछ का कहना है कि ये दस्तावेज़ असली है.

इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड कन्वर्ज़न ऑफ मैनुस्क्रिप्ट में काम करने वाले डॉ. सैयद अब्दुल कादरी कहते हैं, "इस दस्तावेज़ पर अब्दुल मजीद के हस्ताक्षर दूसरे दस्तावेज़ों पर मौजूद उनके हस्ताक्षरों से मिलते हैं."

कादरी ने कहा, "ये वही गहरी काली स्याही है जिसे प्रिंस और शासकों के लिए तैयार किया जाता था."

उन्होंने कहा, "इस तरह के पेपर शासकों के वक्त इस्तेमाल किए जाते थे. ये आम लोगों की पहुंच से दूर हैं."

भारत में कुछ लोग इससे सहमत हैं. अहमद अली भारत सरकार के सालार जंग संग्रहालय के संग्रहाध्यक्ष रहे हैं और अब रिटायर हो चुके हैं. वो कहते हैं, "ख़लीफ़ा के अलावा दूसरे शब्द भी असली हैं और वो बाकी दस्तावेज़ों से मिलते हैं."

बहस जारी है. सैयद अहमद ख़ान अपने परिवार की ओर से कहते हैं, "हमारी ख़लीफ़ा को धार्मिक या राजनीतिक आधार पर पुनर्जीवित करने की कोई योजना नहीं है."

बनाई गई थी ख़ास योजना

अब्दुल मजीद को भारत में दफनाने की योजना कामयाब नहीं हुई

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रहस्य के बावजूद मैंने कहीं और से भी इस बात के पुख्ता सबूत जुटाए हैं कि अब्दुल मजीद चाहते थे कि ख़लीफ़ा की हैदराबाद में बहाली की जाए.

6 अक्टूबर 1933 को नीस में दुर्रुशेहवर ने मुकर्रम जाह को जन्म दिया. वो अब्दुल मजीद और निजाम के ग्रैंडसन थे.

मुकर्रम जाह जब बच्चे ही थे तो निजाम ने अपने क़रीबियों को बताया कि आजम जाह की बजाए मुकर्रम उनके उत्तराधिकारी हैं.

अगस्त 1944 में ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद का निधन हुआ. नवंबर 1944 में सर ऑर्थर लोथियन ने हैदराबाद में अपने प्रतिनिधि को खुफिया पत्र लिखा- "प्रधानमंत्री ने अब्दुल मजीद की वसीयत देखी है और वो चाहते थे कि उन्हें भारत में दफ़नाया जाए जहां उनके ग्रैंडसन अगले ख़लीफ़ा होंगे."

1946 में दो ब्रिटिश अधिकारियों के एक-दूसरे को भेजे गए गोपनीय पत्रों से भी पता चलता है कि अब्दुल मजीद ने जाह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और वो इसे गोपनीय रखना चाहते थे.

निजाम ने उसी साल खुल्दाबाद में मक़बरे के निर्माण का आदेश दिया, वो निज़ाम के अंतर्गत आता था और अब महाराष्ट्र का हिस्सा है. यह उस जगह के नज़दीक था जहां हैदराबाद के पहले निज़ाम को दफ़नाया गया.

ब्रिटिश हुकूमत के भारत छोड़ने के बाद सितंबर 1948 में मक़बरे का निर्माण पूरा हुआ.

उसी महीने भारतीय सेना ने मार्च किया और निज़ाम को सत्ता से हटाया गया. आक्रमण की वजह से लगभग 40 हज़ार लोगों की जान गई और अब्दुल मजीद के शव को भारत में दफ़नाने की योजना काम नहीं कर पाई.

साल 1954 में निधन के 10 साल बाद अब्दुल मजीद को सऊदी अरब में मदीना में दफ़नाया गया.

तुर्की में हुआ मुकर्रम जाह का निधन

चौमोहल्ला महल का दरबार

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मुकर्रम जाह अपने दादा के निधन के बाद 1967 में नाममात्र के निज़ाम बने और उनके पास कोई पावर नहीं थी. वो इस स्थिति में नहीं थे कि ख़लीफ़ा का पद हासिल कर पाएं.

भारत सरकार ने साल 1971 में उनके स्वामित्व को समाप्त कर दिया और उनकी संपत्ति को टैक्स और भूमि अधिनियमों के ज़रिए अधीन कर लिया.

जाह ने एक गैर परंपरागत समाधान चुना और वो 1973 में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया चले गए. वहां उन्होंने 200,000 हेक्टेयर का भेड़ों का फ़ार्म ख़रीदा.

बाद में वो तुर्की चले गए और 14 जनवरी 2023 को इस्तांबुल में गुमनामी में उनका निधन हुआ.

उनके बड़े बेटे राजकुमार अज़मत जाह नाममात्र के नौवें निज़ाम बने. वो ब्रिटिश फ़िल्ममेकर हैं और हैदराबाद में कई जगहों के मालिक हैं.

अब्दुल मजीद और मीर उस्मान अली के वंश के जुड़ाव को इस्लामिक दुनिया में इस्लाम के दो बड़े वंशों के जुड़ाव के तौर पर देखा गया.

ब्रिटिश राज के अंत के बाद अगर हैदरबाद स्वतंत्र देश बनता तो राजकुमार मुकर्रम जाह निज़ाम बनने के बाद ख़लीफ़ा बनने पर दावा पेश करते.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इतिहासकार जॉन जुबरजिकी ने 2005 में तुर्की में मुकर्रम जाह का इंटरव्यू किया था. मैंने उनसे पूछा कि इस इतिहास पर वो क्या सोचते हैं.

जाह की बायोग्राफी लिखते हुए जुबरजिकी को ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद की वसीयत से जुड़ा एक अहम पत्र मिला था.

उन्होंने कहा, "अपनी चालाकी से पीछे. निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान एक चतुर रणनीतिज्ञ थे."

जुबरजिकी कहते हैं कि उनकी इच्छा अपने पोते को ख़लीफ़ा बनाने की थी.

जुबरजिकी जब 2005 में जाह से मिले तो उन्होंने पाया कि वो "करिश्माई, सभ्य और उदार हैं."

"वो उन बातों से दुखी थे जिनका सामना उन्हें अपनी ज़िंदगी में करना पड़ा."

आख़िरी ख़लीफ़ा के ग्रैंडसन को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में दफ़नाया गया.

(इतिहासकार इमरान मुल्ला 'द इंडियन केलिफ़ेट: एक्ज़ाइल्ड ऑटोमन्स एंड द बिलेनियर प्रिंस' किताब के लेखक भी हैं)

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