दक्षिण अफ़्रीका में बिजली गुल, कैसे अंधेरे में जीने पर मजबूर हुए लोग? - दुनिया जहान

बिजली

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साल 2007 के आख़िरी महीनों में दक्षिण अफ़्रीका में एक नयी बात आम होने लगी. वो थी लोड शेडिंग यानि बिजली कटौती, जो पहले नहीं होती थी.

शुरुआत में बिजली कभी कभार कुछ घंटों के लिए चली जाती थी.

इससे लोगों को असुविधा तो होती थी लेकिन बड़ी चिंता की बात नहीं थी. लेकिन अब हालात कहीं ज़्यादा बदतर हो गए हैं.

दक्षिण अफ़्रीका के लोगों का कहना है कि अब लगभग हर दिन 8-10 घंटे तक लोड शेडिंग होती है.

बिजली के अचानक आने और जाने से पैदा होने वाले फ़्लक्चुएशन और इलेक्ट्रिक सर्ज की वजह से घर में इस्तेमाल होने वाले अप्लाऐंस ख़राब हो जाते हैं, फ़्रिज में रखा हुआ खाना बेकार हो जाता है.

अस्पताल में मरीज़ों की मौत हो जाती है क्योंकि बिजली के अभाव में ऑपरेशन नहीं किए जा सकते. सड़कों पर ट्रैफ़िक लाइटें काम नहीं करतीं और अफ़रा-तफ़री है.

बिजली ना होने से घरों में पंप से पानी की सप्लाई बाधित हो रही है. लाखों लोगों की जान पर बन आयी है.

पहले दक्षिण अफ़्रीका की यह ढांचागत सुविधाएं दुनिया के विकसित देशों की सुविधाओं से बेहतर हुआ करती थीं. तो अब वह इतनी ख़राब कैसे हो गई हैं?

इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यह जानेंगे कि दक्षिण अफ़्रीका के हालात क्यों ख़राब हो गए हैं?

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जब नेल्सन मंडेला 1994 में पहली बार दक्षिण अफ़्रीका में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति बने तब उन्होंने और उनकी पार्टी अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) ने दक्षिण अफ़्रीका के सभी लोगों का जीवन बेहतर बनाने का वादा किया था.

आज़ाद और बेहतर ज़िंदगी का यह वादा दक्षिण अफ़्रीका के लोगों के दिल को छू गया था. उस समय तक देश के काले लोगों को मतदान का अधिकार नहीं था और एक संपन्न राष्ट्र होने के सभी फ़ायदे अल्पसंख्यक गोरे लोगों को मिल रहे थे जबकि काले लोग ग़रीबी की गर्त में धंसे हुए थे.

उस समय दक्षिण अफ़्रीका की अर्थव्यवस्था कैसी थी, ये समझने के लिए हमने बात की जोहानसबर्ग के डूमा कूबूले से.. जो अर्थशास्त्री और पत्रकार हैं.

अर्थशास्त्री डूमा कूबूले कहते हैं, “वो अर्थव्यवस्था दक्षिण अफ़्रीका के गोरे लोगों के फ़ायदे के लिए बनी थी, जिनकी आबादी 10 प्रतिशत से भी कम थी.”

“इसलिए उस समय गोरे लोगों की प्रति व्यक्ति आय विकसित देश के लोगों की आय जैसी थी जबकि बहुसंख्यक काले लोगों की आय अफ़्रीका के अन्य पिछड़े देशों की प्रति व्यक्ति आय के समान थी.”

उनके मुताबिक, “यह अर्थव्यवस्था एएनसी को विरासत में मिली थी.”

दक्षिण अफ़्रीका की अर्थव्यवस्था खनन और मोनोपोली यानि एकाधिकार पर आधारित थी.

अर्थव्यवस्था पर पांच से छ: कंपनियों का नियंत्रण था जिनका राजनीति पर भी भारी असर था. दक्षिण अफ़्रीका के पास पूरी आबादी के लिए पर्याप्त संसाधन थे.

वह पूरे अफ़्रीका में सबसे बड़ी औद्योगिक अर्थव्यवस्था थी.

दक्षिण अफ़्रीका के शहर आधुनिक थे जहां आधुनिक सुविधाएं थीं. एएनसी का उद्देश्य था देश के हर कोने में बिजली पहुंचाना और यह काम एस्कॉम कंपनी को सौंपा गया.

बिजली ढांचा

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डूमा कूबूले का कहना है कि इलेक्ट्रिफिकेशन का प्रोजेक्ट काफ़ी सफल रहा. बिजली के साथ साथ, काले बहुसंख्यक लोगों के लिए आवास योजनाओं के तहत मकान भी बनवाए गए.

यह कहा जा सकता है कि एएनसी बिजली, मकान और पानी जैसी मूलभूत सेवाएं लोगों को उपलब्ध कराने में सफल रही.

लेकिन उसके बाद स्थिति गड़बड़ाने लगी. सभी लोगों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं ठप्प होने लगीं.

डूमा कूबूले कहते हैं, “हमें एएनसी से काफ़ी उम्मीदें थीं और हमें लगता था कि वो प्रशासन चलाने में समर्थ होगी. उसने एक दस्तावेज़ भी जारी किया था जिसका शीर्षक था ‘रेडी टू गवर्न’.”

“लोगों को लगता था 30 साल तक निष्कासन में रहने के दौरान उसने आज़ादी मिलने पर प्रशासन चलाने की पूरी तैयारी कर ली होगी. लेकिन ऐसा नहीं था. उस समय एएनसी में प्रशासन चलाने की काबिलियत नहीं थी.”

1990 के दशक में निजीकरण की विचारधारा तेज़ी से प्रचलित हो रही थी और इसका दक्षिण अफ़्रीका की अर्थव्वस्था पर असर पड़ा.

डूमा कूबूले कहते हैं कि उस समय पांच छ: बड़ी कंपनियों के समूहों ने एएनसी को विदेशों में निवेश करने लिए राज़ी कर लिया. इससे हुआ यह कि जो निवेश ये कंपनियां दक्षिण अफ़्रीका में कर सकती थीं वो विदेशों में करने लगीं.

नतीजा यह हुआ कि देश में ढांचागत सुविधाएं मज़बूत करने और समाज कल्याण योजनाओं के लिए पर्याप्त धन नहीं रहा.

मिसाल के तौर पर एस्कॉंम जैसी बिजली निर्माता कंपनी दक्षिण अफ़्रीका में निवेश बढ़ाने के बजाय बाहर की ओर देखने लगी.

डूमा कूबूले ने कहा कि अब अर्थव्यवस्था घाटे में है और देश में बेरोज़गारी की दर बेहद बढ़ गई है. दुनिया में सबसे अधिक आर्थिक असमानता दक्षिण अफ़्रीका में है.

देश की 86 प्रतिशत संपत्ति, केवल 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में है. आधी से अधिक आबादी ग़रीब है. जीडीपी या सकल घरेलू उत्पाद में पिछले 15 सालों में वृद्धि नहीं हुई है.

डूमा कूबूले का अनुमान है कि 2025 तक देश की जीडीपी दर घट कर 2007 के स्तर से भी नीचे चली जा सकती है.

वीडियो कैप्शन, दक्षिण अफ़्रीका में बिजली संकट की पड़ताल

बिखराव

दक्षिण अफ़्रीका में आम लोगों की ज़िंदगी पर लोड शेडिंग का क्या असर पड़ रहा है, इस बारे में पर्यावरण संबंधी संस्था ग्राउंडवर्क के कार्यकर्ता थॉमस मेंगूने का कहना है, “हमें इस स्थिति के अनुसार अपने आप को ढाल कर काम चलाना पड़ता है. बहुत कम लोगों के पास इतने पैसे हैं कि वो सोलर पैनल लगा लें. जब हमें सूचना मिलती है कि कितने बजे कितनी देर के लिए लोड शेडिंग होगी तो हम उस हिसाब से अपने कामकाज की प्लानिंग करते हैं.”

थॉमस मेंगूने की राय है कि नब्बे के दशक में हालात इतने बुरे नहीं थे लेकिन अब तो ज़्यादातर जगहों पर आठ से दस घंटे बिजली ग़ायब रहती है.

आप कल्पना कर सकते हैं कि एक ऐसे देश में जहां आधे से अधिक जनता ग़रीब है और बेरोज़गारी ज़्यादा है, वहां लोड शेडिंग का कितना बुरा असर पड़ता होगा.

कई दुकानें और कारखाने लोड शेडिंग की वजह से काम नहीं कर पाते और इस वजह से हज़ारों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ता है.

थॉमस मेंगूने ने कहा कि लोगों में बहुत नाराज़गी है, “वो सड़कों पर उतर रहे हैं. वो इंतज़ार नहीं कर सकते कि सरकार कुछ करे. अपनी समस्याओं की ओर ध्यान खींचने के लिए वो हिंसा का सहारा भी ले रहे हैं.”

दक्षिण अफ़्रीका में कुछ जगहों पर हैज़ा भी फैल रहा है. लोड शेडिंग की वजह से सिर्फ़ घर में इस्तेमाल होने वाले अप्लाएंस ही ख़राब नहीं हो रहे बल्कि सार्वजनिक सेवाओं के दूसरे ढांचे भी ख़राब हो रहे हैं.

इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.

थॉमस मेंगूने के अनुसार, “अब लोग घर को गर्म रखने, पानी उबालने और खाना पकाने के लिए कोयले का इस्तेमाल कर रहे हैं. कोयला जलाने से जो धुआं फैलता है उसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.”

यह मंज़र हमें दक्षिण अफ्रीका के अपार्थाइड यानि नस्लभेद के समय की याद दिलाते हैं जब ग़रीब शहरों पर कोयले के धुएं की चादर फैली दिखती थी.

सवाल है, कि दक्षिण अफ़्रीका इस स्थिति में कैसे पहुंच गया?

लोड शेडिंग

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धुंधली रौशनी

जब एएनसी ने 90 के दशक में सत्ता संभाली तब बिजली बनाने वाली कंपनी एस्कॉम को देश के हर कोने तक बिजली पहुंचाने के प्रोजेक्ट में मुख्य भूमिका दी गई थी.

उस समय यह कंपनी कैसी थी, यह जानने के लिए हमने बात की एंटॉन एबरहर्ड से जो केपटाउन यूनिवर्सिटी की पॉवर फ़्यूचर्स लैब में प्रोफ़ेसर हैं.

एंटॉन एबरहर्ड ने कहा कि उस समय पूरे अफ़्रीकी महाद्वीप में एस्कॉम, सबसे बड़ी बिजली कंपनी थी.

अफ़्रीका में बनने वाली आधे से अधिक बिजली एस्कॉम सप्लाई करती थी.

वो बताते हैं, “एस्कॉम के पास इस काम का अनुभव और तकनीकी जानकारी थी. आर्थिक दृष्टि से भी वो मज़बूत थी. वह पुनर्निर्माण, विकास और देश में बिजली पहुंचाने के प्रोजेक्ट में बड़ी भूमिका निभा सकती थी.”

एस्कॉम के पास अनुभव और तकनीक मौजूद थी लेकिन राजनीतिक लड़ाइयां, नीतियों में उलटफेर और भ्रष्टाचार के चलते इस कंपनी का डगमगाना निश्चित था. मगर इसके क्या कारण थे?

एंटॉन एबरहर्ड बताते हैं, “योजनाएं विफल हो गईं, तकनीकी जानकार और कुशल कर्मचारी कंपनी छोड़ कर चले गए. बिजली प्लांट के रखरखाव में कमियां रहीं. सरकार में बदलाव और राजनीतिक हस्तक्षेप भी इसके कारण थे.”

“मैं उस टीम में शामिल था जिसने 1998 में ऊर्जा नीति का श्वेतपत्र तैयार किया था. हमने तभी चेताया था कि अगर एस्कॉम ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नये प्लांट में निवेश नहीं किया तो 2007 तक हमें बिजली की कमी हो जाएगी. और वही हुआ. एस्कॉम ने समय रहते निवेश नहीं किया.”

योजनाओं की कमी और समय रहते कदम ना उठाना इस ताकतवर कंपनी को महंगा पड़ा.

लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में फ़ुटबॉल विश्वकप का आयोजन भी एक कारण था जिससे स्थिति बिगड़ती चली गई.

एस्कॉम का ऑफ़िस

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इमेज कैप्शन, जोहानसबर्ग में एस्कॉम का ऑफ़िस.

एंटॉन एबरहर्ड ने कहा कि एस्कॉम के पास बिजली की रिज़र्व मात्रा पहले ही कम थी जिसकी वजह से प्लांट को कुछ समय के लिए बंद करके उसका रखरखाव करना मुश्किल था.

2010 में दक्षिण अफ़्रीका में फ़ीफा फ़ुटबॉल विश्वकप का आयोजन हुआ था. इसके पहले ही सरकार ने एस्कॉम से कहा था कि वर्ल्ड कप के दौरान पूरी दुनिया की नज़र देश पर होगी इसलिए उस दौरान बिजली सप्लाई में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए.

नतीजा यह हुआ कि उस दौरान एस्कॉम ने बिजली प्लांट का मेंटेनंस नहीं किया जिसके परिणाम आने वाले सालों में दिखाई दिए, जब 40 साल पुराने प्लांट में ख़राबियां आने लगीं.

एंटॉन एबरहर्ड का कहना है कि 2014 में बिजली की क़िल्लत बढ़ गई और लोड शेडिंग शुरू हो गई. लेकिन 2018 से लोड शेडिंग की समस्या बढ़ती चली गई.

दक्षिण अफ़्रीका के अधिकांश लोग मानते हैं कि इस समस्या के लिए भ्रष्टाचार और आपराधिक रवैया ज़िम्मेदार है.

एंटॉन एबरहर्ड ने बताया कि एस्कॉम के बिजली उत्पादन प्लांट में ऊंची क्वालिटी के कोयले की जगह निचली क्वालिटी के कोयले का इस्तेमाल किया जाने लगा.

अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए ऊंची क्वालिटी के कोयले को दूसरे देशों को निर्यात किया जाने लगा. इसका बिजली प्लांट पर भारी असर पड़ा.

दूसरी बात यह थी, कि एस्कॉम ने जिन्हें प्लांट के मेंटेनंस का कांट्रेक्ट दिया था वो एस्कॉम के कर्मचारियों के साथ मिल कर जानबूझ कर प्लांट के उपकरणों को बार बार तुड़वा देते थे ताकि उन्हें नये कलपुर्जे लगाने और मेंटेनंस के लिए बुलाया जाए और वो अधिक पैसे कमा सकें.

अभी भी इसे रोक पाना एस्कॉम के लिए बड़ी चुनौती है.

सोलर प्लांट

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कठिन हरित विकल्प

अगले साल एएनसी को चुनावों का सामना करना है. संभावना है कि पहली बार उसे 50 प्रतिशत से भी कम वोट मिले.

बिजली की समस्या और ढांचागत सेवाओं के चरमराने से लोगों की नाराज़गी बढ़ गई है और लगता है कि अब एएनसी कुछ ठोस कदम उठाने को तैयार हो गई है.

सरकार द्वार उठाए गए कदम के बारे में हमने बात की लुंगिले मेशेल से जो ऊर्जा अर्थशास्त्री हैं.

उन्होंने कहा कि, “सरकार ने पिछले 9 महीनों में एक अच्छा कदम यह उठाया है कि एनर्जी बोर्ड में काबिल और जानकार लोगों को शामिल किया है.”

“इन नए लोगों ने समस्या का गहराई से अध्ययन किया है और इंजीनियरिंग ही नहीं बल्कि अर्थशास्त्र और मेनेजमेंट के सही सिद्धांतों पर अमल करना शुरू किया है. उनके प्रयासों के अच्छे नतीजे अभी से सामने आ रहे हैं.”

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफ़ोसा पर आरोप लगते रहे हैं कि वो संकट के समाधान के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं और वो एएनसी के अंदरूनी कलह में फंसे हुए हैं.

मगर अब एक नई योजना सामने रखी गई है जिसे इंटीग्रेटेड रिसोर्स प्लान यानी संगठित संसाधन योजना कहा जा रहा है.

लुंगिले मेशेल ने बताया कि नई ऊर्जा योजना के तहत तय किया जाएगा कि दक्षिण अफ़्रीका को किन चीज़ों में निवेश करना चाहिए और किस किस्म की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए.

देश में पिछले 10 सालों में ऊर्जा उत्पादन के लिए गैस, रिनिवेबल एनर्जी यानि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों और कोयले का इस्तेमाल होता रहा है.

भ्रष्टाचार

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रिनिवेबल ऊर्जा के स्रोतों की चर्चा अक्सर होती है क्योंकि दक्षिण अफ़्रीका में आमतौर पर आसमान साफ़ होता है और सूरज की रौशनी भरपूर होती है. साथ ही हाइड्रो एनर्जी पैदा करना भी एक विकल्प है.

लेकिन बात फिर कोयले पर आकर अटकती है. इसलिए दक्षिण अफ़्रीका में ग्रीन एनर्जी या हरित ऊर्जा अपनाना आसान नहीं है.

लुंगिले मेशेल का कहना है, “दक्षिण अफ़्रीका में 80 प्रतिशत ऊर्जा कोयले से पैदा की जाती है और शेष 20 प्रतिशत हाइड्रो प्लांट और अन्य रिनिवेबल स्रोतों से आती है. कोयला देश के समाज और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.”

“लगभग 90,000 लोग कोयला खदानों में काम करते हैं. अन्य हज़ारों लोग कोयले की ढुलाई और उससे जुड़े व्यापार से रोज़गार पाते हैं. अगर अर्थव्यवस्था की यह चेन टूट जाए तो दक्षिण अफ़्रीका और गहरे संकट में फंस सकता है.”

हर रोज़ कई घंटों की लोड शेडिंग का असर केवल व्यापार और अर्थव्यवस्था पर नहीं बल्कि लोगों के मानसिक स्वास्थ्य भी पड़ रहा है.

एएनसी प्रभावशाली पार्टी है और उसके इरादे भी नेक हैं लेकिन 1994 में उसे विरासत में असमानता वाली अर्थव्यवस्था मिली थी.

उसने लाखों करोड़ों लोगों को आज़ादी और संपन्नता का जो वादा किया था उसे पूरा करने की कोशिश भी की लेकिन अंदरूनी और बाहरी राजनिति की वजह से यह कोशिशें नाकाम हो गईं.

वैश्विक अस्थिरता का भी उस पर बुरा प्रभाव पड़ा. देश में भ्रष्टाचार और आपराधिक रवैये से संपन्नता का सपना और भी धुंधला पड़ गया.

पहले अधिकांश लोगों के घरों तक बिजली नहीं पहुंची थी जो एएनसी की सरकार आने के बाद पहुंच गई.

मगर अब भी लाखों लोग ऐसी बस्तियों में रहते हैं जहां बिजली, साफ़ पानी और स्वास्थ की मौलिक सुविधाएं नहीं हैं.

अगले साल दक्षिण अफ़्रीका के पहले लोकतांत्रिक चुनावों की 30वीं सालगिरह भी है. हो सकता है अगली बार जो नेता सत्ता में आएं वो देश की जनता को इस संकट से उबारने की बेहतर कोशिश करें.

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