इरावती कर्वे: जिन्होंने जर्मनी में रहते हुए भी नाज़ियों के नस्लवादी सिद्धांत को चुनौती दी

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- Author, शेरिलान मोलान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इरावती कर्वे की ज़िंदगी उनके आस-पास के लोगों से बेहद अलग थी. वह ब्रिटिश शासित भारत के उस दौर में पैदा हुईं थीं, जब महिलाओं के पास बहुत ज़्यादा आज़ादी या अधिकार नहीं थे.
लेकिन इरावती कर्वे ने विदेश में अपनी उच्च शिक्षा को पूरा किया और एक कॉलेज़ प्रोफ़ेसर और भारत की पहली मानवविज्ञानी बनीं. उस दौर में भारत में किसी महिला के लिए ऐसा करना बेहद मुश्किल काम था.
इरावती कर्वे ने अपनी मर्ज़ी से शादी की, बाथिंग सूट में तैराकी की, स्कूटर चलाया और यहां तक कि अपने डॉक्टरेट सुपरवाइज़र और प्रसिद्ध जर्मन मानवविज्ञानी यूजेन फ़िशर की नस्लवादी अवधारणा को चुनौती देने का साहस भी किया.
भारतीय संस्कृति, सभ्यता और जाति व्यवस्था पर लिखे गए उनके लेख एक नया नज़रिया पेश करते हैं और भारत के कॉलेज़ों में पाठ्यक्रमों का हिस्सा भी हैं.
लेकिन फ़िर भी ऐतिहासिक रूप से उनके बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है.

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उनकी पोती उर्मिला देशपांडे और एकेडमीशियन थियागो पिंटो बारबोसा की लिखी किताब इरू: रिमार्केबल लाइफ़ ऑफ़ इरावती कर्वे उनके आकर्षक जीवन के बारे में बताती है.
इसमें उन कठिनाइयों का ज़िक्र भी है, जिससे पार पाते हुए इरावती कर्वे ने महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए ही एक मिसाल कायम की.
इरावती नाम कैसे पड़ा

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साल 1905 में बर्मा (अब म्यांमार) में जन्मीं इरावती का नाम इरावदी नदी के नाम पर रखा गया था. वह छह भाइयों के बीच इकलौती बहन थी. उनके परिवार से उन्हें भरपूर प्यार मिला और उनका पालन-पोषण भी बहुत अच्छे से हुआ.
लेकिन इरावती की ज़िंदगी में कई ऐसे अप्रत्याशित मोड़ आए, जिसके अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया.
मज़बूत महिलाओं के अलावा उनके जीवन में सहानुभूति रखने वाले ऐसे प्रगतिशील पुरुष भी थे, जिन्होंने उनको बाधाओं से लड़ने का साहस दिया और हौसला बढ़ाया.
सात साल की उम्र में इरावती को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया. यह उनके पिता की ओर लिया गया एक अनोखा फ़ैसला था क्योंकि उस समय ज़्यादातर लड़कियों को जल्दी शादी के लिए मजबूर किया जाता था.
पुणे में इरावती की मुलाकात प्रसिद्ध शिक्षाविद् आरपी परांजपे से हुई, जिनके परिवार ने अनौपचारिक तौर पर उनको गोद ले लिया और उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला.
परांजपे के परिवार में इरावती को ऐसे जीवन का अनुभव हुआ जहां आलोचनात्मक और सही सोच को अहमियत दी जाती थी. भले ही इसका मतलब भारतीय समाज से अलग हटकर सोचना हो. परांजपे जिन्हें इरावती प्यार से 'अप्पा' यानी दूसरा पिता कहती थीं, अपने समय से बहुत आगे की सोच वाले व्यक्ति थे.
वह एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे और महिलाओं की शिक्षा के कट्टर समर्थक और नास्तिक भी थे. उनके ज़रिए इरावती ने सामाजिक विज्ञान और समाज पर इसके प्रभाव के बारे में जाना.
इरावती ने अपने असली पिता के आपत्ति जताने के बाद भी बर्लिन में मानवविज्ञान से डॉक्टरेट करने का फ़ैसला किया. लेकिन परांजपे और इरावती के पति दिनकर कर्वे ने उनका समर्थन किया. दिनकर कर्वे ख़ुद विज्ञान के प्रोफ़ेसर थे.
इरावती ने किया जर्मनी जाने का फ़ैसला

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पानी के जहाज़ से कई दिनों की यात्रा तय कर इरावती साल 1927 में जर्मनी के बर्लिन पहुंची. जहां उन्होंने मानव विज्ञान और यूजीनिक्स के एक प्रसिद्ध प्रोफेसर फिशर की देख-रेख में अपनी डिग्री के लिए पढ़ाई शुरू की.
जिस समय इरावती जर्मनी पहुंची थीं, उस वक़्त वह देश प्रथम विश्व युद्ध के प्रभावों से जूझ रहा था. हिटलर जर्मनी की सत्ता पर काबिज़ नहीं हुए थे, लेकिन देश में यहूदी विरोधी भावनाएं तेज़ी से पनप रही थीं.
इरावती यहूदियों के प्रति इस नफ़रत भरी भावना से तब वाक़िफ़ हुईं, जब उन्हें पता चला कि उनकी बिल्डिंग में एक यहूदी छात्र की हत्या कर दी गई है.
इरावती पर लिखी गई किताब में उस वक़्त के डर, सदमे और घृणा के बारे लिखा गया है, जब इरावती ने अपनी इमारत के बाहर फुटपाथ पर एक व्यक्ति का शव देखा, जिसके शरीर से खून बह रहा था.
इरावती को प्रोफ़ेशर फिशर की दी गई थीसिस पर काम करते समय भी इसी तरह की भावनाओं से जूझना पड़ा.
थीसिस में यह साबित करने की कोशिश की गई थी कि श्वेत यूरोपीय ज़्यादा समझदार और तर्कसंगत थे और इसीलिए वह नस्लीय तौर पर गैर-श्वेत और यूरोपीय लोगों से बेहतर थे.
इस प्रक्रिया में 149 खोपड़ियों का सावधानी से अध्ययन और माप शामिल था.
फिशर की परिकल्पना के अनुसार श्वेत यूरोपीय व्यक्तियों की खोपड़ी असममित होती है, जिससे उनके दाईं तरफ़ के दिमाग़ का सामने वाला हिस्सा ज़्यादा बड़ा होता है. यह कथित तौर पर ज़्यादा बुद्धिमत्ता की निशानी होती है.
हालांकि, इरावती के शोध में जाति और खोपड़ी की समरूपता के बीच कोई संबंध नहीं मिला.

किताब इरू: रिमार्केबल लाइफ़ ऑफ़ इरावती कर्वे के मुताबिक़, उन्होंने उस ज़ाहिर तौर पर ना केवल प्रोफ़ेसर परांजपे की परिकल्पना का विरोध किया बल्कि उस समय के संस्थानों और मुख्यधारा के सिद्धांतों का विरोध भी किया.
उन्होंने अपने प्रोफ़ोसर की नाराज़गी और अपनी डिग्री से जुड़े ख़तरों को झेलते हुए हिम्मत के साथ अपने शोध के नतीजों को सामने रखा.
प्रोफ़ेशर फिशर ने उनको सबसे ख़राब ग्रेड दिया. लेकिन उनके शोध ने तर्कसंगत तरीक़े से फ़िशर के सिद्धांत को ख़ारिज किया. (बाद में नाज़ियों ने अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए प्रोफ़ेसर फिशर के सिद्धांत का इस्तेमाल किया और प्रोफ़ेशर फिशर भी नाज़ी पार्टी में शामिल हो गए.)
अपनी पूरी ज़िंदगी में इरावती ने अपने इस साहस को असीम सहानुभूति के साथ जारी रखा, ख़ासतौर पर उन महिलाओं के लिए जिनसे वो मिली थीं.
यहूदियों पर अत्याचार का गहरा असर पड़ा

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ऐसे समय में जब किसी महिला के लिए अपने घर से बहुत दूर जाने के बारे में सोचा भी नहीं जाता था, उस समय इरावती ने अपने पुरुष सहयोगियों के साथ यात्रा की, कभी अपने छात्रों के साथ और कभी-कभी अपने बच्चों के साथ भी. उन्होंने कई सारी जनजातियों के जीवन का अध्ययन किया.
वह अतीत और वर्तमान को जोड़ने के लिए 15,000 साल पुरानी हड्डियों को खोजने के लिए पुरातात्विक अभियानों में भी शामिल हुईं.
इस दौरान उन्होंने कई हफ़्तों या महीनों तक जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कठिन यात्राएं कीं. किताब में उनके खलिहानों या ट्रक में सोने और अकसर कम खाने के साथ दिन गुज़ारने के बारे में बताया गया है.
इरावती ने सभी क्षेत्रों के लोगों के साथ बातचीत करते हुए सामाजिक और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों का भी बहादुरी से सामना किया.
उन पर लिखी किताब के लेखक बताते हैं कि कैसे पारंपरिक शाकाहारी और हिंदू धर्म के चितपावन ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक़ रखने के बाद भी उन्होंने कच्चा मांस खाया, जिसे एक आदिवासी नेता ने उन्हें दिया था.
आदिवासी नेता ने उनकी इस हरकत को वफ़ादारी और मित्रता के संकेत के तौर पर लिया. साथ ही उन्होंने खुलेपन और जिज्ञासा के साथ इसे अपनाया.
उनके अध्ययन ने मानवता के लिए गहरी सहानुभूति को बढ़ावा दिया, जिससे बाद में उन्होंने हिंदू धर्म सहित सभी धर्मों में कट्टरवाद की आलोचना की. उनका मानना था कि भारत उन सभी का है जो इसे अपना घर कहते हैं.
किताब उस घटना के बारे में भी बताती है, जब नाज़ी यहूदियों पर अत्याचार कर रहे थे. जिसने इरावती के मन को झकझोर कर रख दिया और इसने मानवता के प्रति उनके नज़रिये को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया.
साल 1970 में इरावती की मृत्यु हुई, लेकिन उनकी विरासत और काम अभी भी लोगों को प्रेरित कर रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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