बाबर से लेकर अकबर तक, मुग़ल सल्तनत की तीन पीढ़ियों के साथ रहने वाली शहज़ादी - विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
गुलबदन भारत के पहले मुग़ल बादशाह बाबर की बेटी, उनके बेटे हुमायूं की सौतेली बहन और उनके पोते अकबर की बुआ थीं.
वो शायद अकेली महिला इतिहासकार थीं जिन्होंने तीन मुग़ल बादशाहों- बाबर, हुमायूं और अकबर की शख़्सियत, उनके दरबार, हरम, कामयाबियों और मुश्किलों की झलक बाहरी दुनिया को दी है.
उनकी याददाश्त ग़ज़ब की थी. अकबर ने अपनी बुआ गुलबदन बानो से अनुरोध किया कि वो उनके पिता और दादा के बारे में कुछ लिखें जिसका इस्तेमाल अबुल फ़ज़ल उनकी जीवनी ‘अकबरनामा’ में कर सकें.
गुलबदन बानो ने ‘हुमायूंनामा’ लिखा जिसमें उन्होंने हुमायूं के जीवन के सभी पक्षों का जीवंत वर्णन किया.

गुलबदन ने जब ये किताब लिखी थी उस समय उनकी उम्र 64 साल की थी. सन 1529 में जब वो काबुल से भारत आईं तो वो सिर्फ़ 6 साल की थीं. वो अपने भाई हुमायूं के निर्वासन की गवाह बनीं.
वो पहली मुग़ल लड़की थीं जो शाही क़ाफ़िले में सफ़र कर ख़तरनाक ख़ैबर दर्रा और सिंधु नदी पार करती हुईं दिल्ली में अपने पिता बाबर से जा मिली थीं. वो उन्हें ‘बाबा’ कहकर पुकारती थीं.

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अपनी जान के बदले हुमायूं की जान माँगी
बाबर बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह पाए थे. वो अपने बेटे हुमायूं से बहुत प्यार करते थे. एक बार हुमायूं गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. परेशान बाबर ने अपने दरबारियों से सलाह ली.
गुलबदन ने लिखा है, "एक अमीर मीर अब्दुल बाका ने उनसे कहा कि जब हकीमों के सारे उपाय नाकाम हो जाते हैं तो मरीज़ की सबसे क़ीमती चीज़ दान देकर ख़ुदा से उसकी सेहत की दुआ की जाती है. बाबर का जवाब था, ‘हुमायूं की सबसे क़ीमती चीज़ मैं ख़ुद हूँ. मैं उसके लिए अपनी क़ुर्बानी दूँगा."
इसके बाद बाबर ने हुमायूं की पलंग का तीन बार चक्कर लगाया और ख़ुदा से दुआ माँगी, "अगर जान का बदला जान हो सकता है तो मेरी ज़िंदगी हुमायूं को लग जाए.’’
गुलबदन आगे लिखती हैं, "उस दिन ही हुमायूं ने अपनी आँखें खोल दीं. वो अपने बिस्तर से उठ बैठे. जैसे-जैसे हुमायूं की सेहत अच्छी होती गई बाबर की सेहत बिगड़ने लगी."
अगले तीन महीनों तक वो बिस्तर पर पड़े रहे और अंतत: उन्होंने दम तोड़ दिया.
भिश्ती को दो दिन तक बादशाह बनाया

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जून, 1539 में शेरशाह के साथ चौसा की लड़ाई में हुमायूं की बाईं बाँह में चोट लग गई. उनके एक सैनिक ने उनके घोड़े की लगाम पकड़ ली और उन्हें गंगा नदी की तरफ़ ले गया.
हुमायूं ने घोड़े को नदी में उतारना चाहा लेकिन उसने उन्हें पानी में गिरा दिया. उस समय एक भिश्ती अपनी चमड़े की मश्क के साथ नदी पार कर रहा था. वो तुरंत बादशाह के पास पहुंचा और उसने उन्हें सुरक्षित नदी पार कराई.
गुलबदन लिखती हैं, "इस एहसान का बदला चुकाने के लिए बादशाह ने उस भिश्ती को दो दिनों के लिए अपने सिंहासन पर बैठा दिया. उनके भाई कामरान ने हुमायूं को पत्र लिखकर उनके इस फ़ैसले के प्रति अपना विरोध जताया. उन्होंने लिखा इस वक्त जब शेरशाह आपके पीछे पड़ा हुआ है, ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? लेकिन हुमायूं ने उनकी एक न सुनी और भिश्ती को गद्दी पर बैठा कर ही छोड़ा."
इसी लड़ाई में हुमायूं की पत्नी बेगा बेगम उनसे बिछुड़ गईं और शेरशाह ने उन्हें बंदी बना लिया. केआर कानूनगो अपनी किताब ‘शेरशाह एंड हिज़ टाइम्स’ में लिखते हैं, "जब शेरशाह ने उन्हें देखा तो वो अपने घोड़े से उतर गए. उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वो मुग़ल महिलाओं के साथ सम्मान से पेश आएं."
इसी लड़ाई में हुमायूं की छह साल की बेटी अक़ीक़ा नदी के पानी में डूब कर मर गई.
अकबर के जन्म की भविष्यवाणी

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अबुल फ़ज़ल ‘अकबरनामा’ में लिखते हैं, "जब शेरशाह ने हुमायूं का पीछा किया तो हुमायूं के छोटे भाई कामरान ने उसे संदेश भेजा कि वो उसे पंजाब का गवर्नर बना दे. शेरशाह ने रणनीति के तहत उस पेशकश को स्वीकार कर लिया."
लेकिन गुलबदन का विवरण इससे भिन्न है. वो लिखती हैं, "कामरान नहीं बल्कि खुद हुमायूं ने शेरशाह को पत्र लिखकर अपने लिए लाहौर माँगा था. उन्होंने लिखा था कि ‘मैंने तुम्हारे लिए पूरा हिंदस्तान छोड़ दिया है.’ लेकिन शेरशाह पर इसका कोई असर नहीं हुआ था. उनका जवाब था, ‘मैंने तुम्हारे लिए काबुल छोड़ा है. तुम वहाँ जा सकते हो.’’
गुलबदन ने अकबर के जन्म की भविष्यवाणी का चित्रण भी ‘हुमायूंनामा’ में लिखा है, "थक हार कर सोए हुमायूं ने एक दिन एक सपना देखा. एक फ़कीर ने हुमायूं से कहा, रंज मत करो. उसने जवाब दिया मैं अहमद हूँ. ख़ुदा तुम्हें कुछ दिनों में एक लड़का देगा. तुम उसका नाम जलालउद्दीन अकबर रखोगे. सिर्फ़ दो साल बाद उस फ़कीर की वो भविष्यवाणी सही साबित हुई."
गुलबदन हुमायूं से बिछड़ीं

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शेरशाह के हमले के बाद कन्नौज में हुमायूं का उससे सामना हुआ. आगरा छोड़ते समय उसने अपने छोटे भाई कामरान को वहाँ के रोज़मर्रा प्रशासन की ज़िम्मेदारी दी. लेकिन जैसे ही हुमायूं ने गंगा पार की कामरान ने लाहौर भाग जाने का फ़ैसला किया.
गुलबदन लिखती हैं, "हम लोग बैठे हुए थे. तभी कामरान का हुक्म आया कि मुझे उनके साथ लाहौर चलना है. उसने शाही ख़ानदान की कई महिलाओं और नौकरों को अपने काफ़िले में लाहौर चलने के लिए मजबूर किया."
गुलबदन ने रो-रोकर न जाने की ज़िद ठान ली लेकिन कामरान नहीं माना. बाद में उन्होंने हुमायूं को उलाहना भरा ख़त लिखा कि "मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि तुम मुझे इस तरह अपने से अलग कर दोगे."
हुमायूं ने तुरंत इसका जवाब देते हुए लिखा, "इस समय हम शेरशाह के ख़िलाफ़ एक मुहिम की अगुवाई कर रहे हैं. जैसे ही ये मुहिम पूरी होगी मैं तुमको सबसे पहले अपने पास बुलाऊँगा."
गुलबदन जब तक लाहौर पहुंचीं, हुमायूं की हार हो चुकी थी लेकिन वो ज़िंदा बच निकले थे.

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हुमायूं की हमीदा से शादी
इस दौरान हुमायूं ने हमीदा बेगम से शादी की और 1542 में अकबर का जन्म हुआ. हुमायूं से हमीदा की शादी का भी बहुत दिलचस्प वर्णन गुलबदन ने किया है.
वो लिखती हैं, "उस ज़माने में बादशाह या राजकुमार की तरफ़ से आया शादी का पैग़ाम ठुकराया नहीं जाता था लेकिन 14 वर्षीय हमीदा ने हुमायूं के शादी के प्रस्ताव को कई हफ़्तों तक स्वीकार नहीं किया. आखिर में हालांकि वो इस रिश्ते के लिए मान गईं. हमीदा ने मुझे खुद मज़े ले-ले कर बताया था कि किस तरह उन्होंने 40 दिनों तक हुमायूं को हाँ नहीं की थी."
जब ये तीनों कंधार पहुंचे तो हुमायूं के भाई अस्करी ने उन्हें वहाँ घुसने नहीं दिया. वहाँ से अपने 42 समर्थकों और अपनी पत्नी हमीदा के साथ हुमायूं आगे बढ़ गए. अकबर को उन्होंने दो दाइयों और कुछ विश्वस्त सैनिकों की देखरेख में छोड़ दिया. आख़िरकार हुमायूं ने लंबे संघर्ष के बाद ईरान के शाह की मदद से काबुल पहुंचने में सफलता हासिल की.
हुमायूं ने अपने भाई को अंधा कर दिया

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उनके भाई कामरान को गिरफ़्तार कर लिया गया. इस बात पर बहस हो रही थी कि उनके साथ क्या सलूक किया जाए.
गुलबदन लिखती हैं, "हुमायूं अपने दरबारियों से अपने छोटे भाई कामरान के बारे में बात कर रहे थे. दरबारियों ने एक स्वर में उनसे कहा- अगर कोई सम्राट या बादशाह बन जाता है तो वो भाई नहीं रहता. अगर आप अपने भाई के प्रति दरियादिली दिखाना ही चाहते हैं तो अपनी गद्दी का त्याग कर दीजिए. दरबारियों ने कहा कि वो भाई नहीं, सम्राट के दुश्मन हैं. हुमायूं ने उन सबकी बात सुनी और कामरान की आँखें फुड़वाने का आदेश दे दिया. इसके बाद हुमायूं ने दोबारा भारत का राजकाज सँभाला."
जब हुमायूं की पत्नी हमीदा तीन साल बाद अपने बेटे अकबर से मिलीं तो एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिला.
गुलबदन अपनी किताब हुमायूंनामा में लिखती हैं, "हुमायूं ने सभी शाही महिलाओं को एक जैसे ऊनी कपड़े और तुर्की टोपी पहनने के लिए कहा. हुमायूं देखना चाहते थे कि शहज़ादे अकबर तीन साल बाद अपनी माँ को पहचान पाते हैं या नहीं? एक नौकर अकबर को उस कमरे में ले गया जहाँ सब महिलाएं एक जैसे कपड़े पहने हुए बैठी हुई थीं. सब चकित रह गए जब अकबर दौड़कर सीधे अपनी माँ की गोद में बैठ गए."
सीढ़ियों से गिरकर हुमायूं की मौत

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हुमायूं भी बहुत दिनों तक भारत पर राज नहीं कर पाए. पार्वती शर्मा अपनी किताब ‘अकबर ऑफ़ हिंदुस्तान’ में लिखती हैं कि हुमायूं अपने मेहमानों से लाल पत्थर से बने ‘शेर मंडल’ में मिला करते थे. वहीं पर उनकी लाइब्रेरी भी थी. छत पर लोगों से मिलने का एक फ़ायदा ये भी था कि पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आए लोग हुमायूं की झलक पा सकते थे.
हुमायूं की मौत का विवरण उन्होंने कुछ इस तरह दिया है, “एक दिन जब हुमायूं लाइब्रेरी से सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे. उन्हें पास की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ सुनाई दी. उन्होंने उसी समय झुककर सज्दे में जाना चाहा लेकिन उनका पैर उनके पायजामे में उलझ गया और वो सीढ़ियों से नीचे आ गिरे. उनके सिर पर गहरी चोट आई और उनके कान से ख़ून बह निकला. तीन दिन बाद 27 जनवरी को उनका निधन हो गया.”
गुलबदन की हज यात्रा

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अकबर के बादशाह बनने के बाद उनकी बुआ गुलबदन बानो ताज़ा बने फ़तेहपुर सीकरी के महल में रहने लगीं. गुलबदन का क़द छोटा था और वो तंदुरुस्त काठी की थीं.
अकबर उनको मुग़ल परिवार की एक बुज़ुर्ग महिला का सम्मान देते थे. पहले दो मुग़ल सम्राटों के साथ रहने वाली गुलबदन अब अपने भतीजे के महल में रह रही थीं.
वो मुग़ल ख़ानदान की पहली महिला थीं जिन्होंने हज़ारों मील दूर सऊदी अरब में हज पर जाने का फ़ैसला किया. अकबर ने उनके इस फ़ैसले का समर्थन किया. उनके दल में कुल 11 महिलाएं थीं.
मशहूर इतिहासकार रूबी लाल गुलबदन की जीवनी ‘वेगाबॉन्ड प्रिन्सेज़, द ग्रेट एडवेंचर्स ऑफ़ गुलबदन’ में लिखती हैं, “सितंबर, 1576 में गुलबदन बेगम के नेतृत्व में मुग़ल महिलाओं का दल दो नौकाओं में सूरत से हज के लिए रवाना हुआ. उनके पास दान देने के लिए छह हज़ार रुपए थे. उनके दल में कुछ पुरुष भी थे क्योंकि उस दौर में पुरुषों के बिना महिलाओं के यात्रा करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.”
लेकिन ये साफ़ था कि इस यात्रा में सभी बड़े फ़ैसले गुलबदन ही ले रही थीं. गुलबदन मक्का में पूरे चार वर्ष रहीं. उनके वहां पहुंचने के एक साल के अंदर ही वहाँ के शासक सुल्तान मुराद तृतीय ने उन्हें और उनके साथियों को वहाँ से निकालने का आदेश दे दिया.
दो वर्ष बाद 1580 में ये आदेश फिर से दिया गया. इस तरह के पाँच आदेश आज भी तुर्की के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं.
अरब शासक मुराद की नाराज़गी की वजह थी इन महिलाओं का लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ आकृष्ट करना. जहाँ-जहाँ वे जातीं उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती.
गुलबदन सिर्फ़ मक्का में ही नहीं रुकीं. उन्होंने अरब के दूसरे शहरों की भी सैर की और ईरान के तीर्थस्थान मशअद भी गईं.
शहज़ादे सलीम ने अजमेर जाकर गुलबदन का स्वागत किया

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मार्च, 1580 में गुलबदन अपने पूरे अमले के साथ ‘तेज़राव’ नौका पर जेद्दाह से भारत के लिए रवाना हुईं. लेकिन अदन के नज़दीक वो नौका टूट गई और गुलबदन को अपने साथियों के साथ अदन में सात महीने बिताने पड़े. जब वो सूरत पहुंचीं तो उन्हें भारत छोड़े पूरे सात साल हो चुके थे.
सूरत पहुंचने के बाद वो फ़तेहपुर सीकरी के लिए रवाना हुईं.
इरा मुखौटी अपनी किताब ‘डॉटर्स ऑफ़ द सन’ में लिखती हैं, “बादशाह अकबर ने हज पार्टी का स्वागत करने के लिए 13 साल के शहज़ादे सलीम को अजमेर भेजा. रास्ते में वो मोइनुद्दीन चिश्ती की मज़ार पर ज़ियारत के लिए रुकीं.”
अकबर ने सीकरी से 37 मील दूर ख़ानवा में आकर अपनी बुआ का स्वागत किया. जब वो सीकरी पहुंचीं तो लोग उनके स्वागत में सड़कों पर उतर आए.
अकबर ने पार्थिव शरीर को कँधा दिया

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गुलबदन ने अपने जीवन के अगले 20 साल अकबर के साथ बिताए. सन 1603 में 80 साल की उम्र में उनका देहावसान हुआ. उस समय उनकी भाभी और अकबर की माँ हमीदा बानो उनके बग़ल में थीं.
उन्होंने गुलबदन को उनके प्रिय नाम ‘बेगम जियो’ कहकर पुकारा. गुलबदन ने अपनी आँखें खोलीं और हमीदा बानो की तरफ़ देख कर कहा, ‘मेरा सफर ख़त्म हुआ. ख़ुदा तुम्हें लंबी उम्र दे.’
गुलबदन की मौत से अकबर को बहुत सदमा पहुंचा. उनके पार्थिव शरीर को क़ब्रिस्तान तक पहुंचाने में उन्होंने अपना कंधा दिया. अगले दो साल में जब तक वो जीवित रहे उन्होंने अपनी इस बुआ को बार-बार याद किया.
हमीदा बानो भी बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहीं. एक साल बाद 1604 में उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए. अकबर ने उनके शोक में अपने सिर के बाल और दाढ़ी कटवा दी.
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