काकोरी ट्रेन लूट की पूरी कहानी, जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था- विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
1925 आते-आते आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों की माली हालत ख़राब हो चुकी थी. वो पाई-पाई के मोहताज हो चुके थे.
किसी के पास साबुत कपड़े तक नहीं थे. उन पर काफ़ी कर्ज़ हो चुका था.
लोगों से ज़बरदस्ती पैसा वसूलने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा था.
उन्होंने महसूस किया कि अगर लूटना है तो फिर सरकारी ख़ज़ाना क्यों न लूटा जाए.

राम प्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने ग़ौर किया था कि गार्ड के डिब्बे में रखे लोहे के संदूक में टैक्स का पैसा होता है.
उन्होंने लिखा है, “एक दिन मैंने लखनऊ स्टेशन पर देखा कि गार्ड के डिब्बे से कुली लोहे के संदूक को उतार रहे हैं. मैंने नोट किया कि उसमें न तो ज़ंजीर थी और न ही ताला जड़ा हुआ था. मैंने उसी समय तय किया कि मैं इसी पर हाथ मारूँगा.”

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पहला प्रयास नाकाम
इस मिशन के लिए बिस्मिल ने नौ क्राँतिकारियों को चुना, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, सचींद्र बख्शी, अशफ़ाक़उल्ला ख़ां, मुकुंदी लाल, मन्मथनाथ गुप्त, मुरारी शर्मा, बनवारी लाल और चंद्रशेखर आज़ाद.
सरकारी धन लूटने के लिए बिस्मिल ने काकोरी को चुना जो कि लखनऊ से आठ किलोमीटर दूर शाहजहाँपुर रेलवे रूट पर एक छोटा-सा स्टेशन था.

सब लोग पहले एक टोही मिशन पर काकोरी गए. आठ अगस्त, 1925 को इन्होंने ट्रेन लूटने की एक नाकाम कोशिश की.
राम प्रसाद बिस्मिल लिखते हैं, “हम लोग लखनऊ की छेदीलाल धर्मशाला के अलग-अलग कमरों में ठहरे हुए थे. पहले से तय समय पर हम लोग लखनऊ रेलवे स्टेशन पहुंचना शुरू हो गए. जैसे ही हम प्लेटफ़ॉर्म पर घुसे हमने देखा कि एक ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म छोड़ रही है. हमने पूछा ये कौन सी ट्रेन है? पता चला कि ये 8 डाउन एक्सप्रेस ट्रेन है जिस पर हम सवार होने वाले थे. हम सब 10 मिनट देरी से स्टेशन पहुंचे थे. हम निराश होकर धर्मशाला लौट आए.”

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ट्रेन की चेन खींचने की योजना बनी
अगले दिन दोपहर यानी 9 अगस्त को ये सभी लोग फिर काकोरी के लिए निकले. उनके पास चार माउज़र पिस्तौलें और रिवॉल्वर थे. अशफ़ाक़ ने बिस्मिल को समझाने की कोशिश की, “राम एक बार फिर से सोच लो. ये सही समय नहीं है. चलो वापस लौट चलें.”
बिस्मिल ने उन्हें ज़ोर से डाँटा, “अब कोई बात नहीं करेगा.” जब अशफ़ाक़ को लग गया कि उनके नेता पर किसी बात का असर नहीं होगा, उन्होंने एक अनुशासित सिपाही की तरह उनका साथ देने का फ़ैसला किया.
तय हुआ कि सभी लोग शाहजहाँपुर से ट्रेन पर चढ़ेंगे और काकोरी के पास पहले से तय स्थान तक जाएंगे. वहाँ पर गाड़ी की चेन खींची जाएगी और गार्ड के केबिन में पहुंच कर रुपयों से भरे संदूक पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा.
राम प्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “हमने ये तय किया था कि हम किसी को शारीरिक नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे. मैं ट्रेन में ही ऐलान कर दूँगा कि हम यहाँ अवैध तरीक़े से हासिल किए गए सरकारी धन को हासिल करने आए हैं. ये भी तय हुआ कि हम में तीन लोग जिन्हें हथियार चलाने आते थे, गार्ड के केबिन के पास खड़े होंगे और रुक-रुक कर फ़ायर करेंगे ताकि कोई केबिन तक पहुंचने की हिम्मत न कर सके.”

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तय जगह पर ट्रेन की चेन खींची गई
चंद्रशेखर आज़ाद ने सवाल किया, अगर किसी वजह से चेन खींचने के बावजूद अगर ट्रेन नहीं रुकी तो हम क्या करेंगे?
इस संभावना से निपटने के लिए बिस्मिल ने समाधान दिया, “हम ट्रेन में फ़र्स्ट और सेकेंड क्लास दोनों डिब्बों में चढ़ेंगे. अगर एक बार चेन खींचने से ट्रेन नहीं रुकती तो दूसरी टीम अपने डिब्बे में चेन खींच कर ट्रेन का रुकना सुनिश्चित करेगी.”
नौ अगस्त को सभी लोग शाहजहाँपुर स्टेशन पहुंच गए. ये सभी लोग स्टेशन अलग-अलग दिशाओं से आए थे और उन्होंने एक दूसरे की तरफ़ देखा तक नहीं था. सबने रोज़मर्रा के कपड़े पहन रखे थे और अपने हथियार कपड़ों के अंदर छिपा रखे थे. उन्होंने डिब्बों में वो जगह ली जो चेन के बिल्कुल नज़दीक थी ताकि उन्हें ट्रेन रुकने पर नीचे उतरने में ज़्यादा समय न लगे.
राम प्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि जैसे ही ट्रेन ने सीटी दी और स्टेशन से आगे बढ़ने लगी. “मैंने अपनी आँखें बंद कीं और गायत्री मंत्र का जाप करने लगा. जैसे ही मुझे काकोरी स्टेशन का साइनबोर्ड दिखाई दिया, मेरी साँसें तेज़ हो गईं और मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा. अचानक ज़ोर की आवाज़ हुई और ट्रेन उसी जगह पर रुक गई जहां हमने तय किया था.”
बिल्कुल सटीक जगह पर चेन खींची गई थी.
बिस्मिल लिखते हैं, “मैंने तुरंत अपनी पिस्टल निकाल ली और चिल्लाकर कहा, शांत रहिए. डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. हम सिर्फ़ सरकार से वो धन लेने आए हैं जो हमारा है. अगर आप अपनी सीट पर बैठे रहेंगे तो आपको कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया जाएगा.’’

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ज़ेवर खोने का बहाना बनाकर चेन खींची गई
ट्रेन रोकने से पहले एक और ड्रामा हुआ. अशफ़ाक़, राजेंद्र लाहिड़ी और सचींद्र बख्शी ने सेकेंड क्लास के टिकट खरीदे थे.
सचींद्रनाथ बख़्शी अपनी किताब ‘मेरा क्रांतिकारी जीवन’ में लिखते हैं, ‘मैंने अशफ़ाक़ से धीमे से पूछा ‘मेरा ज़ेवरों का डिब्बा कहाँ है?’ अशफ़ाक़ ने फ़ौरन जवाब दिया, ‘अरे वो तो हम काकोरी में भूल आए.’
अशफ़ाक़ के बोलते ही बख्शी ने ट्रेन की चेन खींच दी. राजेंद्र लाहिड़ी ने भी दूसरी तरफ़ से चेन खींची. तीनों जल्दी से नीचे उतरे और काकोरी की तरफ़ चलने लगे. थोड़ी दूर चलने पर ट्रेन का गार्ड दिखाई दिया. उसने पूछा चेन किसने खींची है?
फिर उसने हमें वहीं रुकने का इशारा किया. उन्होंने जवाब दिया कि ज़ेवर का डिब्बा काकोरी में छूट गया है. हम उसे लेने जा रहे हैं.
बख्शी आगे लिखते हैं, “तब तक हमारे सारे साथी ट्रेन से उतर कर वहाँ पहुंच चुके थे. हमने पिस्तौलों से हवा में गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं. तभी मैंने देखा कि गार्ड ट्रेन चलाने के लिए हरी बत्ती दिखा रहा है. मैंने उसके सीने पर पिस्टल लगा दी और उसके हाथ से बत्ती छीन ली. उसने हाथ जोड़कर कहा- मेरी जान बख़्श दीजिए. मैंने उसे धक्का देकर ज़मीन पर गिरा दिया.”

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अशफ़ाक़ ने संदूक़ तोड़ना शुरू किया
अशफ़ाक़ ने गार्ड से कहा, अगर आप हमारे साथ सहयोग करेंगे तो आपको नुक़सान नहीं पहुंचाया जाएगा.
बिस्मिल लिखते हैं, “हमारे साथियों ने थोड़ी-थोड़ी देर पर हवा में गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं. रुपयों से भरा लोहे का संदूक़ काफ़ी भारी था. हम उसे लेकर भाग नहीं सकते थे इसीलिए अशफ़ाक़ उसे एक हथौड़े से तोड़ने लगे. कई प्रयासों के बाद वो कामयाब नहीं हुए.”
सभी लोग अशफ़ाक़ की तरफ़ रुकी हुई साँसों से देख रहे थे. तभी वहाँ एक ऐसी घटना हुई जिसने वहाँ मौजूद क्रांतिकारियों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी.

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ट्रेन यात्री को गोली लगी
दो डिब्बे पहले ट्रेन का एक यात्री अहमद अली अपने डिब्बे से नीचे उतरा और गार्ड के केबिन की तरफ़ बढ़ने लगा. इन लोगों ने ये उम्मीद नहीं की थी कि कोई शख़्स ऐसा करने की भी जुर्रत करेगा.
दरअसल, अहमद महिला डिब्बे की तरफ़ बढ़ रहा था जहाँ उसकी पत्नी बैठी हुई थी. चूँकि ट्रेन रुकी हुई थी उसने सोचा कि नीचे उतरकर पत्नी का हालचाल ले लिया जाए. उसको ये बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ट्रेन में क्या हो रहा है?
बिस्मिल लिखते हैं, “मुझे सारा माजरा समझने में ज़्यादा देर नहीं लगी लेकिन मेरे दूसरे साथी चीज़ों का उतनी तेज़ी से आकलन नहीं कर पाए. मन्मथनाथ बहुत उत्साही थे लेकिन उन्हें हथियार चलाने का अधिक अनुभव नहीं था. जैसे ही उन्होंने उस शख़्स को केबिन की तरफ़ आते देखा उन्होंने उसको निशाने पर ले लिया. मैं उनसे कुछ कहता इससे पहले मन्मथ ने अपनी पिस्टल का ट्रिगर दबा दिया. अहमद अली को गोली लगी और वो वहीँ ज़मीन पर गिर गए.”
इस बीच अशफ़ाक़ संदूक़ को तोड़ने में व्यस्त थे लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही थी. अंतत: बिस्मिल ने हथौड़ा सँभाला और संदूक़ के ताले पर पूरी ताक़त से वार किया. ताला टूट कर नीचे गिर गया. सारे रुपयों को निकाल कर चादरों में बाँधा गया लेकिन इस बीच एक और मुसीबत आ खड़ी हुई.
दूर से एक ट्रेन आने की आवाज़ सुनाई दी. सबको डर था कि सामने से आती हुई ट्रेन का ड्राइवर ये नज़ारा देख कर शक न करे. लुट रही ट्रेन के मुसाफ़िर भी अपनी जगह से हिलने-डुलने लगे थे.
उस समय कोई भी मुसाफ़िर ट्रेन से उतर कर भाग सकता था लेकिन किसी ने ऐसा सोचने की हिम्मत नहीं की. इस बीच बिस्मिल अपनी लोडेड माउज़र हवा में लहराते रहे.
बाकी साथियों से उन्होंने अपने हथियार छिपा लेने के लिए कहा. अशफ़ाक़ से उन्होंने अपना हथौड़ा नीचे फेंक देने के लिए कहा. वो ट्रेन पंजाब मेल थी. वो बिना रुके आगे बढ़ गई.
ऑपरेशन के पूरा होने में आधे घंटे का भी समय नहीं लगा.
बिस्मिल लिखते हैं, “मुझे महसूस हुआ कि सभी को एक मासूम व्यक्ति की जान जाने का गहरा अफ़सोस था. उसकी ग़लती यही थी कि वो ग़लत समय पर ग़लत जगह पर था. मन्मथनाथ को बहुत रंज था कि उन्होंने एक निर्दोष आदमी पर गोली चला दी थी. उनकी आँखें सूजकर लाल हो गईं थीं. वो रो रहे थे.”
बिस्मिल ने बढ़कर मन्मथ को गले लगा लिया.

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लूट का देशव्यापी असर
इस लूट का पूरे भारत पर ज़बरदस्त असर पड़ा. जैसे ही ये समाचार फैला कि उत्तर प्रदेश में ट्रेन पर एक सफल हमला हुआ है, लोग इस हमले की वजह पूछने लगे.

बिस्मिल लिखते हैं कि जैसे ही लोगों को पता चला कि इस हमले में बहुत कम लोग शामिल थे और इसका उद्देश्य सिर्फ़ सरकारी ख़ज़ाने को लूटना था, वो हमारे साहस से बहुत प्रभावित हुए. उन्हें ये बात भी पसंद आई कि हमने ट्रेन से सरकारी पैसे के अलावा कुछ भी नहीं लूटा था.
बिस्मिल ने लिखा है, “भारत के अधिकतर अख़बारों ने हमें देश का हीरो करार दिया. अगले कई हफ़्तों में युवाओं में हमसे जुड़ने की होड़ लग गई. इस घटना को लोगों ने एक साधारण लूट की तरह नहीं लिया. इसको एक ऐसी घटना के तौर पर लिया गया जिसने भारत में आज़ादी की लड़ाई को एक बड़े कैनवास पर स्थापित कर दिया.”

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सुबह तक डकैती की ख़बर अख़बारों में
जगह छोड़ने से पहले सभी लोगों ने उसका पूरा मुआयना किया कि कहीं कोई चीज़ छूट तो नहीं गई है. इतनी मेहनत करने के बाद उस लोहे के संदूक़ से उन्हें सिर्फ़ पाँच हज़ार रुपए ही मिले.
गोमती नदी के किनारे कुछ मील चलकर वो लखनऊ शहर में दाख़िल हुए.
मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी किताब ‘दे लिव्ड डेंजेरसली’ में लिखा, “हम चौक की तरफ़ से लखनऊ में दाख़िल हुए. ये लखनऊ का रेड लाइट इलाक़ा था जो हमेशा जागता रहता था. चौक में दाख़िल होने से पहले आज़ाद ने सारे पैसे और हथियार बिस्मिल को सौंप दिए. आज़ाद ने सुझाव दिया कि क्यों न हम पार्क की बेंचों पर सो जाएँ. आख़िर हमने पार्क में ही एक पेड़ के नीचे अपनी आँखें मूँदने की कोशिश की. भोर होते ही चिड़ियाँ चहचहाने लगीं और हमारी आँख खुल गई.”
जैसे ही वे पार्क से बाहर निकले अख़बार हॉकर का शोर सुनाई दिया, ‘काकोरी में डकैती, काकोरी में डकैती.’ उन्होंने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को देखा. कुछ ही घंटों के अंदर ये ख़बर हर जगह फैल गई थी.

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छोड़ी गई चादर से मिला पहला सबूत
उस समय सबको लगा कि उन्होंने अपनी तरफ़ से घटनास्थल पर कोई सबूत नहीं छोड़ा है. लेकिन उनको ये अंदाज़ा ही नहीं था कि ट्रेन के पास हो रही अफ़रा-तफ़री के बीच वो वहाँ एक चादर छोड़ आए थे. उस चादर पर शाहजहाँपुर के एक धोबी का निशान था.
यहाँ से पुलिस को अंदाज़ा हुआ कि कहीं-न-कहीं लूट में शामिल कुछ लोगों का संबंध शाहजहाँपुर से है. पुलिस शाहजहाँपुर में उस धोबी को ढूंढ निकालने में कामयाब हो गई.
वहाँ से उसे पता चला कि ये चादर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के एक सदस्य की है.
यही नहीं इन क्राँतिकारियों के कुछ साथियों ने भी उनके साथ छल किया. राम प्रसाद बिस्मिल लिखते हैं, “दुर्भाग्यवश हमारे बीच भी एक साँप रह रहा था. वो उस शख़्स का बहुत क़रीबी दोस्त था जिस पर मैं संगठन में आँख मूँद कर विश्वास करता था. मुझे बाद में पता चला कि ये शख़्स न सिर्फ़ काकोरी टीम की गिरफ़्तारी बल्कि पूरे संगठन को नेस्तानबूद करने के लिए ज़िम्मेदार था.”
बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में इस शख़्स का नाम नहीं लिया है लेकिन प्राची गर्ग अपनी किताब ‘काकोरी द ट्रेन रॉबरी देट शुक द ब्रिटिश राज’ में लिखती हैं, “बनवारी लाल भार्गव एचआरए के सदस्य थे. काकोरी डकैती में भी उनकी भूमिका हथियार सप्लाई करने की थी. बाद में चले मुकदमे में फाँसी से बचने और सरकार से मिली आर्थिक सहायता के एवज़ में सरकारी गवाह बन गए थे.”

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चंद्रशेखर आज़ाद को छोड़कर सभी गिरफ़्तार
सरकार ने काकोरी हमले में शामिल लोगों की गिरफ़्तारी के लिए 5000 रुपये का इनाम रखा. इससे संबंधित इश्तेहार सभी रेलवे स्टेशन और थानों पर चिपकाए गए.
काकोरी कांड के तीन महीने के अंदर एक एक करके इसमें भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों की गिरफ़्तारी शुरू हो गई.
इस ऑपरेशन में सिर्फ़ 10 लोग शामिल थे लेकिन 40 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया गया.
अशफ़ाक़, रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी, बनारसी लाल और कई अन्य व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर लिया गया. सिर्फ़ चंद्रशेखर आज़ाद को पुलिस गिरप़्तार नहीं कर पाई.
सबसे बाद में राम प्रसाद बिस्मिल गिरफ़्तार हुए. कानपुर से छपने वाले अखबार ‘प्रताप’ की सुर्ख़ी थी ‘भारत के नौ रत्न गिरफ़्तार.’
इस अख़बार के संपादक थे गणेश शंकर विद्यार्थी. इन सब पर न सिर्फ़ डकैती बल्कि हत्या का भी मुक़दमा चला.
अप्रैल, 1927 में मुक़दमे का फ़ैसला सुनाया गया. अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल को फाँसी की सज़ा सुनाई गई. पूरे भारत में इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए.
मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना इन क्रांतिकारियों के समर्थन में उतर आए.
केंद्रीय असेंबली ने वायसराय से अपील की कि इनके मत्यु दंड को उम्र कैद में बदल दिया जाए लेकिन उन्होंने इस माँग को ठुकरा दिया.

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बिस्मिल और अशफ़ाक़ को फाँसी
19 दिसंबर, 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर,रोशन सिंह को मलाका जेल और अश्फ़ाक उल्लाह खां को फ़ैज़ाबाद जेल में में फाँसी दी गई. राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फाँसी पर चढ़ाया गया.
फाँसी से दो दिन पहले उन्होंने अपनी आत्मकथा पूरी की.
मन्मथनाथ गुप्त चूंकि 18 वर्ष के नहीं हुए थे इसलिए उन्हें केवल 14 साल की सज़ा सुनाई गई.

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सन 1937 में उन्हें रिहा कर दिया गया. रिहा होने के बाद उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ लिखना शुरू कर दिया.
सन 1939 में उन्हें फिर गिरफ़्तार कर लिया गया और आज़ादी से एक साल पहले सन 1946 में उनकी रिहाई हुई.
उन्होंने कुछ समय अंडमान की सेल्यूलर जेल में भी बिताया. 26 अक्तूबर, 2000 को उन्होंने अंतिम साँस ली
भूल सुधार- इस रिपोर्ट में फाँसी की तारीख़ को लेकर सही जानकारी अपडेट की गई है.
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