नाज़ियों का वो कैंप जहां क़ैदियों को दी जाती थी यातना, मारने से पहले क़ैदियों के बाल काट लिए जाते

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- Author, वंदना
- पदनाम, सीनियर न्यूज़ एडिटर, बीबीसी न्यूज़
इतिहास के पन्नों में कई हादसे, कई त्रासदियाँ दर्ज हैं लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में नाज़ियों के अधीन जो कुछ हुआ वैसी त्रासदी इतिहास ने शायद पहले कभी नहीं देखी थी.
इसके बारे में सुना था, पढ़ा था लेकिन पोलैंड में बनाए गए यातना शिविरों को रूबरू देखना मेरे लिए रोंगटे खड़े करने वाला अनुभव रहा जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है.
पोलैंड में बसा ऑस्त्विच शहर जर्मनों द्वारा बनाए यातना कैंपों में से सबसे बड़ा नेटवर्क है. साल 1939 में पोलैंड पर क़ब्ज़ा करने के बाद हिटलर ने साल 1940 में ऑस्त्विच के पास यातना शिविर बनवाया था.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में नाज़ियों के बनाए यातना शिविरों में करीब 10 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई जिसमें ज़्यादातर यहूदी थे.

'गेट ऑफ़ डेथ'

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कुछ साल पहले मैं जब पोलैंड गई थी तो इन शिविरों में जाने का मौका मिला. ऑस्त्विच के उन कैंप्स में जाना जिनका ज़िक्र फ़िल्मों में किया गया है, भावनात्मक तौर पर आपके अंदर तक उथल पुथल मचा देता है.
25 दिसंबर को पोलैंड में क्रिसमस मनाने के बाद अगले दिन सोचा कि पोलैंड को करीब से देखा- समझा जाए और पोलैंड के इतिहास को वहाँ बने यहूदी यातना शिविरों के बगैर समझना नामुमिकन सा है.
वहाँ के एक छोटे से शहर से कार के ज़रिए मैं अपनी मेज़बान के साथ सुबह पहुँची ऑस्त्विच कैंप.
जब ऑस्त्विच कैंप में लोहे के गेट से आप शिविर के अंदर आते हैं तो एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है, 'आपका काम आपको आज़ादी दिलवाता है.'
अंदर आने पर नज़र एक खास दरवाज़े पर गई. नाज़ी काल से जुड़ी हॉलीवुड की कई फ़िल्में बनी हैं जिनमें एक दृश्य अकसर रहता है जहाँ यहूदी लोगों से लदी रेलगाड़ियाँ एक दरवाज़े से होते हुईं शिविर के अंदर पहुँचती थीं.
इस दरवाज़े को 'गेट ऑफ़ डेथ' कहा जाता है.
शून्य से कई डिग्री कम तापमान में बर्फ़ से ढके इस दरवाज़े के पास जब मैं खड़ी थी तो एक अजीब सी सिहरन मेरे अंदर दौड़ गई.
यहाँ की वीरानगी और सन्नाटे के बीच खड़े होकर आप उस मंज़र की कल्पना भर ही कर सकते हैं
नाज़ी, लोगों के बाल क्यों काट लेते थे?

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इस शिविर का दौरा करवाने वाली गाइड हमें एक ख़ास जगह ले गईं और बताया कि लाखों लोगों को इन गैस चैम्बरों में डालकर मार दिया जाता था.
यूँ तो आज तक देश विदेशों में कई म्यूज़ियमों में जाना का मौका मिला लेकिन ऑस्त्विच के म्यूज़ियम में जाना बेहद अलग और दिल को हिला देने वाला एहसास रहा.
म्यूज़ियम के एक हिस्से में अंदर करीब दो टन बाल रखे गए हैं.
गाइड ने बताया कि मरने से पहले नाज़ी लोगों के बाल काट लेते थे ताकि उनसे कपड़े वगैरह बनाए जा सकें.
लकड़ी के कुछ बिस्तर भी वहाँ देखे जहाँ बंदी सोते थे. यहाँ की हर चीज़ एक कहानी कहती है. शिविर में घूमते हुए मैं वहाँ बने शौचालयों तक पहुँची.
बताया गया कि बंदी इन शौचालयों को साफ़ करने की ड्यूटी को बेहतर काम समझते थे क्योंकि शौचालय साफ़ करने वालों को यातनाएँ कम उठानी पड़ती थीं.
लेकिन इन शिविरों में एक अनोखी चीज़ भी देखने को मिली. यातनाओं के बीच छिप-छिपाकर कुछ क़ैदी कला को ज़िंदा रखे हुए थे.
एक क़ैदी की बनाई कलाकृति देखकर मन में ख़्याल आया कि उस क़ैदी के ज़ेहन में उस समय क्या चल रहा होगा.
'वॉल ऑफ़ डेथ'

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ऑस्त्विच शिविर के परिसर में एक दीवार है जिसे 'वॉल ऑफ़ डेथ' कहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि यहाँ अक्सर लोगों को बर्फ़ के बीच खड़ा कर गोली मार दी जाती थी.
ऑस्त्विच कैंप के मेरे इस दौरे में एक बात मुझे खटकी. मेरी मेज़बान दूसरे शहर से गाड़ी चलाकर मुझे यहाँ ले आईं पर अंदर नहीं गईं.
उन्होंने घंटों खड़े होकर बाहर ही मेरा इंतज़ार किया. पूछने पर कोई खास वजह नहीं बताई. शाम को वो मुझे अपनी दादी के यहाँ ले चलीं.
80 साल से ज़्यादा की उम्र, आँखों में रोशनी न के बराबर.
जब बातों का सिलसिला निकला तो दोस्त की दादी ने बताया था कि कैसे वो नाज़ी यातना शिविर से ज़िंदा बच निकलने में सफल रहीं थी लेकिन उनके परिवार के बहुत सारे लोग मारे गए थे.
नाज़ी यातना शिविर से ज़िंदा बच निकलने वाली महिला ने क्या कहा?
दादी ने ये भी बताया था कि कैसे हर साल इसराइल से कितने ही अनजान लोग उनसे मिलने आते हैं, वो लोग जिनके अपने कभी ऑस्त्विच कैंप से ज़िंदा बाहर नहीं आ सके.
इस उम्मीद में लोग उनके पास आते हैं कि शायद दादी भी उसी कैंप में रही हों और वो उनके रिश्तेदारों के बारे में कुछ बता पाएँ.
यातना शिविरों के किस्से किताबों के पन्नों में पढ़े थे, फ़िल्मों में देखे थे लेकिन एक चश्मदीद से ये सब सुनना स्तब्ध करने वाला था.
इसके बाद मैंने अपनी मेज़बान से कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा कि क्यों वो मेरे साथ ऑस्त्विच कैंप के अंदर नहीं गई और दोबारा कभी ऑस्त्विच के बारे में उनसे बात नहीं की.
किस्सा 1933 में शुरू हुआ जब नाज़ी जर्मनी में सत्ता में आए और उन्होंने यहूदियों से उनके अधिकार छीनने शुरु कर दिए -फिर वो जायदाद हो या दूसरे अधिकार.
जर्मनी ने सितंबर 1939 में पोलैंड पर हमला किया और नाज़ियों ने यहूदियों को पोलैंड भेजना शुरु कर दिया. ऑस्त्विच उस वक़्त पोलैंड में आर्मी बैरेक हुआ करता था.
1940 में इसे क़ैदियों के लिए जेल के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. यहाँ लाए गए लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया जाता- वो जो काम करने लायक होते थे और वो जिन्हें तुरंत मार दिया जाता.
जब सोवियत सेना ने 27 जनवरी 1945 को यहाँ क़दम रखा तो उन्हें कुछ हज़ार लोग मिले जो ज़िंदा थे. साथ में मिले हज़ारों कपड़े और कई टन लोगों के बाल. वही बाल जो मैंने कई दशक बाद ऑस्त्विच के म्यूज़ियम में देखे. एक बड़ी त्रासदी के बेजान से गवाह.
ऑस्त्विच को नाज़ियों से मुक्त कराने के 27 जनवरी को 80 साल पूरे हो रहे हैं.
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