आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमे की भारत की आज़ादी में कितनी बड़ी भूमिका थी?

आज़ाद हिंद फ़ौज

इमेज स्रोत, HINDUSTAN TIMES

इमेज कैप्शन, आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों के ख़िलाफ़ लाल क़िले में मुक़दमा शुरू हुआ था
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

छह जुलाई, 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के साथ सिंगापुर में आईएनए के सैनिकों का निरीक्षण किया.

इसी सभा में उन्होंने 'दिल्ली चलो' का नारा दिया. नेताजी ने आईएनए के सैनिकों की दशा सुधारने के लिए जी-जान लगा दी.

हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'द ट्रायल दैट शुक ब्रिटेन' के लेखक आशीष रे लिखते हैं, "बोस ने आईएनए के सैनिकों की तनख़्वाह बढ़वाई, राशन बेहतर करवाया. वो बिना पूर्व सूचना दिए सैनिकों के साथ भोजन करने चले जाते. ''

''उन्होंने आईएनए के अफ़सरों के लिए अपने घर के दरवाज़े हमेशा खोल कर रखे. वो उन्हें अपने साथ बैडमिंटन खेलने के लिए आमंत्रित करते और उनके साथ बिल्कुल बराबरी का व्यवहार करते."

रेडलाइन

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

रेडलाइन

जब नेताजी की मुलाक़ात जापान की दक्षिणी सेना के कमांडर फ़ील्ड मार्शल हिसाएची तेरावची से हुई तो उन्होंने बताया कि जापानी सेना भारत पर हमला करने की योजना बना रही है.

जल्द ही भारत को ब्रिटेन की ग़ुलामी से मुक्त करा लिया जाएगा और भारतीय लोगों को देश की सत्ता सौंप दी जाएगी.

आशीष रे लिखते हैं, "बोस ने तेरावची से साफ़ कहा कि भारत पर हमले के समय आईएनए ही अभियान का नेतृत्व करेगी क्योंकि भारत की आज़ादी में भारतीय सैनिकों की भूमिका होना ज़रूरी है. भारत की आज़ादी के लिए बहने वाला पहला ख़ून आईएनए के सैनिक का होना चाहिए."

जापान की दक्षिणी सेना के कमांडर फ़ील्ड मार्शल हिसाएची तेरावची

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जापान की दक्षिणी सेना के कमांडर फ़ील्ड मार्शल हिसाएची तेरावची

भारतीय युद्धबंदी आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हुए

जैसे ही सिंगापुर पर जापानियों का क़ब्ज़ा हुआ हथियार डालने वाले 60 हज़ार भारतीय सैनिकों में से 40 हज़ार सैनिक कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में फ़ारेर पार्क में जमा हुए और उन्होंने आईएनए में शामिल होकर ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने का फ़ैसला किया.

तरक बरकावी अपनी किताब 'सोल्जर्स ऑफ़ एम्पायर' में लिखते हैं, "आईएनए में शामिल होने के पीछे ब्रिटिश सरकार से लड़ने की इच्छा तो थी ही, इसका एक और कारण जापानी जेलों की बहुत बुरी दशा भी थी. उस ज़माने में जापान की जेलों में युद्धबंधियों की मृत्यु दर 27 फ़ीसदी थी जबकि ब्रिटेन और फ्रांस की जेलों में बंद जर्मन और इतालवी युद्धबंदियों की मृत्यु दर सिर्फ़ 4 फ़ीसदी थी."

जॉन कॉनेल ब्रिटिश भारतीय कमांडर-इन-चीफ़ जनलर क्लाउड ऑचिनलेक की जीवनी में लिखते हैं, "बोस के आने के बाद आईएनए के सैनिकों की संख्या बढ़कर 45 हज़ार हो गई थी लेकिन इसमें से 18 हज़ार सैनिकों को दक्षिण एशिया के भारतीय समुदाय के लोगों से सीधी भर्ती के तौर पर लिया गया था."

आजाद हिंद फौज के कैप्टन मोहन सिंह

इमेज स्रोत, X

इमेज कैप्शन, आज़ाद हिंद फ़ौज के कैप्टन मोहन सिंह

आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

21 अक्तूबर, 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा कर दी. उस सरकार को जापान, जर्मनी, क्रोएशिया, इटली, फ़िलीपींस, थाईलैंड और बर्मा ने मान्यता दे दी.

बोस इस सरकार के प्रमुख थे, उनके पास युद्ध और विदेश संबंध का प्रभार भी था. आयरलैंड के राष्ट्रपति इयामोन डे वलेरा ने सुभाष बोस को बधाई का संदेश भेजा और दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने आगे बढ़कर पैसों और ज़ेवरों से इस नई सरकार की मदद की.

आशीष रे लिखते हैं, "बर्मा के एक रईस अब्दुल हबीब साहेब ने अपनी पूरी संपत्ति बोस के अभियान को दान कर दी. तीन दिन बाद आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान कर दिया. टोक्यो में हुए पूर्व एशिया सम्मेलन में ऐलान किया गया कि ब्रिटेन से छीने गए अंडमान-निकोबार के टापुओं को आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार के नियंत्रण में दिया जा रहा है."

आईएनए ने कांग्रेस के तिरंगे झंडे को अपना झंडा चुना लेकिन उसने बीच में चरखे की जगह कुलाँचे भरते हुए चीते को चुना. इसकी प्रेरणा उन्हें 18वी सदी के मैसूर के राजा और अंग्रेज़ों के सबसे बड़े दुश्मन टीपू सुल्तान से मिली.

आईएनए का ध्येय वाक्य था--'एतमाद, इत्तफ़ाक़, क़ुर्बानी,' जिसका अर्थ था विश्वास, एकता और बलिदान.

आज़ाद हिंद फ़ौज

इमेज स्रोत, ATLANTIC

इमेज कैप्शन, आशीष रे की पुस्तक 'द ट्रायल दैट शुक ब्रिटेन'

कलकत्ता पर बमबारी करने का विरोध

राजनीतिक रूप से बोस की आईएनए का सबसे अच्छा इस्तेमाल तब होता अगर वो सेना सीधे बंगाल में घुसती जहाँ के लोग उसके स्वागत में सड़कों पर उतर आते लेकिन तब तक जापान की नौसेना कमज़ोर पड़ चुकी थी और बर्मा पर जापान का हवाई नियंत्रण भी ढीला पड़ने लगा था.

जोएस लेबरा अपनी किताब 'इंडियन नेशनल आर्मी एंड जापान' में लिखते हैं, "सुभाष बोस ने उत्तरी बर्मा में जापानी कमांडर जनरल रेन्या मुतागुची को फ़रवरी, 1944 में बताया था, अगर जापानी सेना इम्फ़ाल हमले में सफल हो जाती है और आईएनए के सैनिक असम के मैदानी इलाके में घुस जाते हैं तो भारतीय लोगों और अंग्रेज़ों की भारतीय फ़ौज में सैनिकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी. धीरे-धीरे ये विचार पूरे भारत में और ख़ासतौर पर मेरे गृह राज्य बंगाल में फैल जाएगा."

जोएस लेबरा लिखते हैं कि जब जनवरी 1944 में जापानी जनरल तदाशी काकाकुरा ने कलकत्ता पर बमबारी करने की योजना बनाई तो नेताजी सुभाष बोस ने उसका घोर विरोध किया.

इससे पहले दिसंबर, 1942 में जापानी वायुसेना के 160 विमानों ने कलकत्ता और चटगाँव पर बमबारी कर भारी तबाही मचाई थी.

सुभाष चंद्र बोस

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सुभाष चंद्र बोस (फ़ाइल फ़ोटो)

जापानी अफ़सरों के साथ मतभेद

सन 1944 में अप्रैल का मध्य आते-आते लड़ाई का रुख़ बदलने लगा था. रेमंड केलाहन ने अपनी किताब 'बर्मा 1942-45' में लिखा, "अमेरिकी संसाधनों की मदद से इम्फ़ाल-कोहिमा सेक्टर रूस के स्टैलिनग्राड की तरह हो गया था."

इस बीच आईएनए और जापानी सैनिकों के बीच संबंध ख़राब होने लगे थे.

जोएस लेबरा लिखते हैं, "दोनों पक्ष एक-दूसरे पर दंभी होने का आरोप लगाने लगे थे. जापानी नहीं चाहते थे कि आईएनए की बड़ी टुकड़ी आगे आगे जाए. वो उनको मुश्किल लक्ष्य देने लगे. उनकी पूरी कोशिश थी कि आईएनए के सैनिकों के मनोबल को गिरा दिया जाए."

आईएनए की छापामार इकाई अपनी रसद के लिए पूरी तरह जापानियों पर निर्भर थी. रसद की आपूर्ति न होने पर वो नागा कबीलों के चावल को जंगल की घास के साथ मिलाकर खाने पर मजबूर हुए.

उनके लिए संतोष का एक ही क्षण था कि वो असम में घुसे थे और वो भारत की मिट्टी पर खड़े हुए थे.

आज़ाद हिंद फ़ौज

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, जापान ने आज़ाद हिंद फ़ौज को कोहिमा से लौटने को कहा

कोहिमा से वापसी

22 जून, 1944 को जापानियों ने आईएनए के शाहनवाज़ ख़ान को वापस लौटने का आदेश दिया. कोहिमा से इस तरह की वापसी किसी भी सेना के लिए बहुत ही मुश्किल काम था. भारी बारिश की वजह से सारे रास्ते मिट चुके थे.

आईएनए के सैनिकों ने नए रास्ते बनाए जो घुटने तक कीचड़ से भरे हुए थे जिसमें बहुत से सैनिक फंस गए. क़रीब-क़रीब हर सैनिक दस्त और मलेरिया से पीड़ित था.

शाहनवाज़ ख़ान ने अपनी किताब 'माई मेमोरीज़ ऑफ़ आईएनए एंड इट्स नेताजी' में लिखा, "लौटते समय मैंने देखा कि हमारे सैनिक उन घोड़ों का माँस खा रहे थे जो चार दिन पहले मर चुके थे. सड़क के दोनों तरफ़ जापानी और भारतीय सैनिकों की सैकड़ों लाशें पड़ी हुई थीं. ये वो लोग थे जो थकान, भुखमरी या बीमारी की वजह से मारे गए थे. कुछ लोग जो इस अग्निपरीक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. वो ये किसी कीमत पर नहीं चाहते थे कि वो ब्रिटिश सैनिकों के हत्थे चढ़ें."

ह्यूग टोए ने अपनी किताब 'द स्प्रिंगिंग टाइगर' में लिखा, "जब आईएनए के सैनिकों ने इम्फ़ाल के लिए मार्च शुरू किया था तो उनके सैनिकों की संख्या छह हज़ार थी. लौटने वालों की संख्या मात्र 2000 रह गई थी. इस बीच 715 सैनिक बीच में लड़ाई छोड़कर भाग गए थे. 400 लोग लड़ाई में मारे गए और क़रीब 800 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया. क़रीब 1500 लोगों की बीमारी और भुखमरी से मौत हुई थी."

आज़ाद हिंद फ़ौज के जनरल शाहनवाज़ खां

इमेज स्रोत, FACEBOOK

इमेज कैप्शन, आज़ाद हिंद फ़ौज के जनरल शाहनवाज़ खां

लाल क़िले में देशद्रोह का मुक़दमा

13 मई की रात शाहनवाज़ ख़ान, जीएस ढिल्लों और आईएनए के 50 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया. आईएनए के सैनिकों को दिल्ली के लाल क़िले में रखा गया और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया.

जब इनसे पूछताछ पूरी हो गई तो इन सबको नज़दीक के सलीमगढ़ क़िले में भेज दिया गया. 27 अगस्त, 1945 की अंग्रेज़ सरकार ने एक प्रेस रिलीज़ जारी की जिसमें कहा गया आईएनए के नेताओं और गंभीर अपराध करने वाले लोगों का कोर्ट मार्शल किया जाएगा ताकि पूरे भारत को उनके 'कारनामों' के बारे में पता चल सके.

पीटर फ़े ने अपनी किताब 'द फॉरगॉटेन आर्मी' में लिखा, "दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद हुई कैबिनेट की बैठक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने बताया कि उनकी सरकार आईएनए के सैनिकों को क्यों माफ़ी देने के पक्ष में नहीं है."

उन्होंने कहा, "ब्रिटिश लोगों के लिए ये बहुत बुरा होगा कि लोगों के बीच ये संदेश जाए कि विद्रोह करना आसान चीज़ थी और इसके गंभीर नतीजे नहीं होंगे."

ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली

आम लोगों और कांग्रेस के नेताओं का समर्थन

दूसरे विश्व युद्ध के बाद सेंसरशिप हटाए जाने का नतीजा ये हुआ था कि भारतीय लोगों से आईएनए के प्रयासों को छिपाया नहीं जा सकता था. जैसे ही लोगों को इसके बारे में पता चला लोगों के बीच आईएनए की लोकप्रियता बढ़ती चली गई.

आशीष रे लिखते हैं, "अक्तूबर 1945 के बाद जवाहरलाल नेहरू अपनी हर सभा में लोगों से 'जय हिंद' और 'दिल्ली चलो' का नारा लगवाने लगे, इससे पहले आईएनए के बारे में उनकी राय मिली-जुली सी थी. उन्होंने अपने मित्र कृष्णा मेनन को लिखा कि आईएनए के लोग बहादुर और योग्य हैं जिनकी राजनीतिक सोच है."

सबसे पहले तीन अफ़सरों शाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल और गुरबख़्श ढिल्लों पर मुक़दमा चलाने का फ़ैसला हुआ.

आज़ाद हिंद फ़ौज

इमेज स्रोत, HINDUSTAN TIMES

इमेज कैप्शन, शाहनवाज़ ख़ान, गुरबख़्श ढिल्लों और प्रेम सहगल पर मुक़दमाल चलाया गया

महात्मा गांधी का वायसराय को पत्र

कांग्रेस ने इन लोगों को क़ानूनी सहायता देने के लिए एक 17 सदस्यीय समिति बनाई. बंबई के मशहूर वकील भूलाभाई देसाई को अदालत में बहस करने के लिए चुना गया.

मुक़दमा शुरू होने से छह दिन पहले महात्मा गांधी ने वायसराय के निजी सचिव सर इवान जैंकिंस को एक पत्र लिखकर कहा, "मैंने इन लोगों का समर्थन कभी नहीं किया लेकिन इनकी बहादुरी और देशभक्ति की अवहेलना नहीं की जा सकती. क्या सरकार भारतीय लोगों के एकमत फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर कोई निर्णय ले सकती है? जिन लोगों पर मुक़दमा चल रहा है, भारत के लोग उनका सम्मान करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार के पास अपार शक्ति है लेकिन अगर वो इस बारे में कोई फ़ैसला करती है तो ये शक्ति का दुरुपयोग होगा."

महात्मा गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, महात्मा गांधी को वायसराय के दूसरे निजी सचिव को लिखा- आपका पत्र अख़बारों में छपे लेखों पर आधारित है जिसमें तथ्यों को हमेशा सही ढंग से पेश नहीं किया जाता

वायसराय ने पल्ला झाड़ा

मुक़दमा शुरू होने के एक दिन बाद वायसराय के दूसरे निजी सचिव जॉर्ज एबेल ने गांधी के पत्र का जवाब देते हुए लिखा, "आपका पत्र अख़बारों में छपे लेखों पर आधारित है जिसमें तथ्यों को हमेशा सही ढंग से पेश नहीं किया जाता. महामहिम इस विषय पर अपने विचार इसलिए नहीं रख सकते क्योंकि मामला अदालत के विचाराधीन है."

इस मुक़दमे में बेंच में सात लोगों को रखा गया था. ये सब सैनिक अधिकारी थे. मेजर जनरल एलन ब्लेक्सलैंड को इसका प्रमुख बनाया गया था. मुक़दमा शुरू होने से दो दिन पहले जवाहरलाल नेहरू लॉर्ड वॉवेल से मिलने गए.

हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा, "वायसराय इस बात से थोड़ा असहज हुए कि वो कांग्रेस नेता जो आईएनए की वकालत कर रहे हैं, अगले अप्रैल में राष्ट्रीय सरकार बनाएंगे और सत्ता संभालने के बाद उनका पहला काम कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया को समाप्त करना होगा और तब तक अगर उन्हें सज़ा सुना दी गई है तो वो उनकी रिहाई का आदेश दे देंगे."

1945 में वायसराय लॉर्ड वॉवेल

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, 1945 में भारत के वायसराय लॉर्ड ए पी वावेल

जिन्ना की भूमिका

इस बीच इस पूरे मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब मोहम्मद अली जिन्ना ने इस मामले में पड़ने की कोशिश की.

दुर्गा दास अपनी किताब 'इंडिया फ़्रॉम कर्ज़न टु नेहरू एंड आफ़्टर' में लिखते हैं, "जिन्ना ने शाहनवाज़ ख़ान को संदेश भिजवाया कि अगर वो अपने आपको दूसरे आरोपियों से अलग कर लें तो वो उनकी वकालत करने के लिए तैयार हैं. शाहनवाज़ ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा, 'हम लोग आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं. इस लड़ाई में हमारे बहुत से साथियों ने जान दी है. हम या तो साथ खड़े रहेंगे या साथ मरेंगे'."

ये मुक़दमा 5 नवंबर को लाल क़िले की दूसरी मंज़िल के एक बड़े कमरे में शुरू हुआ.

सभी अभियुक्त ख़ाकी कपड़े पहनकर आए लेकिन उन पर कोई रैंक नहीं लगा था. मुक़दमा शुरू होने से पहले उन्होंने नेहरू को स्मार्ट सेल्यूट किया.

पंडित नेहरू ने 25 साल बाद बैरिस्टर का गाउन पहना. पहले दिन मुक़दमे की कार्रवाई साढ़े पाँच घंटे चली.

उस दौरान अभियोजन पक्ष ने तीन अफ़सरों कैप्टन शाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल और लेफ़्टिनेंट ढिल्लों के ख़िलाफ़ ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का आरोप लगाया. तीनों आईएनए अफ़सरों ने आरोपों का ज़ोरदार खंडन किया.

मोहम्मद अली जिन्ना

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, मोहम्मद अली जिन्ना (फ़ाइल फ़ोटो)

सज़ा सुनाकर माफ़ी दी गई

31 दिसंबर, 1945 को जजों ने तीनों अभियुक्तों को ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ़ युद्ध करने का दोषी पाया. इन सबको आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.

लेकिन 3 जनवरी, 1946 को कमांडर-इन-चीफ़ ऑचेनलेक ने इन सबकी सज़ा माफ़ कर दी.

पीटर फ़े अपनी किताब 'द फ़ॉरगॉटेन आर्मी' में लिखते हैं, "एक अंग्रेज़ अफ़सर ने ख़ान, सहगल और ढिल्लों को बुलाकर उन्हें सरकार के फ़ैसले की जानकारी दी. वो सभी ये सुनकर अवाक खड़े रह गए. आईएनए के अफ़सरों ने पूछा, अब हमें क्या करना होगा? अफ़सर ने जवाब दिया, आप सभी जा सकते हैं. सबने पूछा कहाँ? अफ़सर ने कहा, अगर दिल्ली में आपके रिश्तेदार हैं तो आप वहाँ चले जाइए, वर्ना हम लाहौर जाने के लिए आपकी ट्रेन की बुकिंग करा देंगे."

उसी शाम तीनों को लाल क़िले की जेल से रिहा कर दिया गया. इन सबको कांग्रेस नेता आसफ़ अली के घर ले जाया गया. एक दिन बाद इन तीनों ने अपने सम्मान में आयोजित एक रैली को संबोधित किया.

शाहनवाज़ ख़ान ने कहा, "हम अपनी रिहाई के लिए अपने देशवासियों का शुक्रिया अदा करने आए हैं. पहली बार ब्रिटिश सरकार की ताक़त ने भारत के लोगों की इच्छा के सामने सिर झुकाया है. हमारी इस बात को मान्यता मिली है कि देशवासियों को अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ने का हक़ है."

आजाद हिंद फौज के अफसरों की वकालत करते हुए भुलाभाई देसाई, आसफ अली और जवाहरलाल नेहरू

इमेज स्रोत, JAICO BOOKS

इमेज कैप्शन, आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों की वकालत भुलाभाई देसाई, आसफ़ अली और जवाहरलाल नेहरू ने की थी

समर्थन में देशव्यापी प्रदर्शन

आशीष रे लिखते हैं, "अंग्रेज़ों का भारतीय सेना के तीन अधिकारियों का कोर्ट मार्शल करने का फ़ैसला एक बहुत बड़ी भूल साबिल हुआ. एक मुसलमान, एक हिंदू और एक सिख, एक तरह से भारत के तीन बड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे और इनके मुक़दमे ने थोड़े समय के लिए ही लेकिन इन तीनों समुदायों को जोड़ने का काम किया. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठी चिंगारी एक बड़ी आग बन गई."

पूरे देश में प्रदर्शनकारी धरने पर बैठ गए. उनके हाथ में बैनर थे, 'आईएनए के देशभक्तों को बचाओ.' इलाहाबाद, बमरौली और कानपुर के वायु सैनिकों ने आईएनए के डिफेंस फ़ंड में चंदा दिया. इन तीनों के सम्मान में उस साल लाहौर में दीपावाली नहीं मनाई गई.

बच्चे सड़कों पर नारा लगाते दिखाई दिए, 'आज़ाद फ़ौज छोड़ दो, लाल क़िला तोड़ दो.' 21 नवंबर को इन तीनों के समर्थन में दंगे भड़क उठे जिसमें 11 लोग मारे गए. भीड़ ने 15 ब्रिटिश सैनिक वाहनों में आग लगा दी और उन पर नियंत्रण करने के लिए पुलिस को दो बार गोली चलानी पड़ी.

दिल्ली में रातों-रात इश्तेहार लग गए जिनमें लिखा था 'हर आईएनए सैनिक की शहादत का बदला बीस अंग्रेज़ों के ख़ून से लिया जाएगा.'

लाल किला जहां आजाद हिंद फौज के सैनिकों के ख़िलाफ़ चलाया गया था मुकदमा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, लाल क़िला जहां आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों के ख़िलाफ़ चलाया गया था मुक़दमा

बदला देश का माहौल

इस मुक़दमे से पूरे देश में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ माहौल बन गया. आईएनए के सैनिकों को कांग्रेस के विरोधी तत्वों जैसे मुस्लिम लीग, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी, यूनियनिस्ट पार्टी, अकाली दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा का भी समर्थन मिला.

उत्तर पश्चिम सीमांत के गवर्नर ने चेतावनी दी कि इस मुक़दमे की वजह से हर दिन भारतीय लोगों में ब्रिटिश विरोधी भावनाएं बढ़ती जा रही हैं.

बिपिन चंद्रा अपनी किताब 'इंडियाज़ स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस' में लिखते हैं, "आशा के विपरीत आईएनए के लोगों को भारतीय सेना का भी समर्थन मिल रहा था. ब्रिटिश सरकार की इनको देशद्रोही दिखाने की कोशिश नाकाम हुई थी."

मुक़दमा शुरू होने के कुछ दिनों बाद ही भारत के लोगों को सत्ता सौंपने की मुहिम पर चुपचाप काम शुरू हो गया था.

इसका पहला संकेत तब मिला जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने ऐलान किया, "मैं उम्मीद करता हूँ कि भारत के लोग ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना पसंद करेंगे. लेकिन अगर वो आज़ाद रहना चाहेंगे तो उनको ये फ़ैसला लेने का हक़ है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)