पुतिन की वजह से क्यों कूटनीतिक जाल में फंस गया दक्षिण अफ़्रीका

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- Author, एंड्रयू हार्डिंग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, केप टाउन
पिछले कुछ महीने दक्षिण अफ़्रीका के लिए कूटनीतिक लिहाज से असहज करने वाले रहे हैं.
रूस-यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता के ज़रिए दक्षिण अफ़्रीका ख़ुद को गंभीर और संतुलित दिखाने की कोशिश कर रहा था, और गुटनिरपेक्षता का अंतरराष्ट्रीय अगुवा बनने की कोशिश कर रहा था. लेकिन इस बीच ये देश अंतरराष्ट्रीय झगड़ों के भंवर में फंस गया है और अब देश की मुद्रा गिर रही है.
दक्षिण अफ़्रीका के रूस के साथ मधुर संबंध रहे हैं. जिसकी वजह से पश्चिमी देशों में एक धारणा बनी है कि दक्षिण अफ़्रीका ने यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद के लिए हथियार भेजे हैं.
लेकिन क्या यह धारणा सही है, और दक्षिण अफ़्रीका की साख और इसकी नाज़ुक अर्थव्यवस्था के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं?
एक दक्षिण अफ़्रीकी अधिकारी मानते हैं कि कि 'ये एक बुरे सपने जैसा है.'
वे इसी सप्ताह केपटाउन में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका वाले ब्रिक्स समूह के विदेश मंत्रियों की बैठक के इतर ऑफ़-द-रिकॉर्ड बोल रहे थे.
पश्चिमी राजनयिक दबे शब्दों में यूक्रेन युद्ध पर दक्षिण अफ़्रीका के रुख़ को लेकर नाराज़गी जता चुके हैं. उनका कहना है कि दक्षिण अफ़्रीका खु़द के "निष्पक्ष" होने की बात करता है लेकिन इस मामले पर खरा साबित नहीं हुआ है.
केप टाउन में बसे एक रूसी शिक्षक इरिना फिलाटोवा कहते हैं कि, "सरकार रूसियों के पक्ष में है. इसमें कोई शक़ नहीं है. उनका मानना है कि दुनिया अब पश्चिमी मुल्कों के हाथ से निकल रही है. उनका (दक्षिण अफ़्रीका सरकार) मानना है कि रूस मज़बूत देश है और जंग जीत सकता है. वे एक रणनीतिक भविष्य के तहत नई विश्व व्यवस्था में निवेश कर रहे हैं."
लेकिन दूसरे जानकारों का ये कहना है कि पश्चिमी मुल्क इस मामले में ग़लत हैं, वो दक्षिण अफ़्रीका के बारे में सही आकलन नहीं कर पा रहे और राजनयिक हलकों में इसे बड़ा मुद्दा बनाए हुए हैं.
राजनीतिक विश्लेषक फिलानी एमथेम्बू कहते हैं, "दक्षिण अफ़्रीकी सरकार अमेरिका, ब्रिटेन या फिर यूरोपीय संघ से दूर नहीं जाना चाहती. ये सभी उसके महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोगी हैं. ये ग़लत आकलन के कारण खड़ी हुई परेशानी है जिसका कोई आधार नहीं."

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गड़बड़ी कहां हुई?
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद दक्षिण अफ़्रीका ने अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में रूस से तत्काल अपनी सेना को वापस लेने के लिए कहा था.
लेकिन जल्द ही दक्षिण अफ़्रीका ने अपना रुख़ बदल लिया और उसने संयुक्त राष्ट्र में रूसी सरकार की आलोचना करने से इनकार कर दिया था और रूसी हमले के प्रति तटस्थता की नीति अपनाई थी.
लेकिन दक्षिण अफ़्रीका की कई कार्रवाइयों और बयानों को उसके तटस्थ रुख़ से इतर पाया गया, जिसकी वजह से यूक्रेन के सहयोगी दक्षिण अफ़्रीका से नाराज़ हैं.
दक्षिण अफ़्रीका ने रूसी हमले के साल भर होने के बाद रूसी नौसेना अभ्यास की मेज़बानी की.
दक्षिण अफ़्रीका ने क्रेमलिन के वरिष्ठ अधिकारियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. इसके बाद अपने देश के सेना प्रमुख को युद्धाभ्यास के लिए मास्को भेजा.
इस देश के वरिष्ठ अधिकारी अक्सर रूसी सरकार की बातों को दोहराते रहे हैं कि कैसे अमेरिका एक "परोक्ष" युद्ध छेड़ रहा है और कैसे पश्चिमी ताक़तों से लैस यूक्रेन अब रूस के लिए ख़तरा बन गया है.

हाल ही में एक न्यूज़ कॉफ्रेंस में पश्चिमी कूटनीति की हताशा आख़िरकार सामने आ गई. जब अमेरिकी राजदूत रूबेन ब्रिगिटी ने दक्षिण अफ़्रीका पर रूस को हथियार देने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ़्रीका ने बीते दिसंबर में केप टाउन के नज़दीक एक नौसेना बंदरगाह के ज़रिए रूसी जहाज़ में "हथियार और गोला-बारूद" को रूस भेजा था.
इसके बाद अमेरिकी राजदूत ने आशंका जताई कि अमेरिकी सरकार दक्षिण अफ़्रीका पर व्यापार प्रतिबंध लगा सकती है.
रूबेन ब्रिगिटी ने कहा, "हमें विश्वास है कि उस जहाज़ पर हथियार लादे गए थे. मैं उस दावे की सटीकता के एवज में अपनी जान दांव पर लगा दूंगा."
अमेरिकी राजदूत की टिप्पणियों से दक्षिण अफ़्रीका के कई हलकों में गुस्से की झलक मिली. कुछ लोग इसे अमेरिका की औपनिवेशिक मानसिकता के तौर पर देखते हैं.
दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद विरोधी संघर्ष के प्रमुख चेहरे मावूसो सिमांग कहते हैं, "वह पूरी तरह से अपना आपा खो चुके हैं. क्या हमें अमेरिकी जो कुछ भी कहते हैं उसके आगे झुकना चाहिए? मैं इससे सहमत नहीं हूं. यह जियो-पॉलिटिकल ब्लैकमेल है."
कई दक्षिण अफ़्रीकी नागरिक पूरे महाद्वीप में मुक्ति आंदोलनों के लिए रूस के समर्थन को याद करते हैं.
दक्षिण अफ़्रीका के रक्षा मंत्री थांडी मोडिसे ने सरकार की हताशा को बयां किया है.
दक्षिण अफ़्रीका ने रूस को कितने हथियार भेजे थे इसके जवाब में रक्षा मंत्री ने दक्षिण अफ़्रीकी बोल-चाल की भाषा का एक शब्द कहा जिसका मतलब "कुछ भी नहीं" होता है.

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अफ़्रीकी शांति प्रस्ताव
दक्षिण अफ़्रीका के कूटनीतिक गलियारों में दबे ज़बान ऐसी बात हो रही है कि अमेरिकी राजदूत ने मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है.
लेकिन जब अमेरिकी राजदूत ने कहा कि वो अपने बारे में किसी भी ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए तैयार हैं लेकिन ना तो उन्होंने अपने दावों का वापस लिया और ना ही माफ़ी मांगी.
दक्षिण अफ़्रीका के साइमन टाउन के नौसैनिक बंदगाह के ज़रिए हथियारों को रूस भेजा गया था या नहीं इसके लिए राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने स्वतंत्र जांच की बात कही है.
इसके बाद से अपनी सरकार की तटस्थ छवि को दोबारा क़ायम करने के लिए उन्होंने मास्को और कीव में एक शांति प्रतिनिधि दल भेजने की योजना का ऐलान किया है.
दक्षिण अफ़्रीका के विदेश मंत्री नलदेई पंडोर ने एक स्थानीय रेडियो स्टेशन को बताया कि, "ये आसान नहीं होगा लेकिन इसे करना ही होगा."
इस बीच विपक्षी डेमोक्रेटिक एलायंस (डीए) ने अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) पर रूस के क़रीब होने का आरोप लगाया है क्योंकि मौजूदा सरकार ने देश को दिवालियेपन की ओर ढकेल दिया है और एएनसी पार्टी की सरकार रूस से मिलने वाली आर्थिक मदद को जारी रखना चाहती है.
डेमोक्रेटिक एलायंस के एक नेता ने कहा, "दक्षिण अफ़्रीका आक्रामक तेवर नहीं रख सकता है, क्योंकि इससे हमारी घरेलू प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को जोख़िम का सामना करना पड़ सकता है."
उलझी हुई कूटनीति की वजह से दक्षिण अफ़्रीका पहले से ही काफ़ी आर्थिक कीमत चुका रहा है.
अमेरिकी राजदूत के साथ हथियारों की तकरार के बाद दक्षिण अफ़्रीकी मुद्रा रैंड अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले तेज़ी से गिरी. इसके अलावा विदेशी निवेश और विदेशी व्यापार सौदों के नुक़सान को लेकर भी चिताएं हैं.
पहले से ही लचर ऊर्जा प्रणाली, बेरोज़गारी और ढहते बुनियादी ढांचे से जूझ रहे देश के लिए ये बुरी ख़बर है. और दक्षिण अफ़्रीका अब एक और कूटनीतिक जटिलता का सामना कर रहा है. सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि अगस्त में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में जोहानिसबर्ग आने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को दिए गए निमंत्रण पर कायम रहना है या नहीं.

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अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) के द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय गिरफ्तारी वारंट जारी कर पुतिन की गिरफ़्तारी के आदेश दिए गए है. अगर पुतिन दक्षिण अफ़्रीका जाते हैं तो वहां कि सरकार उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य होगी.
मार्केट एनालिस्ट पीटर अटार्ड मोंटाल्टो ने चिंता व्यक्त करते हुए दक्षिण अफ़्रीका को चेतावनी दी.
उनका कहना है कि रूस ने दक्षिण अफ़्रीका का इस्तेमाल चालाकी से किया है. और दक्षिण अफ़्रीका ने बेवजह पश्चिमी मुल्कों का विरोध किया है.
पीटर कहते हैं, "अगर पुतिन आते हैं, तो मुझे लगता है कि ये गंभीर झटका होगा. पश्चिम की तरफ से इसपर व्यापक प्रतिक्रिया होगी. मुद्रा में गिरावट आएगी."
लेकिन इस बात के संकेत बढ़ रहे हैं कि दक्षिण अफ़्रीका पुतिन की मेजबानी से बचने की राह तलाश रहा है.
और इसके लिए शायद वो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी किसी दूसरे देश को सौंप दे.
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