स्क्वाड्रन लीडर देवैया की कहानी जिन्हें मौत के 23 साल बाद मिला महावीर चक्र - विवेचना

स्क्वाड्रन लीडर देवैया

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इमेज कैप्शन, स्क्वाड्रन लीडर टबी देवैया जिनको मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

साल 1965 में भारत चीन से मिली हार से उबरने की कोशिश कर रहा था. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान को अमेरिका से बड़ी सैनिक सहायता मिली थी.

युद्ध की औपचारिक घोषणा से पहले ही 6 सितंबर, 1965 की शाम पाकिस्तान ने भारतीय हवाई ठिकानों पर अचानक हमला बोल दिया था.

इस हमले में पठानकोट में भारत के ज़मीन पर खड़े कुछ विमान नष्ट हो गए थे. इस हमले से पूरी भारतीय वायुसेना में नाराज़गी फैल गई थी. उनमें सबसे ज़्यादा नाराज़ थे स्क्वाड्रन लीडर टबी देवैया.

देवैया ने छह दिन पहले ही आदमपुर में नंबर-एक स्क्वाड्रन में कार्यभार सँभाला था. वो कुर्ग के रहने वाले थे और उनकी गिनती भारतीय वायुसेना के कुशल और निर्भीक फ़ाइटर पायलटों में होती थी.

लाल रेखा

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आदमपुर एयर फ़ोर्स स्टेशन

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इमेज कैप्शन, देवैया को आदमपुर एयर फ़ोर्स स्टेशन में उनके अनुरोध पर तैनात किया गया था

इसके अलावा वो हॉकी के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे. वो 6 नवंबर, 1954 को भारतीय वायुसेना का हिस्सा बने थे और शुरू मे वैंम्पायर विमान उड़ाया करते थे.

आदमपुर आने से पहले वो हाकिमपेट एयरफ़ोर्स फ़्लाइंग कॉलेज में भारतीय युद्धक पायलटों को ट्रेनिंग दे रहे थे. जब पाकिस्तान से लड़ाई का माहौल बनने लगा तो उन्होंने खुद विमान उड़ाने की पेशकश की.

उनके इस अनुरोध को मान लिया गया और उन्हें आदमपुर की नंबर- एक स्क्वाड्रन में पोस्ट कर दिया गया.

सरगोधा पर जवाबी हमला करने के आदेश
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इयान कारडोज़ो अपनी किताब 'बियॉन्ड फ़ियर' में लिखते हैं, "भारतीय वायुसेना के कमांड मुख्यालय ने छह सितंबर की देर रात आदेश दिया कि आदमपुर और हलवाड़ा के मिस्टियर और हंटर स्क्वाड्रन पाकिस्तान हवाई ठिकानों पर जवाबी हमला किया जाएगा."

उन्होंने आगे लिखा, "आदमपुर टाइगर्स के कमांडिंग अफ़सर ओपी तनेजा ने तय किया कि उनकी स्क्वाड्रन पाकिस्तान के सरगोधा हवाई ठिकाने पर हमला बोलेंगी. तय हुआ कि सात सितंबर की सुबह भारतीय समय के अनुसार सुबह पांच बजकर 55 मिनट पर सरगोधा पर हमला बोला जाएगा."

योजना बनाने वालों से ये चूक हुई कि उन्होंने सरगोधा का समय चुनने के बजाए आदमपुर का समय पांच बजकर 55 मिनट चुना. वो ये अंदाज़ा नहीं लगा पाए कि सरगोधा में सूर्योदय का समय छह बजकर 10 मिनट था. यानी जब तक मिस्टियर विमान सरगोधा के ऊपर पहुंचेगा, वहां अंधेरा छाया रहेगा.

पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा अपनी किताब 'द इंडिया-पाकिस्तान एयर वॉर ऑफ़ 1965' में लिखते हैं, "विंग कमाँडर तनेजा ने आख़िरी समय पर हमले का समय 15 मिनट देरी से यानि छह बजकर 10 मिनट पर करने का अनुरोध किया लेकिन उनके इस अनुरोध को इसलिए नहीं माना गया क्योंकि हलवाड़ा से हंटर स्क्वाड्रन को भी इसी समय हमला करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी और उनके प्लान को अंतिम समय पर छेड़ा नहीं जा सकता था."

आदमपुर हवाई ठिकाने के कमांडिंग अफ़सर ओपी तनेजा

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इमेज कैप्शन, आदमपुर हवाई ठिकाने के कमांडिंग अफ़सर ओपी तनेजा थे

सुबह 3 बजे सभी पायलटों को जगाया गया

देवैया को मुख्य हमला करने वाली टीम में नहीं रखा गया था. वो एक रिज़र्व पायलट थे. इसका मतलब ये था कि वो हमले में तभी भाग लेंगे अगर कोई विमान किन्हीं कारणों से टेक ऑफ़ नहीं कर पाएगा.

आदमपुर से सरगोधा तक का फ़्लाइंग टाइम 30 मिनट था. पूरे ऑपरेशन के लिए सिर्फ़ एक घंटे का समय दिया गया था.

मिस्टियर विमान के पायलटों को निर्देश था कि वो सिर्फ़ सरगोधा हवाई ठिकाने पर बम गिराएं और हवा में पाकिस्तानी विमानों से लड़ने की कोशिश न करें.

पायलटों को आदेश मिला कि वो उस दिन रात का खाना जल्दी खा लें और तुरंत सो जाएं ताकि अटैक से पहले वो थोड़ी नींद ले सकें.

सुबह तीन बजे उनके सहायकों ने सभी पायलटों को जगा दिया. ठीक चार बजे सुबह सभी 12 और 2 स्टैंडबाई पायलट जी सूट पहने स्क्वाड्रन के ब्रीफ़िंग रूम में पहुंच गए.

उस समय पूरा भारत सो रहा था. सरगोधा हवाई ठिकाने में चार हवाई पट्टियाँ थीं, सरगोधा मेन, छोटा सरगोधा, वागोवाल और बगटनवाला.

पाकिस्तान का सरगोधा एयरबेस

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टेक-ऑफ़ से पहले पाकिस्तानी हवाई हमला

सुबह चार बज कर 15 मिनट पर सभी पायलटों की ब्रीफ़िंग समाप्त हुई. लेकिन इस हमले में शुरू से ही परेशानियां खड़ी हो गईं.

जैसे ही सभी पायलट अपने विमानों तक पहुंचे एयर रेड का सायरन बज उठा. सभी पायलटों और तकनीशियनों ने दौड़कर बंकरों में शरण ली.

पाकिस्तान के बी-57 विमानों ने कुछ बम गिराए लेकिन कोई बड़ा नुक़सान नहीं हुआ.

पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा लिखते हैं, "जब तनेजा अपने विमान पर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि वो अपना पैराशूट भूल आए हैं. दूसरे विमानों के विपरीत जिनमें पैराशूट सीट से जुड़े होते हैं, मिस्टियर के पायलट को उन्हें अपने हाथों में ले जाकर सीट में फ़िट करना होता था."

"सभी पायलट अपना पैराशूट खुद लेकर जाते थे सिवाए कमांडिंग अफ़सर के जिनका पैराशूट एयरमैन लेकर चलता था. जब पैराशूट की तलाश शुरू हुई तो उसे नज़दीक के एक गड्ढे में पाया गया."

"हुआ ये कि एयर रेड के दौरान एयरमैन ने सीओ का पैराशूट गड्ढे में फेंक दिया. थोड़ी देर बाद विंग कमाँडर तनेजा ने टेकऑफ़ किया. उस समय पाकिस्तानी हमले के कारण आदमपुर रनवे की लाइट्स बुझी हुई थीं."

1965 की जंग पर पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा की क़िताब

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हमले के दौरान पूरा रेडियो साइलेंस

चार विमानों की दूसरी खेप का नेतृत्व स्क्वाड्रन लीडर डैनी सटूर कर रहे थे. स्क्वाड्रन लीडर सुदर्शन हाँडा तीसरी खेप के लीडर थे.

कमाँडिग अफ़सर तनेजा ने साफ़ कर दिया था कि सभी पायलटों को अपने लक्ष्य पर हमला कर तुरंत लौटना है क्योंकि उनके पास दूसरी बार हमला करने का न तो समय रहेगा और ना ही ईंधन ही.

इयान कारडोज़ो लिखते हैं, "तनेजा ने ब्रीफ़िंग में कहा अपनी आँखें खुली रखना. तुम्हारी प्राथमिकता ज़मीन पर खड़े दुश्मन के जहाज़ों को तबाह करना है. दूसरी प्राथमिकता आसपास के भवनों पर बमबारी करना रहेगा."

"विज़िबिलिटी इतनी अच्छी नहीं रहेगी लेकिन इसको हमला असफल होने का कारण नहीं माना जाएगा. जब तक विमान टेक ऑफ़ की जगह पर नहीं पहुंचते, पूरी 'रेडियो साइलेंस' रखी जाएगी. रनवे की लाइट तभी जलाई जाएगी जब विमान का इंजन स्टार्ट हो जाएगा. सारे विमान 30-30 सेकेंड के अंतराल पर टेक-ऑफ़ करेंगे. हम लोग 5.28 पर टेक ऑफ़ करेंगे और रडार से बचने के लिए 300 फ़िट की ऊँचाई पर उड़ान भरेंगे. हम लोग 30 मिनट में सरगोधा पहुंच जाएंगे और 5 बजकर 58 मिनट से 30-30 सेकेंड के अंतराल पर बम गिराने के लिए नीचे डाइव करेंगे."

कंट्रोल टावर से इन पायलटों का कोई संवाद नहीं हो रहा था क्योंकि पूरी तरह से 'रेडियो साइलेंस' रखने के आदेश थे. मिस्टियर्स विमानों के दो रिज़र्व पायलट अपने इंजन स्टार्ट कर कभी भी उड़ने की मुद्रा में तैयार खड़े थे.

आदमपुर एयरबेस पर नम्बर- एक स्क्वाड्रन की टीम

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ख़राब रोशनी में सरगोधा एयरबेस पर हमला

विमानों के उड़ान भरते ही दिक़्क़तें आना शुरू हो गईं. दूसरी खेप के दो विमानों में उड़ते ही तकनीकी ख़राबी आ गई. तीसरी खेप के विमानों में भी 'टैक्निकल स्नैग' आया.

तब इनके बदले में रिज़र्व मिस्टियर के साथ तैयार खड़े स्क्वाड्रन लीडर देवैया को टेक ऑफ़ करने के लिए कहा गया.

पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा लिखते हैं, "गरजते हुए मिस्टियर्स ने सरगोधा हवाई ठिकाने पर हमला किया. नीचे से विमानभेदी तोपों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी. समय था 5 बजकर 58 मिनट, निर्धारित समय से 3 मिनट देर."

"तनेजा और उनके विंगमैन वर्मा ने सरगोधा हवाई ठिकाने पर पहली डाइव लगाई. खड़े हुए एक बड़े चार इंजन के जहाज़ को पहचानते हुए उन्होंने उसे रॉकेट्स से बर्बाद कर दिया. ऊपर उठते हुए उनकी नज़र एक स्टार फ़ाइटर और तीन सेबर जेट्स पर पड़ी."

"उन्होंने रेडियो साइलेंस तोड़ते हुए दूसरे जत्थे को उन पर हमला करने के लिए कहा. लेकिन वहाँ रोशनी इतनी ख़राब थी कि सटूर उन विमानों को देख नहीं पाए. उन्होंने टेक्निकल एरिया के दूसरे लक्ष्यों पर हमला किया."

विंग कमांडर ओपी तनेजा अपनी टीम के साथ

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इमेज कैप्शन, विंग कमांडर ओपी तनेजा (बाएं बैठे हुए) अपनी टीम के साथ
अमजद ने कैनन से देवैया के विमान पर हमला किया

जैसे ही तनेजा एक हमला करने के बाद वापस अपने बेस जाने के लिए मुड़े, रिज़र्व पायलट देवैया का विमान वहाँ पहुंच गया.

इस बीच पाकिस्तान के सकेसर रडार स्टेशन ने पाकिस्तानी वायुसेना स्टारफ़ाइटर्स विमानों को भारतीय हमले के बारे में आगाह कर दिया था.

जब तक फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट अमजद हुसैन (जो बाद में एयर वाइस मार्शल बने) का एफ़-104 विमान वहां पहुंचता मिस्टियर्स विमान वापसी का रास्ता पकड़ चुके थे. देवैया सबसे पीछे थे. अमजद की निगाह सबसे पहले उन्हीं पर पड़ी.

इन दोनों पायलटों के बीच हुई हवाई लड़ाई का वर्णन एयर कोमोडोर कैसर तुफ़ैल ने अपनी किताब 'ग्रेट एयर बैटल्स ऑफ़ द पाकिस्तान एयरफ़ोर्स' और जॉन फ़्रिकर ने अपनी किताब 'बैटल फ़ॉर पाकिस्तान : एयर वॉर ऑफ़ 1965' में किया है.

विंग कमांडर अरिजीत घोष अपनी किताब 'एयर वॉरियर्स' में लिखते हैं, "फ़्लाइट लेफ़्टिनेट अमजद हुसैन आवाज़ से दोगुनी गति से तेज़ उड़ने वाले एफ़-104 स्टार फ़ाइटर को चला रहे थे. उनके विमान में ऊष्मा का पीछा करने वाली दो साइडविंडर मिसाइल लगी हुई थीं. उन्होंने अपना विमान स्क्वाड्रन लीडर देवैया के विमान के पीछे लगा दिया."

"उन्होंने अपनी साइडविंडर मिसाइल छोड़ी जो निशाने पर न लगकर ज़मीन पर गिरी. अमजद ने तब अपनी 20 एमएम कैनन चलाई जिसके गोले देवैया के विमान में लगे. अमजद ये सोचकर डॉग फ़ाइट से बाहर निकल आए कि अब देवैया के विमान को धराशायी होने से कोई नहीं बचा सकता."

पाकिस्तानी वायु सेना के फ्लाइट लेफ्टिनेंट अमजद हुसैन ख़ां

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देवैया ने स्टारफ़ाइटर से भिड़ने का फ़ैसला किया

अरिजीत घोष ने लिखा है, "लेकिन देवैया का विमान चोट खाने के बावजूद अब भी लड़ने की स्थिति में था. देवैया के पास दो विकल्प थे. पहला कि वो स्टारफ़ाइटर का आमने-सामने मुक़ाबला करें जिसमें अगर वो बच भी जाते तो उनके पास भारत वापस जाने के लिए ईंधन नहीं बचता और दूसरा कि वो स्टारफ़ाइटर से बचते हुए वापस अपने ठिकाने की तरफ़ निकल जाएं."

"उनको पहले से ही निर्देश थे कि वो ज़्यादा कलाबाज़ी दिखाने की कोशिश न करें और सुरक्षित वापस आएं ताकि वो दोबारा अपने लक्ष्य पर हमला कर सकें. लेकिन देवैया एक दूसरी मिट्टी के बने हुए थे. दुश्मन से न लड़ना उनके लिए विकल्प नहीं था. उन्होंने स्टारफ़ाइटर से आमने-सामने भिड़ने का फ़ैसला किया."

उन्होंने एक सेकेंड के लिए भी नहीं सोचा कि स्टारफ़ाइटर उनके विमान से कहीं बेहतर विमान है.

सक्वाड्रन लीडर एबी देवैया

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देवैया अमज़द के विमान के पीछे आए

इस लड़ाई का वर्णन करते हुए पीवीएस जगनमोहन और समीर चोपड़ा लिखते हैं, "देवैया एक बार फिर स्टारफ़ाइटर के पीछे आए. उधर अमजद ये सोच रहे थे कि एक दूसरा मिस्टियर उनके विमान के पीछे लग गया है."

"अपने आप को हमले के लिए जगह देने के लिए वो पहले 7000 फ़िट की ऊँचाई पर गए और फिर तेज़ी से नीचे आए. जब वो मिस्टियर के पीछे आने की कोशिश कर रहे थे तब उन्हें अहसास हुआ कि उनका वास्ता एक बहुत जीवट वाले पायलट से पड़ा है. लड़ाई जारी रही और अमजद ने मिस्टियर से पिंड छुड़ाने की हर कोशिश कर डाली."

देवैया ने डेफ़ा कैनन से स्टारफ़ाइटर पर किया हमला

यहां पर अमजद से एक ग़लती हुई. उन्होंने मिस्टियर को निशाने में लेने के चक्कर में अपने विमान की गति घटा दी.

इयान कारडोज़ो लिखते हैं, "हालांकि उस समय स्टारफ़ाइटर भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे तेज़ उड़ने वाला विमान था लेकिन डॉग फ़ाइट में उसके मुड़ने की क्षमता सीमित थी."

"देवैया ने इसका फ़ायदा उठाया. उन्होंने स्टारफ़ाइटर पर निशाना साधा और उस पर अपनी 2 गुणा 30 एमएम की डेफ़ा कैनन छोड़ दी."

"कैनन लगते ही अमजद का एलिवेटर कंट्रोल फ़्रीज़ हो गया और उनके पास पैराशूट से इजेक्ट करने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. सन 1965 की लड़ाई में ये पहला मौक़ा था जब कोई स्टारफ़ाइटर जैसा मैक-2 विमान हवाई लड़ाई में नष्ट हुआ था."

पाकिस्तान का एफ़ 104 स्टारफ़ाइटर युद्धक विमान

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दोनों विमान ज़मीन पर गिरे

उधर पिंडी भट्टियां तहसील से पांच मील दक्षिण में कोट नाका गांव के किसान खेतों में अपना काम शुरू कर रहे थे कि उन्होंने सरगोधा की तरफ़ से दो विमानों को अपनी तरफ़ आते देखा.

वो आश्चर्यचकित होकर दोनों विमानों के बीच हो रही लड़ाई को देख रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि अचानक दोनों विमान पेड़ से पत्तियों की तरह नीचे गिरे.

एक विमान का पायलट तो पैराशूट के ज़रिए नीचे आया लेकिन दूसरा विमान जंग नहर के पार गिरा और उसका पायलट इजेक्ट नहीं कर पाया.

पायलट का शव विमान के मलबे से थोड़ी दूर गिरा पड़ा था और उसके शरीर को कोई क्षति नहीं पहुंची थी.

बाद में गाँव वालों ने उसे खेतों में ही दफ़ना दिया. ये शव स्क्वाड्रन लीडर टबी देवैया का था.

मिस्टियर युद्धक विमान और उसके चालक

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'मिसिंग इन एक्शन'

ये कभी पता नहीं चल पाया कि देवैया के साथ अंतिम समय में क्या हुआ था.

अरिजीत घोष अपनी किताब 'एयर वारियर्स' में लिखते हैं, "हो सकता है कि देवैया विमान चलाते चलाते बेहोश हो गए हो और हवा में रहते ही दम तोड़ बैठे हों."

"ये भी हो सकता है कि अंतिम समय पर विमान पर उनका नियंत्रण समाप्त हो गया हो और वो ज़मीन से टकरा गया हो. ये भी हो सकता है कि उन्होंने बहुत नीचाई से 'इजेक्ट' करने की कोशिश की हो लेकिन उसमें उन्हें कामयाबी न मिली हो."

उधर आदमपुर मे परेशान तनेजा देवैया का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे ताकि वो मिशन डिब्रीफ़ की मीटिंग में शामिल हो सकें.

तनेजा और उनकी टीम को टबी देवैया के एक्शन के बारे में ज़रा भी भनक नहीं थी. जब उनके बारे में कोई सूचना नहीं मिली तो तो देवैया को 'मिसिंग इन एक्शन' घोषित कर दिया गया.

सात साल बाद भी जब उनकी कोई ख़बर नहीं लगी तो उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

ब्रिटिश पत्रकार की क़िताब से देवैया के कारनामों का पता चला

अगर ब्रिटिश पत्रकार जॉन फ़्रिकर ने सन 1979 में 'बैटल फॉर पाकिस्तान द एयर वॉर ऑफ़ 1965' किताब नहीं लिखी होती तो स्क्वाड्रन लीडर देवैया के कारनामों के बारे में किसी को पता नहीं चलता. इस किताब में सरगोधा के आसमान में हुई लड़ाई का विस्तृत वर्णन किया गया है.

इस किताब के छपने के एक साल और लड़ाई ख़त्म होने के 15 साल बाद 1980 में ग्रुप कैप्टन तनेजा ने जॉन फ़्रिकर के वर्णन को पढ़ा जिसमें अमजद हुसैन ने खुद स्वीकार किया था कि उन्हें 7 सितंबर, 1965 को सरगोधा के पास एक 'दूसरे' भारतीय मिस्टियर ने गिराया था.

इयान कारडोज़ो लिखते हैं, "तनेजा को अच्छी तरह पता था कि उस दिन किसी भी दूसरे भारतीय विमान की स्टारफ़ाइटर विमान से भिड़ंत नहीं हुई थी. सिर्फ़ देवैया का विमान ही चोट खाने के बावजूद अमजद के विमान का मुक़ाबला करता रहा था."

"वो इसलिए बाहर इजेक्ट नहीं कर पाए थे क्योंकि उनका विमान स्टारफ़ाइटर की गोलियों से करीब करीब नष्ट हो गया था. उस हमले में देवैया को छोड़ कर शामिल हर पायलट सुरक्षित वापस लौट आया था और उनमें से किसी का सामना स्टारफ़ाइटर से नहीं हुआ था. इसलिए तनेजा को पता था कि देवैया के अलावा किसी भी पायलट की भिड़ंत स्टारफ़ाइटर से नहीं हुई थी."

ब्रिटिश पत्रकार जॉन फ़्रिकर की क़िताब
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23 वर्ष बाद मिला वीरता सम्मान

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ग्रुप कैप्टन ओ पी तनेजा ने तत्कालीन भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल इदरीस लतीफ़ को पत्र लिखकर स्क्वाड्रन लीडर देवैया को मरणोपरांत महावीर चक्र देने की माँग की थी.

सन 1987 में नेट विमान के पूर्व पायलट और डिफ़ेंस हिस्टॉरिकल सेल के प्रमुख एयर कॉमोडोर प्रीतम सिंह ने इस मामले पर फिर से शोध किया.

उनकी रिपोर्ट के आधार पर स्क्वाड्रन लीडर टबी देवैया को उनकी मृत्यु के 23 वर्ष बाद 23 अप्रैल, 1988 को महावीर चक्र देने की घोषणा हुई थी.

देवैया की पत्नी सुंदरी देवैया ने ये सम्मान तत्कालीन राष्ट्रपति आर वैंकटरमण से गृहण किया था.

तत्कालीन राष्ट्रपति आर वैंकटरमण स्क्वाड्रन लीडर देवैया की पत्नी सुंदरी देवैया को महावीर चक्र देते हुए

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पाकिस्तानी वायुसेना ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कई दशकों से सरगोधा के ऊपर हुई इस मशहूर लड़ाई ने इतिहासकारों को चकित किया है. लड़ाई के तुरंत बाद फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट अमजद हुसैन को भी उनकी वीरता के लिए 'सितारा-ए-जुर्रत' से सम्मानित किया गया था.

विडंबना देखिए कि 1971 की लड़ाई में अमजद हुसैन का विमान अमृतसर के ऊपर भारतीय विमानभेदी तोपों ने गिरा दिया था.

वायुसेना मुख्यालय में उनसे हुई पूछताछ से उस लड़ाई के और विवरण सामने आए थे.

आज भी देवैया की क़ब्र पाकिस्तान में एक किसान के खेत के एक कोने में है.

इस पूरे प्रकरण पर बॉलीवुड में एक फ़िल्म बनाई गई है 'स्काई फ़ोर्स' जिसमें अभिनेता वीर पहाड़िया ने स्क्वाड्रन लीडर देवैया की भूमिका निभाई है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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