जौन एलियाः ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं - विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
जौन एलिया के दोस्त क़मर रज़ी ने उनके बारे में एक बार कहा था, “जल्दी बुरा मानने वाला मगर बेहद मुख़लिस (सच्चा) दोस्त, अपने ख़यालात में डूबा हुआ राहगीर,”
“एक अभिमानी फ़लसफ़ी, तुरंत रो देने वाला ग़मगुसार (हमदर्द), ग़लत हद तक ख़ुद्दार और मनमौजी आशिक, बहुत ही कमज़ोर मगर सारी दुनिया से एक साथ झगड़ा मोल ले लेने वाला,”
“सारे ज़माने को अपना दोस्त बना लेने वाला अजनबी, हद दर्ज़ा ग़ैर-ज़िम्मेदार और बीमार, ये है वो फ़नकार जिसे जौन एलिया कहते हैं.”
जौन एलिया का जन्म 14 दिसंबर, 1931 को अमरोहा में साहित्यकारों और विद्वानों से भरे ख़ानदान में हुआ था.

जौन एलिया पर एक किताब ‘जौन एलिया, एक अजब ग़ज़ब शायर’ लिखने वाले मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी बताते हैं, “जौन साहब मेरे लिए द्रोण हैं और मैं उनका एकलव्य हूँ.”
“जौन साहब को मैंने कभी देखा नहीं. मैंने बहुत शायरों को पढ़ा था, सुना था, लेकिन जौन साहब से ही ख़ास लगाव हो गया. जौन साहब का अंदाज़ ही वैसा है.”
“जौन जो बाल झटकते हैं. हर नौजवान को प्रभावित करते हैं. मजरूह सुल्तानपुरी ने उन्हें शायरों का शायर कहा था.”
बीबीसी से बात करते हुए मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी कहते हैं, “जो मक़बूल (लोकप्रिय) हो जाए और वो शायर भी अच्छा हो, इस बात की कोई गारंटी नहीं. लेकिन जौन मक़बूल भी हैं और अच्छे शायर भी हैं.”
“कई लोग अमरोहा से वीडियो कॉल करके मुझे जौन साहब का घर दिखाते हैं. अपने पिता अल्लामा शरीफ़ हसन एलिया की वो सबसे छोटी औलाद थे.”
“मशहूर फ़िल्मकार और शायर कमाल अमरोही इनके चचेरे भाई थे.”
जौन शुरू में पढ़ने-लिखने में ज़्यादा अच्छे नहीं थे, छह साल की छोटी उम्र में उन्होंने अपना पहला शेर कह दिया था-
चाह में उसकी तमाचे खाए हैं
देख लो सुर्ख़ी मेरे रुख़सार की
जौन एलिया की भाषाओं में ख़ासी रुचि थी. अरबी- फ़ारसी तो वो जानते ही थे. बाद में उन्होंने अंग्रेज़ी, हिब्रू और संस्कृत भी सीख ली.
उर्दू के अलावा इतिहास और सूफ़ी रवायत पर उनकी पकड़ काफ़ी मज़बूत थी.
ज़ाहिदा हिना से शादी और तलाक

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जौन धर्म के आधार पर देश विभाजन के घोर विरोधी थे और भारत में ही रहना चाहते थे लेकिन परिवार के अधिकतर सदस्यों के पाकिस्तान चले जाने के बाद उन्हें भी सन 1956 में पाकिस्तान जाना पड़ा.
जौन साहब से ये जुमला अकसर सुना जाता था, “पाकिस्तान... ये पाकिस्तान... ये सब अलीगढ़ के लौंडों की शरारत थी.”
उर्दू पत्रिका इंशा निकालने के दौरान उनकी मुलाकात ज़ाहिदा हिना से हुई. उनसे इश्क हुआ और फिर सन 1970 में दोनों की शादी हो गई. ये रिश्ता बहुत दिनों तक चल नहीं पाया.
दोनों के मिज़ाज के फ़र्क ने अपना रंग दिखाया और सन 1984 में दोनों ने तलाक़ ले लिया.
जौन एलिया की बेटी सोहैना एलिया ने रावलपिंडी से फ़ोन पर बात करते हुए कहा, “दरअसल, मैं समझती हूँ जौन एलिया और ज़ाहिदा हिना दोनों के साथ ज़्यादती हुई.”
“दोनों को शादी नहीं करनी चाहिए थी. दोनों को अपने काम पर ज़्यादा वक़्त देना चाहिए था.”
ज़ाहिदा हिना एक ज़माने में बीबीसी उर्दू के लिए काम किया करती थीं. एक बार उन्होंने जौन पर एक लेख ‘अपने कर्बला की तलाश’ में लिखा था, “उनकी महबूबाएं भी कहानी के किरदारों जैसी होती थीं.”
“अपने महबूब को पाताल से ज़िंदा कर लाती हुईं और अपने आशिक़ के लिए सोने और जवाहरात के अंबार ठुकराती हुई.”
“वो एक ऐसे मर्द थे जो आगे बढ़कर हासिल करने के बजाए इस बात का इंतज़ार करता है कि वो चाँदी के बदन वाली न सिर्फ़ इश्क के इज़हार में पहल करे बल्कि इश्क को मंज़िल तक पहुंचाना भी उसी का फ़र्ज़ ठहरे और जो नाकारापन और कम-हिम्मती को अपनी ख़ुद-पसंदी की आड़ में छिपा ले.”
कई परतों वाले इंसान

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जौन एलिया की बेटी सुहैना एलिया ने अपने पिता को याद करते हुए बीबीसी से कहा, “उनकी बहुत परतें थीं. कहीं ग़ुस्सा है, कहीं कुढ़न है, कहीं ग़म है, कहीं झुंझलाहट है, कहीं बहुत नफ़रत है, कहीं अना-पसंदगी (अहंकार प्रियता), वो निहायत ही मुश्किल इंसान थे. वो एक तरह से अपनी ही ईगो की क़ैद में बंद थे.”
सुहैना अपने पिता का एक शेर सुनाती हैं—
मैं भी बहुत अजीब हूँ, इतना अजीब हूँ कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
सुहैना कहती हैं, “उनसे बहुत कुछ सीखना और पढ़ना चाहती थी लेकिन वो अपने आप में उलझे रहे. उन्होंने मेरे और मेरे भाई-बहन के साथ न उस तरह का वक़्त गुज़ारा, न उस तरह से बातें कीं.”
“वो ये भूल जाते थे कि हम किन क्लासों में हैं. वो हमारी उम्र भूल जाते थे. वो अपने ही अंदर एक बच्चा थे. मैं उनसे थोड़ा-बहुत तो पढ़ पाई लेकिन मैं फ़ारसी और अरबी नहीं सीख पाई.”
“उनके पास वक़्त ही नहीं होता था. वो आधा दिन तो सोते थे.”
बचपन के दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, “जब अम्मी ऑफिस से आती थीं तो वो कहते थे गब्चू मुझे बहुत तंग करती है. वो मुझे प्यार से गब्चू कहते थे.”
“मुझे कुछ लिखना होता था तो मैं उनसे कहती थी अब्बू मुझे फ़ौरन एक शेर बता दें. तो वो हँसकर कहते थे, ग़ब्चू, ये अशआर हैं. फ़ैक्ट्री थोड़े ही है. शेर कहना कोई आसान बात थोड़े ही है.”
कलाम पढ़ने का निराला अंदाज़

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पाकिस्तान आकर जौन ने अपनी शायरी के झंडे गाड़ दिए. शायरी के साथ-साथ लोग उनके पढ़ने के ड्रामाई अंदाज़ से बहुत खुश होते थे.
जौन को अजूबा बनकर लोगों का ध्यान खींचने में बहुत मज़ा आता था. लंबे-लंबे बालों के साथ, गर्मियों में कंबल ओढ़ कर निकलना और रात के वक्त धूप का चश्मा लगाना उनके लिए आम बात थी.
जौन एलिया शराब पीने के शौक़ीन थे और वे इसको बिल्कुल भी नहीं छिपाते थे, बाद के दिनों में वे बहुत ज़्यादा पीने लगे थे.
मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी बताते हैं, “जौन मंचों के आदमी थे. मंच पर क्या ड्रामा करना, लोगों को क्या पसंद आएगा, बहुत बेहतरी से जानते थे.”
“जौन साहब कहते भी थे कि अगर मैं शायर न होता तो ड्रामेबाज़ होता. वो सारे नियमों को ताक पर रख देते थे. उनका खिलंदड़पन हमेशा ज़िंदा रहता है. ग़ुस्से में आदमी चाहता है कि मैं दीवार को तोड़ दूँ.”
“दूसरी जगह निकल जाऊँ. सब सामान फेंक दूँ. जौन साहब इसे अपने शेरों में ले आते हैं. आदमी देखता है ये तो मेरी ज़िंदगी है, मेरा संघर्ष है.”
जौन एलिया अपने वक़्त के दूसरे शायरों से एक बिल्कुल अलग पहचान रखने वाले शायर हैं.
पाकिस्तानी शायर और पत्रकार अहमद नदीम क़ासमी लिखते हैं, “बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से की शायरी में उनकी आवाज़ अलग से पहचानी जा सकती है.”
“उर्दू शायरी के तीन सौ साल के इतिहास में किसी शायर ने इस लहजे के, इस मानी के और ऐसी चुभन के शेर कम ही कहे होंगे.”
क़ासमी उनके कलाम सुनाते हैं—
क्या सितम है कि अब तेरी सूरत
ग़ौर करने पे याद आती है
या फिर ये शेर—
न करो बहस हार जाओगी
हुस्न इतनी बड़ी दलील नहीं
जौन एलिया ने न जाने कितने मुशायरों को लूटा और कितने ही लोगों की तन्हाइयों के साथी बन गए.
क़ासमी कहते हैं, “जौन साहब की शायरी गुफ़्तगू करती है.”
“वो स्टेज पर बैठकर बातचीत करना जानते हैं उन्हें मालूम था, कैसे और किस शेर को लोगों तक पहुंचाना है, कैसे ख़ुद ही अपना सिर पटकना है, हाथ पैर मारने हैं और तो और कब अपने ही शेर पर झूमना है. उनके यही अंदाज़ उन्हें और सबसे जुदा करते हैं.”
आशिक़ाना मिज़ाज

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जौन एलिया का मिज़ाज बचपन से ही आशिक़ाना था. उनकी एक ख़्याली महबूबा हुआ करती थी जिससे वो अक्सर बातें किया करते थे.
बारह बरस की उम्र में वो अपनी ख़्याली महबूबा सोफ़िया को चिट्ठियाँ भी लिखा करते थे.
फिर नौजवानी में उन्होंने एक लड़की फ़ारिहा से इश्क भी किया जिसे वो ज़िंदगी भर याद भी करते रहे, लेकिन उससे कभी इज़हार-ए-इश्क नहीं किया.
इश्क के इज़हार को वो एक छोटा काम समझते थे.
मशहूर पाकिस्तानी व्यंग्यकार मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी एक किस्सा सुनाया करते थे, “जब जौन ने कहा कि मेरा पहला इश्क़ आठ साल की उम्र में एक क़ातिल हसीना से हुआ था तो मुझसे रहा नहीं गया.”
“मैंने बहुत अदब से पूछा, उन साहिबा की उस वक़्त क्या उम्र रही होगी, फ़रमाया, ‘छह साल.’ मैंने हैरत से उनकी तरफ़ देखा तो उन्होंने बालों में उंगलियाँ फेरकर इस तरह कंघी की कि वो और उलझ जाएं और फिर बोले, ‘बालिग़ होने का उम्र से कोई रिश्ता नहीं.”
जौन ने खुद लिखा है, “लड़की हमारे घर आई. उस वक्त मैं खाना खा रहा था. मैंने उसे देखते ही फ़ौरन निवाला निगल लिया.”
“महबूबा के सामने निवाला चबाने का काम मुझे बदतमीज़ी और बेहूदगी का महसूस हुआ.”
“मैं अक्सर ये सोचकर शर्मिंदा हो जाता था कि मुझे देखकर कर वो कभी-कभी सोचती होगी कि मेरे जिस्म में भी आँतों जैसी घिनौनी और ग़ैर-रूमानी चीज़ पाई जाती है.”
मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी लिखते हैं, “एलिया आशिक़मिज़ाज शायर हैं लेकिन ये आशिक दबा-कुचला-हताश-परेशान नहीं है, एलिया आशिक-माशूक़ की शायरी करते हुए भी टशन में रहने वाले शायर हैं.”
अमरोहा से 'इश्क़'

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जौन कराची में भले ही बस गए हों लेकिन वो अमरोहा को ताउम्र नहीं भूल पाए.
मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी बताते हैं, “वो अमरोहा पर जान छिड़कते थे. अमरोहा के उनके कई किस्से हैं. एक बार जब वो अमरोहा स्टेशन पर उतरे तो सबसे पहले वहाँ की मिट्टी में लोट गए.”
“अमरोहा की बान नदी की उन्हें बहुत याद आती थी. एक बार मंच पर उनका परिचय देते हुए किसी ने उन्हें पाकिस्तानी शायर कह दिया था. इसका उन्होंने बहुत बुरा माना था.”
“वो फफक कर रो पड़े और कहा मैं पाकिस्तान का नहीं हूँ. मैं हिंदुस्तान का शायर हूँ.”
जौन की बहन सैय्यदा शाह-ए-ज़नाँ नजफ़ी लिखती हैं, “उनको अमरोहा के हमारे ज़माने के खेल जैसे गिल्ली डंडा बहुत पसंद थे. हर बार जब वो अमरोहा आते तो अपनी सरज़मीं को चूमते.”
“दिल्ली में जब वो मेरी बेटी के घर जाते तो कहते कि मैं उस रुख़ से बैठना चाहता हूँ जिधर से अमरोहा की हवा आती है. अमरोहा में गर्मियों में बड़े-बड़े आँगन वाले घरों में पानी का छिड़काव होता था.”
“जब वो दिल्ली में होते तो उसी तरह का माहौल पैदा करने के लिए शोर मचाते. कहते टैरेस पर छिड़काव करो, कुर्सियाँ डालो और मेरी कुर्सी का रुख़ अमरोहा की तरफ़ करो.”
मुशायरा लूटने में माहिर

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उन्हें नज़दीक से जानने वाले शकील आदिलज़ादा लिखते हैं, “वो भरे मुशायरे में कलाम सुनाते हुए किसी जानने वाले के नज़र आ जाने पर उसका नाम लेकर ताज्जुब का इज़हार करते थे, अरे काशिफ़ तुम भी? वो अपनी बिटिया कैसी है.”
“पिछली बार उसने क्या मिर्च क़ीमा खिलाया था! वो कलाम छपवाने में काहिल और मुशायरा लूट लेने के तौर-तरीक़ों में माहिर थे.”
“याद नहीं कि कभी हूट हुए हों, उल्टा उन्हें सुनने वालों को हूट करने का हुनर ख़ूब आता था. बातचीत में अनोखे अछूते जुमलों से सामने वाले को लाजवाब कर देने में उनका कोई तोड़ नहीं था.”
जौन के प्रशंसकों की दीवानगी

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मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी लिखते हैं, “जौन के एक प्रशंसक का यहाँ तक कहना है, जब आप जौन साहब से बातें करते हैं तो ऐसा महसूस करते हैं जैसे किसी ‘लिबरेटेड ख़ातून’ को डेट कर रहे हों.
“किसी बात पर बहस करने के बाद आप जौन साहब से दोबारा उसी विषय पर बात करेंगे तो उनकी बात में कोई रिपीटेशन नहीं होगा.”
जौन की कई किताबें प्रकाशित करवाने वाले ख़ालिद अहमद अंसारी का कहना है, “मेरे पास पंजाब से सिखों की कॉल आती है, वो कहते हैं, ‘यार, ये आदमी कौन है जिसने हमें पागल कर दिया है.’
अफ़गानिस्तान से कॉल आती है, ‘यार, ये आदमी हमें मार डालेगा.”
ख़ालिद अंसारी आगे लिखते हैं, “मुझे देख कर उन्होंने एक जुमला कहा था, ‘मियां, तुम्हारी उमर का कोई लड़का हमारे साथ कभी बैठा नहीं है...तुम बैठ तो रहे हो लेकिन ख़्याल रखना कभी दुनिया के साथ चल नहीं पाओगे.' उस वक्त तो मुझे उस बात का अहसास नहीं हुआ, लेकिन आज होता है और इसलिए आम लोगों के साथ हमारी पटरी नहीं बैठ पाती.”
जौन एलिया ने ख़ुद के बारे में कहा था-
ये है एक जब्र, इत्तेफाक़ नहीं
जौन होना, कोई मज़ाक़ नहीं
धर्म और ईश्वर में नहीं था विश्वास

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दुनिया के सारे धर्मों की उन्हें गहरी जानकारी थी और धर्मों से बेगानगी भी.
धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने से बचते भी थे और दुनियादारी की वजह से शामिल भी होते थे.
शकील आदिलज़ादा लिखते हैं, “मैंने उन्हें कभी दुआ करते नहीं देखा. एस्ट्रॉनॉमी, स्टेटिसटिक्स, पामिस्ट्री और दूसरी ऐसी कई चीज़ों में उन्हें दिलचस्पी थी. देसी बल्कि देहाती खानों के शौकीन थे.”
सुहैना एलिया याद करती हैं, “उनको खाने में क़ीमा मिर्च बहुत पसंद थी. पतले शोरबे के सालन में आलू गोश्त उनको बहुत पसंद था.”
“अगर रात की रोटी बची होती थी तो सुबह लाल मिर्च की चटनी से खाकर बहुत ख़ुश होते थे. वो दूध डबलरोटी का नाश्ता करते थे.”
“फल का जब ज़िक्र करते थे तो बहुत मोहब्बत से अमरोहा के ख़रबूज़ों को याद करते थे. उन्हें फिरनी बहुत पसंद थी.”
“अक्सर जब हम चाइनीज़ रेस्तराँ जाया करते थे तो वो बहुत बोर होते थे और इस फ़िराक में रहते थे कि वहाँ भी उन्हें किसी तरह से देसी खाना मिल जाए.”
“अम्मी कहती थीं कि ये तो मुमकिन नहीं है कि चाइनीज़ होटल में आके हमें सालन और रोटी मिले.”
अलग क़िस्म के इंसान
जौन की याद्दाश्त कमाल की थी. ग़ज़ब के हाज़िरजवाब, लेकिन ख़ुद में खोए हुए शख़्स थे.
ख़ालिद अहमद अंसारी ने उनके कई संस्मरण लिखे हैं.
वो लिखते हैं, “वो मुझसे कहा करते थे, तुझे मालूम है तेरा जौन भाई बड़ा मॉडर्न आदमी हुआ करता था.”
“पर्दों का कपड़ा खरीदकर उनकी पैंट सिलवा कर पाजामे के ऊपर पहनता था ताकि रानें भरी-भरी लगें. उस ज़माने की रॉक हडसन की मशहूर फ़िल्म ‘कम सेप्टेम्बर’ के म्यूज़िक पर डांस किया करता था.”
मीर तकी मीर की मशहूर ग़ज़ल ‘दिखाई दिए यूँ के बेख़ुद किया’ उन्हें बहुत पसंद थी. अक्सर उसे गुनगुनाया भी करते थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















