हरदित सिंह मलिक: पहले 'फ्लाइंग सिख' जिनके फ़ाइटर जेट को 400 गोलियां लगी लेकिन वह बच गए

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- Author, गुरजोत सिंह
- पदनाम, बीबीसी पत्रकार
"एक जर्मन ने मुझ पर घात लगाकर हमला किया, मेरे दाहिने पैर में गोली मार दी, फिर मैंने उस पर गोली चलाई और उसके जलने का आनंद लिया."
"मुझे लगने वाली गोली जहाज़ की पेट्रोल टैंक के भरे हुए हिस्से के क़रीब से आई थी. अगर ये गोली थोड़ी ऊपर होती तो विमान में विस्फोट हो जाता."
"चार जर्मन फ़ाइटर जेट मेरे पीछे थे. मुझ पर बार-बार गोलीबारी कर रहे थे."
"मैं किसी पक्षी की तरह अपने पंख फड़फड़ाते हुए दौड़ रहा था और उड़ने में असमर्थ था. पहले कुछ पल में मुझे लगा कि मैं मरने वाला हूं."
"जब ऐसा नहीं हुआ तो मुझे लगा जैसे मैं किसी दैवीय शक्ति के संरक्षण में हू. मुझे बताया गया कि मेरे विमान पर 400 से अधिक गोलियां लगी थीं."
ये शब्द प्रथम विश्व युद्ध में सेनानी रहे हरदित सिंह मलिक के हैं, जो उनकी आत्मकथा 'ए लिटिल वर्क, ए लिटिल प्ले में दर्ज हैं.'
अविभाजित पंजाब के रावलपिंडी ज़िले में जन्मे हरदित सिंह मलिक को पहले 'फ्लाइंग सिख' होने का गौरव प्राप्त है.
वह प्रथम विश्व युद्ध में रॉयल एयर फोर्स में शामिल होने वाले कुछ चुनिंदा भारतीयों में से एक थे, जो पहले पगड़ीधारी (सिख) पायलट थे.
अपने भागने के बारे में उन्होंने बाद में लिखा, "इस चमत्कार का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा. मुझे यकीन हो गया कि आप तभी मरेंगे जब ईश्वर चाहेंगे."
पगड़ीधारी होने की वजह से उनका सफ़र कठिनाइयों से भरा था, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बरकरार रखी और 'फ़्लाइंग हॉबगोब्लिन' जैसी कई उपाधियां पाकर इतिहास में दर्ज हो गए.
'आसमान का शेर'

हरदित सिंह मलिक का जन्म 23 नवंबर 1894 में पंजाब के रावलपिंडी में हुआ था.
रावलपिंडी उस समय पंजाब में ब्रिटिश सरकार की ओर से बनाई छह छावनियों में से एक थी.
यहां उनके पिता सरदार मोहन सिंह इंजीनियर के पद पर तैनात थे और इलाके में उनकी अच्छी-खासी प्रतिष्ठा थी.
एक अमीर घर में पैदा होने के कारण उन्हें शुरुआत से ही पश्चिमी शिक्षा मिली.
पायलट बनने के बाद वह पटियाला राज्य के 'प्रधानमंत्री' बने और भारत की आज़ादी के बाद कनाडा में पहले उच्चायुक्त भी बने.
दिवंगत लेखक खुशवंत सिंह ने हरदित सिंह को अपने समय के सबसे महत्वपूर्ण सिखों में से एक बताया.
प्रथम विश्व युद्ध के इतिहासकार स्टीफ़न बार्कर ने हरदित सिंह मलिक के बारे 'लायन ऑफ़ द स्काइज़' किताब लिखी है.

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वह लिखते हैं, "हालांकि, हरदित सिंह मलिक 14 साल की उम्र में इंग्लैंड चले गए, लेकिन वहां घरेलू माहौल की वजह से वह हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे."
हरदित सिंह मलिक अपनी आत्मकथा 'ए लिटिल वर्क, ए लिटिल प्ले' में अपने परिवार के बारे में लिखते हैं, ''मेरी मां बहुत धार्मिक थीं, उनका मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव था. मेरे पिता कोई काम करने से पहले अरदास किया करते थे.”
हरदित सिंह की मां का नाम लाजवंती भगत था.
स्टीफ़न बार्कर लिखते हैं कि रावलपिंडी में अपने शुरुआती साल बिताने से उन्हें ब्रिटिश सरकार को करीब से समझने का मौका मिला.
बार्कर के अनुसार हरदित सिंह उस समय के प्रभावशाली सिख संत अतर सिंह मस्तुआना के प्रभाव में आ गए.
सैन्य इतिहासकार सोमनाथ सप्रू को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर वह संत अतर सिंह से नहीं मिले होते तो उनका जीवन कुछ और होता.
उन्होंने 12 साल की उम्र में रावलपिंडी की एक रैली में लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को भी देखा था.
14 साल की उम्र में गए इंग्लैंड

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बार्कर लिखते हैं कि 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के भारतीय लड़कों का पढ़ाई-लिखाई के लिए ब्रिटेन जाना आम बात है. लेकिन बहुत कम लोगों ने 14 साल के लड़के के स्कूल और आगे की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन जाने के बारे में सोचा था.
ईस्टबॉर्न कॉलेज से स्कूली शिक्षा लेकेने के बाद हरदित सिंह ने ऑक्सफ़ोर्ड के बैलिओल कॉलेज में पढ़ाई की. यहां वह कई हस्तियों के संपर्क में आए, जिन्होंने आगे चलकर बड़ा मुकाम हासिल किया.
हरदित सिंह को बचपन से ही खेलों में रुचि थी. उन्होंने इंग्लैंड आने के बाद भी क्रिकेट खेलना जारी रखा और कॉलेज टीम के कप्तान बने.
रिश्ता सिर्फ़ क्रिकेट से ही नहीं था. हरदित सिंह को एक अच्छे गोल्फ़र के तौर पर भी जाना जाता था. उनके निधन के बाद गोल्फ़ एशिया सोसाइटी ने उनके बारे में एक लेख भी प्रकाशित किया.
ईस्टबॉर्न कॉलेज में उनका समय काफ़ी यादगार था. यहां उन्होंने कॉलेज टीम के लिए क्रिकेट खेला. उनके साथ खेलने वाले खिलाड़ियों में से एक दलपत सिंह थे, जो बाद में जोधपुर लांसर्स में मेजर बने और 1918 में फ़लस्तीन में हाइफ़ा की जंग में मारे गए.
उन्होंने बैलिओल कॉलेज में आधुनिक यूरोपीय इतिहास पढ़ा.
वायुसेना का हिस्सा कैसे बनें?

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1917 में जब हरदित सिंह बैलिओल कॉलेज में पढ़ रहे थे, उनके कई सहपाठी प्रथम विश्व युद्ध में शामिल होने चले गए थे.
हरदित सिंह भी अपने अन्य साथियों की तरह ही युद्ध में जाना चाहते थे.
उन्होंने फ़्रांस में रेड क्रॉस के लिए एंबुलेंस ड्राइवर के तौर पर काम करना शुरू किया. उन्होंने यहां के कॉन्यैक शहर से काम करना शुरू किया.
स्टीफ़न लिखते है कि 21 साल की उम्र में फ़्रांस पहुंचे हरदित सिंह मलिक को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वह भारत की आज़ादी के बाद यहां भारत के राजदूत बनेंगे.
फ़्रांस पहुंचने के अनुभव के बारे में हरदित सिंह आत्मकथा में लिखते हैं, "मेरे मना करने के बाद भी वहां अस्पताल में लोगों को ऐसा लगा जैसे मैं कोई भारतीय महाराजा हूं."
बार्कर लिखते हैं, "फ़्रेंच रेड क्रॉस के साथ काम करते हुए, हरदित सिंह ने युद्ध में हिस्सा तो लिया, लेकिन शुरू से ही वह सीधा जंग में उतरना चाहते थे."
वह फ़्रांस में अपने दोस्तों से पूछते रहे कि फ़्रांसीसी वायु सेना का हिस्सा कैसे बन सकते हैं.
बार्कर ने लिखा है कि तब जहाज़ इतने मज़बूत नहीं होते थे, वे फ़ाइबर और लकड़ी के बने होते थे.
उनकी पहली तैनाती हैम्पशायर के एल्डरशॉट में थी. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि यहां रहना बहुत मुश्किलों भरा था.
बार्कर ने बीबीसी को बताया कि सरदार मलिक को सैन्य नियमों का उल्लंघन करके वायु सेना में शामिल किया गया था.
उन्होंने कहा कि विश्व युद्ध के दौरान, ब्रिटेन के पास वायु सेना के पायलटों की इतनी कमी थी कि वह भारतीयों (जो तब ब्रिटेन का उपनिवेश था) को भर्ती करने के बारे में सोचने लगे.
वह कहते हैं, "भर्ती अक्टूबर 1916 में शुरू हुई और मार्च 1917 तक चली. पाँच भारतीयों को भर्ती किया गया, जिनमें हरदित सिंह मलिक अकेले सिख थे."
पगड़ी के लिए किया संघर्ष

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हरदित सिंह मलिक ने अपनी काबिलियत के दम पर हर जगह पहचान बनाई, लेकिन कुछ मौकों पर उन्हें पगड़ी के लिए संघर्ष करना पड़ा.
उन्होंने अपनी आत्मकथा में ब्रिटिश वायुसेना में शामिल होने के बाद की एक घटना का ज़िक्र किया है.
"सैन्य वर्दी के साथ वाली टोपी पहनने की बजाय मैंने अपनी पगड़ी खाकी रंग में रंग ली. एक सार्जेंट मेजर ने मुझे पगड़ी में देखा और मुझसे पूछा कि मेरी टोपी कहाँ है. फिर मैंने अधिकारी को समझाया कि एक सिख होने के नाते मेरे लिए पगड़ी पहनना ज़रूरी है."
"एक अन्य अधिकारी वहां पहुंचे और मामले को शांत कराया."
"बाद में इस मुद्दे पर वरिष्ठ अधिकारियों ने चर्चा की. फिर मुझे पगड़ी पहनने की इजाज़त दी गई."
अपने कॉलेज की एक घटना के बारे में सिंह लिखते हैं, "रात के खाने के बाद पाँच या छह लड़कों ने मुझे घेर लिया और मुझसे अपनी पगड़ी उतारने को कहा. वे देखना चाहते थे कि इसके नीचे क्या है."
"मैंने उनसे कहा कि मैं एक सिख हूं और अपनी पगड़ी नहीं उतारूंगा. वे मेरी पगड़ी हटाने के लिए मेरी ओर बढ़े. मैं बहुत ग़ुस्से में था. मैं उनके सामने अकेला था."
"लेकिन मैंने उनसे बहुत शांति से कहा कि मैं तुम्हें रोक नहीं सकता, लेकिन जो सबसे पहले मेरी पगड़ी छुएगा, मैं उसे किसी न किसी तरह मार डालूंगा."
हरदित सिंह लिखते हैं कि उन लड़कों को ये पता था कि सिख कृपाण रखते हैं. मज़ाक को गंभीर होता देख मैं पीछे हट गया.
जब जिन्ना से मिले हरदित सिंह

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हरदित सिंह मलिक जब पटियाला राज्य के प्रधानमंत्री थे, तो उनकी मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना से मुलाकात हुई.
यह मुलाकात नई दिल्ली में भगवान दास रोड पर हरदित सिंह के भाई तेजा सिंह मलिक के घर पर हुई.
मलिक ने बैठक के बारे में कहा, "यह ऐतिहासिक बैठक मेरी अब तक की सबसे दिलचस्प बैठक थी."
"जिन्ना बिना किसी सलाहकार के आए थे, जबकि हमारी पार्टी में महाराजा भूपिंदर सिंह, तारा सिंह, ज्ञानी करतार सिंह और मैं शामिल थे."
हरदित्त सिंह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि "जिन्ना सिखों को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे, उन्होंने हमसे कहा कि हम अपनी मांगें लेकर आएं और वह उन्हें स्वीकार करेंगे.
जब मैंने उनसे पूछा कि जब आप नहीं रहेंगे तो आपके वादे कौन पूरा करेगा, तो जिन्ना ने जवाब दिया, "मेरा कहा पाकिस्तान में भगवान के कहे जैसा होगा."
वह लिखते हैं, "ऐसा अहंकार पागलपन जैसा था."
'1984 के सैन्य अभियान के वह उदास हो गए'

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नवंबर 1985 में हरदित सिंह की मृत्यु के बाद खुशवंत सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा था, "मैं बहुत कम लोगों को जानता हूं जिन्होंने अपने जीवन में इतना कुछ हासिल किया."
उन्होंने लिखा कि हरदित सिंह मलिक सबसे 'सोहणे' सरदारों में से एक थे.
खुशवंत सिंह ने लिखा कि हरदित सिंह मलिक को अलग-अलग तरह की शराब इकट्ठा करने का शौक था. साथ ही वह ख़ास तरह का खाना खाने के भी शौकीन थे.
उन्होंने लिखा कि हरदित सिंह मलिक नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रशंसक थे, लेकिन जब सेना ने अमृतसर में श्री दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर) में प्रवेश किया तो उनका दिल टूट गया. इसके बाद वह कभी भी पहले जैसे शख्स नहीं रहे.
खुशवंत सिंह लिखते हैं कि इसके बाद से हरदित सिंह हमेशा उदास रहते थे.
खुशवंत सिंह ने लिखा, "हुआ यूं कि इंदिरा गांधी की हत्या वाले दिन उन्हें दिल का दौरा पड़ा, बाहर भीड़ सिखों के खून की प्यासी घूम रही थी, इसी बीच उनके परिवार वाले उन्हें अस्पताल ले गए."
इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर उनके परिवार ने उन्हें नहीं बताई.
उनके अंतिम संस्कार के बारे में खुशवंत सिंह ने लिखा कि हरदित सिंह की पत्नी प्रकाश कौर के अनुरोध पर अस्पताल में दूसरे मरीज़ों ने गई हर्ष गीत गाए.
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