पाकिस्तान: जरांवाला दंगों के कई महीने बाद भी ईसाई समुदाय में ख़ौफ़

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- Author, कैरोलिन डेवीस
- पदनाम, बीबीसी, जरांवाला
उत्तर पूर्वी पाकिस्तान के शहर जरांवाला में चार महीने पहले ईसाई समुदाय ने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की ओर से दो दर्जन गिरजाघरों और कई घरों में तोड़फोड़ का मंज़र देखा था.
उसके बाद सरकार ने उनके गिरजाघरों और मकानों के पुनर्निर्माण में मदद के लिए पैसे देने का वादा किया था लेकिन अब उनका सबसे बड़ा त्योहार क्रिसमस सामने है और ईसाई समुदाय उन नुक़सानों की वजह से सदमे में हैं.
क्रिसमस कैरोल जुलूस जरांवाला की पिछली गलियों से गुज़रता है, जिसमें पारंपरिक गायक भी शामिल होते हैं. यह जुलूस चर्च से शुरू होता है, जिसमें पादरी के साथ दो ढोलची और लगभग 15-20 उत्साही गवैये शामिल हैं.
यह जुलूस अंधेरी गलियों से गुज़रता है, जहाँ लोग अपने मोबाइल फ़ोन की टॉर्च से रोशनी करते हैं और जैसे-जैसे यह आगे बढ़ता है, हर गली और मोड़ से उसमें और लोग शामिल होते जाते हैं.
बच्चे अपने क्रिसमस के बेहतरीन लिबास में होते हैं, कुछ अपनी पसंदीदा कैरोल लाइनों को सस्वर गा रहे हैं जबकि दूसरे लोग शर्माते हुए इसमें शामिल होते हैं.
वह सब चमकदार कमानों, फ़ादर क्रिसमस टोपियों और लाइट अप ट्रेनर्स के साथ चमकदार लिबास में सड़कों से गुज़रते हुए कैरोल के जुलूस में शामिल होते हैं.
कुछ बड़े लड़के छोटे-छोटे पटाख़े फोड़ते हैं और जब उन पटाख़ों से उनकी माएं डर जाती हैं और उन्हें डांटती हैं तो वह आपस में मिलकर हँसते हैं.

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22 गिरजाघरों पर हमले
इस साल जरांवाला में क्रिसमस के त्योहार की पुरानी परंपरा पादरी रिज़वान मिल के लिए एक नया महत्व रखती है.
जुलूस के नेतृत्व से थोड़ा समय निकालकर वह कहते हैं, “क्रिसमस अब हमारे दिलों में है. ईसा मसीह मेरे लिए मुक्तिदाता हैं. उन्होंने मुझे हमले के दौरान बचाया. वह हम सबके मुक्तिदाता हैं.”
इस साल 16 अगस्त को जरांवाला में हज़ारों लोग इस बात पर नाराज़ हो गए कि ईसाई समुदाय के किसी व्यक्ति ने कथित तौर पर जानबूझकर पवित्र क़ुरान के पन्नों को नुक़सान पहुंचाया. इसके बाद ईसाई समुदाय के लोगों पर धर्म के अपमान का आरोप लगाया जाने लगा.
भीड़ हिंसक हो गई, चर्चों और निजी घरों पर हमला कर दिया गया. ईसाई समुदाय के बहुत से लोग शहर में अपने घरों को छोड़ने और खुले मैदाने में रात गुज़ारने पर मजबूर हो गए.
तोड़फोड़ की इन घटनाओं में नौ पुलिस वाले घायल हुए हालांकि किसी नागरिक की जान नहीं गई.
पुलिस ने इंसाफ़ का वादा किया और 350 से अधिक लोगों को गिरफ़्तार किया जबकि सरकार ने विश्वास बहाल करने और इमारतों के पुनर्निर्माण में मदद करने का वादा किया.
अधिकारियों ने कहा है कि जिन 22 गिरजाघरों पर हमला किया गया था अब उन्हें मरम्मत और सजाने संवारने के बाद दोबारा खोल दिया गया है. दीवारों पर ताज़ा पेंट और फ़र्शों पर नए क़ालीन की ताज़ा ख़ुशबू है.
सरकार की ओर से आर्थिक मदद के साथ-साथ परोपकारी संस्थाओं, एनजीओ और स्थानीय मस्जिदों और गिरजाघरों में आयोजित आउटरीच प्रोग्राम के ज़रिए काम किए गए हैं और उपहार दिए गए हैं.
लेकिन चार महीनों के बाद भी कुछ घरों में उस रात होने वाली तोड़फोड़ के निशान नज़र आते हैं.

हमले और तोड़फोड़ के निशान
साइमा अपने घर के एक कमरे में बैठी हुई हैं जो कि अभी तक सही हैं लेकिन उनकी दीवारों पर काले निशान नज़र आते हैं.
वह कहती है कि उन्हें पैसे तो मिले हैं लेकिन इमारत में रहने वाले सभी रिश्तेदारों में बाँटने के बाद काफ़ी नहीं थे. नुक़सान बहुत अधिक था और मरम्मत के काम में समय लग रहा है.
वह बताती हैं, “यह एक बहुत ख़ूबसूरत घर था. मेरे मां-बाप ने इसे पाई पाई बचाकर बनाया था. एक घर बनाने में पूरा जीवन लग जाता है और अब यह सब जल चुका है. हमारे पास जो कुछ था वह सब जल गया है.”
वह कहती हैं कि उनके साथ पूरे घराने में उनके भाई-बहन और उनके बच्चे हैं. कुल मिलाकर चार परिवारों को बीस लाख रुपए दिए गए हैं जो नाकाफ़ी साबित हुए.
इसमें से कुछ रक़म उन लोगों के किराए के लिए दी गई जो घर में नहीं रह सकते. अब साइमा और उनकी एक भाभी रहने के लायक़ अकेले कमरे में रहती हैं.
वह मेरे कानों में रहती हैं, “हम बहुत थक गए हैं”, और फिर वह रोने लगती हैं. “इस एक कमरे में कोई सुविधा नहीं, लाइट नहीं, पानी नहीं. हमारे पास कुछ नहीं है. हम केवल यह चाहते हैं कि यह घर दोबारा बन जाए.”

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डर और भरोसे का संकट
जरांवाला में अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि नुक़सान की जांच करने वाली कमिटी ने 78 परिवारों की निशानदेही की है और हर एक को बीस लाख रुपए दिए गए हैं.
उन्होंने बताया कि रक़म का फ़ैसला हर घर के नुक़सान का जायज़ा लेने के बाद किया गया था.
साइमा के घर के सामने वाली सड़क के उस पार सोनम के घर पर निर्माण और मरम्मत का काम जारी है.
जब हमने अगस्त में यहां का दौरा किया था तो उनके एक बेडरूम से उस समय धुआं उठ रहा था. दूसरे की खिड़की टूटी हुई थी, बिस्तर पहली मंज़िल से गली में फेंक दिया गया था.
अब कमरों को नए फ़र्नीचर के साथ दोबारा रंग दिया गया है लेकिन बेडरूम के दरवाज़े पर अब भी छेद हैं जिन्हें दंगाइयों ने तोड़ दिया था.
सोनम कहती हैं, “हम यहां सुरक्षित महसूस नहीं करते.”
“वह डर जो हमारे दिलों में पैदा हुआ वह अब भी मौजूद है. गलियों में कोई चीख़ पुकार हो तो हर कोई यह देखने के लिए निकल पड़ता है कि क्या हो रहा है क्योंकि हम बहुत डरे हुए हैं. दोबारा भरोसा करना बहुत मुश्किल है.”

पुलिस का रवैया
सिटी पुलिस ऑफ़िसर कैप्टन अली ज़िया कहते हैं, “एक समाज और एक पुलिस फ़ोर्स के तौर पर हमें भरोसा को दोबारा लाना होगा. दोनों ने पहले ही इस दिशा में बहुत कुछ किया है.”
लेकिन अब भी कुछ ग़ुस्सा बाक़ी है.
हमलों के समय कुछ लोगों ने पुलिस की इस बात के लिए आलोचना की थी कि वह नुक़सान को रोकने या भीड़ को समय पर नियंत्रण में लाने में नाकाम रही.
कैप्टन ज़िया का कहना है, "हमारी प्राथमिकता जान बचाने की थी. दूसरी संपत्ति बचाने की थी. उस दिन पुलिस के नौ अधिकारी घायल हुए थे. पुलिस ने बहुत नुक़सान उठाया. कुल मिलाकर हमें लोगों का विश्वास मिला हुआ है.”
पुलिस का कहना है की हक़ीक़त यह है कि गिरफ़्तार किए गए 350 लोगों में से एक चौथाई अभी जेल में बंद हैं. दूसरे ज़मानत पर रिहा हुए हैं लेकिन प्रशासन का रुख़ अटल है कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमे चलाए जाएंगे.
कैप्टन ज़िया का कहना है, “क़ानून लागू करने की अपनी एक प्रक्रिया है. पुलिस महकमा और सरकार यहां के दो सबसे बड़े स्टेक होल्डर हैं. हम यह दिखाना चाहते हैं कि इस हरकत को भविष्य में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अगर हमने इंसाफ़ को सुनिश्चित नहीं किया तो यह होता रहेगा.”

कैप्टन ज़िया का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि अदालती मुक़दमे 2024 की शुरुआत में शुरू हो जाएंगे.
उस समय तक पुलिस तौहीन-ए-रिसालत (हज़रत मोहम्मद के अपमान) के मुक़दमे और हिंसक भीड़ के बारे में विस्तार से बात करने में परहेज़ कर रही है.
लेकिन सड़कों पर होने वाली हिंसा के बारे में पुलिस का कहना है कि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि प्रतिक्रिया पहले से नियोजित थी और इसकी बजाय उनका कहना है कि प्रदर्शन की कॉल सोशल मीडिया के ज़रिए अचानक फैल गई थी.
जरांवाला में कैरोल का जुलूस अंततः चर्च की ओर वापस चला गया जहां से यह शुरू हुआ था.
बच्चे स्नोमैन, क्रिसमस के पेड़ों और फ़ादर क्रिसमस की तस्वीरों से सजे स्टेज पर अपने क्रिसमस डांस का रिहर्सल करना शुरू कर देते हैं.
अगस्त में यह उन गिरजाघरों में से एक था जहां हमले के बाद कई घंटे तक धुआं निकलता रहा.
साइमा ने मुझे बताया, “हम अब भी उस पल को महसूस करते हैं. लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि जो गुज़र चुका वह गुज़र चुका है. हम यही चाहते हैं. इसी के लिए हम दुआ मांगते हैं.”
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