कांग्रेस के उत्थान और पतन की गवाह रही इमारत, कहानी 24 अकबर रोड की

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
ये एक टाइप-7 बंगला है जो कांग्रेस के आंध्र प्रदेश से सांसद जी वेंकटस्वामी को आवंटित किया गया था. साल 1978 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो वेंकटस्वामी उन कुछ लोगों में से थे जिन्होंने इंदिरा गांधी का साथ देने का फ़ैसला किया था.
साल 1977 में चुनाव हारने के बाद जब इंदिरा गांधी के पास रहने के लिए कोई जगह नहीं बची तो एक ज़माने में उनके सहयोगी रहे मोहम्मद यूनुस ने 12 विलिंगटन क्रीसेंट में अपना बंगला उन्हें रहने के लिए दे दिया और वो खुद दक्षिणी दिल्ली के एक मकान में रहने चले गए.
विलिंगटन क्रीसेंट में इंदिरा गांधी के साथ उनके बड़े बेटे राजीव गांधी, उनकी पत्नी सोनिया और उनके दोनों बच्चे राहुल और प्रियंका, उनके छोटे बेटे संजय और उनकी पत्नी मेनका रहते थे.
ये जगह उन सब के लिए इतनी छोटी थी कि वहाँ राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची थी.

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राशिद क़िदवई अपनी किताब '24, अकबर रोड' में लिखते हैं कि 12 विलिंगटन क्रीसेंट लोगों से खचाखच भरा था इसलिए 24, अकबर रोड को कांग्रेस का नया मुख्यालय बनाया गया.
इस बंगले के सामने वायुसेना अध्यक्ष का घर था और इसमें कुल मिलाकर पाँच कमरे, एक ड्राइंग रूम और डायनिंग हॉल और एक गेस्ट रूम था.
किदवई लिखते हैं, "इस घर की ख़ास बात ये थी कि इसमें एक गेट था जो उसे 10, जनपथ से जोड़ता था. उस ज़माने में वो युवा कांग्रेस का मुख्यालय हुआ करता था. बाद में ये घर पहले विपक्ष के नेता के तौर पर राजीव गाँधी और फिर सोनिया गाँधी को आवंटित हो गया था."
आंग सान सू ची का घर

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इस घर का एक और रोचक इतिहास रहा है.
इस बंगले को सन 1911 और 1925 के बीच सर एडविन लुटियंस ने बनवाया था. सन 1961 में दो वर्षों के लिए इसमें बर्मा की नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची भी रहा करती थीं.
उनकी माँ डॉ. खिन की, म्यांमार के नेता आंग सान की पत्नी थीं और उन्हें उनके पति की मृत्यु के बाद भारत में बर्मा का राजदूत नियुक्त किया गया था.
डॉ. खिन के विशेष दर्जे को देखते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बंगले को 'बर्मा हाउस' का नाम दिया था.
आंग सान सू ची की जीवनीकार जस्टिन विंटेल अपनी किताब 'द पर्फ़ेक्ट होस्टेज' में लिखती हैं, "यहीं रहते हुए सू ची ने जापानी फूलों को सजाने की कला 'इकेबाना' सीखी थी. यहीं रहते हुए उन्होंने कॉन्वेंट ऑफ़ जीज़स एंड मेरी स्कूल में पढ़ाई की थी. बाद में उन्होंने राजनीतिक विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लेडी श्रीराम कॉलेज में दाख़िला लिया था. ये कालेज उस ज़माने में दरियागंज में हुआ करता था."
कांग्रेस का मुख्यालय बनाए रखने का समर्थन

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जब सन 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं तो 7 जंतर-मंतर रोड स्थित बंगले को कांग्रेस का मुख्यालय बनाया गया.
जब 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ तो इस बंगले पर मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाले धड़े ने कब्ज़ा कर लिया और इंदिरा कांग्रेस का दफ़्तर 5 राजेंद्र प्रसाद रोड पर चला गया.
जब इंदिरा गांधी सन 1980 में सत्ता में दोबारा लौटीं तो उन्होंने 7 जंतर-मंतर रोड के पुराने कांग्रेस मुख्यालय पर दावा ठोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
उन्होंने कहा, "मैंने एक बार नहीं बल्कि दो बार पार्टी को शून्य से खड़ा किया है. मेरा मानना है कि कांग्रेस का नया मुख्यालय आने वाले दशकों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह का संचार करता रहेगा."
जब 24 अकबर रोड के दफ़्तर में उस समय इंदिरा गांधी के निकट सहयोगियों बूटा सिंह और एआर अंतुले ने प्रवेश किया तो बंगले में मामूली फ़र्नीचर तक नहीं था. बंगले के सबसे बड़े कमरे को कांग्रेस अध्यक्ष के दफ़्तर में बदल दिया गया था.
भगत ने कांग्रेस पार्टी का साइन बोर्ड बनवाया
उस समय इंदिरा कांग्रेस के महासचिव बूटा सिंह को एक शयनकक्ष में बैठने की जगह दी गई थी.
24 अकबर रोड में आने से कुछ समय पहले तक इंदिरा कांग्रेस के नेता पहले एम. चंद्रशेखर के 3 जनपथ वाले निवास और फिर कमलापति त्रिपाठी के बंगले पर बैठा करते थे.
राशिद क़िदवई लिखते हैं, "कमलापति त्रिपाठी एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे. उनके यहाँ नित्य होने वाला हवन और पूजा-पाठ कांग्रेस के नेताओं को रास नहीं आया. ब्राह्मण होते हुए भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजित प्रसाद शर्मा कहते सुने गए कि वो मंदिर जैसे वातावरण में काम करने में सक्षम नहीं हैं. तब जाकर बूटा सिंह ने वेंकटस्वामी को पार्टी के लिए अपना घर देने के लिए मनाया, जो अकेले रहा करते थे."
दिल्ली कांग्रेस के एक बड़े नेता हरकिशन लाल भगत ने अपने संसाधनों से लकड़ी का एक बोर्ड बनवाया जिस पर लिखा हुआ था अखिल भारतीय कांग्रेस (इंदिरा). इस बोर्ड को 24, अकबर रोड के मेन गेट पर लगा दिया गया.
ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से कमरे बनवाए गए
अकबर रोड बंगले में कई बदलाव किए गए हैं.
राशिद क़िदवई लिखते हैं, "अब कमरों की संख्या बढ़कर 34 हो गई है. मुख्य भवन में कांग्रेस अध्यक्ष, महासचिवों और कोषाध्यक्ष के कमरे हैं. बंगले के पिछवाड़े में नरसिम्हा राव के शासन काल में एक दर्जन से अधिक कमरे बनवाए गए थे. इनमें से अधिकतर निर्माण ग़ैर-कानूनी ढंग से हुए हैं. उसके बाद जब-जब कांग्रेस सरकारें आईं सार्वजनिक निर्माण विभाग ने बार-बार अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए भवन कानूनों का कड़ाई से पालन नहीं किया."
सन 1985 में राजीव गांधी चाहते थे कि कांग्रेस एक आधुनिक भवन में अपना मुख्यालय बनाए. उन्होंने कई जगह से चंदा लिया और कांग्रेस के सांसदों से भी इसके लिए एक महीने का वेतन देने के लिए कहा गया ताकि राजेंद्र प्रसाद रोड में पर एक नई इमारत बनाई जा सके.
लेकिन सन 1991 में राजीव गांधी की अचानक हुई मौत ने सब कुछ बदल दिया और उस भवन में राजीव गांधी फ़ाउंडेशन का दफ़्तर खोल दिया गया.
मुख्यालय के लिए चार एकड़ ज़मीन
सन 2009 में शहरी विकास मंत्रालय के बनाए नियमों के अनुसार, कांग्रेस को दोनों सदनों में उसके सदस्यों की संख्या को देखते चार एकड़ के प्लॉट पर भवन बनाने की अनुमति दी गई थी.
दिलचस्प बात ये है कि जब भारतीय जनता पार्टी की तरह कांग्रेस पार्टी को भी अपना दफ़्तर बनाने के लिए ज़मीन आवंटित की गई तो उसे कोटला रोड और दीनदयाल उपाध्याय रोड के कोने में ज़मीन मिली.
कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी के विचारक के नाम पर बनी सड़क पर अपना मुख्यालय बनवाने में थोड़ी झिझक थी. इसलिए उन्होंने अपने दफ़्तर का प्रवेश द्वार कोटला रोड से रखने का फ़ैसला किया.
तूफ़ान में पेड़ गिरा
मई, 1999 में मात्र 10 मिनट के तूफ़ान ने 24, अकबर रोड के अंदर एक बड़े पेड़ को धराशायी कर दिया. इस दुर्घटना में एक आठ साल के लड़के की मृत्यु हो गई. इससे पार्टी के मुख्यालय के परिसर के अंदर बना एक अस्थायी मंदिर भी नष्ट हो गया.
इसे पार्टी के लिए बहुत बड़ा अपशकुन माना गया.
ये पेड़ तब से 24 अकबर रोड के अंदर था जब से कांग्रेस का मुख्यालय वहाँ शिफ़्ट हुआ था. इस मंदिर को कर्नाटक के एक व्यक्ति ने पार्टी का टिकट पा जाने के बाद बनवाया था.
बहुत से टिकट उम्मीदवारों का मानना था कि इस मंदिर में प्रार्थना करने से लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी हो जाती हैं.
सीताराम केसरी को हटा सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं

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सन 1996 में 24 अकबर रोड कांग्रेस के सत्ता से हटने का गवाह बना.
ये अलग बात है कि कांग्रेस ने पहले एचडी देवेगौड़ा और फिर इंदर कुमार गुजराल को बाहर से समर्थन देकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में नहीं आने दिया.
इस बीच सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष बने. 24 मार्च, 1998 को 24 अकबर रोड में ही सीताराम केसरी को हटा कर सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
पांच मार्च, 1998 को कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई.
उसी बैठक मे जीतेंद्र प्रसाद, शरद पवार और ग़ुलाम नबी आज़ाद ने केसरी को सलाह दी कि सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित करें.
सीताराम केसरी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और ये सलाह देने वाले नेताओं पर उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया.
सीताराम केसरी की नेमप्लेट हटाई गई

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उसके बाद सीताराम केसरी ने कार्यसमिति की बैठक की समाप्ति की घोषणा कर दी.
प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द कोएलिशन इयर्स' में लिखा, "इसके बावजूद कांग्रेस कार्यसमिति के सभी नेता वहाँ से नहीं हटे, चूँकि मैं सबसे वरिष्ठ नेता था, इसलिए मुझसे बैठक की अध्यक्षता करने के लिए कहा गया. मैंने एक प्रस्ताव पेश किया जिसे कार्यसमिति के सभी सदस्यों ने एकमत से स्वीकार कर लिया. प्रस्ताव में कांग्रेस कार्यसमिति ने पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी को सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने की इच्छा जताने के लिए धन्यवाद दिया. प्रस्ताव में सीताराम केसरी को कांग्रेस को नेतृत्व प्रदान करने के लिए भी धन्यवाद दिया गया. इसके बाद कार्यसमिति के कुछ सदस्य इस प्रस्ताव की एक प्रति लेकर सोनिया गांधी के पास गए और उनसे कांग्रेस अध्यक्ष का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया."
सोनिया ने वो अनुरोध स्वीकार कर लिया. सीताराम केसरी ने चिल्लाकर विरोध प्रकट किया कि वो अब भी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं लेकिन पार्टी के उपाध्यक्ष जीतेंद्र प्रसाद ने भारी शोर-शराबे के बीच एलान किया कि अब सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष हैं.
राशिद किदवई लिखते हैं, "पद से हटाए गए सीताराम केसरी कमरे से बाहर निकले. उनके पीछे-पीछे तारिक अनवर भी गए. जब वो कमरे से बाहर निकले तो उन्होंने देखा कि उनकी नेम प्लेट वहाँ से हटा दी गई है और उसके स्थान पर एक कंप्यूटर प्रिंट आउट पर लिखा हुआ है, 'सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष.''
सोनिया ने मनमोहन सिंह को चुना अगला प्रधानमंत्री

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एक साल बाद 24 अकबर रोड पर ही कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया.
सोनिया ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन जब इन नेताओं को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया तो उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया.
इसी बैठक के बाद पूर्व पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ धक्का-मुक्की की गई और उनकी कार को नुकसान पहुंचाया गया. उनको अपना फटा हुआ कुर्ता बदलने के लिए अपने घर लौटना पड़ा.
उनके साथ ये सब इसलिए किया गया क्योंकि विद्रोह करने वाले एक नेता तारिक अनवर उनके बहुत करीबी थे.
सन 2004 के चुनाव में कांग्रेस की आठ साल बाद सत्ता में फिर वापसी हुई लेकिन जब ये लग रहा था कि सोनिया गांधी देश की अगली प्रधानमंत्री होंगी उन्होंने मनमोहन सिंह को अपनी जगह भारत का अगला प्रधानमंत्री बनाकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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