आंबेडकर मौजूदा राजनीति के लिए क्यों हो गए हैं इतने ज़रूरी?

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- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर एक बार फिर चर्चा में हैं. वजह पिछले दिनों राज्यसभा में दिया गया गृहमंत्री अमित शाह का एक बयान है.
इसने विपक्ष को गृहमंत्री और उनकी पार्टी पर हमलावर होने का मौक़ा दे दिया है. हालाँकि, अमित शाह का कहना है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है.
यही नहीं, उनके बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म 'एक्स' पर कांग्रेस पर पलटवार किया. अमित शाह ने प्रेस वार्ता की.
इससे भी अंदाज़ा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी इस विवाद से कितनी बेचैन है.
आख़िर डॉ. आंबेडकर आज के वक़्त और राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हैं, हमने कुछ विशेषज्ञों के ज़रिए इसे समझने की कोशिश की.

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'डॉ. आंबेडकर मसीहा हैं'

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डॉ. आंबेडकर को दलित समाज में एक मसीहा की तरह माना जाता है.
उन्होंने एक समता मूलक समाज की स्थापना का ख़्वाब देखा. वह शोषित वर्गों के अधिकार, आज़ादी और गरिमापूर्ण ज़िंदगी के लिए अलख जगाने वाले माने जाते हैं.
पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर श्याम लाल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "डॉ. आंबेडकर ने दलित समाज के उत्थान के लिए जैसा काम किया है, ऐसे में अगर वह समाज उन्हें अपना मसीहा या भगवान मानता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति भी नहीं है."
"आज़ादी से पहले या उसके बाद इस समाज के लिए आंबेडकर ने जितना काम किया, उतना किसी और ने नहीं किया है."
पूर्व आईएएस अधिकारी और कांग्रेस के नेता पीएल पुनिया का कहना है, "अगर आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई न लड़ी होती, तो हम लोग आईएएस अधिकारी न बनकर आज भी ग़ुलामी की ज़िंदगी जी रहे होते."
पुनिया ने कहा, "बाबा साहेब की मूल लड़ाई समाज में बराबरी के अधिकार की थी. साथ ही उनका संघर्ष इस बात के लिए भी था कि राजनीतिक शक्ति समाज के आख़िरी व्यक्ति तक कैसे पहुँचे.''
दिल्ली के भारती कॉलेज के आंबेडकर स्टडी सर्किल के डॉ. जसपाल सिंह का कहना है, "आंबेडकर ने सिर्फ़ दलित वर्ग के लिए ही नहीं बल्कि समाज के सभी दबे-कुचले लोगों की बेहतरी के लिए काम किया."
"हालाँकि, इस संदर्भ में दूसरों के साथ उनके राजनीतिक मतभेद भी रहे लेकिन उनका मूल लक्ष्य समाज में बराबरी का ही था."
आंबेडकर और राजनीति

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साल 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर ही भाजपा को घेरने की कोशिश की थी. ऐसा माना जाता है कि इस वजह से भी भाजपा अकेले बहुमत के आँकड़े तक नहीं पहुँच सकी. लिहाज़ा, अमित शाह के बयान पर भाजपा चिंतित दिख रही है.
अमित शाह राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान डॉ. बीआर आंबेडकर की विरासत पर बोल रहे थे.
उन्होंने कहा था, "…अब ये एक फ़ैशन हो गया है. आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता."
गृह मंत्री के भाषण के इसी छोटे से अंश पर विपक्षी दल आपत्ति जता रहे थे.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला कहते हैं, "बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर राजनीतिक दलों के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में अनुसूचित जाति के 20-22 प्रतिशत मतदाता हैं."
"असली लड़ाई इस वोट बैंक को हासिल करने और उसे बरक़रार रखने की है. वास्तव में लंबे प्रयास के बाद पिछले दिनों भाजपा अनुसूचित जाति के एक बड़े वर्ग को लुभाने में कामयाब हुई थी."
इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शाह के हमलों के बावजूद कांग्रेस इस मुद्दे पर पीछे हटते दिखना नहीं चाहती.
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, "बाबा साहेब आंबेडकर जी ने हमें हमारा संविधान दिया. हर नागरिक को अधिकार दिया है."
"भाजपा ने जिस तरह से उनका अपमान किया, उससे पूरे देश की जनता आहत है. बाबा साहेब का इस तरह से अपमान देश नहीं सहेगा."
कांग्रेस के साथ ही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) भी भाजपा के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आई.
अभी तक ज़्यादातर मुद्दों पर ख़ामोश रहने वाले बीएसपी के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार 24 दिसंबर को हर ज़िला मुख्यालय पर प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भी दिया.
हालाँकि, बीएसपी की अध्यक्ष मायावती ने 'एक्स' पर लिखा कि धरना-प्रदर्शन इसका हल नहीं है.
उन्होंने कहा, "बाबा साहेब विरोधी टिप्पणी वापस नहीं लेने व पश्चाताप नहीं करने पर बीएसपी के आह्वान पर आयोजित ऐसे प्रदर्शन आदि समस्या का स्थाई हल नहीं हैं."
"इसके लिए बहुजनों को सत्ता की मास्टर चाबी प्राप्त करके, शासक वर्ग बनकर ही अपना उद्धार स्वयं करने योग्य बनना होगा. तभी मुक्ति व सम्मान संभव होगा."
भीमराव आंबेडकर की विरासत के साथ कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को मज़बूत किया था. उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर दलितों की अनदेखी संभव नहीं है.
आंबेडकर ने दलित समाज में सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही चेतना जगाई है. अब यह एक बड़ा धड़ा है. राजनीतिक रूप से काफ़ी मज़बूत भी है.
इसके साथ आ जाने पर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचा जा सकता है.

दलित समाज में आंबेडकर का क्या स्थान है, भाजपा को भी ये बात बख़ूबी पता है.
इसलिए इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे तो आए लेकिन उन्होंने बीएसपी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा.
मंगलवार 24 दिसंबर को एक प्रेस कांफ्रेंस में योगी आदित्यनाथ ने कहा, "गृहमंत्री अमित शाह के आधे-अधूरे बयान को पेश कर राजनीति की जा रही है."
"कांग्रेस और सपा ने गफ़लत पैदा करने का प्रयास किया है. सपा सरकार के समय सुपर सीएम ने बाबा साहेब पर क्या कहा था, यह किसी से छिपा नहीं है."
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला के मुताबिक, "साल 2024 के लोकसभा के चुनावों के दौरान इंडिया गठबंधन ने दलित समाज के एक धड़े को अपने पक्ष में कर लिया था."
"विपक्ष ने भाजपा के कई नेताओं के बयानों के आधार पर जनता को यह बताया कि अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो आरक्षण समाप्त कर देगी. संविधान बदल देगी."
"यही नहीं, गृह मंत्री अमित शाह के अप्रैल 2024 के एक बयान को काट-छाँट कर आरक्षण समाप्त करने की झूठी बात फैलाई गई. लोकसभा चुनाव में वह काम भी कर गई."
हालाँकि, शुक्ला नहीं मानते कि यह रणनीति दोबारा काम करेगी. उनका तर्क है, "ऐसा इसलिए कि एक तो चुनाव अभी दूर है. दूसरा, एक ही मसले को राजनीतिक दल कितनी बार उपयोग में ला सकते हैं."
आंबेडकर कैसे बने दलितों के मसीहा

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मीडिया स्टडीज़ ग्रुप ने समाजवादी चिंतक मधु लिमये की एक किताब छापी है- डॉ. आंबेडकरः एक चिंतन.
इसमें उनके हवाले से लिखा गया है "जीवन के कटु अनुभवों से आंबेडकर ने सीखा था कि दलितों की स्थिति में सुधार समतामूलक समाज की स्थापना में एक व्यापक आंदोलन का हिस्सा है."
इस वजह से ही आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन की लडाई लड़ी. इसमें उनके अन्य लोगों से वैचारिक मतभेद भी रहे. यहाँ तक कि आंबेडकर ने सामाजिक चेतना जगाने के लिए हिंदू धर्म को भी त्याग दिया था.
मधु लिमये के मुताबिक, "आंबेडकर को अर्थशास्त्र पढ़ने के लिए विदेश भेजा गया था लेकिन उनकी सबसे ज्यादा रुचि जाति समस्या को लेकर ही थी."
"जाति व्यवस्था के उद्गम स्थल की खोज और उसको नष्ट करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया था."
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया का कहना है, "आंबेडकर अपने इस विचार की वजह से दोनों धड़ों के निशाने पर रहे हैं."
"भाजपा और कांग्रेस ने आंबेडकर की विचारधारा का समर्थन राजनीतिक कारणों से ही किया है लेकिन इसका समायोजन नहीं किया."
"आंबेडकर जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे. इसके ख़िलाफ़ उनकी विचारधारा की लड़ाई अब भी जारी है."
हालाँकि, अनिल चमड़िया का कहना है, "आंबेडकर को कांग्रेस भी नापसंद करती रही है. भाजपा और कांग्रेस द्वारा एक-दूसरे को आंबेडकर का विरोधी बताना, हिन्दुत्ववाद के बीच में डॉ. आंबेडकर को फँसाए रखने का प्रयास है."
"डॉ. आंबेडकर ने हिन्दुत्ववादी यानी मनुवादी विचारधारा को किसी भी स्तर पर स्वीकार करने वाली राजनीतिक पार्टियों की आलोचना की है. उन्हें समाज में समानता विरोधी बताया है."
दूसरी ओर, प्रोफ़ेसर श्याम लाल का मानना है, "सिर्फ़ दलितों के लिए ही नहीं, आंबेडकर ने महिला, पुरुष, अल्पसंख्यक के लिए भी काम किया है."
"एक राष्ट्र को कैसे सबको एक साथ लेकर चलना चाहिए, यह सोच आंबेडकर ने ही दी है."
"एक राष्ट्र तभी अग्रसर हो सकता है, जब समाज में सबको बराबरी को दर्जा प्राप्त हो. समाज में किस तरह से सबको शामिल करना है, यह आंबेडकर ने बताया है."
हालाँकि, प्रोफेसर श्याम लाल के मुताबिक, "कोई भी महापुरुष होता है तो उसको उस समाज से जोड़ दिया जाता है, जिसमें वह पैदा होता है. ये एक त्रासदी है."
"आंबेडकर ने सिर्फ़ दलितों के लिए ही काम नहीं किया, बल्कि उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक के लिए काम किया."
'जाति-विहीन व्यवस्था, स्वराज से अधिक ज़रूरी'

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आंबेडकर का मानना था कि स्वराज से पहले हिंदू समाज में जाति-विहीन व्यवस्था क़ायम करना ज़रूरी है.
एक जगह उन्होंने लिखा था, "ऐसे स्वराज का कोई फ़ायदा नहीं है जिसकी आप रक्षा न कर सकें. मेरे विचार में हिंदू समाज जब जाति-विहीन हो जाएगा, तभी उसमें अपने-आप की रक्षा करने की ताक़त आएगी."
पूर्व आईएएस अधिकारी पीएल पुनिया कहते हैं,"आंबेडकर ने अंग्रेज़ों से कहा कि वे यहाँ से जाएँ, लेकिन इस जाति व्यवस्था को ख़त्म करके ही जाएँ.''
उस समय हिंदू महासभा जैसे संगठन भी हिंदू समाज को ताक़तवर बनाने की बात कर रहे थे.
हिंदुओं की संख्या बढ़ाने और मुसलमानों की तादाद कम करने का उनका एक फ़ॉर्मूला था. उन लोगों का शुद्धिकरण हो जिनके पूर्वजों ने किन्हीं कारणों से इस्लाम धर्म अपना लिया था.
आंबेडकर ने 'तेलुगू समाचार' के एक अंक में लिखा था, "अगर हिंदू समाज बचा रहना चाहता है तो उसे अपनी संख्या बढ़ाने के बजाय अपनी एकजुटता बढ़ाने पर ज़ोर देना चाहिए."
"इसका सीधा मतलब है, जाति का उन्मूलन. अगर हिंदू समाज को जाति का उन्मूलन कर संगठित कर दिया जाए तो शुद्धि की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
आंबेडकर और सावरकर

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बाबा साहब आंबेडकर ने बहुत पहले ही कह दिया था, "हम समाज में बराबरी का अधिकार चाहते हैं और हम जहाँ तक संभव है, हिंदू समाज में ही रहकर ये अधिकार लेना चाहते हैं."
"अगर ज़रूरी हुआ तो हम हिंदुत्व से पिंड छुड़ाने से नहीं हिचकेंगे. अगर हम हिंदुत्व को छोड़ते हैं तो मंदिर जाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं रहेगी."
हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर आंबेडकर और सावरकर की राय अलग-अलग थी.
जब आंबेडकर ने ये कहा था कि हिंदू धर्म छोड़ने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होगी, तब उन्होंने ये साफ़ नहीं किया था कि वह बौद्ध धर्म अपनाने के बारे में सोच रहे हैं.
इस विषय में सावरकर ने 'निर्भिद' के तीन नवंबर 1935 के अंक में एक विस्तृत लेख लिखा था.
सावरकर ने आंबेडकर के हिंदू धर्म छोड़ने की इच्छा पर सवाल उठाते हुए लिखा था, "हिंदू धर्म में भी हर संगठित धर्म की तरह तर्कहीनता के कुछ तत्व हैं. लेकिन दूसरे धर्मों में भी इस तरह की तर्कहीनता पाई जाती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















