दुनिया के विभिन्न देशों में कैसे-कैसे होती है शासक की ताजपोशी?

थाईलैंड के महाराजा की ताजपोशी के वक़्त बैंकॉक में शाही महल के पास परेड करते हाथी.

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इमेज कैप्शन, थाईलैंड के महाराजा की ताजपोशी के वक़्त बैंकॉक में शाही महल के पास परेड करते हाथी.
    • Author, जेमी मोरलैंड
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

ऐतिहासिक परंपराओं में रचे बसे समारोह में सम्राट चार्ल्स की ताजपोशी हो रही है, तो पूरी दुनिया की नज़र इस कार्यक्रम पर है. लेकिन, दुनिया में और भी राजशाही हैं, जहां पर ताजपोशी के ब्रिटेन सरीखे असाधारण रिवाजों का चलन है.

आइए आपको दुनिया में उन कुछ बचे-खुचे राजपरिवारों में ताजपोशी के रीति रिवाजों के बारे में बताते हैं, जिनके ज़रिए लोग अपने महाराज या महारानी के राज्याभिषेक का जश्न मनाते हैं.

इन रिवाजों में बछड़े की खाल से बना मुकुट पहनाने से लेकर एक ऐसा पवित्र तख़्त भी शामिल है, जिस पर कभी बैठा नहीं जा सकता.

ब्रिटेन की विंचेस्टर यूनिवर्सिटी में पुनर्जागरण के इतिहास की रीडर डॉ लेना वुडेकर कहती हैं कि राजशाही संस्कारों और समारोहों के आधार पर चलती हैं.'

डॉ एलेना समझाती हैं, 'आप देखते हैं कि अलग-अलग राजपरिवारों में ताजपोशी की रीति और उसके रिवाज भी अलहदा होते हैं. हर राजपरिवार में या तो सिर पर कुछ न कुछ रखा जाता है, या तख़्त पर बिठाया जाता है. इसके अलावा ताजपोशी के दौरान कुछ राजचिह्न और शाही लिबास भी देखने को मिलते हैं. और, तेल छिड़कने जैसे पवित्रता के कुछ प्रतीक भी शामिल होते हैं.'

वो कहती हैं, 'राज्याभिषेक समारोह के ये सारे तत्व किसी राजा या रानी के शासन पर मुहर लगाने का काम करते हैं. और ये परंपराएं शाही शासक और उसकी प्रजा के बीच रिश्ते को मज़बूत भी बनाते हैं.'

2019 में राज्याभिषेक के दौरान अपने ऊपर पवित्र जल उड़ेलते थाईलैंड के महाराजा महा वाजिरालोंगकोर्न

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अभिमंत्रित जल

राजतिलक के दौरान ब्रिटेन के महाराजा चार्ल्स पर एक गोपनीय नुस्खे वाला पवित्र तेल तैयार किया गया है. कैंटरबरी के आर्कबिशप, महाराजा के सिर, सीने और हाथों पर ये पवित्र तेल लगाते हैं.

इस परंपरा को ब्रिटेन के शाही शासक की ताजपोशी का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है. पवित्र तेल छिड़कने से महाराजा या महारानी को एक आध्यात्मिक दर्जा भी मिल जाता है, क्योंकि वो चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के भी प्रमुख होते हैं.

थाईलैंड में भी शाही परिवार की ताजपोशी के समारोह में एक ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई जाती है. इस दौरान नए राजा को 'शुद्ध' करने और अभिषेक के लिए उनके ऊपर पवित्र जल उड़ेला जाता है.

महाराजा के अभिषेक के लिए ये जल पूरे थाईलैंड के 100 से ज़्यादा जलस्रोतों से जमा किया जाते हैं, वो भी स्थानीय समय के मुताबिक़, सुबह 11.52 से लेकर दोपहर 12.38 के बीच.

थाई ज्योतिष विज्ञान में ये समय बेहद ख़ास माना जाता है. फिर इस जल को बौद्ध परंपराओं के मुताबिक़ अभिमंत्रित किया जाता है.

ओटुमफुओ ओसेई टुटु II, घाना के 'अशांति' क्षेत्र में रहने वालों की असांतेहीन हैं.

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ऐसा पवित्र तख़्त जिस पर बैठना भी मना है

राज्याभिषेक समारोह के दौरान सम्राट या महारानी ज़्यादातर समय ताजपोशी वाली कुर्सी पर बैठे रहते हैं.

शाहबलूत की लकड़ी से बनी ये कुर्सी 700 से भी ज़्यादा बरस पुरानी है और ब्रिटेन में अब तक इसी काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा, ये सबसे पुराना फर्नीचर है. इसे ताजपोशी के लिए ही बनाया गया था.

इस कुर्सी की बनावट ऐसी है कि इसमें स्टोन ऑफ़ डेस्टिनी भी रखा रहता है. ये स्कॉटलैंड के राजाओं की ताजपोशी का ऐतिहासिक प्रतीक है.

पश्चिमी अफ्रीका की असांते रियासत में असांतेहीन, उसके धार्मिक प्रमुख होते हैं. इस साम्राज्य की स्थापना 17वीं सदी के आख़िर में हुई थी. जब ये सल्तनत अपनी सत्ता के शिखर पर थी, तो इसका इलाक़ा आज के अफ्रीकी देश घाना से भी बड़ा था.

असांते संस्कृति की सबसे पवित्र चीज़ एक सुनहरी चौकी होती है. इसे सिका ड्वा कोफी भी कहा जाता है. असांते के लोग मानते हैं कि इस चौकी में असांते क़बीले के लोगों की 'आत्मा' बसती है.

इस चौकी को इतना पवित्र माना जाता है कि इस पर कोई भी नहीं बैठ सकता, यहां तक कि राजा भी नहीं. इसलिए, असांतेहीनी के राज्याभिषेक के वक़्त उन्हें इस पवित्र चौकी पर बिठाने के बजाय उठाकर इसके ऊपर झुकाया जाता है.

हालांकि, साल 1900 में गोल्ड कोस्ट के बर्तानवी गवर्नर सर फ्रेडरिक हॉजसन ने इस पवित्र चौकी पर बैठने की इच्छा ज़ाहिर की और अपने सैनिकों को इसे तलाशने का हुक्म दिया.

पवित्र चौकी की इस खोज के ख़िलाफ़ असांते की महारानी की मां या असांतेवा की अगुवाई में बग़ावत हो गई. हालांकि ब्रिटेन की सेना ने उन्हें हरा दिया और उनकी रियासत ब्रिटिश उपनिवेश में मिला ली. असांते क़बीले की ये राजशाही 1935 में जाकर दोबारा बहाल की गई.

2019 में अपने सिंहासन पर बैठने का एलान करते हुए जापान के सम्राट नारुहितो.

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छतरियां, पर्दे और वस्त्र

ब्रिटेन के सम्राट या महारानी का राज्याभिषेक इतना पवित्र और गोपनीय माना जाता है कि अभिषेक की प्रक्रिया के दौरान महाराजा को जनता की नज़र से छुपाने के लिए उनके ऊपर एक छतरी लगा दी जाती है. इस दौरान वहां जमा भीड़, 'ईश्वर राजा की रक्षा करें' के नारे भी लगाए जाते हैं.

जापान के सम्राट की ताजपोशी के वक़्त भी ऐसे ही लम्हे देखने को मिलते हैं.

राज्याभिषेक के दौरान, एक पवेलियन पर लगे बैंगनी रंग के पर्दे उठाए जाते हैं, जिससे सिंहासन के सामने खड़े सम्राट के दीदार हो सकें. इस दौरान सम्राट के बगल में एक प्राचीन तलवार और रत्न रखे होते हैं.

मुंह-दिखाई के बाद, जापान के सम्राट एक औपचारिक शाही एलान करते हैं. उस वक़्त वो पीले और नारंगी रंग का एक ऐसा शाही लबादा पहने रहते हैं, जो सम्राट कुछ ख़ास मौक़ों पर ही पहना करते हैं.

इसके बाद वहां मौजूद लोग 'बनज़ाई!' का शोर मचाते हैं, जिसका मतलब होता है, 'सम्राट जुग-जुग जिएं'.

जापान के सम्राट नारूहितो के राज्याभिषेक समारोह में ब्रिटेन के महाराज चार्ल्स और सैकड़ों दूसरे विदेशी मेहमान भी शामिल हुए थे.

दक्षिण अफ्रीका की 20 फ़ीसदी आबादी ज़ुलू है. इसलिए ज़ुलू का शाही परिवार अभी भी बेहद प्रभावशाली बना हुआ है.

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पंख और शेर की खालें

राज्याभिषेक के वक़्त ब्रिटेन के सम्राट या महारानी एक ख़ास लबादा पहनते हैं. जब वो वेस्टमिंस्टर एबी में दाख़िल होते हैं, तो वो मखमल का लाल रंग का एक लंबा सा लबादा पहने होते हैं, जिस पर हाथ से सुनहरे धागे की कढ़ाई की गई होती है और अरमाइन नाम के सफ़ेद रंग के महंगे फर का अस्तर लगा होता है.

समारोह के अंत में सम्राट दूसरा शाही लबादा पहनते हैं.

1953 में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने अपनी ताजपोशी के वक़्त रेशम का सात मीटर लंबा गाउन पहना हुआ था. उस पर सोने और चांदी के 18 तरह के तारों से कढ़ाई के साथ साथ, ब्रिटेन और कॉमनवेल्थ के प्रतीक चिह्नों की कशीदाकारी की गई थी. इस गाउन की कढ़ाई में 3,500 घंटे लगे थे.

दक्षिण अफ्रीका की आठ क़बीलाई रियासतों के शाही शासकों में से ज़ुलू के राजा सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली होते हैं. वो भी अपनी ताजपोशी के वक़्त एक ख़ास लिबास पहनते हैं.

पारंपरिक ज़ुलू समारोह के दौरान, महाराजा जानवरों के एक पवित्र बाड़े में प्रवेश करते हैं, ताकि वो अपने पुरखों से समर्थन की गुहार लगा सकें. उस वक़्त महाराजा उस शेर की खाल से बना लबादा पहने रहते हैं, जिसका शिकार उनके पुरखों ने किया होता है.

इसका मक़सद स्वर्ग में बिराजे पुरखों की नज़र में ये साबित करता होता है कि वो ही असली महाराजा हैं.

2022 में उनकी ताजपोशी के समारोह में जब दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने उन्हें मान्यता का प्रमाणपत्र दिया, तो ज़ुलू महाराजा मिसुज़ुलू का ज़्वेलिथिनी तेंदुए की खाल वाला लिबास और पंख पहने हुए थे.

1997 में ताजपोशी के वक़्त लेसोथो के राजा लेत्सी तृतीय के सिर पर चमड़े की पट्टी लगाई गई.

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इमेज कैप्शन, 1997 में ताजपोशी के वक़्त लेसोथो के राजा लेत्सी तृतीय के सिर पर चमड़े की पट्टी लगाई गई.

बछड़े के चमड़े से बना ताज

राज्याभिषेक के रिवाजों में मुकुट की अहमियत सबसे ज़्यादा होती है. मुकुट किसी महाराजा या महारानी के शासक बनने का प्रतीक होता है.

किंग चार्ल्स III का मुकुट खालिस सोने से बना है और इसमें माणिक्य और नीलम लगे हुए हैं. ताजपोशी के बाद सम्राट चार्ल्स इस मुकुट को धारण नहीं करेंगे.

समारोह के आख़िर में किंग चार्ल्स III, 1.06 किलो वज़न वाला इंपीरियल स्टेट क्राउन पहनेंगे. ये मुकुट भी आधिकारिक आयोजनों जैसे कि संसद सत्र के उद्घाटन के मौक़े पर पहना जाता है.

अफ्रीकी देश लेसोथो में ताजपोशी के वक़्त नए राजा के सिर पर बछड़े के चमड़े से बनी पट्टी और एक पंख लगाया जाता है. ये काम क़बीले के दो पारंपरिक प्रमुख करते हैं.

लेसोथो के राजा अपने राजतिलक के वक़्त जानवरों के पारंपरिक चमड़े को ओढ़े रहते हैं. और वो नीले रंग का एक कुर्ता भी पहनते हैं, जिस पर एक मगरमच्छ की सुनहरी कढ़ाई की हुई होती है. कार्यक्रम के दौरान प्रजा नाचती-गाती रहती है.

लेत्सी तृतीय का राज्याभिषेक, राजधानी मसेरू के एक खेल के स्टेडियम में हुआ था. इस समारोह में ब्रिटेन के महाराजा चार्ल्स और उस वक़्त दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे नेल्सन मंडेला भी शामिल हुए थे.

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